सूर्य कुंडली की आत्मा है — ओज, आत्मसम्मान, अधिकार और पिता का कारक। वह जिस भाव में बैठता है, उस भाव के विषय उसके प्रकाश में आ जाते हैं और वहाँ की कोमलता झुलस भी सकती है; साथ ही सामने के भाव पर उसकी पूर्ण दृष्टि सदा बनी रहती है। आगे पढ़ें कि पाराशरी परंपरा में सूर्य कौन है और बारह भावों में उसका फल कैसा रहता है; फिर निःशुल्क गणना से अपनी कुंडली में सूर्य का भाव, राशि और अवस्था देखें।
अपने सूर्य का भाव जानें
जन्म विवरण दर्ज करें — सूर्य का भाव, राशि और अवस्था, निःशुल्क।
सूर्य कौन है: आत्मा का कारक
पाराशरी परंपरा में सूर्य — रवि, आदित्य, भानु — नैसर्गिक पाप ग्रह है, पर उसकी कठोरता हानि करने वाली नहीं, दिन के उजाले जैसी है। बृहत् पाराशर होरा शास्त्र ग्रह-मंडल में सूर्य और चंद्र दोनों को राजपद देता है; मंगल सेनापति, बुध राजकुमार, गुरु तथा शुक्र मंत्री और शनि सेवक कहे गए हैं। 'सूर्य राजा और चंद्र रानी' वाला प्रचलित विभाजन बाद की लोकप्रिय व्याख्या है, पाराशर का अपना वर्गीकरण नहीं। उसी अध्याय में सूर्य को सबकी आत्मा कहा गया है — इसी अर्थ में उसे आत्मा, ओज तथा स्वयं को सार्थक सिद्ध करने की इच्छा का नैसर्गिक कारक माना जाता है। अध्याय 32 में वर्णित आत्मकारक इससे भिन्न है, क्योंकि वह चर कारक है — किसी कुंडली में सबसे अधिक अंश वाला ग्रह, जो प्रायः सूर्य नहीं होता। पिता, अधिकार, शासन और राज्य, मान-प्रतिष्ठा तथा सप्त धातुओं में अस्थि — ये सब भी उसी के कारकत्व में आते हैं। पारंपरिक चिकित्सा-ज्योतिष पुरुष की कुंडली में दाहिनी और स्त्री की कुंडली में बाईं आँख का विचार सूर्य से करता है, जबकि शास्त्रीय नेत्र-विचार द्वितीय तथा द्वादश भाव से होता है; अतः इसे चिकित्सा-ज्योतिष की परिपाटी मानें, पाराशरी नियम नहीं।
बृहत् पाराशर होरा शास्त्र की भाव-कारक सूची में सूर्य केवल प्रथम भाव का कारक है; उसी सूची में नवम गुरु को और दशम बुध को दिया गया है। नवम से उसका संबंध पितृ कारक के रूप में बनता है — ग्रंथ स्वयं कहता है कि पिता का प्रश्न उठने पर कारक सूर्य ही है, और सूर्य से गिना गया नवम भाव पिता का सूचक है। सूर्य को दशम का कारक मानना उत्तर कालामृत की बहु-कारक परंपरा से आया है। स्वामित्व उसका केवल सिंह राशि पर है; सिंह के 0° से 20° तक उसका मूलत्रिकोण और 20° से 30° तक सामान्य स्वराशि रहती है। मेष में वह उच्च का होता है, सर्वाधिक बल 10° पर; तुला में नीच का, सर्वाधिक निर्बलता भी 10° पर। नैसर्गिक मित्र चंद्र, मंगल और गुरु हैं, बुध सम है, शुक्र तथा शनि शत्रु — ये संबंध तात्कालिक मैत्री के साथ मिलकर पंचधा मैत्री बनाते हैं। कोई विशेष पूर्ण दृष्टि सूर्य की नहीं होती; चंद्र, बुध और शुक्र की भाँति वह अपने स्थान से सप्तम भाव को ही पूर्ण दृष्टि से देखता है, और अध्याय 26 की अंशात्मक दृष्टियाँ उस पर भी हर ग्रह की तरह लागू रहती हैं। दिग्बल उसे दशम भाव में प्राप्त होता है, चतुर्थ में बिलकुल नहीं।
