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PanchangBodhसटीक वैदिक कैलेंडर

पूर्णिमा तिथियां और समय 2026

पूर्ण चंद्रमा के पवित्र दिन

13 पवित्र दिन
सटीक समय
नई दिल्ली
अगला:Raksha Bandhan (श्रावण पूर्णिमा), 28 अगस्त, नई दिल्ली
2025
वर्ष
2026
2027
अगला:Raksha Bandhan (Shravana Purnima), 28 अगस्त, New Delhi

2026 Purnima कैलेंडर

New Delhi के लिए गणना किया गया समय

पौष पूर्णिमा

शनि, जनवरी 3, 2026
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पूर्णिमा तिथि समय
शुरू:शनि, जनवरी 3, 2026, 6:54 अपराह्न
समाप्ति:शनि, जनवरी 3, 2026, 3:33 अपराह्न

भक्त माघ स्नान आरंभ करने के लिए पवित्र नदी‑स्नान करते हैं; पाप क्षय और स्वास्थ्य‑समृद्धि के आशीर्वाद की मान्यता।

माघ पूर्णिमा

रवि, फ़रवरी 1, 2026
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पूर्णिमा तिथि समय
शुरू:रवि, फ़रवरी 1, 2026, 5:53 पूर्वाह्न
समाप्ति:रवि, फ़रवरी 1, 2026, 3:39 पूर्वाह्न

माघ मेले का समापन स्नान; इस दिन दान महान आध्यात्मिक पुण्य देता है।

Holi (फाल्गुन पूर्णिमा)

मंगल, मार्च 3, 2026
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पूर्णिमा तिथि समय
शुरू:मंगल, मार्च 3, 2026, 5:56 अपराह्न
समाप्ति:मंगल, मार्च 3, 2026, 5:08 अपराह्न

होली का उत्सव—भक्ति की विजय; आनंद, छोड़ देने और आध्यात्मिक नवीनीकरण का दिन।

चैत्र पूर्णिमा

गुरु, अप्रैल 2, 2026
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पूर्णिमा तिथि समय
शुरू:गुरु, अप्रैल 2, 2026, 7:07 पूर्वाह्न
समाप्ति:गुरु, अप्रैल 2, 2026, 7:42 पूर्वाह्न

Hanuman Jayanti; devotees perform Satyanarayan Puja for family harmony and well-being.

बुद्ध पूर्णिमा

शुक्र, मई 1, 2026
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पूर्णिमा तिथि समय
शुरू:शुक्र, मई 1, 2026, 9:13 अपराह्न
समाप्ति:शुक्र, मई 1, 2026, 10:53 अपराह्न

Birth, enlightenment, and nirvana of Lord Buddha; prayer, meditation, and compassion.

पूर्णिमा

रवि, मई 31, 2026
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पूर्णिमा तिथि समय
शुरू:रवि, मई 31, 2026, 11:59 पूर्वाह्न
समाप्ति:रवि, मई 31, 2026, 2:15 अपराह्न

Full Moon (Purnima) — auspicious for vrata, meditation, and charity.

ज्येष्ठ पूर्णिमा

सोम, जून 29, 2026
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पूर्णिमा तिथि समय
शुरू:सोम, जून 29, 2026, 3:07 पूर्वाह्न
समाप्ति:सोम, जून 29, 2026, 5:27 पूर्वाह्न

Vat Savitri Vrat observed for long life and protection of the husband; devotion of Savitri is remembered.

गुरु पूर्णिमा

बुध, जुलाई 29, 2026
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पूर्णिमा तिथि समय
शुरू:बुध, जुलाई 29, 2026, 6:20 अपराह्न
समाप्ति:बुध, जुलाई 29, 2026, 8:06 अपराह्न

Honoring spiritual Gurus and teachers; gratitude and recommitment to wisdom and self-realization.

