PanchangBodh logo
PanchangBodhसटीक वैदिक कैलेंडर

सूर्यात् नक्षत्र बिंदु कैलकुलेटर

सूर्य आज जिस नक्षत्र में है, वहीं से गिने आठ संवेदनशील नक्षत्र — अभी देखें कि वे कौन-से हैं और उन पर कौन-से ग्रह बैठे हैं।

सर्वतोभद्र चक्र परम्परा में सूर्य की स्थिति से आठ संवेदनशील बिंदु निकलते हैं — सूर्यात् नक्षत्र बिंदु। सूर्य के वर्तमान नक्षत्र से गिनती करें, तो पाँचवें, आठवें, चौदहवें, अठारहवें, इक्कीसवें, बाईसवें, तेईसवें और चौबीसवें स्थानों के नक्षत्र विशेष भार लिए होते हैं। ये शास्त्रीय सौर उपग्रह-नक्षत्र हैं, और परम्परा इनके फल को अटल मानती है — जो मिलना है, वह भोगना ही है। यह पृष्ठ आज के आठों बिंदु सजीव गणना से दिखाता है, साथ ही यह भी कि इस समय किन बिंदुओं पर कौन-से ग्रह हैं।

आज के सूर्यात् बिंदु — 2 जुलाई 2026

सूर्य आज जिस नक्षत्र में: Ardra— ये बिंदु 6 जुलाई तक टिके रहेंगे, जब सूर्य पुनर्वसु में प्रवेश करेगा।

बिंदुसूर्य से गिनतीआज का नक्षत्रवहाँ बैठे ग्रहशास्त्रीय संकेत
विद्युन्मुख5Maghaकेतुदूरदर्शिता — फल आने से पहले उसका आभास
शूल8Hastaभीतरी चिंता, जिसे केवल जातक अनुभव करता है
सन्निपात14Mulaबार-बार लौटते विचार, मन का उलझाव
केतु18Dhanishtaध्वजा — मान, प्रतिष्ठा और यश
उल्का21Uttara Bhadrapadaअवसर और सूझ की क्षणिक चमक
कम्प22Revatiशनिकम्पन — अच्छे फल में भी बना रहने वाला संशय
वज्र23Ashwiniवज्र-सी दृढ़ता, अडिग निश्चय
निर्धात24Bharaniऐसा निश्चय जो पलटा न जा सके

सूर्यात् नक्षत्र बिंदु क्या हैं?

सूर्यात् का अर्थ है — सूर्य से। यह प्रणाली सूर्य के वर्तमान नक्षत्र को आधार मानती है और आठ निश्चित स्थानों तक गिनती करती है; जिन नक्षत्रों पर ये स्थान पड़ते हैं, वे उस अवधि के सौर संवेदनशील नक्षत्र बन जाते हैं। सूर्य लगभग तेरह-चौदह दिन में नक्षत्र बदलता है, इसलिए पूरा समूह उसके साथ खिसकता रहता है — बिंदु आकाश पर धीरे-धीरे सरकती एक रचना हैं।

ये आठ स्थान मनमाने नहीं हैं: ये शास्त्रीय सौर उपग्रह-स्थान हैं — विद्युन्मुख, शूल, सन्निपात, केतु, उल्का, कम्प, वज्र और निर्धात — जिन्हें फलदीपिका के अध्याय XXVI की टीका कार्यों में बाधा डालने वाले बिंदुओं में गिनाती है। डॉ. परेश देसाई की सर्वतोभद्र चक्र शृंखला (सप्तर्षि ज्योतिष, 2008) ने इन्हें उस बिंदु-पद्धति का रूप दिया जिसका पालन यह कैलकुलेटर करता है।

गिनती कैसे होती है

गिनती समावेशी है — सूर्य का अपना नक्षत्र पहला गिना जाता है — और सामान्य 27 नक्षत्रों पर चलती है, अभिजित के बिना; रेवती के बाद गिनती फिर अश्विनी से जुड़ जाती है। जैसे, सूर्य अश्विनी में हो तो पाँचवाँ बिंदु (विद्युन्मुख) मृगशिरा पर और चौबीसवाँ (निर्धात) शतभिषा पर पड़ता है।

पाद का एक सूक्ष्म नियम भी है: बिंदु का नक्षत्र पूरा लिया जाता है, और उसके चार पाद दो राशियों में बँटे हों तो बिंदु का प्रभाव दोनों राशियों में पढ़ा जाता है।

सूर्यात् फल अटल क्यों माने जाते हैं

परम्परा इस प्रणाली को इसके चांद्र जोड़े के साथ पढ़ती है: सूर्य (आत्मा, जो दिया गया है) से निकले सूर्यात् बिंदुओं का फल मोल-भाव नहीं मानता — यह प्रारब्ध है; जबकि चंद्रमा (मन) से निकले चन्द्रात् बिंदुओं का फल प्रयत्न से बदलता है। दोनों को साथ पढ़ना ही इस विद्या का सार है: एक बताता है कि क्या स्वीकारें, दूसरा कि किस पर काम करें।