सूर्य कभी वक्री नहीं होता, और चूँकि अस्त होने की स्थिति सूर्य के सामीप्य से ही बनती है, वह स्वयं कभी अस्त नहीं कहलाता; यह दोष वह शेष छह ग्रहों पर लाता है, जिनकी शास्त्रीय सीमाएँ आगे दी गई हैं। विंशोत्तरी में सूर्य की महादशा 6 वर्ष की है; जन्म का चंद्र कृत्तिका, उत्तरा फाल्गुनी या उत्तराषाढ़ा में हो तो जीवन सूर्य दशा से आरंभ होता है, पर केवल शेष अंश के अनुपात में — पूरे 6 वर्ष कभी नहीं। पंच महापुरुष योग मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि से बनते हैं, सूर्य से कोई नहीं; उसके अपने योग अलग हैं — बुध के साथ बुधादित्य योग, जिसके पूर्ण फल के लिए अनेक ज्योतिषी बुध का अस्त-सीमा से बाहर होना आवश्यक मानते हैं, तथा वेशि, वासि और उभयचरी योग, जो तब बनते हैं जब चंद्र के अतिरिक्त कोई ग्रह सूर्य से द्वितीय भाव में, द्वादश में अथवा दोनों में स्थित हो।
ये गुण हर भाव में सूर्य के साथ जाते हैं; बदलता केवल यह है कि उसका प्रकाश और ताप जीवन के किस क्षेत्र पर पड़ता है।
बारहों भावों में सूर्य
नीचे हर खंड में सूर्य को एक भाव के विषयों से पढ़ा गया है — वहाँ वह क्या प्रकाशित करता है और क्या झुलसा सकता है, उस स्थान से किस भाव पर उसकी दृष्टि जाती है, और कौन-सी अवस्था या योग सर्वाधिक महत्व रखता है। जिन भावों का अपना विस्तृत पृष्ठ बना है, उनके सार से वहीं तक पहुँचा जा सकता है; शेष का पूरा विवेचन यहीं दिया गया है। हर फल को एक प्रवृत्ति मानें, जिसे शेष कुंडली बढ़ा भी सकती है और घटा भी।
ये सामान्य प्रवृत्तियाँ हैं, पूरी कुंडली पर निर्भर — शैक्षिक, भविष्यवाणी नहीं, और व्यक्तिगत परामर्श का विकल्प नहीं।
प्रथम भाव — स्वयं, ओज और स्वभाव
लग्न में बैठा सूर्य आत्मा को उसका अपना आसन दे देता है — स्थिर ओज, आत्मसम्मान का प्रबल अनुभव और नेतृत्व की सहज प्रवृत्ति; अहं और ऊष्मा उसका दूसरा पक्ष हैं। दृष्टि सप्तम भाव पर पड़ती है, इसलिए दांपत्य और साझेदारी में भी उसका अधिकार झलकता है। सिंह लग्न में वह स्वराशि में, मेष लग्न में उच्च का और तुला लग्न में नीच का होता है।
प्रथम भाव में सूर्य का पूर्ण विश्लेषण पढ़ेंद्वितीय भाव — धन, वाणी और कुटुंब
