चंद्र मन का कारक है। कुंडली में वह जिस भाव में बैठता है, वही क्षेत्र भीतर से स्थिरता भी देता है और बेचैनी भी। भाव बताता है कि मन किस ओर टिकेगा, और शुक्ल या कृष्ण पक्ष तय करता है कि वह फल कितना खुलकर सामने आएगा। इसीलिए एक ही स्थिति का फल किसी के लिए स्थिर और किसी के लिए चंचल पढ़ा जाता है। नीचे दिया निःशुल्क कैलकुलेटर आपके जन्म-विवरण से चंद्र का भाव, राशि, पक्ष और दृष्टि निकाल देता है।
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चंद्र कौन है: मन का कारक
बृहत् पाराशर होरा शास्त्र सूर्य और चंद्र, दोनों को राजसी पद देता है; 'रानी' वाली छवि चंद्र को स्त्री-भाव का ग्रह मानकर बाद में गढ़ी गई लोकप्रिय व्याख्या है, पाराशर का शब्द नहीं। ग्रंथ की मूल परिभाषा इससे सरल और कहीं अधिक उपयोगी है — चंद्र मन है। मन के कारक के रूप में वह मनःस्थिति, ग्रहणशीलता, भीतर बनने वाले संस्कार और किसी नए प्रभाव को अपनाने की गति — इन सबका प्रतिनिधित्व करता है। इसके साथ माता, जल तथा सभी तरल पदार्थ, सुख, यात्रा और तीर्थ, मोती, श्वेत वर्ण एवं वस्त्र जुड़ते हैं। दो बातें स्पष्ट रहनी चाहिए। तार्किक अध्ययन, वाणी और स्मरण-शक्ति बुध का विषय हैं, चंद्र का नहीं; तथा 'जनसमूह' वाला अर्थ देश-नगर के फलित से आया विस्तार है, जन्म-कुंडली का कारकत्व नहीं। पुरुष की कुंडली में बाईं आँख वाला नियम भी चिकित्सा-परंपरा की रूढ़ि है, जबकि शास्त्रीय नेत्र-विचार द्वितीय और द्वादश भाव से होता है। पाराशर चंद्र को चतुर्थ भाव का कारक बताते हैं, तथा यह भी कि माता का विचार चंद्र से चतुर्थ भाव से किया जाए।
चंद्र के फल पर जितना प्रभाव उसके पक्ष का पड़ता है, उतना किसी और बात का नहीं। ग्रंथ का द्वितीय अध्याय शुक्ल पक्ष के चंद्र को शुभ और कृष्ण पक्ष के चंद्र को अशुभ मानता है, तथा अमावस्या के निकट उसे सबसे निर्बल बताता है। टीका तुरंत एक छूट भी देती है — कृष्ण पक्ष का चंद्र यदि किसी शुभ ग्रह से युत हो अथवा उसकी दृष्टि में हो, तो वह शुभ ही फल देता है। यवन तथा सारावली की परंपरा इसी गुण को सूर्य से दूरी के आधार पर श्रेणीबद्ध करती है, और यही कारण है कि एक ही भाव में बैठे चंद्र का फल दो जातकों के लिए अलग पढ़ा जाता है। नीचे इसी पृष्ठ पर जन्म-समय के पंचांग से आपका अपना पक्ष निकालकर दिखाया जाता है, जिससे वह आपके फल में अनुमान नहीं, गणना बनकर जुड़े। दूसरी परत अवस्था की है। चंद्र का स्वामित्व केवल कर्क पर है, मूलत्रिकोण वृषभ में 4° से 30° तक, उच्च वृषभ में (परम उच्च 3°) तथा नीच वृश्चिक में (परम नीच 3°)। सूर्य और बुध उसके मित्र हैं, शेष सम, और उसका कोई नैसर्गिक शत्रु नहीं — यहाँ विषमता ध्यान देने योग्य है, क्योंकि बुध चंद्र को शत्रु मानता है। चंद्र की कोई विशेष पूर्ण दृष्टि नहीं होती, अतः वह केवल अपने से सप्तम भाव को पूर्ण रूप से देखता है, जबकि छब्बीसवें अध्याय की अंश-दृष्टियाँ उस पर भी उतनी ही लागू होती हैं जितनी शेष ग्रहों पर। दिग्बल उसे चतुर्थ भाव में मिलता है, दशम में नहीं, और उसकी विंशोत्तरी महादशा दस वर्ष चलती है।