किसी सूर्यात् बिंदु पर से गुज़रता ग्रह उन दिनों को चिह्नित करता है जब उस बिंदु का संकेत सबसे सजीव रहता है — सौम्य ग्रह वहाँ विषय को सहारा देता है, क्रूर ग्रह उसे तीखा करता है। इसे समय की बनावट मानें, फ़ैसला कभी नहीं।

इसका चांद्र जोड़ा — आपके अपने जन्म नक्षत्र से गिने नौ चन्द्रात् बिंदु — चन्द्रात् नक्षत्र बिंदु कैलकुलेटर पर है। चन्द्रात् नक्षत्र बिंदु कैलकुलेटर

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सूर्यात् नक्षत्र बिंदु क्या होते हैं?

सर्वतोभद्र चक्र परम्परा में सूर्य की वर्तमान स्थिति से गिने आठ संवेदनशील नक्षत्र — पाँचवें, आठवें, चौदहवें, अठारहवें, इक्कीसवें, बाईसवें, तेईसवें और चौबीसवें स्थान पर, सूर्य के अपने नक्षत्र को पहला गिनते हुए। ये शास्त्रीय सौर उपग्रह-नक्षत्रों के ही स्थान हैं, और इनके फल अटल माने जाते हैं।

आठ बिंदुओं की गिनती कैसे होती है?

गिनती समावेशी है और सामान्य 27 नक्षत्रों पर चलती है: सूर्य का नक्षत्र पहला, अभिजित शामिल नहीं, और रेवती के बाद गिनती फिर अश्विनी से जुड़ती है। सूर्य अश्विनी में हो तो विद्युन्मुख (पाँचवाँ) मृगशिरा पर और निर्धात (चौबीसवाँ) शतभिषा पर पड़ता है।

सूर्यात् बिंदु कितनी बार बदलते हैं?

ये सूर्य के साथ चलते हैं — लगभग हर तेरह-चौदह दिन में, जब सूर्य नए नक्षत्र में प्रवेश करता है, आठों बिंदु एक-एक नक्षत्र आगे खिसक जाते हैं। बीच की अवधि में समूह स्थिर रहता है।

किसी बिंदु पर ग्रह बैठा हो तो क्या अर्थ है?

वह गोचर उन दिनों को चिह्नित करता है जब उस बिंदु का संकेत सबसे सजीव रहता है। बिंदु पर गुरु या शुक्र हों तो विषय को सहारा मिलता है — जैसे केतु-बिंदु (ध्वजा) पर सौम्य ग्रह मान-सम्मान के पक्ष में; वहीं शनि, मंगल, सूर्य, राहु या केतु उसी बिंदु के कठिन पक्ष को तीखा करते हैं। यह समय की बनावट है, फ़ैसला नहीं।

क्या सूर्यात् बिंदु और उपग्रह एक ही हैं?

स्थान वही हैं — विद्युन्मुख से निर्धात तक फलदीपिका XXVI की टीका में गिनाए गए सौर उपग्रह-नक्षत्र ही हैं। इन्हें सर्वतोभद्र चक्र पर बिठाकर गोचर पढ़ने की बिंदु-पद्धति डॉ. परेश देसाई की आधुनिक व्यवस्था है; यह कैलकुलेटर उन्हीं की पद्धति और नामों का पालन करता है।

सूर्यात् फल अटल क्यों कहे जाते हैं?

देसाई की व्याख्या में सूर्य उस सबका कारक है जो दिया जा चुका है — प्रारब्ध — इसलिए सौर बिंदुओं का फल जैसा आए वैसा भोगना होता है; चंद्रमा मन का कारक है, इसलिए चन्द्रात् बिंदुओं का फल योजना और प्रयत्न से बदलता है। दोनों की जोड़ी यही बताती है कि क्या स्वीकारना है और कहाँ प्रयत्न फलेगा।

क्या सूर्यात् बिंदु मेरे जन्म विवरण पर निर्भर हैं?

नहीं — किसी भी दिन ये सबके लिए एक जैसे होते हैं, क्योंकि गिनती सूर्य की वर्तमान स्थिति से होती है, आपकी कुंडली से नहीं। व्यक्तिगत जोड़ा चन्द्रात् बिंदु हैं, जो आपके जन्म नक्षत्र से गिने जाते हैं।

सूर्यात् बिंदु शास्त्रीय संवेदनशील-नक्षत्र सूचियों पर आधारित हैं, जिन्हें डॉ. परेश देसाई की सर्वतोभद्र चक्र शृंखला (सप्तर्षि ज्योतिष, 2008) ने व्यवस्थित रूप दिया। इन्हें समय की शास्त्रीय बनावट मानें — दिन के बारे में अटल भविष्यवाणी कभी नहीं।