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द्वितीय भाव में मंगल

द्वितीय भाव का मंगल कमाई में जुझारूपन भर देता है और वाणी को धार देता है। धन किस तरह आता और खर्च होता है, आपकी बोलचाल कैसी है, और साझी पारिवारिक संपत्ति को लेकर कुटुंब से आपका व्यवहार कैसा है — ये सभी विषय इसी स्थिति से आकार लेते हैं।

द्वितीय भाव में मंगल धन, वाणी और कुटुंब — तीनों में बल भर देता है। कमाई प्रायः परिश्रम, भूमि-संपत्ति या प्रतिस्पर्धा वाले कार्य से होती है और उतनी ही बेधड़क खर्च भी हो जाती है; बोली सीधी और प्रभावशाली रहती है, कभी-कभी कठोर भी। इससे संपदा बनेगी या टकराव बढ़ेगा, यह आपके लग्न और मंगल की अवस्था पर निर्भर है — दोनों की निःशुल्क गणना नीचे दी गई है।

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द्वितीय भाव में मंगल का अर्थ

द्वितीय भाव संचय का भाव है — कमाया और बचाया हुआ धन, वह कुटुंब जिसमें आपका जन्म हुआ, थाली का भोजन और वह वाणी जो आपका परिचय देती है। यहाँ बैठा मंगल इन चारों में ताप और गति भर देता है। बोली सीधी और प्रभावशाली हो जाती है; अपने अच्छे रूप में वह पक्ष को मज़बूती से रखती है, बिगड़े रूप में अनजाने ही चोट पहुँचा देती है। धन सहजता से कम, परिश्रम से अधिक मिलता है — भूमि और संपत्ति (मंगल को भूमि-कारक कहा जाता है), तकनीकी या प्रतिस्पर्धा वाले कार्य इसके सामान्य स्रोत हैं — और जितनी तेज़ी से आता है, उतनी ही तेज़ी से बिना सोचे-समझे की गई खरीदारी, जोखिम भरे उद्यमों या पारिवारिक दायित्वों में निकल भी जाता है। कुटुंब में, विशेषकर साझी संपत्ति या निर्णय के अधिकार को लेकर, खटास आ सकती है। परंपरागत ग्रंथ मुख, दाँत और खान-पान की आदतों की ओर भी ध्यान दिलाते हैं: बहुत गरम या जल्दबाज़ी में खाया गया भोजन और मुँह के आसपास छोटी-मोटी चोटें — इस स्थिति में प्रायः इन्हीं से सावधान रहने की सलाह दी जाती है।

द्वितीय भाव से मंगल तीन पूर्ण दृष्टियाँ डालता है। उसकी चतुर्थ दृष्टि पंचम भाव पर पड़ती है, जो संतान, बुद्धि, शिक्षा और पूर्व पुण्य का भाव है; इससे मन तेज़ और प्रतिस्पर्धी बनता है, और पढ़ाई या रचनात्मक कार्य शांत साधना कम, मुकाबला अधिक बन जाता है। सप्तम दृष्टि अष्टम भाव तक पहुँचती है, जो आयु, आकस्मिक परिवर्तन, विरासत और ससुराल का भाव है; यहाँ वह संयुक्त धन में अचानक उतार-चढ़ाव या पैतृक संपत्ति पर विवाद दे सकती है, साथ ही शोध-कार्य और संकट की घड़ी में डटे रहने की सहनशक्ति भी देती है। अष्टम दृष्टि से वह नवम भाव को देखता है, जहाँ पिता, गुरु, भाग्य और उच्च शिक्षा का विचार होता है; अतः व्यक्ति अपनी मान्यताओं पर हठपूर्वक अडिग रह सकता है और पिता या गुरुजनों से मतभेद खुलकर सामने आ सकते हैं। द्वितीय अर्जित धन का, पंचम सट्टे से होने वाले लाभ का, अष्टम विरासत का और नवम भाग्य से मिलने वाली समृद्धि का भाव है — चारों किसी न किसी रूप में धन से जुड़े हैं। इसलिए यह स्थिति कुंडली के धन-सूत्रों को आपस में कसकर बाँध देती है।