चंद्र कोई पंचमहापुरुष योग नहीं बनाता — वे मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि के हैं — किंतु अपने कई योग अवश्य बनाता है, और फलित में सबसे पहले प्रायः इन्हीं की चर्चा होती है। चंद्र से द्वितीय में सूर्य के अतिरिक्त कोई ग्रह हो तो सुनफा, द्वादश में हो तो अनफा, दोनों ओर हो तो दुरुधरा। जहाँ दोनों ओर कोई ग्रह न हो, वहीं से केमद्रुम की बात उठती है; किंतु पाराशर इस एक शर्त से कहीं अधिक माँगते हैं और उसके शास्त्रीय भंग भी बताए गए हैं, इसलिए वह अकेला कभी निर्णय नहीं बनता — नीचे दिए प्रश्नोत्तर तथा हमारे केमद्रुम दोष पृष्ठ पर पूरी परख दी गई है। गजकेसरी पाराशर के अनुसार तब बनता है जब गुरु लग्न अथवा चंद्र से केंद्र में हो, किसी अन्य शुभ ग्रह से युत या दृष्ट हो, और नीच, अस्त या शत्रुराशि में न हो; जो सरल रूप 'चंद्र से केंद्र में गुरु' अधिकांश गणक लेते हैं, वह फलदीपिका का केसरी योग है। चंद्र से षष्ठ, सप्तम और अष्टम में शुभ ग्रह हों तो अधि योग बनता है, तथा चंद्र और मंगल की युति से चंद्र-मंगल योग — दृष्टि वाला रूप आधुनिक विस्तार है। एक पारिभाषिक भेद स्पष्ट रखें: जन्म के समय चंद्र जिस 30° की निरयण राशि में हो वह जन्म राशि है, जिस पर अधिकांश फलादेश और लगभग समस्त राशिफल आधारित होते हैं; और वह जिस 13°20' के नक्षत्र में हो वह जन्म नक्षत्र है, जिससे विंशोत्तरी दशा तथा नामाक्षर निकलते हैं। जन्म राशि को कभी 'नक्षत्र आधारित' न कहें।
ये सभी गुण चंद्र के अपने हैं और प्रत्येक कुंडली में समान रहते हैं; भाव केवल यह बदलता है कि मन किस क्षेत्र पर टिकेगा।
बारहों भावों में चंद्र
आगे वही चंद्र बारह अलग-अलग भूमियों में है। भाव ग्रह को नहीं बदलता; वह केवल उस भूमि को तय करता है जिस पर मन खड़ा होता है — इसीलिए माता चतुर्थ से, आय एकादश से और एकांत द्वादश से देखे जाते हैं। प्रत्येक खंड को अपने पक्ष और चंद्र की राशि के साथ पढ़ें; जिस भाव का विस्तृत पृष्ठ बना है, वहाँ दी गई कड़ी सारांश से कहीं आगे ले जाती है। पद्धति के विषय में एक बात: यह पृष्ठ भाव की गणना राशि के आधार पर करता है, अर्थात् चंद्र जिस राशि में है वही उसका भाव माना गया है। भाव-चलित कुंडली में, जहाँ प्रत्येक भाव उसके अपने आरंभ-बिंदु से नापा जाता है, राशि के आदि या अंत में बैठा चंद्र समीप के भाव में चला जा सकता है — इसलिए यदि आपका चंद्र राशि की संधि से एक-दो अंश की दूरी पर हो, तो यहाँ इस भाव के साथ-साथ उससे लगे भाव को भी पढ़ें।
ये सामान्य प्रवृत्तियाँ हैं, पूरी कुंडली पर निर्भर — शैक्षिक, भविष्यवाणी नहीं, और व्यक्तिगत परामर्श का विकल्प नहीं।
प्रथम भाव — स्वयं, शरीर और स्वभाव
मन सीधे शरीर पर बैठता है। मनोभाव चेहरे पर दिख जाते हैं, स्वभाव ग्रहणशील तथा संवेदनशील रहता है, और लोग आपको शीघ्र पढ़ लेते हैं — कई बार आपकी अपेक्षा से भी शीघ्र। शुक्ल पक्ष का चंद्र यहाँ खुला और आकर्षक व्यक्तित्व देता है; कृष्ण पक्ष का चंद्र उसी संवेदनशीलता को भीतर मोड़ देता है। स्वास्थ्य भी मनःस्थिति के साथ चलता है, प्रायः अनुमान से कहीं अधिक निकटता से।
