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PanchangBodhसटीक वैदिक कैलेंडर

एकादशी तिथियां और समय 2026

भगवान विष्णु के लिए पवित्र उपवास

24 पवित्र दिन
सटीक समय
नई दिल्ली
अगला:पुत्रदा एकादशी, 23 अगस्त, नई दिल्ली
2025
वर्ष
2026
2027
अगला:Putrada एकादशी, 23 अगस्त, New Delhi

2026 एकादशी कैलेंडर

New Delhi के लिए गणना किया गया समय

षट्तिला एकादशी

बुध, जनवरी 14, 2026, 03:19 अपराह्न

माघ, कृष्ण पक्ष

षट्तिला एकादशी—संपन्नता और दान‑पुण्य का साधन; आर्थिक बाधाएं घटती हैं।

एकादशी तिथि समय

शुरू:बुध, जनवरी 14, 2026, 03:19 अपराह्न
समाप्ति:बुध, जनवरी 14, 2026, 05:53 अपराह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: जनवरी 14, 2026
वैष्णव: जनवरी 14, 2026

जया एकादशी

गुरु, जनवरी 29, 2026, 04:37 अपराह्न

माघ, शुक्ल पक्ष

जया एकादशी—कठिनाइयों पर विजय और सत्कर्मों में सफलता।

एकादशी तिथि समय

शुरू:गुरु, जनवरी 29, 2026, 04:37 अपराह्न
समाप्ति:गुरु, जनवरी 29, 2026, 01:56 अपराह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: जनवरी 29, 2026
वैष्णव: जनवरी 29, 2026

जया एकादशी

शुक्र, फ़रवरी 13, 2026, 12:23 अपराह्न

फाल्गुन, कृष्ण पक्ष

विजया एकादशी—विजय और सिद्धि के लिए शुभ; बाधाएँ हटती हैं।

एकादशी तिथि समय

शुरू:शुक्र, फ़रवरी 13, 2026, 12:23 अपराह्न
समाप्ति:शुक्र, फ़रवरी 13, 2026, 02:27 अपराह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: फ़रवरी 13, 2026
वैष्णव: फ़रवरी 13, 2026

आमलकी एकादशी

शुक्र, फ़रवरी 27, 2026, 12:34 पूर्वाह्न

फाल्गुन, शुक्ल पक्ष

आमलकी/आमलकी एकादशी—आरोग्य और दीर्घायु का आशीर्वाद। (नोट: परंपरा अनुसार तिथियां भिन्न हैं)

एकादशी तिथि समय

शुरू:शुक्र, फ़रवरी 27, 2026, 12:34 पूर्वाह्न
समाप्ति:शुक्र, फ़रवरी 27, 2026, 10:33 अपराह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: फ़रवरी 27, 2026
वैष्णव: फ़रवरी 28, 2026

पापमोचनी एकादशी

रवि, मार्च 15, 2026, 08:12 पूर्वाह्न

चैत्र, कृष्ण पक्ष

पापमोचनी एकादशी पाप क्षय और आंतरिक शुद्धि का दिन है—पुरानी भूलों को छोड़ने की शक्ति देती है।

एकादशी तिथि समय

शुरू:रवि, मार्च 15, 2026, 08:12 पूर्वाह्न
समाप्ति:रवि, मार्च 15, 2026, 09:17 पूर्वाह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: मार्च 15, 2026
वैष्णव: मार्च 15, 2026

कामदा एकादशी

रवि, मार्च 29, 2026, 08:46 पूर्वाह्न

चैत्र, शुक्ल पक्ष

कामदा एकादशी शुभता और आध्यात्मिक वृद्धि देती है। नकारात्मक प्रभाव घटते हैं और शांति‑समृद्धि बढ़ती है।

एकादशी तिथि समय

शुरू:रवि, मार्च 29, 2026, 08:46 पूर्वाह्न
समाप्ति:रवि, मार्च 29, 2026, 07:47 पूर्वाह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: मार्च 29, 2026
वैष्णव: मार्च 29, 2026

वरूथिनी एकादशी

सोम, अप्रैल 13, 2026, 01:18 पूर्वाह्न

वैशाख, कृष्ण पक्ष

वरूथिनी एकादशी सुरक्षा और बल देती है—भय और चुनौतियों पर विजय में सहायक। (नोट: परंपरा अनुसार तिथियां भिन्न हैं)

एकादशी तिथि समय

शुरू:सोम, अप्रैल 13, 2026, 01:18 पूर्वाह्न
समाप्ति:सोम, अप्रैल 13, 2026, 01:09 पूर्वाह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: अप्रैल 13, 2026
वैष्णव: अप्रैल 14, 2026

मोहिनी एकादशी

सोम, अप्रैल 27, 2026, 06:08 अपराह्न

वैशाख, शुक्ल पक्ष

मोहिनी एकादशी भगवान विष्णु के मोहिनी रूप से जुड़ी है—कृपा और आंतरिक सौंदर्य का प्रतीक।

एकादशी तिथि समय

शुरू:सोम, अप्रैल 27, 2026, 06:08 अपराह्न
समाप्ति:सोम, अप्रैल 27, 2026, 06:17 अपराह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: अप्रैल 27, 2026
वैष्णव: अप्रैल 27, 2026

अपरा एकादशी

बुध, मई 13, 2026, 02:53 अपराह्न

ज्येष्ठ, कृष्ण पक्ष

अपरा एकादशी पुराने संकटों से उबारकर शांति और आध्यात्मिक प्रगति में सहायक मानी जाती है।