Raksha Bandhan (श्रावण पूर्णिमा)

शुक्र, अगस्त 28, 2026
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पूर्णिमा तिथि समय
शुरू:शुक्र, अगस्त 28, 2026, 9:10 पूर्वाह्न
समाप्ति:शुक्र, अगस्त 28, 2026, 9:49 पूर्वाह्न

Sisters tie Rakhi for protection; Brahmins perform Upakarma to renew the sacred thread.

भाद्रपद पूर्णिमा

शनि, सितंबर 26, 2026
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पूर्णिमा तिथि समय
शुरू:शनि, सितंबर 26, 2026, 11:07 अपराह्न
समाप्ति:शनि, सितंबर 26, 2026, 10:19 अपराह्न

Satyanarayan Puja and charity; prosperity; preparation for Anant Chaturdashi next day.

शरद पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा (कोजागरी))

सोम, अक्टूबर 26, 2026
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पूर्णिमा तिथि समय
शुरू:सोम, अक्टूबर 26, 2026, 11:57 पूर्वाह्न
समाप्ति:सोम, अक्टूबर 26, 2026, 9:42 पूर्वाह्न

देवी लक्ष्मी की पूजा; पूर्णिमा‑रात्रि की जागरण स्वास्थ्य और समृद्धि का आशीर्वाद देती है।

कार्तिक पूर्णिमा

मंगल, नवंबर 24, 2026
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पूर्णिमा तिथि समय
शुरू:मंगल, नवंबर 24, 2026, 11:43 अपराह्न
समाप्ति:मंगल, नवंबर 24, 2026, 8:24 अपराह्न

Dev Deepawali — lamps and sacred baths; believed to liberate from sins.

मार्गशीर्ष पूर्णिमा

बुध, दिसंबर 23, 2026
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पूर्णिमा तिथि समय
शुरू:बुध, दिसंबर 23, 2026, 10:48 पूर्वाह्न
समाप्ति:बुध, दिसंबर 23, 2026, 6:58 पूर्वाह्न

Dedicated to Lord Dattatreya and Goddess Annapurna; prayers for wisdom and prosperity in food.

पूर्णिमा के बारे में

पूर्णिमा, अर्थात पूर्ण चंद्रमा का दिन, व्रत, ध्यान और दान के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। यह पेज आपके चुने हुए शहर और वर्ष के अनुसार पूर्णिमा की तिथियां और स्थानीय समय दिखाता है।

आध्यात्मिक महत्व

पूर्ण चंद्रमा पूर्णता, स्पष्टता और आध्यात्मिक प्रकाश का प्रतीक है।

अनुष्ठान

सामान्य पालन में उपवास, ध्यान, मंत्र‑जप और दान शामिल हैं।

समय गणना स्रोत

सभी समय हमारी सटीक चंद्र गणनाओं के आधार पर शहर के समय‑क्षेत्र अनुसार निकाले गए हैं।

"पूर्णिमा दिव्य कृपा का दिन है"

पूर्णिमा को श्रद्धा से मनाने का वर्णन ग्रंथों में मिलता है—ऐसा पालन हजारों यज्ञ और तीर्थों के समान पुण्य देता है।

परंपरा और अनुष्ठान

पूर्णिमा पारंपरिक रूप से पवित्रता, दान और चिंतन के साथ मनाई जाती है। कई भक्त उपवास रखते हैं, पवित्र ग्रंथ पढ़ते हैं और सत्यनारायण पूजा करते हैं या चंद्रमा को प्रार्थना अर्पित करते हैं। नीचे संक्षिप्त दिशानिर्देश हैं जिन्हें आप पारिवारिक परंपरा के अनुसार अपना सकते हैं।