प्रथम भाव में चंद्र का पूर्ण विश्लेषण पढ़ेंद्वितीय भाव — धन, कुटुंब और आहार
द्वितीय भाव धन, कुटुंब, वाणी और आहार का है, और चंद्र इन चारों को मन के अधीन कर देता है। धन सीधी रेखा में नहीं, ज्वार-भाटे की तरह आता है, और कितना टिकेगा यह प्रायः उस अवधि की मानसिक स्थिरता पर निर्भर करता है। परिवार — विशेषकर माता का पक्ष तथा घर की स्त्रियाँ — सुरक्षा-बोध का आधार बनते हैं, और भोजन केवल आवश्यकता न रहकर भावना से जुड़ा प्रसंग बन जाता है। वाणी में मनोदशा स्पष्ट झलकती है, इसलिए शांत मन में आप प्रभावी होते हैं और अशांत मन में पारदर्शी। यहाँ से चंद्र अष्टम भाव को देखता है, अतः उत्तराधिकार, साझा धन और ससुराल पक्ष भावनात्मक रूप से सक्रिय रहते हैं तथा पारिवारिक उलटफेर गहरा असर छोड़ते हैं। यहाँ स्वराशि कर्क का चंद्र बचत के प्रति रक्षात्मक दृष्टि देता है और वृषभ का उच्च चंद्र बल; वृश्चिक में कृष्ण पक्षीय चंद्र हो तो संकल्प के भरोसे नहीं, स्वतः चलने वाली बचत-व्यवस्था बनाएँ।
तृतीय भाव — साहस, भाई-बहन और प्रयास
तृतीय उपचय भाव है — समय और प्रयास के साथ बढ़ने वाला — इसलिए कृष्ण पक्ष के चंद्र की सामान्य चेतावनी यहाँ हल्की पड़ जाती है। मन का कारक इस भाव में हो तो पराक्रम पहले अनुभव से जागता है, तर्क से बाद में। मनोदशा अनुकूल हो तो काम तेज़ चलता है और प्रतिकूल हो तो रुक जाता है, अतः उत्साह पर नहीं, दिनचर्या पर निर्भर रहना सबसे उपयोगी सुधार है। भाई-बहन, विशेषकर बहनें, जीवन में भावनात्मक रूप से केंद्रीय रहते हैं, तथा पड़ोस एवं छोटी यात्राएँ बार-बार लौटती हैं। लेखन, अध्यापन, संचार-माध्यम और संवाद से जुड़ा हर काम इस स्थिति के अनुकूल है, यद्यपि विश्लेषण की गहराई बुध की अवस्था से देखी जाती है, चंद्र से नहीं। यहाँ से चंद्र नवम भाव को देखता है, जिससे आपका प्रयास भाग्य, पिता, गुरुजन और लंबी यात्राओं से जुड़ जाता है — यहाँ की पहल वहाँ अवसर बनकर लौटती है। स्वराशि कर्क अथवा उच्च वृषभ का चंद्र प्रयास को स्थिर करता है; वृश्चिक हो तो प्रतिद्वंद्वियों के साथ-साथ अपनी बेचैनी के प्रति भी धैर्य अपेक्षित है।
चतुर्थ भाव — माता, गृह और मानसिक शांति
यह चंद्र की अपनी भूमि है — दिग्बल उसे चतुर्थ में मिलता है और कारकत्व भी इसी का। गृह, माता, भूमि और वाहन गहरे मायने रखते हैं, तथा मानसिक शांति वह धुरी बन जाती है जिसके चारों ओर जीवन सजता है। शुक्ल पक्ष का चंद्र यहाँ सबसे स्थिर स्थितियों में गिना जाता है। 'कारको भाव नाशाय' बाद की लोकोक्ति है, पाराशर का सूत्र नहीं; उसे मुख्यतः तभी तौलें जब चंद्र क्षीण या पीड़ित हो।
चतुर्थ भाव में चंद्र का पूर्ण विश्लेषण पढ़ेंपंचम भाव — संतान, बुद्धि और प्रेम