यह स्थिति कैसा फल देगी, यह मंगल की राशि पर निर्भर है, और वह राशि आपके लग्न से तय होती है। तुला लग्न में मंगल स्वराशि वृश्चिक में बैठता है और द्वितीय तथा सप्तम, दोनों भावों का स्वामी होता है — धन और विवाह का स्वामी धन भाव में, अर्थात् बलवान और कमाने वाला मंगल; स्वराशि का मंगल मांगलिक दोष का एक प्रचलित परिहार भी माना जाता है। धनु लग्न में मंगल मकर में उच्च का होता है और पंचम तथा द्वादश का स्वामी बनता है: कमाई अनुशासित रहती है, और खर्च का झुकाव संतान, शिक्षा या विदेश से जुड़े विषयों की ओर होता है। मिथुन लग्न में वह कर्क में नीच का होकर षष्ठ और एकादश का स्वामी बनता है — लाभ सेवा और प्रतिस्पर्धा से मिलता है, पर वाणी और पारिवारिक भावनाएँ उग्र और अस्थिर रहती हैं। कर्क और सिंह लग्न के लिए मंगल योगकारक है, इसलिए द्वितीय भाव में उसकी उपस्थिति कार्यक्षेत्र (कर्क लग्न) या भाग्य (सिंह लग्न) को सीधे आय से जोड़ देती है। आपके लग्न और मंगल की राशि की गणना नीचे दी गई है।

भाव-स्थिति राशि कुंडली के अनुसार है।

शुभ या अशुभ? क्या तय करता है

अपने-आप में न शुभ, न अशुभ। द्वितीय भाव में मंगल कमाने की लगन और प्रभावशाली वाणी देता है, पर बोलचाल और खर्च में संयम माँगता है। स्वराशि मेष या वृश्चिक में, मकर में उच्च का होकर, या बृहस्पति की दृष्टि पाकर यह सबसे अधिक सहायक रहता है; कर्क में नीच होने पर, बुध की राशियों मिथुन या कन्या में, अथवा राहु या शनि से युति होने पर यह अधिक परीक्षा लेता है। इसे परिश्रम और स्पष्टवादिता से बनने वाली समृद्धि की प्रवृत्ति समझें, अंतिम निर्णय नहीं।

द्वितीय भाव से मांगलिक दोष: कब गिना जाता है, कब परिहार होता है

मांगलिक दोष के प्रश्न पर जिन दो भावों को लेकर परंपराएँ एकमत नहीं हैं, उनमें द्वितीय भाव एक है (दूसरा प्रथम भाव है)। अधिकांश आधुनिक गणना-पद्धतियाँ, इस साइट की गणना सहित, प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव गिनती हैं, इसलिए यहाँ मंगल होने पर व्यक्ति मांगलिक माना जाता है। उत्तर भारतीय श्लोक में केवल प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश का उल्लेख है, अतः अनेक उत्तर भारतीय ज्योतिषी द्वितीय भाव को नहीं गिनते। दक्षिण भारतीय पाठ में 'लग्ने' के स्थान पर 'धने' — अर्थात् धन भाव — आता है, इसलिए वहाँ द्वितीय शामिल है और प्रथम छूट जाता है। मांगलिक दोष बृहत् पाराशर होरा शास्त्र का नियम नहीं है; यह बाद के मुहूर्त-ग्रंथों और क्षेत्रीय परंपराओं से आया है। कुछ ज्योतिषी सप्तम और अष्टम भाव के मंगल को अधिक महत्त्व देते हैं, और उनके मत में द्वितीय भाव के मंगल से बनने वाला दोष अपेक्षाकृत हल्का होता है। जाँच लग्न से की जाती है, प्रायः चंद्रमा से भी, और कुछ परंपराओं में शुक्र से भी।

प्रचलित परिहारों की सूचियाँ ग्रंथ और क्षेत्र के अनुसार बदलती हैं, और इनमें से कोई भी बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में नहीं मिलता। इनमें प्रमुख हैं: मंगल स्वराशि या उच्च राशि में हो (द्वितीय भाव में मेष, वृश्चिक या मकर), मंगल पर बृहस्पति की दृष्टि हो या दोनों की युति हो, अथवा वर और वधू दोनों मांगलिक हों — इस स्थिति में परंपरा मिलान को संतुलित मानती है। यह धारणा कि 28 वर्ष की आयु के बाद दोष समाप्त हो जाता है, शास्त्रीय ग्रंथों में नहीं मिलती। मांगलिक होना कुंडली-मिलान का एक विचारणीय बिंदु है; यह न कोई शाप है, न किसी प्रतीकात्मक 'विवाह' का कारण। लग्न, चंद्रमा और शुक्र — तीनों बिंदुओं से पूरी जाँच इस साइट के मांगलिक दोष कैलकुलेटर पर निःशुल्क उपलब्ध है।

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धन, कुटुंब, वाणी और भोजन पर इस मंगल की छाप