उपवास नियम
  • उपवास रखें या सात्त्विक भोजन लें; जहाँ मान्य हो, चंद्रमा दर्शन के बाद पारण करें
  • वाणी और विचार में शुद्धता रखें; क्रोध और कठोरता से बचें
  • संध्या में चंद्र देव को जल, दूध या सफ़ेद प्रसाद अर्पित करें
आध्यात्मिक साधना
  • मंत्र‑जप करें (जैसे ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमः शिवाय, चंद्र मंत्र)
  • जहाँ प्रचलित हो, सत्यनारायण कथा पढ़ें/सुनें
  • सफ़ेद खाद्य, चावल या वस्त्र का दान करें
परिवार और समुदाय
  • परिवार के कल्याण और भावनात्मक सद्भाव के लिए प्रार्थना करें
  • स्थानीय कैलेंडरों के चंद्र उदय समय और पालन विवरण का सम्मान करें
  • आवश्यक हो तो विशेष संस्कारों के लिए बड़ों/पुजारी से मार्गदर्शन लें

महत्वपूर्ण अनुस्मारक

विशिष्ट पालन प्रथाओं के लिए हमेशा अपने आध्यात्मिक गुरु या पारिवारिक परंपराओं से परामर्श लें। समय स्थान और स्थानीय रीति‑रिवाजों के आधार पर भिन्न हो सकते हैं। अपने शरीर की सुनें और केवल रीति‑रिवाज के बजाय भक्ति के साथ अभ्यास करें।

पूर्णिमा प्रश्नोत्तर — तिथि, समय और व्रत

पूर्णिमा क्या है?

पूर्णिमा पूर्ण चंद्रमा का दिन है, जब चंद्रमा सूर्य के सामने आकर पूरा प्रकाशित होता है। हिंदू पंचांग में यह शुक्ल पक्ष का समापन करती है और इसे प्रार्थना, व्रत, दान और चंद्र-पूजा का श्रेष्ठ दिन माना जाता है। वर्ष के कई बड़े पर्व—गुरु पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा—पूर्णिमा के ही दिन होते हैं।

2026 में कितनी पूर्णिमा हैं?

तेरह, सामान्य बारह नहीं। 2026 में एक अधिक मास पड़ता है, इसलिए एक पूर्णिमा दोहराई जाती है और एक अधिक पूर्णिमा जुड़ जाती है, जिसे अधिकांश पंचांग छोड़ देते हैं। ऊपर की सूची में सभी तेरह पूर्णिमाएँ उनके मास-नामों के साथ दी गई हैं।

गुरु, शरद और कार्तिक पूर्णिमा में क्या अंतर है?

हर पूर्णिमा अपने चंद्र मास का भाव लिए होती है। गुरु पूर्णिमा (आषाढ़, जुलाई) गुरु और शिक्षकों को समर्पित है; शरद पूर्णिमा (आश्विन, अक्टूबर) खीर और चाँदनी-रात्रि-जागरण की पूर्णिमा है; कार्तिक पूर्णिमा (नवंबर) देव दीपावली और नदी-स्नान लाती है। ऊपर की सूची हर पूर्णिमा का नाम देती है, ताकि आप अपनी वांछित तिथि पा सकें।

सत्यनारायण पूजा क्या है और कब की जाती है?

सत्यनारायण पूजा विष्णु के सत्यनारायण स्वरूप की आराधना है, जो प्रायः पूर्णिमा को की जाती है, यद्यपि परिवार इसे अन्य शुभ दिनों और जीवन-प्रसंगों पर भी करते हैं। पूर्णिमा की संध्या, कथा और शीरे के प्रसाद के साथ, इसका पारंपरिक समय है। कई घरों में यह हर पूर्णिमा पर एक नियमित संकल्प के रूप में दोहराई जाती है।

क्या पूर्णिमा और चंद्रोदय का समय शहर के अनुसार बदलता है?

हाँ। ऊपर दी गई तिथि की शुरुआत और समाप्ति आपके शहर के स्थानीय समय में गणना की गई है, और चंद्रोदय—जो शरद पूर्णिमा और चंद्र-पूजा के लिए महत्वपूर्ण है—आपके देशांतर और अक्षांश के साथ बदलता है। जो पूर्ण चंद्रमा दिल्ली में एक क्षण उदय होता है, वह चेन्नई में दूसरे क्षण। अपना शहर चुनें ताकि समय आपके वास्तविक स्थान से मेल खाए।

पूर्णिमा व्रत कैसे करें?