द्वितीय भाव संचित धन, वाणी, कुल और आहार का है। यहाँ का सूर्य स्वर में वज़न भर देता है — स्पष्ट, संयत और सुनी जाने की आदत वाला स्वर। कमाई का नाता पद से जुड़ जाता है: अधिकार, प्रशासन, शासकीय सेवा अथवा पिता की ओर से आने वाला धन, चुपचाप की गई बचत से अधिक। उसकी ऊष्मा दिखावे, आयोजन या प्रतिष्ठा के प्रश्न पर जमा पूँजी घटा भी सकती है, और कुटुंब को एक प्रबल व्यक्तित्व का भार अनुभव कराती है। द्वितीय से उसकी दृष्टि अष्टम भाव पर पड़ती है, इसलिए पैतृक संपत्ति, साझी निधि तथा अचानक आने वाले मोड़ उसी प्रकाश में आ जाते हैं। नेत्र, दाँत और तीखे-गरम भोजन की रुचि यहाँ की पारंपरिक सूचनाएँ हैं, क्योंकि शास्त्रीय नेत्र-विचार के भावों में द्वितीय भी गिना गया है। बुध साथ हो तो बुधादित्य योग सीधे वाणी पर बैठता है और तर्क तथा गणना को पैना करता है।
तृतीय भाव — पराक्रम, भाई-बहन और प्रयास
तृतीय भाव पराक्रम, भाई-बहन, स्वयं किए गए प्रयास और संवाद का है, और उपचय होने के कारण यहाँ पाप ग्रह क्षति नहीं, वृद्धि देता है। सूर्य की ऊष्मा यहाँ काम में लगने योग्य साहस बन जाती है — बिना किसी आश्वासन के आरंभ करने का हौसला, विरोध सहकर टिके रहने का बल, तथा अपने बूते खड़े होने की प्रवृत्ति। लेखन, वक्तृत्व, अध्यापन, संचार और छोटी यात्राओं में उसका आत्मविश्वास खुलकर दिखता है। छोटे भाई-बहनों के साथ संबंध में अधिकार का स्वर आ सकता है; सहयोग तब सहज होता है जब बड़ा बनने का आग्रह पीछे रहे। तृतीय से सूर्य नवम भाव को देखता है, इसलिए पिता, गुरु और भाग्य के विषय पराक्रम से जुड़े रहते हैं — परिश्रम भाग्य को जगाता है, केवल प्रतीक्षा नहीं। सिंह या मेष राशि में यह साहस संगठित रूप लेता है; तुला में वही प्रयास दूसरों की स्वीकृति पर अधिक निर्भर हो जाता है।
चतुर्थ भाव — घर, माता और मन की शांति
चतुर्थ भाव घर, माता, मन की शांति, भूमि और वाहन का है, और दिशा की दृष्टि से यही सूर्य का सबसे कठिन स्थान है — दिग्बल यहाँ शून्य हो जाता है। इस भाव को विश्राम, निजता और अपनेपन की आवश्यकता होती है, जबकि सूर्य दिखना चाहता है; इसलिए घर में स्थिरता से अधिक हलचल रहती है और शांति प्रयत्न से बनानी पड़ती है। माता प्रायः दृढ़ इच्छाशक्ति वाली, अपने काम में व्यस्त अथवा परिवार में अधिकार सँभालने वाली होती हैं। भवन, भूमि अथवा वाहन का सुख पद और अधिकार के रास्ते आता है, विरासत से कम। संतुलन यहाँ से जाने वाली दृष्टि से बनता है — चतुर्थ से सूर्य दशम भाव को प्रकाशित करता है, अतः भीतर की बेचैनी बाहर कार्यक्षेत्र और प्रतिष्ठा में बदल जाती है। पीड़ित होने पर पिता से दूरी या घर में अधिकार को लेकर खिंचाव संभव है; शुभ अवस्था में वही सूर्य परिवार को अनुशासन और मर्यादा देता है।
पंचम भाव — बुद्धि, शिक्षा और संतान
