Shadbala — Six-Fold Planetary Strength
पाराशर-प्रमाणित विधि

षड्बल कैलकुलेटर

Shadbala Calculator

अपनी जन्म कुंडली के प्रत्येक ग्रह की छह प्रकार की शक्ति — स्थान, दिग, काल, चेष्टा, नैसर्गिक और दृष्टि बल

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षड्बल क्या होता है?

आपकी कुंडली में सात प्रमुख ग्रह हैं — पर सभी की ताकत एक जैसी नहीं। कोई ग्रह अपनी दशा में तूफ़ान लाता है, कोई चुपचाप गुज़र जाता है। षड्बल पाराशर पद्धति की वह शास्त्रीय प्रणाली है जो बताती है — कौन सा ग्रह कितना बलवान है, और कितना फल देने में सक्षम। बृहत् पराशर होरा शास्त्र (BPHS) के अनुसार छह आयामों — स्थान, दिग, काल, चेष्टा, नैसर्गिक और दृष्टि — में हर ग्रह की शक्ति नापी जाती है। यह गणक BPHS-अनुसार पूर्ण गणना करता है और परिणाम दृश्य चित्रों सहित, ग्रह दर ग्रह, प्रस्तुत करता है।

षड्बल के छह घटक

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स्थान बल

Positional Strength

स्थान बल यह बताता है कि ग्रह अपनी राशि में, उच्च या नीच स्थिति में, और वर्ग कुंडलियों में किस बल से बैठा है। स्वराशि या उच्च राशि में बैठा ग्रह अपना सर्वोच्च स्थान बल प्राप्त करता है।

💡 धनु राशि में गुरु (स्वराशि) को उच्च स्थान बल प्राप्त होता है।

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दिग बल

Directional Strength

गुरु को पहले भाव में रख दो — वह खिल जाएगा। सातवें में ले जाओ — दिशा बल शून्य। यही दिग बल है। प्रत्येक ग्रह के लिए एक विशेष चतुष्कोण भाव (1, 4, 7, 10) होता है जहाँ उसका दिशात्मक बल चरम पर होता है।

💡 सूर्य और मंगल को 10वें भाव में, गुरु और बुध को 1ले भाव में, चंद्र और शुक्र को 4थे भाव में, तथा शनि को 7वें भाव में पूर्ण दिग बल मिलता है।

काल बल

Temporal Strength

रात के 3 बजे कृष्ण पक्ष में जन्म? तो आपके रात्रि-ग्रह — चंद्र, मंगल, शनि — को पहले से एक काल-लाभ मिल चुका है। काल बल वह शक्ति है जो ग्रह को जन्म-समय, पक्ष, मास, ऋतु और अयन से प्राप्त होती है। इसमें नथोन्नत बल, पक्ष बल और त्रिभाग बल जैसी कई उप-गणनाएँ शामिल हैं।

💡 सूर्य, गुरु और शुक्र दिन में अधिक बलवान होते हैं; चंद्र, मंगल और शनि रात में। बुध सदा समान रहता है।

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चेष्टा बल

Motional Strength

चेष्टा बल ग्रह की गति से मिलने वाली शक्ति है। वक्री (retrograde) ग्रह को उच्च चेष्टा बल मिलता है। सूर्य और चंद्रमा कभी वक्री नहीं होते, इसलिए उनका चेष्टा बल शून्य रहता है — यह कोई त्रुटि नहीं, यह शास्त्र-सम्मत है।

💡 वक्री मंगल, जो धारा के विरुद्ध चल रहा है, सर्वाधिक चेष्टा बल अर्जित करता है। शीघ्र गति वाले ग्रहों को कम चेष्टा बल मिलता है।

नैसर्गिक बल

Natural / Innate Strength

नैसर्गिक बल स्थिर रहता है — यह प्रत्येक ग्रह की शाश्वत प्राकृतिक चमक है। बृहत् पराशर होरा शास्त्र के अनुसार क्रम है: सूर्य > चंद्र > शुक्र > गुरु > बुध > मंगल > शनि। यह बल किसी भी कुंडली में नहीं बदलता।