एकादशी तिथि समय

शुरू:बुध, मई 13, 2026, 02:53 अपराह्न
समाप्ति:बुध, मई 13, 2026, 01:30 अपराह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: मई 13, 2026
वैष्णव: मई 13, 2026

पद्मिनी एकादशी

मंगल, मई 26, 2026, 05:12 पूर्वाह्न

Adhika Jyeshtha, शुक्ल पक्ष

पद्मिनी (अधिक मास) एकादशी—असाधारण आध्यात्मिक फल देती है। (नोट: परंपरा अनुसार तिथियां भिन्न हैं)

एकादशी तिथि समय

शुरू:मंगल, मई 26, 2026, 05:12 पूर्वाह्न
समाप्ति:मंगल, मई 26, 2026, 06:22 पूर्वाह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: मई 26, 2026
वैष्णव: मई 27, 2026

रमा एकादशी

गुरु, जून 11, 2026, 12:58 पूर्वाह्न

Adhika Jyeshtha, कृष्ण पक्ष

परमा (अधिक मास) एकादशी—श्रेष्ठ आध्यात्मिक लाभ और स्वतंत्रता। (नोट: परंपरा अनुसार तिथियां भिन्न हैं)

एकादशी तिथि समय

शुरू:गुरु, जून 11, 2026, 12:58 पूर्वाह्न
समाप्ति:गुरु, जून 11, 2026, 10:37 अपराह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: जून 11, 2026
वैष्णव: जून 12, 2026

निर्जला एकादशी

गुरु, जून 25, 2026, 06:13 अपराह्न

ज्येष्ठ, शुक्ल पक्ष

निर्जला एकादशी सबसे कठिन—बिना पानी के। इसके पुण्य सभी एकादशियों के समतुल्य माने जाते हैं।

एकादशी तिथि समय

शुरू:गुरु, जून 25, 2026, 06:13 अपराह्न
समाप्ति:गुरु, जून 25, 2026, 08:10 अपराह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: जून 25, 2026
वैष्णव: जून 25, 2026

योगिनी एकादशी

शुक्र, जुलाई 10, 2026, 08:17 पूर्वाह्न

आषाढ़, कृष्ण पक्ष

योगिनी एकादशी स्वास्थ्य, समृद्धि और साधना‑फल के लिए शुभ मानी जाती है। (नोट: परंपरा अनुसार तिथियां भिन्न हैं)

एकादशी तिथि समय

शुरू:शुक्र, जुलाई 10, 2026, 08:17 पूर्वाह्न
समाप्ति:शुक्र, जुलाई 10, 2026, 05:23 पूर्वाह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: जुलाई 10, 2026
वैष्णव: जुलाई 11, 2026

देवशयनी एकादशी

शनि, जुलाई 25, 2026, 09:13 पूर्वाह्न

आषाढ़, शुक्ल पक्ष

देवशयनी एकादशी से चातुर्मास आरंभ—आध्यात्मिक साधना के लिए अत्यंत शुभ काल।

एकादशी तिथि समय

शुरू:शनि, जुलाई 25, 2026, 09:13 पूर्वाह्न
समाप्ति:शनि, जुलाई 25, 2026, 11:35 पूर्वाह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: जुलाई 25, 2026
वैष्णव: जुलाई 25, 2026

कामिका एकादशी

रवि, अगस्त 9, 2026, 02:00 अपराह्न

श्रावण, कृष्ण पक्ष

कामिका एकादशी सद्भावनापूर्ण इच्छाओं की पूर्ति और बाधा निवारण में सहायक।

एकादशी तिथि समय

शुरू:रवि, अगस्त 9, 2026, 02:00 अपराह्न
समाप्ति:रवि, अगस्त 9, 2026, 11:06 पूर्वाह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: अगस्त 09, 2026
वैष्णव: अगस्त 09, 2026

पुत्रदा एकादशी

रवि, अगस्त 23, 2026, 02:01 पूर्वाह्न

श्रावण, शुक्ल पक्ष

पुत्रदा एकादशी परिवार के कल्याण और सौहार्द के लिए मंगलकारी—घर‑परिवार के बंधन मजबूत करने का दिन। (नोट: परंपरा अनुसार तिथियां भिन्न हैं)

एकादशी तिथि समय

शुरू:रवि, अगस्त 23, 2026, 02:01 पूर्वाह्न
समाप्ति:रवि, अगस्त 23, 2026, 04:19 पूर्वाह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: अगस्त 23, 2026
वैष्णव: अगस्त 24, 2026

अजा एकादशी

सोम, सितंबर 7, 2026, 07:30 अपराह्न

भाद्रपद, कृष्ण पक्ष

अजा एकादशी कठिनाइयों पर विजय और अंतःशांति की ओर बढ़ने में सहायक।

एकादशी तिथि समय

शुरू:सोम, सितंबर 7, 2026, 07:30 अपराह्न
समाप्ति:सोम, सितंबर 7, 2026, 05:05 अपराह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: सितंबर 07, 2026
वैष्णव: सितंबर 07, 2026

परिवर्तिनी एकादशी

मंगल, सितंबर 22, 2026, 08:02 अपराह्न

भाद्रपद, शुक्ल पक्ष

परिवर्तिनी/पार्श्व एकादशी भगवान के दिव्य परिवर्तन का उत्सव—सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों लाभ।