बुद्धि, शिक्षा, संतान और पूर्व पुण्य का त्रिकोण, जो सूर्य के अनुकूल है। यहाँ वह सोच को स्पष्ट तथा मर्यादित रखता है और पढ़ाने की क्षमता देता है; संतान के प्रति स्नेह अनुशासन के साथ चलता है। पीड़ित सूर्य को शास्त्र विलंब या चिंता का संकेत मानते हैं, कोई निश्चित परिणाम नहीं। मंत्र-साधना इस स्थिति का सहज मार्ग है। दृष्टि एकादश भाव पर है, जिससे बुद्धि आय में बदलती है।
पंचम भाव में सूर्य का पूर्ण विश्लेषण पढ़ेंषष्ठ भाव — सेवा, स्वास्थ्य और प्रतिद्वंद्वी
षष्ठ भाव सेवा, स्वास्थ्य, ऋण और प्रतिद्वंद्वियों का है — एक ओर उपचय, दूसरी ओर दुःस्थान। सूर्य के लिए यह अपेक्षाकृत उपयोगी स्थान है: विरोधी अधिक समय नहीं ठहरते, मुकदमे और विवाद में धैर्य साथ देता है, तथा चिकित्सा, विधि, प्रशासन, सेना अथवा किसी भी अनुशासित सेवा-क्षेत्र में पद मिलता है। पाचन तीव्र रहता है और उसे नियमित भोजन, पर्याप्त नींद तथा बँधी हुई दिनचर्या चाहिए; अत्यधिक परिश्रम और अनियमितता से अम्लता, सूजन या नेत्र-थकान जैसी ऊष्मा-जनित शिकायतें उभर सकती हैं। ऋण चुकाने की क्षमता अच्छी रहती है, बशर्ते दिखावे का खर्च न बढ़े। यहाँ से दृष्टि द्वादश भाव पर जाती है, इसलिए व्यय, विश्राम और घर से दूर बीतने वाला समय भी उसी प्रकाश में आते हैं। नीच का सूर्य हो तो खुली स्पर्धा में आत्मविश्वास डगमगाता है; ऐसे में जीतने से अधिक सेवा और चुपचाप की गई दक्षता पर ध्यान दें — फल यह भाव तब भी देता है।
सप्तम भाव — विवाह और साझेदारी
साझेदारी सूर्य से वह अधिकार बाँटने को कहती है जिसे वह अपने पास रखना चाहता है; इसलिए यहाँ स्वाभिमान ही केंद्रीय विषय बन जाता है — कभी आपका, कभी जीवनसाथी का। दृष्टि लग्न पर लौट आती है, अतः हर प्रश्न घूमकर स्वयं पर आ जाता है। मेष लग्न में यही भाव तुला का होता है, जहाँ सूर्य नीच का पड़ता है — इसीलिए एक ही स्थिति हर कुंडली में एक-सी नहीं पढ़ी जाती।
सप्तम भाव में सूर्य का पूर्ण विश्लेषण पढ़ेंअष्टम भाव — आयु, उथल-पुथल और शोध
अष्टम भाव आयु, अचानक आने वाले परिवर्तन, उत्तराधिकार, ससुराल और हर छिपे हुए विषय का है — शोध, गूढ़ विद्याएँ, बीमा, कर, शल्य-चिकित्सा अथवा ऐसा कोई काम जिसमें तह तक जाना पड़े। यहाँ का सूर्य व्यक्ति को प्रदर्शन से हटाकर गहराई की ओर मोड़ देता है; पहचान देर से मिलती है, पर एक बार मिलने के बाद टिकती है। पैतृक संपत्ति और साझी निधि के प्रसंग जीवन में बार-बार उठते हैं, और लिखित स्पष्टता से अधिकांश विवाद टल जाते हैं। अष्टम से सूर्य द्वितीय भाव को देखता है, इसलिए कुल की संपत्ति तथा वाणी दोनों उसकी परख में रहती हैं, और सीधी बात कभी-कभी परिवार के बीच कठोर सुनाई देती है। यह आयु का भी भाव है, अतः इसे भय से नहीं, संयम से पढ़ें: नियमित दिनचर्या, पर्याप्त विश्राम और अधिक ताप से बचाव ओज की रक्षा करते हैं। शुभ ग्रहों का सहयोग मिले तो यही स्थान गंभीर शोध, गहरी अंतर्दृष्टि और संकट में दूसरों का सहारा बनने की क्षमता देता है।