एक सामान्य रूप है दिनभर का व्रत, जो चंद्र-दर्शन के बाद खोला जाता है, सात्त्विक आहार, मंत्र-जप और संध्या में चंद्रमा को जल या श्वेत मिष्ठान्न के अर्पण के साथ। जहाँ परंपरा हो, सत्यनारायण कथा पढ़ी जाती है। वही करें जो आपका परिवार मानता है; यह समझ के लिए है, विधान के रूप में नहीं।

क्या पूर्णिमा नया कार्य शुरू करने के लिए शुभ है?

पूर्णिमा सामान्यतः शुभ तिथियों में गिनी जाती है और पूजा, दान, गृह-प्रवेश तथा मांगलिक आरंभ के लिए अनुकूल मानी जाती है। फिर भी, पूर्ण चंद्रमा उच्च-ऊर्जा का दिन है, जिसे परंपरा में चंचलता से जोड़ा गया है, इसलिए बहुत से लोग इसे कठिन सौदेबाज़ी या यात्रा के बजाय भक्ति के लिए चुनते हैं। किसी विशेष मुहूर्त के लिए उस दिन का पंचांग देखें।

2026 में New Delhi को 13 पूर्णिमाएँ मिलती हैं। अधिकांश देर शाम या रात में चरम पर होती हैं—हर महीने के सटीक समय देखकर अनुष्ठान की विंडो सही पकड़ें।

New Delhi के लिए समय गणना किए गए हैं। पालन परिवार/क्षेत्र परंपरा के अनुसार बदल सकता है।

वर्ष भर की पूर्णिमाएँ

जनवरी 2026: जनवरी 2026 में पूर्णिमा शनिवार, 3 जनवरी को पड़ती है।

फ़रवरी 2026: फ़रवरी 2026 में पूर्णिमा रविवार, 1 फ़रवरी को पड़ती है।

मार्च 2026: मार्च 2026 में पूर्णिमा मंगलवार, 3 मार्च को पड़ती है।

अप्रैल 2026: अप्रैल 2026 में पूर्णिमा गुरुवार, 2 अप्रैल को पड़ती है।

मई 2026: मई 2026 में पूर्णिमा शुक्रवार, 1 मई और रविवार, 31 मई को पड़ती हैं।

जून 2026: जून 2026 में पूर्णिमा सोमवार, 29 जून को पड़ती है।

जुलाई 2026: जुलाई 2026 में पूर्णिमा बुधवार, 29 जुलाई को पड़ती है।

अगस्त 2026: अगस्त 2026 में पूर्णिमा शुक्रवार, 28 अगस्त को पड़ती है।

सितंबर 2026: सितंबर 2026 में पूर्णिमा शनिवार, 26 सितंबर को पड़ती है।

अक्टूबर 2026: अक्टूबर 2026 में पूर्णिमा सोमवार, 26 अक्टूबर को पड़ती है।

नवंबर 2026: नवंबर 2026 में पूर्णिमा मंगलवार, 24 नवंबर को पड़ती है।

दिसंबर 2026: दिसंबर 2026 में पूर्णिमा बुधवार, 23 दिसंबर को पड़ती है।

व्रत, ध्यान और दान — तीनों पूर्णिमा पर ही क्यों आ मिलते हैं?