एकादशी तिथि समय

शुरू:मंगल, सितंबर 22, 2026, 08:02 अपराह्न
समाप्ति:मंगल, सितंबर 22, 2026, 09:44 अपराह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: सितंबर 22, 2026
वैष्णव: सितंबर 22, 2026

इंदिरा एकादशी

मंगल, अक्टूबर 6, 2026, 02:08 पूर्वाह्न

Ashwina, कृष्ण पक्ष

इंदिरा एकादशी पितरों की शांति और पारिवारिक सौहार्द के लिए विशेष। (नोट: परंपरा अनुसार तिथियां भिन्न हैं)

एकादशी तिथि समय

शुरू:मंगल, अक्टूबर 6, 2026, 02:08 पूर्वाह्न
समाप्ति:मंगल, अक्टूबर 6, 2026, 12:35 पूर्वाह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: अक्टूबर 06, 2026
वैष्णव: अक्टूबर 07, 2026

पापांकुशा एकादशी

गुरु, अक्टूबर 22, 2026, 02:13 अपराह्न

Ashwina, शुक्ल पक्ष

पापांकुशा एकादशी बाधाएँ दूर कर सिद्धि और सफलता दिलाने वाली मानी जाती है।

एकादशी तिथि समय

शुरू:गुरु, अक्टूबर 22, 2026, 02:13 अपराह्न
समाप्ति:गुरु, अक्टूबर 22, 2026, 02:49 अपराह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: अक्टूबर 22, 2026
वैष्णव: अक्टूबर 22, 2026

रमा एकादशी

गुरु, नवंबर 5, 2026, 11:04 पूर्वाह्न

कार्तिक, कृष्ण पक्ष

रमा एकादशी कृपा और समृद्धि का आशीर्वाद देती है।

एकादशी तिथि समय

शुरू:गुरु, नवंबर 5, 2026, 11:04 पूर्वाह्न
समाप्ति:गुरु, नवंबर 5, 2026, 10:36 पूर्वाह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: नवंबर 05, 2026
वैष्णव: नवंबर 05, 2026

प्रबोधिनी एकादशी

शुक्र, नवंबर 20, 2026, 07:16 पूर्वाह्न

कार्तिक, शुक्ल पक्ष

प्रबोधिनी/देवोत्थान एकादशी—भगवान विष्णु के जागरण का दिन; नए आरंभ के लिए शुभ। (नोट: परंपरा अनुसार तिथियां भिन्न हैं)

एकादशी तिथि समय

शुरू:शुक्र, नवंबर 20, 2026, 07:16 पूर्वाह्न
समाप्ति:शुक्र, नवंबर 20, 2026, 06:32 पूर्वाह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: नवंबर 20, 2026
वैष्णव: नवंबर 21, 2026

उत्पन्ना एकादशी

शुक्र, दिसंबर 4, 2026, 11:04 अपराह्न

मार्गशीर्ष, कृष्ण पक्ष

उत्पन्ना एकादशी—एकादशी देवी का आरंभ; दीर्घकालीन दोषों से मुक्ति का अवसर।

एकादशी तिथि समय

शुरू:शुक्र, दिसंबर 4, 2026, 11:04 अपराह्न
समाप्ति:शुक्र, दिसंबर 4, 2026, 11:45 अपराह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: दिसंबर 04, 2026
वैष्णव: दिसंबर 04, 2026

मोक्षदा एकादशी

रवि, दिसंबर 20, 2026, 10:10 अपराह्न

मार्गशीर्ष, शुक्ल पक्ष

मोक्षदा एकादशी—मोक्ष और परम शांति की साधना का श्रेष्ठ दिन।

एकादशी तिथि समय

शुरू:रवि, दिसंबर 20, 2026, 10:10 अपराह्न
समाप्ति:रवि, दिसंबर 20, 2026, 08:15 अपराह्न

अनुष्ठान तिथियां

स्मार्त: दिसंबर 20, 2026
वैष्णव: दिसंबर 20, 2026

About Ekadashi

Sacred days of spiritual purification and devotion to Lord Vishnu

आध्यात्मिक महत्व

Ekadashi literally means "eleven" in Sanskrit, referring to the 11th day of each lunar fortnight. It is considered one of the most auspicious days for spiritual practices.

Mythological Origins

According to the Padma Purana, Ekadashi Devi emerged from Lord Vishnu to defeat the demon Mura, earning the boon of granting liberation to devotees.

Benefits of Observance

Regular observance of Ekadashi brings numerous spiritual, mental, and physical benefits to devoted practitioners.

Types of Ekadashi

Each Ekadashi has unique significance and is associated with specific benefits and spiritual practices.

"Ekadashi दिव्य कृपा का दिन है"

Ekadashi को श्रद्धा से मनाने का वर्णन ग्रंथों में मिलता है—ऐसा पालन हजारों यज्ञ और तीर्थों के समान पुण्य देता है।

Fasting Observance Guidelines

Traditional guidelines for observing Ekadashi fasting with devotion and spiritual discipline.