नवम भाव — भाग्य, धर्म और पिता
भाग्य, धर्म, गुरु और लंबी यात्राओं का भाव — और पिता का प्रश्न भी यहीं से देखा जाता है, क्योंकि सूर्य पितृ कारक है। यह स्थिति प्रायः सिद्धांतनिष्ठ दृष्टिकोण देती है और पिता का प्रभाव जीवन पर गहरा रहता है। दृष्टि तृतीय भाव पर जाकर आस्था को कर्म से जोड़ देती है। 'कारको भाव नाशाय' की उक्ति यहाँ बार-बार उद्धृत होती है, पर वह विवादित है।
नवम भाव में सूर्य का पूर्ण विश्लेषण पढ़ेंदशम भाव — कार्यक्षेत्र, प्रतिष्ठा और अधिकार
सूर्य का सबसे बलवान स्थान — दशम भाव में उसे दिग्बल मिलता है और कार्यक्षेत्र, प्रतिष्ठा तथा अधिकार में उसका प्रकाश सार्थक हो जाता है। दृष्टि चतुर्थ भाव पर पड़ती है, इसलिए घर और विश्राम प्रायः काम के बाद आते हैं। पाराशर की सूची में इस भाव का कारक बुध है; सूर्य का दावा बाद की परंपरा से आया है।
दशम भाव में सूर्य का पूर्ण विश्लेषण पढ़ेंएकादश भाव — लाभ, आय और संपर्क
एकादश भाव लाभ, आय, संपर्क, बड़े भाई-बहन और इच्छाओं की पूर्ति का है, और उपचय होने से पाप ग्रह यहाँ फलता है। सूर्य प्रायः पद, अधिकार अथवा शासकीय संपर्कों से कमाई कराता है और उच्चपदस्थ लोगों से सम्मान दिलाता है। बड़े भाई-बहन या वरिष्ठ मार्गदर्शक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, यद्यपि उनसे संबंध में पद-क्रम का स्वर रह सकता है। बड़े समूहों और संस्थाओं में आपकी बात सुनी जाती है, पर हर मंडली का केंद्र बनने का आग्रह छोड़ना पड़ता है। एकादश से दृष्टि पंचम भाव पर जाती है, इसलिए बुद्धि, शिक्षा और संतान के विषय लाभ से जुड़ जाते हैं — और जो मिलता है, उसका बड़ा भाग योग्यता से आता है, संयोग से नहीं। पीड़ित होने पर अपेक्षाएँ आय से आगे निकल जाती हैं और प्रतिष्ठा की भूख जितना देती है उससे अधिक ले जाती है; ऐसे में आय-व्यय का सीधा हिसाब और इच्छाओं की छोटी सूची ही व्यावहारिक उपाय है।
द्वादश भाव — व्यय, एकांत और मोक्ष
व्यय, विदेश, एकांत और मोक्ष का भाव — केवल हानि का नहीं। सूर्य यहाँ प्रसिद्धि से दूर रहकर काम कराता है — शोध, चिकित्सालय, आश्रम, बड़ी संस्थाएँ अथवा विदेश में नियुक्ति। दृष्टि षष्ठ भाव पर रहती है, इसलिए सेवा, स्वास्थ्य और प्रतिद्वंद्वी ओझल नहीं होते। नींद तथा नेत्रों का ध्यान रखने को विशेष रूप से कहा गया है।
द्वादश भाव में सूर्य का पूर्ण विश्लेषण पढ़ेंसूर्य किस भाव में सबसे प्रबल या सबसे निर्बल है?