💡 सूर्य का नैसर्गिक बल सदा 60 विरूपा है; शनि का सदा 8.57 विरूपा। यह सभी कुंडलियों में समान रहता है।

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दृष्टि बल (दृक बल)

Aspectual Strength

दृक बल उन दृष्टियों का योग है जो अन्य ग्रह किसी ग्रह पर डालते हैं। शुभ ग्रहों (गुरु, शुक्र, बुध, शुक्ल पक्ष का चंद्र) की दृष्टि बल बढ़ाती है; पाप ग्रहों (शनि, मंगल, राहु) की दृष्टि घटाती है। यह बल ऋणात्मक (negative) भी हो सकता है — इसका अर्थ है ग्रह पर पाप दृष्टि का प्रभाव अधिक है।

💡 गुरु की दृष्टि वाले चंद्रमा का दृक बल सकारात्मक होगा; शनि और मंगल की दृष्टि वाले चंद्रमा का दृक बल ऋणात्मक हो सकता है।

पराशर ने क्या निर्धारित किया? — न्यूनतम आवश्यक रूपा

बृहत् पराशर होरा शास्त्र के अनुसार न्यूनतम रूपा

ग्रहन्यूनतम रूपान्यूनतम विरूपा
सूर्य6.5390
चन्द्र6360
मंगल5300
बुध7420
गुरु6.5390
शुक्र5.5330
शनि5300

इष्ट फल और कष्ट फल — ग्रह आपकी मदद कर रहा है या बोझ?

षड्बल ग्रह की शक्ति बताता है। लेकिन इष्ट फल और कष्ट फल यह बताते हैं कि वह शक्ति आपके पक्ष में काम कर रही है या नहीं।

इष्ट फल (Ishta Phala) ग्रह की शुभ फल देने की क्षमता है — यह चमक, गति और शुभ स्थिति से बढ़ता है।

कष्ट फल (Kashta Phala) ग्रह की कठिनाई उत्पन्न करने की प्रवृत्ति है — यह मंदता, दुर्बलता और पाप प्रभाव से बढ़ता है। उच्च कष्ट फल का अर्थ ग्रह का दुष्ट होना नहीं है; यह दर्शाता है कि ग्रह पर अत्यधिक भार है।

परिणाम कैसे पढ़ें — संख्याओं का अर्थ

प्रत्येक ग्रह की शक्ति विरूपा में नापी जाती है — इसे शक्ति-अंक समझें। 60 विरूपा = 1 रूपा। बृहत् पराशर होरा शास्त्र ने हर ग्रह के लिए एक न्यूनतम रूपा निर्धारित किया है।

न्यूनतम से ऊपर = "बल-युक्त" (शक्तिशाली)। नीचे = "बलहीन" (कमज़ोर)। अनुपात स्तंभ यह एक नज़र में बताता है: 1.0× से ऊपर = बलवान, नीचे = ध्यान देने योग्य।

1.5× अनुपात का अर्थ है ग्रह न्यूनतम से 50% अधिक शक्तिशाली है। 0.8× का अर्थ है 20% की कमी है। दोनों संख्याएँ उपयोगी हैं — ये बताती हैं कि ग्रह के पास काम करने के लिए कितनी जगह है।

षड्बल कब और क्यों देखें?