Fasting Rules
  • Begin fast from sunrise on Ekadashi day
  • Complete abstinence from grains and beans
  • Only fruits, milk, and water allowed (if not doing Nirjala)
  • Break fast on Dwadashi after sunrise
  • Maintain celibacy during the fast
आध्यात्मिक साधना
  • Chant Vishnu mantras and names
  • Read Bhagavad Gita or Vishnu Purana
  • Perform meditation and prayer
  • Visit Vishnu temples if possible
  • Engage in charitable activities
Physical Preparation
  • Eat light meal on Dashami (day before)
  • Avoid heavy or spicy foods
  • Stay hydrated (except during Nirjala)
  • Get adequate rest
  • Avoid strenuous physical activities

महत्वपूर्ण अनुस्मारक

विशिष्ट पालन प्रथाओं के लिए हमेशा अपने आध्यात्मिक गुरु या पारिवारिक परंपराओं से परामर्श लें। समय स्थान और स्थानीय रीति‑रिवाजों के आधार पर भिन्न हो सकते हैं। अपने शरीर की सुनें और केवल रीति‑रिवाज के बजाय भक्ति के साथ अभ्यास करें।

एकादशी प्रश्नोत्तर — व्रत, पारण और प्रकार

एकादशी क्या है?

एकादशी हर पक्ष की ग्यारहवीं तिथि है, जिसे भगवान विष्णु के व्रत के रूप में रखा जाता है। यह महीने में दो बार आती है—एक शुक्ल पक्ष में, एक कृष्ण पक्ष में—इसलिए वर्ष में लगभग चौबीस एकादशी होती हैं। पद्म पुराण इसे आध्यात्मिक शुद्धि के सबसे प्रभावी दिनों में गिनता है।

एक वर्ष में कितनी एकादशी होती हैं?

सामान्यतः चौबीस—हर चंद्र मास में दो। जिस वर्ष अधिक मास पड़ता है, इनकी संख्या पच्चीस या छब्बीस हो सकती है, जिनमें पद्मिनी और परमा एकादशी जुड़ जाती हैं। ऊपर की सूची वर्ष की हर एकादशी नाम सहित दिखाती है, इसलिए सही गिनती वही है जो आप वहाँ देखते हैं।

एकादशी व्रत का पारण कब करें?

व्रत अगली सुबह, द्वादशी को, पारण नामक निश्चित समय में खोला जाता है—सूर्योदय के बाद, द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले, और हरि वासर (द्वादशी के पहले चरण) में कभी नहीं। बहुत जल्दी या बहुत देर से पारण करना व्रत को निष्फल कर देता है, ऐसा माना जाता है। इसीलिए अगले दिन का सूर्योदय एकादशी की तिथि जितना ही महत्वपूर्ण है।

कुछ एकादशी तिथियाँ अलग क्यों होती हैं (स्मार्त बनाम वैष्णव)?

जब एकादशी तिथि दो सूर्योदयों तक फैलती है या दशमी से मिल जाती है, तब स्मार्त और वैष्णव (इस्कॉन) परंपराएँ अलग-अलग दिन तय कर सकती हैं—स्मार्त पहले दिन व्रत रखते हैं, वैष्णव दूसरे (गौण) दिन, ताकि व्रत दशमी से मुक्त रहे। अपनी-अपनी परंपरा में दोनों सही हैं। ऊपर की सूची जहाँ अंतर हो, वहाँ दोनों तिथियाँ दिखाती है।

एकादशी पर चावल क्यों नहीं खाते, और क्या खा सकते हैं?

एकादशी पर अन्न—विशेषकर चावल—त्याग दिया जाता है; परंपरा इसे एक भारीपन से जोड़ती है जो दिन के उद्देश्य के विरुद्ध है। बहुत से लोग फल, दूध और कंद-मूल तक सीमित रहते हैं, या पूर्णतः निराहार व्रत रखते हैं (निर्जला एकादशी पर निर्जल)। साधारण नमक के स्थान पर सेंधा नमक लिया जाता है। वही रूप अपनाएँ जो आपका परिवार और स्वास्थ्य अनुमति दे।

सबसे महत्वपूर्ण एकादशी कौन-सी है?

निर्जला एकादशी (जून) के बारे में माना जाता है कि एक ही निर्जल व्रत में यह सभी एकादशियों का पुण्य समेट लेती है, इसीलिए इसका पालन सबसे व्यापक रूप से होता है। देवउठनी/प्रबोधिनी (नवंबर), जब विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं, और दक्षिण में वैकुंठ एकादशी (दिसंबर–जनवरी) भी प्रमुख हैं। हर एक का अपना महत्व और कथा है।

क्या एकादशी का समय शहर के अनुसार बदलता है?

हाँ। तिथि की शुरुआत और समाप्ति आपके चुने हुए शहर के स्थानीय समय में गणना की जाती है, इसलिए वे स्थान के साथ बदलती हैं। इससे भी महत्वपूर्ण, पारण का समय अगली सुबह आपके स्थानीय सूर्योदय पर निर्भर करता है—इसीलिए पारण का सही समय पाने के लिए शहर चुनना ज़रूरी है। कैलेंडर को स्थानीय बनाने के लिए ऊपर अपना शहर चुनें।

2026 brings New Delhi 24 Ekadashis, 18 of them on weekdays—easier to keep around a work schedule. Nirjala Ekadashi on June 25 is the strictest if you keep the waterless fast.