सबसे प्रबल: सूर्य दशम भाव में सबसे बलवान होता है, क्योंकि वहाँ उसे दिग्बल प्राप्त होता है और अधिकार, प्रतिष्ठा तथा सार्वजनिक कर्म की उसकी प्रवृत्ति को उपयुक्त क्षेत्र मिल जाता है। इसके बाद प्रथम भाव आता है, क्योंकि शरीर, ओज और आत्मसम्मान — इस भाव के विषय स्वयं सूर्य के कारकत्व हैं; बल फिर भी राशि, अवस्था और दृष्टि से ही आँका जाता है। नैसर्गिक पाप ग्रह होने से वह उपचय भावों — तृतीय, षष्ठ और एकादश — में भी बढ़ता है, जहाँ परिश्रम, स्पर्धा और आय उसकी ऊष्मा को दंड नहीं देते, उसे फल में बदल देते हैं।
सबसे परीक्षक: चतुर्थ भाव उसके लिए सबसे कठिन है — वहाँ दिग्बल शून्य हो जाता है, और दिखने की प्रवृत्ति विश्राम, माता तथा मानसिक शांति के भाव में असहज पड़ती है। सप्तम भाव उसकी परीक्षा लेता है, क्योंकि साझेदारी उससे वह अधिकार बाँटने को कहती है जिसे वह अपने पास रखना चाहता है, और मेष लग्न में वहीं तुला राशि आती है, जिसमें सूर्य नीच का होता है। द्वादश भाव उसके प्रकाश को भीतर मोड़ देता है, जो पहचान से अधिक एकांत और साधना के अनुकूल है। इनमें से कोई भी अंतिम निर्णय नहीं है; अवस्था, दृष्टि और शेष कुंडली ही तय करती हैं कि यह प्रवृत्ति व्यवहार में कैसे उतरती है।
भावों में वक्री सूर्य
सूर्य कभी वक्री नहीं होता। पृथ्वी से देखने पर वह निरयण राशिचक्र में सदा आगे ही चलता है — प्रत्येक राशि लगभग एक माह में, और हर प्रवेश पर संक्रांति, जिससे पारंपरिक सौर मास गिना जाता है; समूचा चक्र करीब 365.25 दिन में पूरा होता है। इसी कारण वह अस्त भी नहीं होता, क्योंकि अस्त होने की स्थिति सूर्य के सामीप्य से बनती है और वह स्वयं अपने ही निकट नहीं हो सकता; यह दोष वह शेष छह ग्रहों पर लाता है। अतः किसी कुंडली में सूर्य 'वक्री होने के कारण' निर्बल नहीं होता। उसका बल राशि और अवस्था से, जिस भाव में वह बैठा है उससे, साथ बैठे या दृष्टि डालने वाले ग्रहों से, तथा अपनी महादशा और गोचर से पढ़ा जाता है।
सूर्य के उपाय, मंत्र और सेवा
सूर्य के उपाय परंपरा में भक्ति और आचरण, दोनों से जुड़े हैं, और सबकी दिशा एक ही है — प्रकाश, अनुशासन तथा पिता और गुरुजनों के प्रति आदर। ये उपाय केवल शैक्षिक उद्देश्य से दिए गए हैं; न किसी फल की गारंटी हैं, न चिकित्सा, विधिक अथवा वित्तीय परामर्श का विकल्प। माणिक्य परंपरा में सूर्य का रत्न कहा गया है, पर रत्न प्रबल प्रभाव डालते हैं और परंपरा स्वयं उनमें सावधानी बरतने को कहती है — नीचे दिए गए उपायों में कोई रत्न सम्मिलित नहीं है।
रविवार को बीज मंत्र
रविवार को स्नान के बाद सूर्य का बीज मंत्र — 'ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः' — परंपरा के अनुसार माला से 108 बार शांत और स्थिर स्वर में जपें। संभव हो तो प्रातः उगते सूर्य की ओर मुख करके बैठें। एक दिन के लंबे जप से अधिक महत्व हर सप्ताह की नियमितता का है।
आदित्य हृदय स्तोत्र
रामायण के युद्धकांड में अगस्त्य ऋषि द्वारा श्रीराम को दिया गया आदित्य हृदय स्तोत्र सूर्य की उपासना का सबसे प्रचलित पाठ है। इसे प्रातःकाल, विशेषकर रविवार को, पढ़ें अथवा ध्यान से सुनें। अर्थ समझते हुए पढ़ने से साधना में स्थिरता बनी रहती है।