परिश्रम से कमाई, साहस से खर्च

यह मंगल बैठे-बिठाए मिले धन से अधिक उस धन को महत्त्व देता है जो ज़ोर लगाकर कमाया जाए। आय प्रायः भूमि और संपत्ति, शल्य-चिकित्सा या ऐसे किसी क्षेत्र से बढ़ती है जहाँ मुकाबला करके जीतना पड़े; निर्माण, यंत्र, अभियांत्रिकी, सुरक्षा और खेल — ये मंगल के अग्नि, शस्त्र और सेना से शास्त्रीय संबंध के आधुनिक रूप माने जाते हैं। कमाई स्थिर धारा की तरह कम, किसी बड़े प्रयास के बाद एकमुश्त अधिक आती है। यही साहस खर्च को भी तेज़ कर देता है: एक दिन में तय की गई बड़ी खरीद, किसी संबंधी को दिया गया उधार, किसी उद्यम पर लगाया गया दाँव। बचत तभी टिकती है जब उसकी व्यवस्था इच्छाशक्ति पर निर्भर न हो — स्वचालित जमा, रोज़मर्रा के खर्च से अलग एक बचत खाता, और यह नियम कि कोई भी बड़ा खर्च एक सप्ताह ठहरकर ही होगा। मंगल की महादशा सात वर्ष की होती है (जन्म के समय शेष अवधि कम हो सकती है), और कमाने-खर्चने का यह ढर्रा प्रायः इसी दशा में सबसे स्पष्ट दिखता है।

तीखी वाणी और कुटुंब में खटास

द्वितीय भाव वाणी का भाव है, और मंगल उसे धार देता है। इस स्थिति वाले लोग मन की बात कह देते हैं, अच्छा तर्क करते हैं, कड़ा मोलभाव करते हैं और कुटुंब के मान की रक्षा में ऊँचे स्वर से खड़े हो जाते हैं। ऐसे लोग अच्छे वार्ताकार, शिक्षक, वकील और विक्रेता बनते हैं; पर उनके शब्द कभी-कभी इरादे से अधिक चोट भी कर जाते हैं। कुटुंब में खटास आती है तो प्रायः स्नेह की कमी से नहीं, धन के कारण — संपत्ति का हिस्सा, लौटाया न गया उधार, बिना पूछे लिया गया निर्णय। बुध मंगल का नैसर्गिक शत्रु है और वाणी बुध का क्षेत्र, इसलिए बुध की राशियों मिथुन या कन्या में बैठा मंगल दबाव में बोली को चुभती या व्यंग्यपूर्ण बना सकता है। अनुशासन सीधा है: बहस मुद्दे पर करें, व्यक्ति पर नहीं; और पारिवारिक संपत्ति के प्रश्न उसी समय लिखित रूप में सुलझा लें जब संबंधों में गर्मजोशी बनी हुई हो।

भोजन, मुख और खान-पान की आदतें

शास्त्रीय ग्रंथ द्वितीय भाव को मुख, दाँत, नेत्र और स्वयं भोजन से जोड़ते हैं। मंगल यहाँ ताप बढ़ा देता है: तीखे, तले या गरिष्ठ व्यंजनों में रुचि, जल्दी-जल्दी या क्रोध में खाने की आदत, और मुँह के आसपास छोटे-मोटे कटने-जलने या दाँतों के उपचार की संभावना। यह कोई रोग-निदान नहीं है; यह केवल संकेत देता है कि मंगल की अग्नि प्रायः कहाँ प्रकट होती है। नियमित आहार, गर्मी के मौसम में शीतल पदार्थ, दाँतों की देखभाल और बहस के बीच भोजन न करना — ये साधारण आदतें इस स्थिति के अनुकूल हैं। द्वितीय भाव घर की थाली भी है — कौन साथ बैठता है, कौन पकाता है, कौन खर्च उठाता है — और यह मंगल साथ के भोजन को अक्सर जीवंत बहस का अवसर बना देता है। खाते समय पैसों की चर्चा टालें; इससे पाचन भी ठीक रहता है और संबंध भी।

लग्न अनुसार: आपकी पंक्ति

यहाँ मंगल किस राशि में है और किन भावों का स्वामी है, यह आपके लग्न से बदलता है। आपकी पंक्ति चिह्नित है।

ये सामान्य प्रवृत्तियाँ हैं, पूरी कुंडली पर निर्भर — शैक्षिक, भविष्यवाणी नहीं, और व्यक्तिगत परामर्श का विकल्प नहीं।