पूर्णिमा शुक्ल पक्ष की पंद्रहवीं और अंतिम तिथि है — वह क्षण, जब चंद्रमा सूर्य से ठीक 180 अंश की दूरी पर पहुँचकर पूरी तरह प्रकाशित हो जाता है। नाम में ही सब कुछ कहा गया है: पूर्ण, यानी जिसमें अब कुछ जोड़ने को शेष नहीं। वृद्धि पूरी हो चुकी है और क्षय अभी आरंभ नहीं हुआ है। जो परंपरा आकाश को एक नैतिक और मानसिक पंचांग की तरह पढ़ती आई है, उसके लिए पूर्णता का यह क्षण स्वाभाविक रूप से संकल्प पूरे करने, कृतज्ञता का ऋण चुकाने और संचित को बाँट देने का अवसर बन गया।

चंद्रमा और मन का संबंध शास्त्रों में बहुत गहरा है। ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में कहा गया — चन्द्रमा मनसो जातः, अर्थात चंद्रमा विराट पुरुष के मन से उत्पन्न हुआ। आयुर्वेद और योग की परंपरा ने इसी सूत्र को आगे बढ़ाया: जैसे-जैसे चंद्रमा बढ़ता है, वैसे-वैसे समुद्र का ज्वार, वनस्पतियों का रस और मनुष्य के विचारों की हलचल भी बढ़ती है। इस दृष्टि से पूर्णिमा वह दिन है जब मन की तरंगें अपने चरम पर होती हैं। यही कारण है कि साधना की परंपराएँ किसी शांत दिन पर नहीं, इसी दिन सिमट आती हैं — उपवास शरीर को हल्का रखता है, ध्यान बढ़ी हुई चेतना को बिखरने देने के बजाय उसे दिशा देता है, और मान्यता है कि पूर्णिमा का जप कई गुना फल देता है।

दान भी पूर्णता के इसी तर्क से जुड़ा है। भरा हुआ पात्र या तो छलकेगा या ठहरकर दूषित होगा — इसलिए पूर्णता का दिन देने का दिन बना। धर्मशास्त्र की परंपरा में पूर्णिमा पर अन्न, चंद्रमा से जुड़ी श्वेत वस्तुओं (चावल, दूध, शक्कर) और वस्त्र के दान का विशेष पुण्य बताया गया है।

देश भर में इस दिन के कई नाम सुनने को मिलेंगे। पंजाब और उत्तर भारत के बड़े भाग में पूरनमासी, गुजरात-राजस्थान में पूनम, दक्षिण भारत में पौर्णमी, और हिंदी पट्टी के गाँवों के पंचांगों में प्रायः पुन्नी। नाम अलग हैं, तिथि वही है।

सामान्यतः एक चांद्र वर्ष में 12 पूर्णिमाएँ होती हैं। परंतु 12 चांद्र मास सौर वर्ष से लगभग 11 दिन छोटे पड़ते हैं, इसलिए पर्वों को उनकी ऋतुओं से बाँधे रखने के लिए पंचांग बीच-बीच में एक अतिरिक्त मास — अधिक मास — जोड़ता है। ऐसे वर्ष में 13 पूर्णिमाएँ आती हैं, और अधिक मास की पूर्णिमा की अपनी अलग मान्यताएँ हैं। इस पृष्ठ की तिथि-तालिका में यह अंतर स्वतः दिखता है: जब आप एक पूर्णिमा अधिक गिनें, तो समझें कि यह पंचांग की स्वाभाविक लय है, कोई भूल नहीं।

इतनी कथाओं में से सत्यनारायण कथा ही घर-घर की पूर्णिमा-रीति कैसे बनी?

उत्तर भारत के किसी भी घर से पूछें कि पूर्णिमा पर क्या होता है, तो सबसे आम उत्तर कोई विराट मंदिर-अनुष्ठान नहीं, बल्कि संध्या को घर में पढ़ी जाने वाली सत्यनारायण कथा और उसके बाद बँटने वाला प्रसाद है। आख़िर एक कथा-पाठ ने पूर्णिमा के दिन पर ऐसा एकछत्र अधिकार कैसे पा लिया?