सूर्योदय पर अर्घ्य
सूर्योदय के समय उगते सूर्य को जल का अर्घ्य दें — परंपरा के अनुसार ताँबे के पात्र से, मुख पूर्व की ओर — और कुछ क्षण उसी उजाले में खड़े रहें। इस उपाय का आधा पक्ष व्यावहारिक भी है: जल्दी उठना, बँधी हुई दिनचर्या और प्रातः के प्रकाश का संपर्क।
गेहूँ, गुड़ और पिता की सेवा
रविवार को गेहूँ, गुड़ अथवा लाल वस्त्र का दान परंपरा में सूर्य से जोड़ा गया है। साथ ही आचरण का वह पक्ष भी निभाएँ, जिसे शास्त्र अधिक महत्व देते हैं — पिता तथा वृद्धजनों की सेवा, दिए हुए वचन का पालन, और अपने अधिकार का संयमित प्रयोग। सूर्य पितृ कारक है, अतः पिता की सेवा को सबसे सीधा उपाय माना गया है।
ये उपाय केवल शैक्षिक उद्देश्य से दिए गए हैं। माणिक्य सूर्य का पारंपरिक रत्न है, पर रत्न प्रबल प्रभाव डालते हैं और परंपरा में भी इनके प्रति सावधानी बरती जाती है — पूर्ण कुंडली विश्लेषण के बिना इसे कभी धारण न करें। हर उपाय को श्रद्धा से किया गया सहायक अभ्यास मानें, निश्चित फल देने वाला साधन नहीं।
भावों में सूर्य — सामान्य प्रश्न
सूर्य से जुड़े वे प्रश्न, जो उसके किसी भी भाव में होने पर समान रूप से लागू होते हैं।
Q: वैदिक ज्योतिष में सूर्य किस भाव में सबसे बलवान होता है?
दशम भाव में। दिग्बल वह बल है जो ग्रह को कुंडली की एक विशेष दिशा से प्राप्त होता है, और सूर्य की दिशा दशम है — कार्यक्षेत्र, प्रतिष्ठा और सार्वजनिक कर्म, जहाँ उसकी अधिकार-प्रवृत्ति को उपयुक्त भूमि मिलती है। इसके बाद प्रथम भाव आता है, क्योंकि शरीर, ओज तथा आत्मसम्मान — इस भाव के विषय स्वयं सूर्य के कारकत्व हैं, अतः वहाँ कुछ भी उसके स्वभाव के विरुद्ध नहीं पड़ता; बल फिर भी राशि, अवस्था और दृष्टि से ही आँका जाता है। नैसर्गिक पाप ग्रह होने के कारण वह उपचय भावों — तृतीय, षष्ठ और एकादश — में भी फलता है, जहाँ परिश्रम, स्पर्धा और आय उसकी ऊष्मा के अनुकूल हैं। चतुर्थ भाव में उसे दिग्बल बिलकुल नहीं मिलता। भाव के साथ राशि का महत्व भी उतना ही है — मेष में सूर्य उच्च का, सिंह में स्वराशि का (मूलत्रिकोण 0°–20°) तथा तुला में नीच का होता है।
Q: जन्मकुंडली में तुला राशि का नीच सूर्य क्या दर्शाता है?
नीच का अर्थ है सूर्य का तुला राशि में होना, जो उसकी उच्च राशि के ठीक सामने है; सर्वाधिक निर्बलता तुला के 10° पर मानी गई है। शास्त्रीय दृष्टि यह है कि सूर्य के अपने गुण — आत्मविश्वास, अधिकार सँभालने की क्षमता और अपने मूल्य का स्थिर बोध — दूसरों की स्वीकृति पर टिक जाते हैं, क्योंकि तुला संतुलन और संबंध की शुक्र-राशि है। व्यवहार में यह दृढ़ मत लेने में झिझक या अनिच्छा से सँभाले गए अधिकार के रूप में दिखता है। यह कोई अभिशाप नहीं है: शास्त्र नीच भंग की ऐसी अनेक स्थितियाँ बताते हैं जो इसे घटाती या समाप्त करती मानी जाती हैं, बलवान राशि-स्वामी सहारा देता है, और भाव से तय होता है कि यह विषय जीवन के किस क्षेत्र में उभरेगा। इसे पूरी कुंडली और सूर्य की दशा-अवधियों के साथ ही पढ़ें।
Q: सूर्य के निकट आने पर कोई ग्रह अस्त क्यों कहलाता है, और इसका फल क्या होता है?