कल्पनाशील और स्नेही मन। संतान भावनात्मक रूप से बड़ा स्थान घेरती है, प्रेम गहराई से अनुभव होता है और कल्पना पद्धति से आगे दौड़ती है। मंत्र तथा भक्ति यहाँ सहज बैठते हैं, और छोटों को पढ़ाना अनुकूल रहता है। शिक्षा वहाँ अच्छी चलती है जहाँ विषय से लगाव बने; शुष्क विश्लेषण बुध पर निर्भर है। त्रिकोण में शुक्ल पक्ष का चंद्र वस्तुतः शुभ रहता है।
पंचम भाव में चंद्र का पूर्ण विश्लेषण पढ़ेंषष्ठ भाव — स्वास्थ्य, सेवा और ऋण
षष्ठ भाव दुःस्थान भी है और उपचय भी; चंद्र यहाँ पहले का दबाव अनुभव करता है और दूसरे का लाभ धीरे-धीरे अर्जित करता है। मन दूसरों की समस्याएँ उठा लेता है — रोगी, अधीनस्थ, आश्रित, ऋण — और चिंता स्थायी जोखिम बन जाती है, जो प्रायः उदर, नींद तथा शरीर के जल-संतुलन पर उतरती है, क्योंकि शरीर के तरल चंद्र के अधीन हैं। दूसरी ओर यह स्थिति सेवा, चिकित्सा, परिचर्या, अन्न से जुड़े कार्य और हर उस काम की क्षमता देती है जिसमें प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा ध्यान चाहिए। समय भी साथ देता है — बीस की आयु में बड़े दिखने वाले विरोध और ऋण चालीस तक पतले पड़ जाते हैं। यहाँ से चंद्र द्वादश भाव को देखता है, जिससे मानसिक थकान और विश्राम का संबंध और गहरा हो जाता है — इस कुंडली में नींद उपचार है, विलास नहीं। कृष्ण पक्ष के चंद्र को नियत समय, स्पष्ट सीमाएँ और शुभ दृष्टि चाहिए; कर्क या वृषभ राशि हो तो बिना थके सेवा करने का बल मिलता है।
सप्तम भाव — विवाह और साझेदारी
मन साझेदारी में जाकर टिकता है। विचार खुलने के लिए साथ चाहिए, और जीवनसाथी प्रायः पोषण करने वाला, गृहप्रिय अथवा जल, अन्न तथा परिचर्या से जुड़ा होता है। व्यवहार में लोकप्रियता सहज मिलती है। जोखिम दूसरे की मनोदशा पर निर्भरता का है; प्रतिफल गहरी दांपत्य आत्मीयता का। पक्ष और दृष्टि तय करते हैं कि इनमें से क्या सामने आएगा।
सप्तम भाव में चंद्र का पूर्ण विश्लेषण पढ़ेंअष्टम भाव — आयु, गहराई और परिवर्तन
अष्टम दुःस्थान है, किंतु वही आयु, उत्तराधिकार, ससुराल और हर उस विषय का भाव भी है जिसे खोजना पड़ता है, घोषित नहीं किया जाता — और चंद्र वहाँ मन को ठीक इन्हीं की ओर मोड़ देता है। अंतर्ज्ञान असामान्य रूप से सटीक हो सकता है, मनोविज्ञान, चिकित्सा, शोध, मंत्र और गूढ़ विद्या में रुचि वास्तविक होती है, तथा रहस्य भली-भाँति सँभाले जाते हैं — अपने भी। कठिनाई यह है कि भावना भीतर ही बहती है: आघात व्यक्त होने के बजाय सोख लिए जाते हैं, और शुभ सहयोग रहित कृष्ण पक्षीय चंद्र पुरानी बातों को बहुत देर तक जीवित रखता है। यहाँ से चंद्र द्वितीय भाव को देखता है, अतः मनःस्थिति का प्रभाव कुटुंब, बचत और वाणी तक सीधे पहुँचता है। साझा धन, उत्तराधिकार तथा ससुराल का घर जीवनभर महत्त्व रखते हैं। इसे चेतावनी नहीं, उपयोग योग्य गहराई मानें — चिकित्सा, परामर्श और अनुसंधान इसके स्वाभाविक क्षेत्र हैं; शुक्ल पक्ष अथवा शुभ दृष्टि इस स्थिति का स्वर काफ़ी बदल देती है।
नवम भाव — भाग्य, धर्म और पिता