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रत्न धारण करने से पहले

पहले जांचें कि ग्रह वाकई बलहीन है या नहीं। 1.5× वाले ग्रह का रत्न पहनना व्यर्थ है — और पहले से बलवान ग्रह को अत्यधिक उत्तेजित कर सकता है।

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दशा परिवर्तन के समय

दशा-स्वामी का षड्बल बताता है कि आने वाला काल कितना तीव्र होगा। बलवान दशा-स्वामी निर्णायक फल देता है; बलहीन विलम्बित या फीका।

विंशोत्तरी दशा देखें →
🔍

कुंडली पाठ के बाद

पंडित ने कहा गुरु "बलवान" है? षड्बल से पुष्टि करें। अनुपात वस्तुनिष्ठ प्रमाण देता है — अनुमान नहीं, शुद्ध गणित।

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📅

मुहूर्त चयन के लिए

बलवान दशा-स्वामी + बलवान संबंधित भाव = महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए बेहतर समय। षड्बल सही कुंडली से सही समय चुनने में मदद करता है।

शुभ मुहूर्त देखें →

भ्रांति बनाम सच — षड्बल के बारे में गलतफहमियाँ

सबसे बलवान ग्रह सफलता दिलाएगा

शक्ति = शुभता नहीं। शनि का अनुपात 2.0× हो तो इसका अर्थ है शनि के गुण (अनुशासन, विलम्ब, संरचना) पूरी ताकत से काम करेंगे। यह मदद करेगा या चुनौती देगा — यह भाव-स्थिति और दशा पर निर्भर है।

षड्बल कम हो तो ग्रह बेकार है

0.85× अनुपात वाला ग्रह मृत नहीं है — वह मानक से थोड़ा नीचे है। वह काम करता है, बस कम शक्ति से। कमजोर गुरु भी बुद्धि देता है — पर 1.8× गुरु जैसा प्रभाव नहीं।

वक्री ग्रह हमेशा अशुभ होता है

षड्बल में वक्री ग्रह को सर्वाधिक चेष्टा बल मिलता है। वक्री गति = अधिक परिश्रम, धारा के विरुद्ध तैरना। परिश्रम = अशुभ नहीं। वक्री गुरु विलम्बित पर गहन ज्ञान दे सकता है।

षड्बल से पूरी कुंडली का अंदाज़ लग जाता है

षड्बल कच्ची शक्ति नापता है। यह नहीं बताता कि ग्रह किस भाव का स्वामी है, कौन सी दशा चल रही है, या कौन से योग बन रहे हैं। यह एक दृष्टिकोण है — शायद सबसे सटीक — पर एकमात्र कभी नहीं।

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षड्बल से जुड़े सामान्य प्रश्न

