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पंचम भाव में सूर्य

आत्मा और अधिकार का कारक सूर्य यहाँ संतान, बुद्धि, शिक्षा तथा मंत्र के भाव में स्थित है। वह मेधा को तीक्ष्ण करता है और उपासना को गरिमा देता है; संतान के विषय में शास्त्रीय मत निषेध का नहीं, सावधानी का है।

पंचम भाव में सूर्य बुद्धि को प्रखर और गरिमामय बनाता है, सिखाने की सहज क्षमता जगाता है, रचनात्मक या राजनीतिक कार्यक्षेत्र में नेतृत्व की ओर ले जाता है, और उपासना को मनमर्ज़ी से नहीं, नियत समय के अनुशासन से जोड़ देता है। उसकी एकमात्र पूर्ण दृष्टि एकादश भाव पर पड़ती है — इसीलिए त्वरित लाभ का आकर्षण यहाँ प्रबल रहता है, किंतु वह प्रायः स्थायी नहीं होता। यह स्थिति आपके लिए कितनी बलवती रहेगी, यह लग्न और सूर्य की अवस्था तय करते हैं — दोनों की निःशुल्क गणना नीचे दी गई है।

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भाव के लिए सटीक जन्म समय चाहिए; समय न होने पर हम सूर्य की राशि दिखाते हैं और भाव को ‘अनुपलब्ध’ लिखते हैं, अनुमान नहीं लगाते।

पंचम भाव में सूर्य का अर्थ

पंचम भाव में वह सब रखा रहता है जो आपने रचा है और जो आप साथ लेकर आए हैं — संतान, प्रशिक्षित बुद्धि, शिक्षा, मंत्र, पूर्व पुण्य तथा प्रेम। सूर्य आत्मा, ओज और अधिकार का कारक है; शास्त्र उसे नैसर्गिक पाप ग्रह मानते हैं, फिर भी इस त्रिकोण में उसका ताप बिगाड़ता कम, निखारता अधिक है। यहाँ मेधा तेज, व्यवस्थित और आत्मविश्वास से भरी रहती है; समझाने वाली भूमिका सहज लगती है, और शिष्यों, कनिष्ठों तथा अपनी संतान के प्रति व्यवहार में एक गरिमा दिखाई देती है। प्रेम-संबंधों में भी वही स्वाभिमान रहता है और छिपाव आपको रुचता नहीं। संतान के विषय में शास्त्रीय पाठ सतर्क हो जाते हैं — संख्या में कम, समय में विलंब, अथवा ऐसी पहली संतान जो माता-पिता की महत्वाकांक्षा का भार उठाती हो। इसे संपूर्ण कुंडली से बनी प्रवृत्ति मानें, न आश्वासन न निषेध।

सूर्य को कोई विशेष पूर्ण दृष्टि प्राप्त नहीं, अतः पंचम से उसकी एकमात्र पूर्ण दृष्टि लाभ, आय और संपर्कों के एकादश भाव पर पड़ती है। इसी रेखा पर इस स्थिति का सबसे उपयोगी पक्ष टिका है। जो आप मन से रचते हैं — पाठ्यक्रम, प्रस्तुति, लेखन, परामर्श-कार्य, अथवा वह छोटा-सा उपक्रम जिसकी माँग पहले किसी विद्यार्थी या कनिष्ठ ने की थी — वही आगे चलकर आय का साधन बन जाता है। अवसर यहाँ आवेदन से कम, व्यक्तियों से अधिक मिलते हैं: कोई पुराना सहपाठी-समूह, नाट्य-मंडली, कोई समिति, अथवा वह वरिष्ठ जो आपका नाम आगे बढ़ा दे। संतान और शिष्य भी इसी वृत्त का भाग हैं, और उनकी उपलब्धियाँ कालांतर में आपकी प्रतिष्ठा में जुड़ जाती हैं। बृहत् पाराशर होरा शास्त्र आंशिक दृष्टियाँ भी मानता है — अष्टम तथा द्वादश पर तीन-चौथाई, नवम तथा प्रथम पर आधी, और सप्तम तथा द्वितीय पर चौथाई — जिनसे अन्य भावों तक हल्का संपर्क बना रहता है।