New Delhi के लिए समय गणना किए गए हैं। पालन परिवार/क्षेत्र परंपरा के अनुसार बदल सकता है।

माह अनुसार एकादशी — पूर्ण वर्ष

जनवरी 2026: जनवरी 2026 में एकादशी बुधवार, 14 जनवरी और गुरुवार, 29 जनवरी को पड़ती हैं।

फ़रवरी 2026: फ़रवरी 2026 में एकादशी शुक्रवार, 13 फ़रवरी और शुक्रवार, 27 फ़रवरी को पड़ती हैं।

मार्च 2026: मार्च 2026 में एकादशी रविवार, 15 मार्च और रविवार, 29 मार्च को पड़ती हैं।

अप्रैल 2026: अप्रैल 2026 में एकादशी सोमवार, 13 अप्रैल और सोमवार, 27 अप्रैल को पड़ती हैं।

मई 2026: मई 2026 में एकादशी बुधवार, 13 मई और मंगलवार, 26 मई को पड़ती हैं।

जून 2026: जून 2026 में एकादशी गुरुवार, 11 जून और गुरुवार, 25 जून को पड़ती हैं।

जुलाई 2026: जुलाई 2026 में एकादशी शुक्रवार, 10 जुलाई और शनिवार, 25 जुलाई को पड़ती हैं।

अगस्त 2026: अगस्त 2026 में एकादशी रविवार, 9 अगस्त और रविवार, 23 अगस्त को पड़ती हैं।

सितंबर 2026: सितंबर 2026 में एकादशी सोमवार, 7 सितंबर और मंगलवार, 22 सितंबर को पड़ती हैं।

अक्टूबर 2026: अक्टूबर 2026 में एकादशी मंगलवार, 6 अक्टूबर और गुरुवार, 22 अक्टूबर को पड़ती हैं।

नवंबर 2026: नवंबर 2026 में एकादशी गुरुवार, 5 नवंबर और शुक्रवार, 20 नवंबर को पड़ती हैं।

दिसंबर 2026: दिसंबर 2026 में एकादशी शुक्रवार, 4 दिसंबर और रविवार, 20 दिसंबर को पड़ती हैं।

वर्ष की 24 एकादशियाँ — विस्तार से

हर चंद्र मास में दो एकादशियाँ आती हैं—शुक्ल और कृष्ण पक्ष की। प्रत्येक की कथा, महत्व, व्रत विधि और पारण के नियम के लिए उसका पृष्ठ खोलें।

एकादशी को विष्णु की तिथि क्यों कहा गया है?

एकादशी का सीधा अर्थ है — ग्यारहवीं। पर पंचांग में तिथि कोई सौर दिन नहीं होती; वह चंद्रमा और सूर्य के बीच बढ़ती दूरी का माप है। जितने समय में चंद्रमा सूर्य से 12 अंश और आगे निकल जाता है, वह अवधि एक तिथि कहलाती है। अमावस्या से ग्यारह ऐसे चरण पूरे होने पर शुक्ल पक्ष की एकादशी आती है, और पूर्णिमा से ग्यारह चरण गिनने पर कृष्ण पक्ष की। हर चांद्र मास में दोनों पक्ष होते हैं, इसलिए यह तिथि महीने में दो बार आती है — सामान्य वर्ष में 24 बार, और जिस वर्ष चांद्र-सौर तालमेल के लिए अधिक मास जोड़ा जाता है, उस वर्ष 26 बार।

स्वाभाविक प्रश्न है कि तीस तिथियों में ग्यारहवीं ही उपवास की तिथि क्यों बनी। परंपरा इसका उत्तर कई परतों में देती है। पुरुषसूक्त कहता है — "चन्द्रमा मनसो जातः", अर्थात मन का जन्म चंद्रमा से हुआ। इसी कारण हर तिथि केवल प्रकाश की एक अवस्था नहीं, मन की भी एक अवस्था मानी गई। ग्यारह की संख्या का अपना संकेत है: दस इंद्रियाँ और उनके ऊपर ग्यारहवाँ मन। ग्यारहवें दिन का उपवास, इस दृष्टि से, इन सभी ग्यारह पर एक साथ लगाम लगाने का अभ्यास है। यही कारण है कि एकादशी के व्रत को पहले मन का संयम और उसके बाद आहार का संयम कहा गया।

पुराण इस तिथि को और ऊँचा आसन देते हैं। पद्म पुराण में हर एकादशी का अलग माहात्म्य मिलता है, और उत्पन्ना एकादशी की कथा में तो यह तिथि स्वयं देवी के रूप में विष्णु के शरीर से प्रकट होकर मुर नामक दैत्य का वध करती है। इसीलिए वर्ष की हर एकादशी का अपना नाम, अपनी कथा और अपना फल है — निर्जला, मोक्षदा, सफला। भक्त इन्हें एक ही तिथि की पुनरावृत्ति नहीं, अलग-अलग पर्व मानते हैं।

लोक-व्यवहार में इस तिथि का घरेलू नाम "ग्यारस" है — देव उठनी ग्यारस, निर्जला ग्यारस। संस्कृत नाम और लोक नाम एक ही दिन की ओर संकेत करते हैं — आप चाहे जिस नाम से खोजें, उत्तर यही पृष्ठ देगा।

वैष्णव परंपरा के लिए एकादशी केवल एक व्रत नहीं, पूरे वर्ष का ढाँचा है। देवशयनी एकादशी से चातुर्मास आरंभ होता है, जब विष्णु योगनिद्रा में जाते हैं, और प्रबोधिनी अर्थात देव उठनी एकादशी पर उनके जागरण के साथ यह चार मास का विराम समाप्त होता है। इन्हीं दो ध्रुवों के बीच शेष एकादशियाँ मंदिरों के उत्सव-क्रम, तीर्थ-यात्राओं और घर-घर के व्रतों की लय तय करती हैं। ऊपर दी गई तिथियों की तालिका, इस अर्थ में, वैष्णव वर्ष का नक्शा है।

एक ही एकादशी के दो दिन क्यों दिखते हैं?