नवम धर्म, भाग्य, पिता और गुरु का त्रिकोण है, और वहाँ चंद्र आस्था को बौद्धिक मत नहीं, भावनात्मक सत्य बना देता है। तीर्थ, लंबी यात्राएँ, गुरुजन और दर्शन-शास्त्र मन को वैसे ही स्थिर करते हैं जैसे अन्य कुंडलियों में घर करता है। इस कुंडली को बदलने वाली यात्रा वही होती है जो किसी गुरु, ग्रंथ अथवा पवित्र स्थान के लिए की जाए, आजीविका के लिए की गई नहीं; और यदि निवास बदलता है तो प्रायः इसी सूत्र के साथ बदलता है। भाग्य गणना से नहीं, किसी संबंध से खुलता है — कोई वरिष्ठ, कोई गुरु, कोई परंपरा। यहाँ से चंद्र तृतीय भाव को देखता है, जिससे विश्वास लौटकर साहस, संवाद और भाई-बहनों के क्षेत्र में उतरता है: जो आप मानते हैं, वही करने का हौसला बनता है। शुक्ल पक्ष का चंद्र यहाँ सीधा शुभ है; क्षीण चंद्र को त्रिकोण बल से नहीं, पुण्य से सँभालता है, यद्यपि गुरु की दृष्टि उसे स्पष्ट सहारा देती है, और वृश्चिक राशि हो तो श्रद्धा उत्तराधिकार से नहीं, प्रश्नों से होकर आती है।
दशम भाव — कार्यक्षेत्र, प्रतिष्ठा और सार्वजनिक भूमिका
सार्वजनिक और परिवर्तनशील आजीविका। लोगों से जुड़ा काम — परिचर्या, अन्न, आतिथ्य, जनसंपर्क, जल, यात्रा — अनुकूल रहता है, तथा प्रतिष्ठा योग्यता के साथ-साथ मनोदशा से भी घटती-बढ़ती है। दशम में चंद्र को दिग्बल नहीं मिलता, इसलिए स्थान निरंतरता से अर्जित होता है, अपने आप नहीं; शुक्ल पक्ष का चंद्र यह काम बहुत सरल कर देता है।
दशम भाव में चंद्र का पूर्ण विश्लेषण पढ़ेंएकादश भाव — लाभ, संपर्क और इच्छापूर्ति
एकादश लाभ, आय, संपर्क, बड़े भाई-बहन और इच्छापूर्ति का उपचय भाव है, और वहाँ चंद्र लोगों के माध्यम से कमाता है। मित्रता यहाँ शौक नहीं, साधन है: ग्राहक, संरक्षक और समूह व्यक्तिगत आत्मीयता से आते हैं, तथा सहायकों में स्त्रियाँ एवं बड़े भाई-बहन प्रायः रहते हैं। आय एक स्रोत से नहीं, कई ओर से आती है और मंडली के आकार के साथ घटती-बढ़ती है। इच्छाएँ अनेक होती हैं, तीव्रता से अनुभव होती हैं और बड़ी सीमा तक पूरी भी होती हैं — कठिनाई यह है कि तृप्ति अल्पकालिक रहती है और अगली कामना पिछली का सुख लेने से पहले आ खड़ी होती है। यहाँ से चंद्र पंचम भाव को देखता है, अतः लाभ संतान, सृजन, शिक्षा और प्रेम तक पहुँचता है, तथा धन प्रायः उसी काम से आता है जो पहले रुचि के लिए आरंभ हुआ था। यहाँ लाभ एक साथ नहीं, जुड़ते-जुड़ते बनता है, इसलिए क्षीण चंद्र की हानि इस भाव में अन्य भावों जितनी नहीं होती। कर्क या वृषभ राशि इस विस्तृत संपर्क-जाल में सच्ची आत्मीयता जोड़ देती है।
द्वादश भाव — व्यय, विदेश और मोक्ष
मन एकांत में लौटकर स्वस्थ होता है। विदेश, विश्राम, नींद और निवृत्ति बड़ा स्थान घेरते हैं, स्वप्न स्पष्ट रहते हैं और निजता आवश्यकता है, पसंद नहीं। व्यय अधिक रहता है — प्रायः सुख-सुविधा, यात्रा अथवा दूसरों पर। द्वादश केवल हानि नहीं, मोक्ष और विसर्जन का भी भाव है; शुक्ल पक्ष का चंद्र यहाँ पराजित नहीं, चिंतनशील कुंडली बनाता है।
द्वादश भाव में चंद्र का पूर्ण विश्लेषण पढ़ेंचंद्र किस भाव में सबसे प्रबल या सबसे निर्बल है?