राशि इस स्थिति का ताप बदल देती है। मेष लग्न में सूर्य अपनी ही राशि सिंह में बैठकर पंचमेश भी होता है और आरंभिक 20 अंश तक मूलत्रिकोण में रहता है — भाव का स्वामी स्वयं अपने भाव में, यही इस स्थिति का सबसे आत्मनिर्भर रूप है, जहाँ अधिकार, अध्यापन और संतान एक ही प्रकाशित क्षेत्र में आ जाते हैं। धनु लग्न में वह मेष में उच्च का होकर नवम भाव का स्वामी बनता है, अतः भाग्य, पिता और धर्म बुद्धि के कार्य से जुड़ जाते हैं। वृश्चिक लग्न में मित्र राशि मीन में रहकर वह दशम का स्वामी होता है, इसलिए रचनात्मक या परामर्श का कार्य सार्वजनिक आजीविका का रूप ले लेता है। मिथुन लग्न में मार्ग कठिन रहता है, जहाँ वह तुला में नीच होकर तृतीय का स्वामी बनता है; कन्या और तुला लग्न में शनि की राशियाँ उसकी ऊष्मा घटा देती हैं। ये सब आरंभ-बिंदु हैं, निष्कर्ष नहीं — राशि-स्वामी, पंचमेश तथा इस भाव से जुड़ने वाली युति और दृष्टि ही पाठ पूरा करती हैं।

यहाँ भाव-स्थिति राशि कुंडली के अनुसार है, जहाँ राशि ही भाव मानी जाती है। भाव चलित कुंडली में भाव लग्न के अंश से मापे जाते हैं, इसलिए राशि के आरंभिक या अंतिम अंशों में स्थित सूर्य निकटवर्ती चतुर्थ या षष्ठ भाव में भी जा सकता है — पाठ निश्चित करने से पहले दोनों की तुलना कर लेना उचित रहता है।

शुभ या अशुभ? क्या तय करता है

अपने-आप में न शुभ, न अशुभ। बुद्धि, अध्यापन और अनुशासित उपासना के लिए यह स्थिति सचमुच वरदान है, जबकि संतान तथा शीघ्र धन को लेकर शास्त्र संयम बरतते हैं। स्वराशि सिंह में, मेष में उच्च होकर, अथवा अस्त-सीमा से बाहर बैठे बुध के साथ सूर्य यहाँ सर्वोत्तम फल देता है। तुला में नीच होने पर तथा शनि या शुक्र की राशियों में वह परीक्षा लेता है, और मंगल, शनि अथवा राहु का दबाव भी इसी दिशा में काम करता है। सर्वाधिक बलवान होने पर भी वह विनम्रता माँगता है, क्योंकि जो तेज आपको स्वाभाविक शिक्षक बनाता है, वही सुनने की क्षमता घटा सकता है। इसे प्रखर और अधिकारपूर्ण मेधा की प्रवृत्ति समझें, परिवार या भाग्य पर अंतिम निर्णय नहीं।