एक ही एकादशी के लिए दो पंचांगों में दो अलग-अलग दिन दिखें, तो घबराने की बात नहीं — यह कोई भूल नहीं है। एक दिन "स्मार्त" कहलाता है, दूसरा "वैष्णव", और दोनों एक ही कठिन प्रश्न के दो उत्तर हैं: यदि सूर्योदय के समय एकादशी चल रही हो, पर भोर की अंतिम बेला में दशमी का कुछ अंश शेष रहा हो, तो व्रत किस दिन रखा जाए?

इस स्थिति का शास्त्रीय नाम है दशमी-विद्धा, अर्थात दशमी से "बिंधी हुई" एकादशी। निर्णयसिन्धु और धर्मसिन्धु जैसे धर्मशास्त्रीय ग्रंथ सूर्योदय से पहले की अंतिम घड़ियों को — अरुणोदय काल, लगभग 4 घटी यानी करीब डेढ़ घंटा — निर्णायक मानते हैं। वैष्णव मत में यदि अरुणोदय के भीतर दशमी का लेशमात्र भी बचा हो, तो उस सुबह की एकादशी विद्धा मानी जाती है और उपवास अगले दिन होता है, जब तिथि शुद्ध रहती है — भले ही पंचांग उस दिन को द्वादशी लिखे। स्मार्त परंपरा, सामान्य गृहस्थ धर्म की व्यवस्था के अनुसार, प्रायः पहले ही दिन व्रत रखती है और सूक्ष्म अपवाद केवल विरल स्थितियों में लागू करती है।

अब प्रश्न यह है कि आपके लिए कौन-सा दिन है। मोटे तौर पर विभाजन सीधा है: जो परिवार किसी वैष्णव संप्रदाय में दीक्षित हुए बिना, सामान्य गृहस्थ परंपरा के अंग के रूप में एकादशी रखते हैं, उन पर स्मार्त निर्णय लागू होता है — उत्तर भारत के अधिकांश छपे पंचांग यही मानकर चलते हैं। जो गौड़ीय, माध्व या श्रीवैष्णव परंपरा में दीक्षित हैं, अथवा इस्कॉन के पंचांग का अनुसरण करते हैं, उनके लिए वैष्णव निर्णय मान्य है। दोनों में कोई ऊँच-नीच नहीं; अंतर केवल इस बात का है कि तिथि की शुद्धता को कौन कितनी कठोरता से तौलता है।

जब उपवास दूसरे दिन खिसकता है, तो उस दिन को गौण एकादशी कहा जाता है — "गौण" अर्थात द्वितीयक। पंचांग में जहाँ यह शब्द दिखे, समझ लें कि उस पखवाड़े दोनों मतों के व्रत-दिन अलग पड़े हैं।

यह भेद हर महीने क्यों नहीं उभरता? क्योंकि तिथि की सीमा दिन-रात के किसी भी क्षण पड़ सकती है। अधिकांश पखवाड़ों में दशमी भोर से बहुत पहले समाप्त हो जाती है और दोनों मत बिना किसी चर्चा के एक ही दिन पर सहमत रहते हैं। वर्ष में कुछ ही बार तिथि-सीमा अरुणोदय के इतने निकट आती है कि निर्णय बँट जाए — इसीलिए यह मतभेद जब भी सामने आता है, अचानक और उलझाने वाला लगता है।

इस पृष्ठ पर आपको अनुमान नहीं लगाना पड़ेगा: जब-जब स्मार्त और वैष्णव दिन अलग पड़ते हैं, ऊपर की तालिका में दोनों स्पष्ट रूप से चिह्नित करके दिए जाते हैं, ताकि आप अपनी कुल-परंपरा या संप्रदाय के अनुसार दिन चुन सकें।

दशमी की संध्या से पारण तक व्रत कैसे चलता है?

यह व्रत जिस तिथि के नाम पर है, उससे लंबा चलता है। शास्त्रीय व्यवस्था में इसका आरंभ दशमी की संध्या से माना जाता है: सूर्यास्त से पहले एक बार सादा, सात्त्विक भोजन, जिसमें चावल पहले ही छोड़ दिया जाता है — ताकि शरीर हल्का होकर और मन निश्चय करके एकादशी में प्रवेश करे। इसके बाद उपवास पूरी तिथि चलता है और अगली सुबह द्वादशी के पारण पर ही पूर्ण होता है। यानी एक चांद्र दिवस के चारों ओर सिमटा तीन दिन का क्रम।

एकादशी के दिन परंपरा एक नियम नहीं, कई स्तर मानती है। सबसे कठोर है निर्जल — न अन्न, न जल; वर्ष में एक बार निर्जला एकादशी पर इसका विशेष विधान है, और कुछ साधक हर एकादशी इसी रूप में रखते हैं। बीच का मार्ग फलाहार है, जो अधिकांश घरों में चलता है — फल, दूध और अन्न-रहित आहार जैसे सिंघाड़े या कुट्टू का आटा; क्षेत्रीय परंपरा में साबूदाना भी मान्य है। सबसे सरल रूप है दिन में एक बार अन्न-रहित भोजन। तीनों रूपों में जो बात समान है, वह है अनाज का त्याग — और सबसे बढ़कर चावल का।