सबसे प्रबल: चंद्र का सर्वोत्तम भाव चतुर्थ है: वही उसका कारक भाव है और वहीं उसे दिग्बल मिलता है, इसलिए मन, माता और गृह एक-दूसरे को सहारा देते हैं। इसके बाद केंद्र तथा त्रिकोण — प्रथम, पंचम, सप्तम, नवम और दशम — उसे विस्तार देते हैं, जिनमें पंचम और नवम विशेष अनुकूल हैं। इन सबसे ऊपर पक्ष है: सूर्य से दूर, शुक्ल पक्ष का चंद्र किसी भी भाव में बलवान रहता है, और स्वराशि कर्क अथवा उच्च वृषभ में वह और भी सुदृढ़ हो जाता है।
सबसे परीक्षक: कृष्ण पक्ष के चंद्र की सबसे कठिन परीक्षा अष्टम और द्वादश में होती है, क्योंकि दोनों भाव मन से वह सोखने को कहते हैं जिसे वह सहज कह नहीं पाता। षष्ठ इसमें चिंता, ऋण और स्वास्थ्य जोड़ता है, यद्यपि उपचय होने के कारण वह बहुत कुछ आयु के साथ लौटा भी देता है, और दशम अलग स्थिति है — केंद्र होते हुए भी वही एक भाव है जहाँ चंद्र को दिग्बल नहीं मिलता। वृश्चिक की नीच अवस्था तथा अमावस्या के समय सूर्य के अत्यंत निकट पहुँचा चंद्र — ये दो बातें उसे हर भाव में निर्बल करती हैं, और किसी शुभ ग्रह की युति या दृष्टि इन सबका भार हल्का कर देती है।
भावों में वक्री चंद्र
चंद्र कभी वक्री नहीं होता। वह कुंडली का सबसे तीव्र ग्रह है — लगभग सवा दो दिन में एक राशि और लगभग 27.3 दिन में पूरा राशिचक्र — तथा सदैव मार्गी रहता है। अन्य ग्रहों में वक्रता जो काम करती है, चंद्र में वह काम पक्ष करता है। शुक्ल पक्ष का, सूर्य से दूर होता हुआ चंद्र शुभ माना जाता है और अपने भाव का फल खुलकर देता है; कृष्ण पक्ष का, विशेषकर अमावस्या के निकट का चंद्र अशुभ माना जाता है और वही फल भीतर की ओर मोड़ देता है। पक्ष बल षड्बल का विधिवत अंग है, कोई अटकल नहीं; और ऊपर बताई गई शास्त्रीय छूट यहाँ भी लागू रहती है — शुभ ग्रह का साथ अथवा उसकी दृष्टि क्षीण चंद्र की प्रतिष्ठा लौटा देती है। आपका अपना पक्ष नीचे जन्म-समय से निकालकर दिया गया है।
चंद्र के उपाय, मंत्र और सेवा
चंद्र के पारंपरिक उपाय दो बिंदुओं पर काम करते हैं — मन और माता, जो उसके सबसे सीधे कारकत्व हैं। ये उपाय शैक्षिक तथा सांस्कृतिक जानकारी के रूप में दिए गए हैं; ये चिकित्सा, परामर्श अथवा किसी व्यावसायिक सलाह का विकल्प नहीं हैं। इस पृष्ठ पर किसी रत्न की संस्तुति नहीं की गई है।
सोमवार को चंद्र का बीज मंत्र
सोमवार को 'ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्राय नमः' का जप करें, यथासंभव प्रातः काल और स्थिर दीपक अथवा जलपात्र के सामने बैठकर। संख्या लंबी रखने के बजाय दिन और नियम एक-से रखें; चंद्र तीव्रता से नहीं, आवृत्ति से सधता है। आरंभ के लिए शुक्ल पक्ष का सोमवार स्वाभाविक बिंदु है।