सूर्य से एक निश्चित अंश-सीमा के भीतर आ जाने पर ग्रह अस्त कहलाता है। सूर्य सिद्धांत तथा बृहत् पाराशर होरा शास्त्र के अनुवादों में दी गई सारणी के अनुसार ये सीमाएँ हैं — चंद्र 12°, मंगल 17° (वक्री हो तो 8°), बुध 14° (वक्री 12°), गुरु 11°, शुक्र 10° (वक्री 8°) और शनि 15°, जिसे कुछ मुद्रित संस्करण 16° पढ़ते हैं। अस्त ग्रह अपना फल स्वतंत्र रूप से देने में असमर्थ माना जाता है; उसके कारकत्व सूर्य के विषयों — स्वयं, पद और अधिकार — में समा जाते हैं। इन्हें शास्त्रीय अस्त-सीमाएँ मानें, कोई भौतिक स्थिरांक नहीं; अनेक परंपराएँ इससे कहीं कम अंश लेती हैं, और टीकाकारों के मत से राहु-केतु कभी अस्त नहीं होते। सूर्य स्वयं कभी अस्त नहीं होता।
Q: कुंडली में सूर्य पिता के विषय में क्या बताता है?
सूर्य पितृ कारक है, अर्थात् पिता का कारक। बृहत् पाराशर होरा शास्त्र कहता है कि पिता का प्रश्न उठने पर कारक सूर्य ही है, और सूर्य से गिना गया नवम भाव पिता का सूचक है; इसलिए यह विषय तीन स्थानों से एक साथ देखा जाता है — लग्न से नवम भाव, स्वयं सूर्य, और सूर्य से नवम। बलवान तथा सुस्थित सूर्य ऐसे पिता की ओर संकेत करता है जो उपस्थित, सिद्धांतनिष्ठ और प्रभावशाली हों; पीड़ित सूर्य दूरी, सहारे का समय से पहले उठ जाना अथवा अधिकार को लेकर खिंचाव दिखा सकता है। शनि के साथ सूर्य को शास्त्र पिता और संतान के बीच तनाव के रूप में पढ़ते हैं। यह किसी व्यक्ति पर निर्णय नहीं है — यह उस कुंडली का एक सूत्र भर है, जिसे पूरा पढ़ना आवश्यक है।
Q: सूर्य की महादशा कितने वर्ष की होती है और उसमें क्या फल मिलता है?
विंशोत्तरी में सूर्य की महादशा 6 वर्ष की होती है और उसमें सूर्य के विषय सामने आ जाते हैं — पहचान, पद, शासन तथा उच्चाधिकारियों से व्यवहार, पिता का स्वास्थ्य या उनके कार्य, और स्वयं का ओज तथा आत्मसम्मान। ये वर्ष उन्नति देंगे या परीक्षा लेंगे, यह सूर्य की राशि, भाव और अवस्था पर, उसके साथ बैठे या उस पर दृष्टि डालने वाले ग्रहों पर, तथा भीतर चल रही अंतर्दशा पर निर्भर करता है। जन्म का चंद्र कृत्तिका, उत्तरा फाल्गुनी या उत्तराषाढ़ा में हो तो जीवन सूर्य महादशा से आरंभ होता है, पर जन्म के समय उसका शेष अंश ही बचा रहता है — पूरे 6 वर्ष कभी नहीं। दशा को गोचर के साथ पढ़ें; प्रायः उसी अवधि में सम्मान भी मिलता है और सामने आकर उत्तरदायित्व लेने की माँग भी।