लग्नद्वितीय में मंगल की राशिअवस्थामंगल के स्वामित्व वाले भाव
मेषवृषभसम (शुक्र)प्रथम व अष्टम
वृषभमिथुनशत्रु राशि (बुध)सप्तम व द्वादश
मिथुनकर्कनीचषष्ठ व एकादश
कर्कसिंहमित्र राशि (सूर्य)पंचम व दशम
सिंहकन्याशत्रु राशि (बुध)चतुर्थ व नवम
कन्यातुलासम (शुक्र)तृतीय व अष्टम
तुलावृश्चिकस्वगृहीद्वितीय व सप्तम
वृश्चिकधनुमित्र राशि (गुरु)प्रथम व षष्ठ
धनुमकरउच्चपंचम व द्वादश
मकरकुंभसम (शनि)चतुर्थ व एकादश
कुंभमीनमित्र राशि (गुरु)तृतीय व दशम
मीनमेषस्वगृहीद्वितीय व नवम

यहाँ आपके मंगल की अवस्था और गति

भावों में मंगल— मकर में उच्च का हो या अपनी राशियों मेष और वृश्चिक में, तो मंगल द्वितीय भाव को अनुशासित, सुरक्षित संपदा और अधिकारपूर्ण वाणी का भाव बना देता है; कर्क में नीच का मंगल हो तो व्यक्ति प्रायः भावनाओं में बहकर खर्च करता है और आहत मन से बोलता है। मित्र राशियों सिंह, धनु या मीन में कमाई की लगन और वाणी, दोनों अधिक संतुलित रहती हैं; शत्रु बुध की राशियों मिथुन या कन्या में यह अधिक दबाव में काम करता है। यहाँ वक्री मंगल को प्रायः ऐसे बल के रूप में पढ़ा जाता है जो घटता नहीं, भीतर की ओर मुड़ जाता है — खोया हुआ फिर से कमाना, पारिवारिक संपत्ति को दोबारा खड़ा करना या पुराने विवादों को फिर छेड़ना इसके सामान्य रूप हैं।

अन्य भावों में मंगल

भावों में मंगल — सभी 12 भाव

इस स्थिति के उपाय

ये उपाय सीधे द्वितीय भाव के विषयों — वाणी, पारिवारिक भोजन और धन — से संबंधित हैं। ये परंपरागत भक्ति और आचरण-संबंधी साधन हैं, जो केवल शैक्षिक उद्देश्य से दिए गए हैं; इन्हें किसी पेशेवर, चिकित्सकीय या वित्तीय सलाह का विकल्प न मानें।

वाणी के लिए मंगलवार का संयम

मंगलवार को भौम के बीज मंत्र 'ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः' या हनुमान चालीसा का पाठ करें, और उस दिन वाणी का एक छोटा-सा व्रत रखें: घर में ऊँचा स्वर नहीं, धन को लेकर बहस नहीं। परंपरा में हनुमान जी सेवा को समर्पित बल के आदर्श माने जाते हैं — और द्वितीय भाव के मंगल को अपने शब्दों में ठीक यही संतुलन चाहिए।

अन्न का दान, संपत्ति का न्यायपूर्ण बँटवारा

मंगलवार को मसूर की दाल या गुड़ का दान मंगल के लिए प्रचलित लोक-परंपरा है; यहाँ यह अन्न के भाव, अर्थात् द्वितीय भाव, का सम्मान भी है। इसके साथ व्यावहारिक पक्ष भी जोड़ें: साझी पारिवारिक संपत्ति का न्यायपूर्ण और लिखित निपटारा करें, और परिवार से लिया उधार समय पर लौटाएँ।

ये उपाय केवल शैक्षिक उद्देश्य से दिए गए हैं। मूँगा मंगल का पारंपरिक रत्न है, पर रत्न प्रबल प्रभाव डालते हैं और परंपरा में भी इनके प्रति सावधानी बरती जाती है — पूर्ण कुंडली विश्लेषण के बिना इसे कभी धारण न करें। हर उपाय को श्रद्धा से किया गया सहायक अभ्यास मानें, निश्चित फल देने वाला साधन नहीं।

मंगल के सभी उपाय मंगल मुख्य पृष्ठ पर

गोचर का मंगल बनाम जन्मकालीन मंगल

यह पृष्ठ जन्मकालीन मंगल का विचार करता है — आपकी जन्म कुंडली के द्वितीय भाव में उसका निश्चित स्थान, जिसका प्रभाव जीवन भर बना रहता है। गोचर का मंगल इससे भिन्न है: वह एक राशि में औसतन लगभग 57 दिन रहता है, तेज़ मार्गी गति में छह से आठ सप्ताह, और वक्री होने वाले वर्ष में चार से सात महीने तक एक ही राशि में ठहर सकता है। जब गोचरस्थ मंगल आपके लग्न या चंद्रमा से गिने गए द्वितीय भाव में आता है, तो कुछ समय तक बोली में तीखापन, खर्च में तेज़ी या परिवार में धन को लेकर चर्चा हो सकती है; फिर वह आगे बढ़ जाता है। मांगलिक दोष केवल जन्म कुंडली से देखा जाता है, गोचर से कभी नहीं।

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सामान्य प्रश्न

द्वितीय भाव में मंगल के बारे में सबसे अधिक पूछे जाने वाले प्रश्नों के सीधे उत्तर।

Q: क्या द्वितीय भाव में मंगल होने से व्यक्ति मांगलिक होता है?