यह कथा परंपरा में स्कंद पुराण के रेवा खंड से जोड़ी जाती है, जहाँ नारद जी भगवान विष्णु से ऐसा व्रत पूछते हैं जिसे साधारण गृहस्थ भी सहज भाव से कर सके। उत्तर जान-बूझकर सबके लिए खुला रखा गया है: ऐसा व्रत जिसमें न भारी व्यय है, न दुर्लभ सामग्री, न किसी विशेष वर्ग का एकाधिकार। कथा के पाँच अध्याय अपने पात्रों के माध्यम से यही बात बार-बार कहते हैं — निर्धन ब्राह्मण, लकड़हारा, वणिक, राजा — हर कोई व्रत का संकल्प लेता है, और कष्ट हर किसी को धन या पद की कमी से नहीं, बल्कि उस संकल्प को भूलने या टालने से मिलता है। कथा का नैतिक आधार श्रद्धा और संकल्प की पूर्ति है: जो ईश्वर से कहा, उसे पूरा करें। संकल्प, चूक, परिणाम, स्मरण और पूर्ति — यही व्रत-कथा की चिर-परिचित संरचना है, और सत्यनारायण कथा उसका सबसे परिष्कृत रूप है।

पूर्णिमा इस कथा के लिए सर्वथा उपयुक्त तिथि है। सत्यनारायण अर्थात सत्य-स्वरूप नारायण, और पूर्ण चंद्रमा — अखंड, निष्कलंक — उसी पूर्णता का आकाश में लिखा प्रतीक। पूजा परंपरागत रूप से संध्या समय होती है, और क्रम प्रायः ऐसा रखा जाता है कि कथा का समापन चंद्रोदय के आसपास हो; कई परिवार संकल्प दोपहर बाद लेते हैं और कथा गोधूलि तक चलती रहती है। प्रसाद इस व्रत की मुहर है: पंचामृत, फल और सबसे बढ़कर सूजी का हलवा — घी में भुनी सूजी, शक्कर और केला — जिसे उपस्थित सभी को, यहाँ तक कि कथा में न बैठे पड़ोसियों को भी बाँटना व्रत का ही अंग माना गया है। स्वयं कथा के प्रसंगों में सत्यनारायण का प्रसाद अस्वीकार करना ही वह चूक है जो संकट को निमंत्रण देती है; बाँट देना ही पूर्ति है।

पहली बार व्रत करने वालों के लिए एक बात स्पष्ट कर लेना उपयोगी रहेगा। सत्यनारायण पूजा हर पूर्णिमा की सर्वसामान्य रीति है, परंतु वर्ष की कुछ पूर्णिमाएँ अपनी अलग और प्राचीन पर्व-पहचान रखती हैं — गुरु पूर्णिमा गुरु के सम्मान की तिथि है, शरद पूर्णिमा चंद्रमा की अमृतमयी चाँदनी का उत्सव, और कार्तिक पूर्णिमा स्नान-दान के सबसे पवित्र मास का समापन। ऐसे दिनों में प्रायः वही पर्व प्रधान रहता है और सत्यनारायण पूजा उसके साथ या किसी निकट की पूर्णिमा पर कर ली जाती है। इन सभी विशेष पूर्णिमाओं के अपने अलग पृष्ठ यहाँ उपलब्ध हैं; यह पृष्ठ उस परंपरा की बात करता है जो हर पूर्णिमा में समान है।

पूर्णिमा का व्रत कैसे रखा जाता है, और इसे आधी रात नहीं, चंद्रोदय ही क्यों पूर्ण करता है?

पूर्णिमा व्रत का कोई एक बँधा हुआ नियम नहीं है; यह श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार कई स्तरों पर रखा जाता है। सबसे प्रचलित रूप सूर्योदय से चंद्रोदय तक का है: प्रातः स्नान के बाद संकल्प, दिन भर अन्न का त्याग, और संध्या को उदित पूर्ण चंद्रमा के दर्शन तथा अर्घ्य के बाद पारण। अधिकांश व्रती इसे फलाहार के रूप में रखते हैं — फल, दूध और अन्न-रहित आहार — जबकि कड़ा नियम रखने वाले साधक केवल जल लेते हैं। पूरी तरह निर्जल पूर्णिमा व्रत कुछ कुल-परंपराओं में मिलता है, पर वह अपवाद ही है; यह तिथि चंद्रमा के शीतल, पोषक गुण से जुड़ी है और परंपरा स्वयं यहाँ वैसी कठोरता नहीं माँगती जैसी कुछ एकादशी-परंपराओं में दिखती है।