षड्बल क्या होता है और इसकी गणना कैसे होती है?+
षड्बल वैदिक ज्योतिष की वह प्रणाली है जो ग्रहों की शक्ति को छह आयामों में मापती है — स्थान बल, दिग बल, काल बल, चेष्टा बल, नैसर्गिक बल और दृष्टि बल। बृहत् पराशर होरा शास्त्र में इसका विस्तृत वर्णन है। इन छहों का योग Rupa में होता है और यही ग्रह की कुल षड्बल शक्ति कहलाती है।
कुंडली में सबसे शक्तिशाली ग्रह कैसे पहचानें?+
षड्बल अनुपात (कुल षड्बल ÷ न्यूनतम आवश्यक रूपा) जिस ग्रह का सबसे अधिक हो, वही आपकी कुंडली का सर्वाधिक बलवान ग्रह है। 1.0 से अधिक अनुपात का अर्थ है वह ग्रह अपनी न्यूनतम शक्ति से ऊपर है। यही ग्रह अपनी दशा-अंतर्दशा में सबसे प्रभावी फल देने में सक्षम होता है।
कमजोर ग्रह (बलहीन) होने पर क्या उपाय करें?+
बलहीन ग्रह के लिए — (1) उस ग्रह का बीज मंत्र 108 बार प्रतिदिन जपें; (2) संबंधित वस्तुओं का दान करें (शनि के लिए काले तिल, गुरु के लिए पीली वस्तुएँ); (3) किसी अनुभवी ज्योतिषी की सलाह से रत्न धारण करें — जन्म माह के आधार पर रत्न कभी न पहनें; (4) उस ग्रह के अधिपति देव की पूजा करें; (5) ग्रह के गुणों को जीवनशैली में अपनाएँ।
षड्बल और भाव बल में क्या अंतर है?+
षड्बल ग्रह की शक्ति मापता है और भाव बल भाव (घर) की शक्ति। सरल शब्दों में: षड्बल बताता है कि अभिनेता कितना शक्तिशाली है; भाव बल बताता है कि मंच कितना मजबूत है। एक बलवान ग्रह कमजोर भाव में उस भाव के विषयों में पूर्ण फल देने में सीमित हो सकता है।
इष्ट फल और कष्ट फल का क्या अर्थ है?+
इष्ट फल ग्रह की शुभ फल देने की क्षमता है — यह चमक, गति और शुभ स्थिति से बढ़ता है। कष्ट फल ग्रह की कठिनाई उत्पन्न करने की प्रवृत्ति है — यह दुर्बलता और पाप प्रभाव से बढ़ता है। उच्च इष्ट फल और न्यून कष्ट फल वाला ग्रह अपनी दशा में आशीर्वाद देता है।
दृष्टि बल (दृक बल) ऋणात्मक क्यों हो सकता है?+
दृक बल वह शक्ति है जो अन्य ग्रहों की दृष्टि से प्राप्त होती है। शुभ ग्रहों की दृष्टि बढ़ाती है और पाप ग्रहों की घटाती है। जब पाप दृष्टि का योग शुभ दृष्टि से अधिक हो जाए, तो दृक बल ऋणात्मक हो जाता है। यह शास्त्र-सम्मत है — इससे घबराने की आवश्यकता नहीं।
क्या शक्तिशाली ग्रह भी अशुभ फल दे सकता है?+
हाँ। शनि या मंगल जैसे पाप ग्रह की षड्बल शक्ति अधिक हो तो वे अधिक प्रभावी होंगे — लेकिन शुभ नहीं हो जाएंगे। वे अपने स्वभाव से ही फल देंगे, पर उसकी तीव्रता अधिक होगी। उच्च कष्ट फल वाला बलवान ग्रह अपनी दशा में अधिक तीव्र अनुभव दे सकता है।
सूर्य और चंद्रमा का चेष्टा बल शून्य क्यों है?+
चेष्टा बल ग्रह की गति और विशेषकर वक्री गति से मिलता है। सूर्य और चंद्रमा कभी वक्री नहीं होते, इसलिए उनका चेष्टा बल हमेशा शून्य रहता है — यह शास्त्र-सम्मत नियम है, कोई त्रुटि नहीं।
षड्बल कमजोर हो तो क्या करें?+
सबसे पहले देखें कौन सा ग्रह बलहीन है। फिर उसका बीज मंत्र 108 बार प्रतिदिन जपें, संबंधित देवता की पूजा करें, और उस ग्रह से जुड़ी वस्तुओं का दान करें। रत्न अंतिम विकल्प है — वह भी किसी अनुभवी ज्योतिषी की सलाह से। जन्म माह के आधार पर रत्न कभी न पहनें।
क्या षड्बल से विवाह का भी पता चलता है?+
सीधे नहीं, पर अप्रत्यक्ष रूप से हाँ। सप्तम भाव (विवाह का घर) का भाव बल देखें — बलवान सप्तम भाव सुखद वैवाहिक जीवन का संकेत देता है। साथ ही शुक्र और गुरु का षड्बल अनुपात भी महत्वपूर्ण है — ये दोनों ग्रह विवाह-सुख के प्राकृतिक कारक हैं।

यह षड्बल गणना बृहत् पराशर होरा शास्त्र (BPHS) की शास्त्रीय पद्धति के अनुसार है — पाराशर ज्योतिष की मूल ग्रन्थ। ग्रह बल ज्योतिष विश्लेषण का एक महत्वपूर्ण अंग है, परन्तु सम्पूर्ण विश्लेषण के लिए किसी योग्य ज्योतिषाचार्य से परामर्श अवश्य लें।