अधिकांश आधुनिक गणना-पद्धतियों के अनुसार, जिनमें इस साइट की गणना भी शामिल है, हाँ — इनमें प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव गिने जाते हैं। उत्तर भारतीय श्लोक में केवल प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश का उल्लेख है, इसलिए अनेक उत्तर भारतीय ज्योतिषी द्वितीय भाव को नहीं गिनते, जबकि दक्षिण भारतीय पाठ में यह शामिल है। स्वराशि या उच्च का मंगल अथवा बृहस्पति की दृष्टि जैसे प्रचलित परिहार भी लागू हो सकते हैं। लग्न, चंद्रमा और शुक्र — तीनों से जाँच मांगलिक दोष कैलकुलेटर पर निःशुल्क करें।

Q: क्या द्वितीय भाव का मंगल वाणी को कठोर बनाता है?

यह वाणी को सीधा और प्रबल बनाता है; वह कठोर होगी या नहीं, यह राशि और दृष्टियों पर निर्भर है। स्वराशि या उच्च राशि में, अथवा बृहस्पति की दृष्टि मिलने पर, यही बल दृढ़ विश्वास और समझाने की क्षमता के रूप में सामने आता है। बुध की राशियों मिथुन या कन्या में, या नीच राशि कर्क में, तनाव के समय शब्द चुभने लग सकते हैं। सजगता और उत्तर देने से पहले क्षण भर का ठहराव परिणाम को बहुत हद तक बदल देते हैं।

Q: क्या द्वितीय भाव में मंगल धन के लिए शुभ है?

कमाने के लिए यह अच्छा है, पर कमाए हुए धन को सहेजकर रखने में उतना सहायक नहीं। आय प्रायः एकमुश्त आती है और साहसिक खरीद या पारिवारिक दायित्वों में शीघ्र निकल जाती है। अच्छी अवस्था वाला मंगल, या कर्क और सिंह लग्न के लिए योगकारक मंगल, ठोस संपत्ति खड़ी करने की प्रवृत्ति देता है; इस स्थिति वाले हर व्यक्ति के लिए व्यवस्थित बचत सबसे उपयोगी आदत है।

Q: क्या द्वितीय भाव का मंगल परिवार में विवाद कराता है?

यह खटास ला सकता है, पर प्रायः धन या संपत्ति को लेकर, स्नेह की कमी से नहीं। द्वितीय भाव से मंगल की दृष्टि विरासत और ससुराल से जुड़े अष्टम भाव तथा पिता से जुड़े नवम भाव पर भी पड़ती है, इसलिए पैतृक संपत्ति को लेकर विवाद या बड़ों से मतभेद इसके परंपरागत विषय हैं। स्पष्ट लिखित व्यवस्था और शांत वाणी से अधिकांश तनाव घट जाता है; बृहस्पति की दृष्टि या सुस्थित मंगल इसे और नरम कर देता है।

Q: किन लग्नों के लिए द्वितीय भाव में मंगल सबसे अनुकूल रहता है?

तुला और मीन लग्न में मंगल स्वराशि (क्रमशः वृश्चिक और मेष) में होता है, और धनु लग्न में मकर में उच्च का — इन तीनों लग्नों के लिए वह सबसे बलवान है। कर्क और सिंह लग्न के लिए मंगल योगकारक है और कार्यक्षेत्र या भाग्य को आय से जोड़ता है, यद्यपि सिंह लग्न में वह शत्रु राशि कन्या में पड़ता है। मिथुन लग्न में मंगल कर्क में नीच का होता है, जो इसका सबसे कठिन रूप है। फिर भी हर स्थिति में पूरी कुंडली फल को प्रभावित करती है।

सूचना: शास्त्रीय ज्योतिष (बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, फलदीपिका) पर आधारित। भाव-स्थिति का विश्लेषण प्रवृत्तियाँ बताता है, गारंटी नहीं देता। व्यक्तिगत परामर्श हेतु योग्य ज्योतिषी से संपर्क करें।