चावल ही क्यों? पुराणों का उत्तर बड़ा सजीव है: मान्यता है कि इस तिथि पर पाप स्वयं अन्न में आश्रय लेता है, इसलिए अन्न ग्रहण करना उसी को भीतर लेना है जिसे व्रत बाहर निकालना चाहता है। दूसरा तर्क अधिक सूक्ष्म है और चावल को चंद्रमा से जोड़ता है: चावल पानी भरे खेतों में उपजता है, और चंद्रमा जल तथा मन दोनों का अधिपति है। मन को शांत करने की तिथि पर चंद्रमा की ही उपज खाना उसी चंचलता को बढ़ावा देना माना गया जिसे उपवास थामना चाहता है। इन कथाओं को कोई अक्षरशः सत्य माने या शिक्षाप्रद दृष्टांत — चावल-रहित एकादशी ही वह एक बात है जिस पर लगभग हर क्षेत्रीय परंपरा सहमत है।

पारण का अपना नियम है, और वह उपवास जितना ही महत्त्व रखता है। पारण द्वादशी की सुबह, सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले किया जाता है — और हरि वासर से बचकर, जो द्वादशी का पहला चौथाई भाग है और व्रत का ही अंग माना जाता है। यदि द्वादशी बहुत जल्दी समाप्त होने वाली हो, तो पारण सूर्योदय के तुरंत बाद कर लिया जाता है। त्रयोदशी में देर से व्रत खोलना परंपरा में फल का ह्रास माना गया है — इसीलिए इस पृष्ठ पर हर तिथि के साथ पारण की अवधि भी दी जाती है।

एक बात यहीं स्पष्ट कहना उचित है: ये सभी विधियाँ परंपरा को समझाने की दृष्टि से दी गई हैं, चिकित्सा-परामर्श के रूप में नहीं। व्रत का स्वरूप — पूर्ण, फलाहार, आंशिक, अथवा कोई भी नहीं — अपनी कुल-परंपरा और स्वास्थ्य के अनुसार चुनें; रोग या गर्भावस्था में, अथवा जहाँ चिकित्सक ने मना किया हो, कठोर रूप न अपनाएँ।

एक ही एकादशी दो शहरों में अलग दिन क्यों पड़ सकती है?

एकादशी आधी रात से नहीं बदलती। तिथि उस क्षण आरंभ होती है जब चंद्रमा सूर्य से वह निश्चित कोणीय दूरी पूरी कर लेता है जो इस तिथि को परिभाषित करती है — और वह क्षण पूरे विश्व के लिए एक ही होता है। नगर-नगर में बदलता है केवल सूर्योदय, जिसकी कसौटी पर उस क्षण को परखा जाता है। व्रत का दिन उदया तिथि के नियम से तय होता है: उपवास उसी दिन का माना जाता है जिसके स्थानीय सूर्योदय के समय एकादशी तिथि व्याप्त हो — और पिछले खंड में बताए विद्धा-नियम इसमें और सूक्ष्मता जोड़ते हैं। न्यूयॉर्क में सूर्योदय दिल्ली से कई घंटे बाद होता है; यदि तिथि इसी अंतराल में समाप्त हो जाए, तो दोनों नगरों में व्रत एक दिन आगे-पीछे पड़ता है — तिथि वही, खगोलीय क्षण वही, केवल कैलेंडर की तारीख़ अलग। भारत के भीतर भी यही बारीक अंतर संभव है: कोलकाता का सूर्योदय द्वारका से लगभग एक घंटा पहले होता है, और उसी घंटे में पड़ी तिथि-सीमा पूर्व और पश्चिम को अलग-अलग दिन दे देती है।

इसीलिए "एकादशी कब है" का कोई एक विश्वव्यापी उत्तर नहीं होता, और यही कारण है कि यह पृष्ठ उत्तर देने से पहले आपका नगर पूछता है। हर तिथि के सामने दिखने वाले आरंभ और समाप्ति के समय तिथि की वास्तविक सीमाएँ हैं, जो आपके चुने हुए नगर की घड़ी में बदलकर दिखाई जाती हैं; व्रत का दिन फिर आपके ही नगर के सूर्योदय से निकाला जाता है — न दिल्ली के, न उज्जैन के।

एक दूसरा भेद पाठकों को तब भी उलझाता है जब दिन बिलकुल एक ही होता है: मास का नाम। उत्तर भारत के पंचांग पूर्णिमांत हैं — मास पूर्णिमा पर समाप्त होता है — जबकि दक्षिण और पश्चिम भारत का अधिकांश भाग अमांत गणना अपनाता है, जिसमें मास अमावस्या पर पूरा होता है। शुक्ल पक्ष में दोनों प्रणालियाँ एक ही नाम देती हैं, पर कृष्ण पक्ष में पूर्णिमांत नाम एक मास आगे चलता है। वही कामिका एकादशी पूर्णिमांत पंचांग में श्रावण कृष्ण पक्ष की है और अमांत पंचांग में आषाढ़ कृष्ण पक्ष की। दिन अपनी जगह से नहीं हिलता; केवल उसका नाम बदलता है। यदि किसी दूसरे क्षेत्र की सूची में कोई एकादशी "गलत" मास में दिखे, तो पहले पक्ष देखें — उलझन प्रायः वहीं सुलझ जाती है।