संतान, प्रखर बुद्धि और नियमित साधना

पालन की शैली, संतान का संकेत

इस भाव को लेकर सबसे पहला प्रश्न संतान का ही उठता है, और ईमानदार उत्तर प्रवृत्ति का है, संख्या का नहीं। सूर्य जो बात अधिक निश्चय से बदलता है, वह पालन-पोषण की शैली है। पितृकारक होने के कारण वह स्पष्ट मानदंड रखता है और दृढ़ता से रक्षा करता है; स्थायी ख़तरा यही है कि मार्गदर्शन आदेश में बदल जाए और संतान खुलकर कहने के बजाय प्रदर्शन करना सीख ले। संतान के विषय में कुछ कहने से पूर्व ज्योतिषी चार बातें तौलता है — पंचमेश और उसकी अवस्था, संतान-कारक गुरु, चंद्रमा से गिना गया पंचम भाव, तथा सप्तांश कुंडली; और समय का संकेत दशा से मिलता है। बलवान लग्नेश तथा सुस्थित पंचमेश प्रायः इस शास्त्रीय सावधानी को हटा देते हैं। स्वास्थ्य का प्रश्न कोई कुंडली नहीं सुलझाती — गर्भधारण की चिंता हो तो सबसे पहले चिकित्सक से मिलें।

सिखाने वाली प्रखर मेधा

यहाँ बुद्धि विश्वकोश जैसी नहीं, आत्मविश्वासी और सुव्यवस्थित होती है — विषय का ढाँचा शीघ्र पकड़ में आता है, समझाना सहज लगता है, और ऐसे क्षेत्र भाते हैं जहाँ आपका निर्णय सबके सामने दिखे: व्याख्यान, रंगमंच, प्रशासन, राजनीति, अथवा कोई भी रचनात्मक कार्य जो आपके नाम से पहचाना जाए। शिक्षा तब अच्छी चलती है जब घर में उसका आदर हो; ऐसा विद्यार्थी उस गुरु के सान्निध्य में खिलता है जिसे वह मन से सराहता हो, और जिस व्यवस्था में वह गुमनाम रह जाए, वहाँ उसका प्रदर्शन गिर जाता है। बुध यदि इसी भाव में सूर्य के साथ हो तो बुधादित्य योग बनता है, जिसे तीक्ष्ण विश्लेषण-क्षमता के लिए पढ़ा जाता है; बुध प्रायः सूर्य के निकट ही रहता है, अतः पूर्ण फल के लिए अनेक ज्योतिषी उसे अस्त की शास्त्रीय सीमा 14 अंश (वक्री होने पर 12) से बाहर देखना चाहते हैं। यहाँ का स्थायी जोखिम विद्या का अहंकार है — वह छात्र जो पूछना छोड़ दे, और वह विद्वान जो प्रवाह को ही गहराई मान ले।

मंत्र, पूर्व पुण्य और दाँव से दूरी

पंचम भाव मंत्र का उच्चारण ही नहीं, उसका संचय भी है, और सूर्य को वही साधना भाती है जो नित्य हो, स्वर में हो और नियत समय पर हो — प्रातः का काल उसे सर्वाधिक अनुकूल है। पूर्व पुण्य इस भाव का दूसरा पक्ष है: यह वह कोष है जिसे पिछले श्रम ने भरा; अहंकार इसे जिस गति से घटाता है, सेवा उसी गति से इसकी पूर्ति कर देती है। दाँव भी इसी भाव के अधीन है, और एकादश पर पड़ने वाली दृष्टि मुनाफ़े को सदा आँखों के सामने रखती है; यही खिंचाव लोगों को शेयर-सौदों, लॉटरी और ऐसे जुए की ओर ले जाता है जिनसे वे अन्यथा दूर रहते। व्यावहारिक पाठ सीधा है — सूर्य धीरे-धीरे अर्जित अधिकार को फल देता है, अचानक मिले धन को नहीं। जोखिम उतना ही लें जितना खोकर भी जीवन-क्रम अडिग रहे, और वही ललक अध्यापन, प्रस्तुति अथवा दैनिक साधना में लगाएँ, जहाँ इस भाव का प्रतिफल भरोसेमंद रहता है।

लग्न अनुसार: आपकी पंक्ति

यहाँ सूर्य किस राशि में है और किन भावों का स्वामी है, यह आपके लग्न से बदलता है। आपकी पंक्ति चिह्नित है।