इस व्रत का मर्म संध्या में है। जब पूर्ण चंद्रमा क्षितिज से ऊपर आता है, व्रती अर्घ्य देते हैं — पात्र से चंद्रमा की दिशा में जल, प्रायः उसमें दूध, कहीं-कहीं श्वेत पुष्प या अक्षत मिलाकर। यह भाव बहुत प्राचीन है; वैदिक और पौराणिक साहित्य, दोनों प्रत्यक्ष चंद्रमा को ही सोम मानते हैं, और जल के उस महान अधिपति को जल लौटा देना मानो एक वृत्त पूरा करना है। कुछ घरों में चाँदनी में खीर रखने का चलन भी है — इसका सबसे विस्तृत रूप शरद पूर्णिमा पर मिलता है, पर सामान्य पूर्णिमाओं पर भी इसकी झलक दिखती है।

अब मूल प्रश्न — आधी रात क्यों नहीं, चंद्रोदय क्यों? क्योंकि यहाँ उपासना का विषय प्रत्यक्ष चंद्रमा है। पूर्णिमा व्रत घड़ी से नहीं, दर्शन से चलता है — यह जन्माष्टमी के निशीथ-जागरण जैसा समय-बद्ध नहीं है। व्रत तभी संपन्न माना जाता है जब पूर्ण चंद्रमा वास्तव में देखा और पूजा जाए; इसीलिए पंचांग की पूर्णिमा-प्रविष्टियों में चंद्रोदय का समय इतना प्रमुख रहता है — वही निर्णायक क्षण है, जिसके बाद पारण होता है। सुविधा यह है कि पूर्णिमा की संध्या को चंद्रमा सूर्यास्त के आसपास ही उदित हो जाता है, इसलिए प्रतीक्षा चतुर्थी या करवा चौथ के चंद्रमा जितनी लंबी नहीं खिंचती। बादल हों तो परंपरा यह छूट देती है कि गणना से निकले चंद्रोदय-समय पर चंद्रमा की दिशा में अर्घ्य दे दिया जाए — तब पंचांग ही आकाश का स्थान ले लेता है।

कई घरों में इस व्रत के साथ ऊपर वर्णित सत्यनारायण कथा जुड़ती है, या विष्णु-लक्ष्मी की पूजा — शुक्ल पक्ष का चरम उन्हीं का समय माना गया है। कुछ लोग सरल रूप अपनाते हैं: उपवास नहीं, केवल संध्या का अर्घ्य और एक दीपक।

ध्यान रखें कि यह सब व्रत का परंपरागत स्वरूप है, जो यहाँ शिक्षा और समझ की दृष्टि से दिया गया है। उपवास के नियम कुल-परंपरा और स्वास्थ्य के अनुसार बदलते हैं, इसलिए अपने घर की रीति और शरीर की सीमा के अनुसार ही निर्णय लें — नियम शिथिल करने की छूट परंपरा स्वयं देती है।

हर महीने का नाम उसकी पूर्णिमा से क्यों निकला है, और 'गलत-सा दिखने वाला' दिन भी सही कैसे होता है?

हिंदू महीनों के नाम ध्यान से पढ़ें, तो वास्तव में आप पूर्णिमाओं का मानचित्र देख रहे होते हैं। चैत्र वह मास है जिसकी पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र के निकट होती है; वैशाख की विशाखा, कार्तिक की कृत्तिका, मार्गशीर्ष की मृगशिरा, माघ की मघा और फाल्गुन की फाल्गुनी नक्षत्रों के पास। नियम पुराना और सुंदर है: पूर्ण चंद्रमा जिस नक्षत्र में या जिसके पड़ोस में दिखे, वही नक्षत्र महीने को नाम दे देता है। पूर्णिमा मानो हर महीने का हस्ताक्षर है, जो आकाश के एक निश्चित भाग में अंकित होता है, और ऋतुओं के साथ यह हस्ताक्षर वर्ष भर नक्षत्र-दर-नक्षत्र सरकता जाता है।

