
किसी भी पूजा, व्रत या संस्कार के लिए सटीक संकल्प मन्त्र — स्थान और तिथि के आधार पर स्वतः गणना
यह संकल्प मन्त्र शैक्षिक उद्देश्य से प्रस्तुत है। कृपया अपने पारिवारिक पुरोहित या आचार्य से परामर्श लें।
संकल्प संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है “दृढ़ निश्चय” या “संकल्पित इच्छा”। हिन्दू कर्मकाण्ड में किसी भी पूजा, व्रत, दान, हवन या संस्कार से पहले संकल्प लेना अनिवार्य माना जाता है। यह कर्ता (पूजा करने वाले) की घोषणा होती है कि वे किस समय, किस स्थान पर, किस उद्देश्य से यह कर्म कर रहे हैं।
संकल्प मन्त्र में ब्रह्माण्डीय काल-गणना का पूरा ढाँचा आता है — कल्प, मन्वन्तर, युग से लेकर संवत्सर, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, तिथि, नक्षत्र, योग और करण तक। इसके साथ भौगोलिक स्थान (जम्बूद्वीपे भरतवर्षे...) और कर्ता का गोत्र-नाम भी जोड़ा जाता है। इस प्रकार संकल्प कर्म को समय और स्थान दोनों में स्थापित करता है।
शास्त्रों के अनुसार बिना संकल्प के किया गया कर्म अपूर्ण माना जाता है। संकल्प लेने से कर्ता का मन एकाग्र होता है और पूजा का फल पूर्ण रूप से प्राप्त होता है।
आचमन करें
पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। "ॐ केशवाय नमः", "ॐ नारायणाय नमः", "ॐ माधवाय नमः" बोलते हुए दाहिने हाथ की हथेली से तीन बार जल ग्रहण करें। प्रत्येक बार होंठ पोंछें।
सामग्री हाथ में लें
दाहिने हाथ में जल, अक्षत (साबुत चावल), पुष्प और दक्षिणा (सिक्का) लें। बायें हाथ से दाहिनी कलाई पकड़ें — इसे "सव्य" मुद्रा कहते हैं। पितृ कर्म में यज्ञोपवीत और हाथ की स्थिति उलटी (अपसव्य) होती है।
सही दिशा की ओर मुख करें
सभी देव कर्म (पूजा, हवन, व्रत) के लिए पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करें। पितृ कर्म (श्राद्ध, तर्पण, पिण्डदान) के लिए दक्षिण दिशा की ओर मुख करें।
संकल्प मन्त्र बोलें
मन्त्र को स्पष्ट और धीरे-धीरे पढ़ें। निर्धारित स्थानों पर अपना गोत्र और नाम भरें। जिस पूजा या व्रत का संकल्प ले रहे हैं उसका नाम बोलें। ऊपर दिए कैलकुलेटर से आज के सटीक पंचांग तत्त्वों के साथ मन्त्र तैयार करें।
जल भूमि पर छोड़ें
मन्त्र पूर्ण होने पर दाहिने हाथ से जल और सामग्री भूमि पर, ताम्र पात्र में, या कलश में छोड़ दें। संकल्प सम्पन्न हुआ — अब मुख्य पूजा-विधि आरम्भ करें।
संकल्प मन्त्र की प्रत्येक पंक्ति का अर्थ नीचे दिया गया है। केसरिया रंग में दिखाए गए भाग पंचांग-गणना से स्वतः भरे जाते हैं, जबकि रिक्त स्थान (___) कर्ता स्वयं भरता है।
ईश्वर स्मरण
ॐ विष्णुः विष्णुः विष्णुः।
विष्णु भगवान का तीन बार स्मरण। सभी शुभ कार्यों का आरम्भ ईश्वर-स्मरण से होता है।
ब्रह्माण्डीय काल
अद्य ब्रह्मणो द्वितीये परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे
आज, ब्रह्मा के द्वितीय परार्ध में, श्वेतवाराह कल्प में, वैवस्वत (सातवें) मन्वन्तर में, अठाइसवें कलियुग के प्रथम चरण में — यह सनातन काल-गणना की अटल पंक्ति है जो प्रत्येक संकल्प में समान रहती है।
स्थान
जम्बूद्वीपे भरतवर्षे भरतखण्डे ___देशे
जम्बूद्वीप (भारतीय उपमहाद्वीप) में, भरतवर्ष में, भरतखण्ड में, आपके नगर के देश-नाम (जैसे इन्द्रप्रस्थदेशे, काशीक्षेत्रे) के साथ।
पंचांग तत्त्व
___नामसंवत्सरे ___अयने ___ऋतौ ___मासे ___पक्षे ___तिथौ ___वासरे ___नक्षत्रे ___योगे ___करणे
ये दस तत्त्व पंचांग-गणना से स्वतः भरे जाते हैं: संवत्सर (60 वर्षीय बृहस्पति चक्र), अयन (उत्तरायण/दक्षिणायन), ऋतु, चान्द्र मास, पक्ष (शुक्ल/कृष्ण), तिथि (उदय तिथि), वार, नक्षत्र, योग और करण।
कर्ता परिचय
___गोत्रोत्पन्नः ___ अहं
अपने गोत्र का नाम (जैसे भरद्वाजगोत्रोत्पन्नः) और अपना नाम (जैसे रामशर्मा अहं) बोलें। स्त्रियों के लिए "गोत्रोत्पन्ना" का प्रयोग होता है।
कर्म और संकल्प
___पूजनम्___ करिष्ये।
जिस कर्म के लिए संकल्प ले रहे हैं उसका नाम (जैसे गणेशपूजनम्, सत्यनारायणव्रतम्)। "करिष्ये" का अर्थ है "मैं करूँगा/करूँगी"। पितृ कर्म में यह "तर्पयिष्ये" (मैं तर्पण करूँगा) में बदलता है।
कालखण्ड
संवत्सर, अयन, ऋतु
60 वर्षीय बृहस्पति चक्र से वर्ष का नाम, सूर्य की दिशा (उत्तरायण/दक्षिणायन), और वैदिक ऋतु।
चान्द्र पंचांग
मास, पक्ष, तिथि
पूर्णिमान्त चान्द्र मास, पक्ष (शुक्ल या कृष्ण), और सूर्योदय पर प्रचलित तिथि (उदय तिथि)।
नक्षत्र स्थिति
नक्षत्र, योग, करण
चन्द्र नक्षत्र, सूर्य-चन्द्र संयुक्त कोण (योग), और तिथि का आधा भाग (करण) — सभी सूर्योदय पर गणना।
वार एवं स्थान
वार, स्थान
सप्ताह का दिन और संस्कृत सप्तमी विभक्ति में भौगोलिक स्थान — जम्बूद्वीप से आपके नगर तक।
कर्ता परिचय
गोत्र, नाम, लिंग
आपकी वंश-परम्परा (गोत्र), व्यक्तिगत नाम, और व्याकरणिक लिंग — ये मन्त्र के प्रत्यय निर्धारित करते हैं।
कर्म
पूजा / कर्म का नाम
जो कर्म कर रहे हैं उसका नाम। पितृ कर्म में दिवंगत का सम्बन्ध और नाम भी जोड़ा जाता है।
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