माता की सेवा
चंद्र का शास्त्रीय उपाय कोई वस्तु नहीं, एक संबंध है — माता की, अथवा जो उस स्थान पर हों ऐसी किसी वरिष्ठ स्त्री की, व्यावहारिक और नियमित सेवा करें। समय देना, स्वास्थ्य की देखभाल और वह कुशल-क्षेम जो सचमुच पूछी जाए, टाली न जाए — परंपरा इसी को उपाय मानती है, क्योंकि चंद्र चतुर्थ भाव और माता, दोनों का कारक है।
जल अथवा दूध अर्पित करें
सूर्योदय के समय जल अर्पित करें और सोमवार को दूध चढ़ाएँ; घर में स्वच्छ जल-स्रोत बनाए रखना भी इसी भावना का विस्तार है। जहाँ संभव हो, इसे बाहर तक ले जाएँ — राहगीरों, पशुओं अथवा पक्षियों के लिए पीने के पानी की व्यवस्था करें। चंद्र तरल और सुख का कारक है, तथा जल को बाहर की ओर बहाने वाले कर्म मन को स्थिर करने वाले माने गए हैं।
चावल, दूध अथवा श्वेत वस्त्र का दान
श्वेत वस्तुएँ चंद्र की हैं — चावल, दूध, दही, चीनी और श्वेत वस्त्र। दान सोमवार को करें और यथासंभव किसी स्त्री को, छोटे बच्चों वाली माता को, अथवा ऐसे स्थान पर जहाँ लोगों को भोजन मिलता हो। प्रतीक के बजाय वही दें जिसकी वास्तव में आवश्यकता हो; परंपरा भावना तथा नियमितता को ही उपाय का कार्यकारी अंश मानती है।
ये उपाय केवल शैक्षिक उद्देश्य से दिए गए हैं। मोती चंद्रमा का पारंपरिक रत्न है, पर रत्न प्रबल प्रभाव डालते हैं और परंपरा में भी इनके प्रति सावधानी बरती जाती है — पूर्ण कुंडली विश्लेषण के बिना इसे कभी धारण न करें। हर उपाय को श्रद्धा से किया गया सहायक अभ्यास मानें, निश्चित फल देने वाला साधन नहीं।
भावों में चंद्र — सामान्य प्रश्न
जन्म-कुंडली में चंद्र को लेकर प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
Q: क्या शुक्ल और कृष्ण पक्ष का चंद्र एक ही भाव में अलग फल देता है?
हाँ, और यह देखने का सरल उपाय भी है कि पक्ष कितना आगे बढ़ चुका है। यहाँ बल सूर्य से दूरी पर टिकता है, और तिथि इसी दूरी को गिनती है — प्रत्येक तिथि सूर्य तथा चंद्र के बीच 12° का अंतर है। अमावस्या पर यह अंतर लगभग शून्य रहता है और चंद्र सबसे निर्बल; पूर्णिमा पर 180° और चंद्र पूर्णतः अपने ही प्रकाश पर खड़ा। व्यवहार में प्रायः यह माना जाता है कि शुक्ल अष्टमी से कृष्ण अष्टमी तक का चंद्र अपने भाव का फल स्वयं उठा लेता है, जबकि अमावस्या के दो-तीन तिथि के भीतर वाले चंद्र को किसी शुभ ग्रह के सहारे ही पढ़ना चाहिए। इस पृष्ठ की पंचांग-पंक्ति आपके जन्म-समय की तिथि और पक्ष बताती है, जिससे आप अपने चंद्र को अनुमान से नहीं, इसी क्रम में रखकर देख सकें।
Q: चंद्र किस भाव में सबसे बलवान होता है?