तो ऊपर की तालिका पढ़ने के तीन चरण हैं: पहला, आपके स्थानीय समय में तिथि का आरंभ और समाप्ति; दूसरा, आपके सूर्योदय से तय हुआ व्रत का दिन; और तीसरा, जहाँ स्मार्त और वैष्णव गणनाएँ अलग हों, वहाँ दोनों दिन साथ-साथ। शेष सब — मास का नाम भी — उसी एक खगोलीय गणना की प्रस्तुति भर है, जिसे यह पृष्ठ किसी छपे पंचांग से उतारने के बजाय आपके स्थान के लिए हर बार नए सिरे से निकालता है।

एकादशी प्रश्नोत्तर — व्रत, पारण और प्रकार

एकादशी क्या है?

एकादशी हर पक्ष की ग्यारहवीं तिथि है, जिसे भगवान विष्णु के व्रत के रूप में रखा जाता है। यह महीने में दो बार आती है—एक शुक्ल पक्ष में, एक कृष्ण पक्ष में—इसलिए वर्ष में लगभग चौबीस एकादशी होती हैं। पद्म पुराण इसे आध्यात्मिक शुद्धि के सबसे प्रभावी दिनों में गिनता है।

एक वर्ष में कितनी एकादशी होती हैं?

सामान्यतः चौबीस—हर चंद्र मास में दो। जिस वर्ष अधिक मास पड़ता है, इनकी संख्या पच्चीस या छब्बीस हो सकती है, जिनमें पद्मिनी और परमा एकादशी जुड़ जाती हैं। ऊपर की सूची वर्ष की हर एकादशी नाम सहित दिखाती है, इसलिए सही गिनती वही है जो आप वहाँ देखते हैं।

एकादशी व्रत का पारण कब करें?

व्रत अगली सुबह, द्वादशी को, पारण नामक निश्चित समय में खोला जाता है—सूर्योदय के बाद, द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले, और हरि वासर (द्वादशी के पहले चरण) में कभी नहीं। बहुत जल्दी या बहुत देर से पारण करना व्रत को निष्फल कर देता है, ऐसा माना जाता है। इसीलिए अगले दिन का सूर्योदय एकादशी की तिथि जितना ही महत्वपूर्ण है।

कुछ एकादशी तिथियाँ अलग क्यों होती हैं (स्मार्त बनाम वैष्णव)?

जब एकादशी तिथि दो सूर्योदयों तक फैलती है या दशमी से मिल जाती है, तब स्मार्त और वैष्णव (इस्कॉन) परंपराएँ अलग-अलग दिन तय कर सकती हैं—स्मार्त पहले दिन व्रत रखते हैं, वैष्णव दूसरे (गौण) दिन, ताकि व्रत दशमी से मुक्त रहे। अपनी-अपनी परंपरा में दोनों सही हैं। ऊपर की सूची जहाँ अंतर हो, वहाँ दोनों तिथियाँ दिखाती है।

एकादशी पर चावल क्यों नहीं खाते, और क्या खा सकते हैं?

एकादशी पर अन्न—विशेषकर चावल—त्याग दिया जाता है; परंपरा इसे एक भारीपन से जोड़ती है जो दिन के उद्देश्य के विरुद्ध है। बहुत से लोग फल, दूध और कंद-मूल तक सीमित रहते हैं, या पूर्णतः निराहार व्रत रखते हैं (निर्जला एकादशी पर निर्जल)। साधारण नमक के स्थान पर सेंधा नमक लिया जाता है। वही रूप अपनाएँ जो आपका परिवार और स्वास्थ्य अनुमति दे।

सबसे महत्वपूर्ण एकादशी कौन-सी है?

निर्जला एकादशी (जून) के बारे में माना जाता है कि एक ही निर्जल व्रत में यह सभी एकादशियों का पुण्य समेट लेती है, इसीलिए इसका पालन सबसे व्यापक रूप से होता है। देवउठनी/प्रबोधिनी (नवंबर), जब विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं, और दक्षिण में वैकुंठ एकादशी (दिसंबर–जनवरी) भी प्रमुख हैं। हर एक का अपना महत्व और कथा है।

क्या एकादशी का समय शहर के अनुसार बदलता है?

हाँ। तिथि की शुरुआत और समाप्ति आपके चुने हुए शहर के स्थानीय समय में गणना की जाती है, इसलिए वे स्थान के साथ बदलती हैं। इससे भी महत्वपूर्ण, पारण का समय अगली सुबह आपके स्थानीय सूर्योदय पर निर्भर करता है—इसीलिए पारण का सही समय पाने के लिए शहर चुनना ज़रूरी है। कैलेंडर को स्थानीय बनाने के लिए ऊपर अपना शहर चुनें।

अन्य व्रत एवं तिथि कैलेंडर

अमावस्या तिथियाँ
पितृ कार्य, स्नान और दान के लिए अमावस्या तिथियाँ
पूर्णिमा तिथियाँ
तिथि समय और नामांकित पूर्णिमाओं सहित पूर्णिमा तिथियाँ
प्रदोष व्रत
हर त्रयोदशी का प्रदोष काल — शिव आराधना का संध्या समय
त्योहार कैलेंडर
माहवार सम्पूर्ण हिंदू त्योहार कैलेंडर