इसीलिए उत्तर भारत की पद्धति पूर्णिमांत कहलाती है — अर्थात वह पद्धति जिसमें हर मास पूर्णिमा पर समाप्त होता है। इस गणना में पूर्णिमा सचमुच महीने का अंतिम शब्द है, उसका सार। पश्चिम और दक्षिण भारत की अमांत पद्धति मास को अमावस्या पर समाप्त करती है, परंतु — यह बात बहुतों को चौंकाती है — दोनों पद्धतियों में महीनों के नाम एक ही रहते हैं, क्योंकि नाम दोनों को उसी एक पूर्णिमा से मिलता है। मतभेद केवल इस बात पर है कि महीने की सीमा-रेखा कहाँ खिंचे; इस पर कभी नहीं कि कौन-सी पूर्णिमा किस नाम की है। यही कारण है कि अमावस्या-आधारित मास-सीमाएँ भले क्षेत्र के अनुसार बदलती हों, पूर्णिमा की तिथियाँ और उनके मास-नाम पूरे देश में एक ही मिलते हैं।

समय से जुड़े अधिकांश प्रश्न एक तथ्य पर आकर टिकते हैं: तिथि एक खगोलीय घटना है, कैलेंडर की तारीख़ नहीं। पूर्णिमा उसी क्षण आरंभ होती है जब चंद्रमा सूर्य से 180 अंश की दूरी पर पहुँचता है, और उसके आगे बढ़ते ही समाप्त हो जाती है; यह अवधि प्रायः आधी रात से आधी रात वाले ढाँचे में नहीं बैठती। तिथि किसी दिन सुबह लग सकती है और अगले दिन सुबह ही उतर भी सकती है। तब 'असली' पूर्णिमा कौन-सा दिन है? चंद्र-पूजा के लिए उत्तर स्पष्ट है — वह संध्या, जब पूर्ण चंद्रमा उदित हो और तिथि उस समय विद्यमान हो। जो पूर्णिमा सुबह 10 बजे लगी, वही उस संध्या के चंद्रोदय, अर्घ्य और कथा की स्वामिनी है। हाँ, स्नान-दान या मासिक श्राद्ध जैसे सूर्योदय-आधारित प्रयोजनों के लिए वह दिन चुना जा सकता है जिसके सूर्योदय के समय तिथि चल रही हो — इसीलिए कभी-कभी व्रत और स्नान-दान आस-पास के दो दिनों पर दिखते हैं।

रही शहरों की बात: तिथि का आरंभ पूरे संसार के लिए एक ही क्षण है, पर सूर्योदय और चंद्रोदय स्थानीय घटनाएँ हैं। दो शहरों की घड़ी पर तिथि का समय एक हो सकता है, फिर भी वहाँ चंद्रमा कई मिनट के अंतर से उगता है — कभी-कभी तिथि की सीमा के आर-पार भी। ऊपर दिया गया आगामी पूर्णिमा का कार्ड आपके चुने हुए शहर के लिए यह पूरी गणना स्वयं कर देता है; यह अनुभाग बस यह समझाता है कि वह आख़िर सुलझा क्या रहा है।

अन्य व्रत एवं तिथि कैलेंडर

एकादशी तिथियाँ
स्मार्त और वैष्णव तिथियों सहित वर्ष की 24 एकादशियाँ
अमावस्या तिथियाँ
पितृ कार्य, स्नान और दान के लिए अमावस्या तिथियाँ
प्रदोष व्रत
हर त्रयोदशी का प्रदोष काल — शिव आराधना का संध्या समय
त्योहार कैलेंडर
माहवार सम्पूर्ण हिंदू त्योहार कैलेंडर