चतुर्थ भाव में, और इसका कारण दिग्बल है। प्रत्येक ग्रह कुंडली की एक दिशा में पूर्ण बल पाता है — गुरु और बुध लग्न पर, सूर्य तथा मंगल दशम पर, शनि सप्तम पर, और चंद्र शुक्र के साथ चतुर्थ पर, जो कुंडली का सबसे निचला बिंदु तथा अर्धरात्रि का स्थान है। यह चंद्र के स्वभाव से ठीक मेल खाता है, क्योंकि चतुर्थ विश्राम, गृह, माता और उस भूमि का भाव है जिस पर व्यक्ति खड़ा होता है — वही सब चंद्र का कारकत्व भी है, अतः कारकत्व और दिग्बल एक ही भाव में आ जाते हैं। इसका उल्टा पक्ष यह है कि दशम में चंद्र को दिग्बल बिलकुल नहीं मिलता। भाव के साथ राशि भी गिनें — वृषभ में उच्च (परम उच्च 3°), वृषभ में ही 4° से 30° तक मूलत्रिकोण, कर्क का स्वामी और वृश्चिक में नीच।
Q: जन्म राशि और जन्म नक्षत्र में क्या अंतर है?
परिभाषा से अधिक महत्त्व इसके परिणाम का है: एक ही दिन जन्मे दो व्यक्तियों की चंद्र राशि समान हो सकती है, फिर भी उनकी विंशोत्तरी दशा का क्रम और नामाक्षर अलग निकलेंगे, क्योंकि ये दोनों नक्षत्र से आते हैं, राशि से नहीं। राशि 30° की होती है और उसमें 13°20' के सवा दो नक्षत्र आते हैं, अतः राशि बदले बिना नक्षत्र बदल जाता है — और उसके साथ जीवन की पहली दशा का स्वामी तथा जन्म के समय उसका शेष भाग भी। जन्म राशि वह है जिस पर राशिफल तथा अधिकांश फलादेश चलते हैं; जन्म नक्षत्र वह है जिस पर दशा-क्रम और पारंपरिक नाम टिके हैं। दोनों साथ-साथ देखे जाते हैं, एक दूसरे का स्थान नहीं लेता।
Q: केमद्रुम योग सरल शब्दों में क्या है, और क्या वह भंग भी होता है?
केमद्रुम आवश्यकता से कहीं अधिक बार दिखाया जाता है, क्योंकि अधिकांश गणक फलदीपिका की केवल एक शर्त जाँचते हैं — चंद्र के दोनों ओर कोई ग्रह न हो। बृहत् पाराशर होरा शास्त्र तीन शर्तें एक साथ माँगता है: चंद्र के साथ सूर्य के अतिरिक्त कोई ग्रह न हो, चंद्र से द्वितीय तथा द्वादश दोनों भाव रिक्त हों, और लग्न से किसी केंद्र में कोई ग्रह न हो। इसके ऊपर शास्त्रीय भंग भी लगते हैं — चंद्र स्वयं लग्न अथवा सूर्य से केंद्र में हो, गुरु चंद्र से केंद्र में हो, या चंद्र पर शुभ दृष्टि हो — इसलिए परिभाषा पूरी होने पर भी योग व्यवहार में निष्फल रह सकता है। किसी भी केमद्रुम-संकेत को जीवन का निर्णय नहीं, पूरी कुंडली देखने का कारण मानें, और शर्तों तथा भंग को एक-एक कर परखने के लिए हमारे केमद्रुम दोष पृष्ठ का उपयोग करें।
Q: चंद्र की महादशा में क्या फल मिलता है?
विंशोत्तरी में चंद्र की महादशा दस वर्ष चलती है, और वह घटनाओं से अधिक मन तथा परिस्थिति की अवधि होती है। विषय जन्म-कुंडली में चंद्र के भाव, राशि और पक्ष के अनुसार आते हैं: गृह, माता, संपत्ति, जल, यात्रा, अन्न और जनसंपर्क आगे आ जाते हैं, तथा निर्णय भावनात्मक धुरी पर घूमने लगते हैं। बलवान शुक्ल पक्षीय चंद्र प्रायः सुख, गृह-स्थिरता और लोकप्रियता देता है; निर्बल अथवा क्षीण चंद्र बेचैनी, बार-बार स्थान-परिवर्तन और मनोदशा के साथ चलता स्वास्थ्य दे सकता है। इन दस वर्षों के भीतर की अंतर्दशाएँ रंग तय करती हैं, इसलिए चंद्र की महादशा आरंभ से अंत तक एक-सी नहीं रहती।