ये सामान्य प्रवृत्तियाँ हैं, पूरी कुंडली पर निर्भर — शैक्षिक, भविष्यवाणी नहीं, और व्यक्तिगत परामर्श का विकल्प नहीं।

लग्नपंचम में सूर्य की राशिअवस्थासूर्य के स्वामित्व वाले भाव
मेषसिंहस्वगृहीपंचम
वृषभकन्यासम (बुध)चतुर्थ
मिथुनतुलानीचतृतीय
कर्कवृश्चिकमित्र राशि (मंगल)द्वितीय
सिंहधनुमित्र राशि (गुरु)प्रथम
कन्यामकरशत्रु राशि (शनि)द्वादश
तुलाकुंभशत्रु राशि (शनि)एकादश
वृश्चिकमीनमित्र राशि (गुरु)दशम
धनुमेषउच्चनवम
मकरवृषभशत्रु राशि (शुक्र)अष्टम
कुंभमिथुनसम (बुध)सप्तम
मीनकर्कमित्र राशि (चंद्र)षष्ठ

यहाँ आपके सूर्य की अवस्था और गति

भावों में सूर्य— मेष में उच्च होकर (परम उच्चांश 10 अंश) सूर्य इस स्थिति का पूर्ण रूप देता है: स्पष्टता, आत्मविश्वास और सबसे आगे खड़े होने का सहज अधिकार। स्वराशि सिंह में वह लगभग उतना ही बलवान रहता है, जिसमें आरंभिक 20 अंश मूलत्रिकोण कहलाते हैं; तुला में वह नीच होता है (परम नीचांश 10 अंश) और तब उसकी मेधा आदेश से नहीं, परामर्श और सहमति से बेहतर काम करती है। शनि या शुक्र की राशियों में उसका ताप मंद पड़ता है तथा फल देर से और अधिक परिश्रम के बाद मिलते हैं। गति को लेकर यहाँ कोई उलझन नहीं — सूर्य न वक्री होता है, न अस्त; देखने की बात यही है कि उसके साथ पंचम भाव में बैठा ग्रह कहीं दग्ध तो नहीं।

अन्य भावों में सूर्य

भावों में सूर्य — सभी 12 भाव

इस स्थिति के उपाय

नीचे लिखे पारंपरिक उपाय इसी भाव के विषयों — अध्ययन, संतान और नित्य उपासना — तथा सूर्य के वार से जुड़े हैं। ये केवल शैक्षिक तथा आत्मचिंतन के उद्देश्य से प्रस्तुत हैं और चिकित्सकीय, कानूनी अथवा किसी व्यावसायिक परामर्श का विकल्प नहीं हैं।

प्रातः अर्घ्य, फिर अध्ययन

पूर्व की ओर मुख करके उगते सूर्य को अंजुलि अथवा ताम्र-पात्र से जल अर्पित करें, और उसके बाद कुछ क्षण सूर्य के बीज मंत्र ‘ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः’ के साथ बैठें — पुस्तक खोलने या रचनात्मक कार्य आरंभ करने से पहले। यह भाव अवधि नहीं, नियमितता देखता है; अतः प्रतिदिन एक ही समय पर थोड़ी देर का अभ्यास कभी-कभार की लंबी बैठक से अधिक फल देता है। रविवार का नियम और आदित्य हृदय स्तोत्र इसी क्रम में परंपरा से जोड़े जाते हैं।

रविवार को विद्या का दान

जो आप भली-भाँति जानते हैं, वह किसी एक व्यक्ति को बिना शुल्क सिखाएँ — एक बालक का गृहकार्य, किसी कनिष्ठ को कोई कौशल, अथवा ऐसे विद्यार्थी को एक घंटा जो इसका मूल्य नहीं चुका सकता। रविवार को गेहूँ या गुड़ का दान इसी भावना का पारंपरिक रूप है, और जहाँ चिंता संतान की हो, वहाँ किसी बच्चे की पढ़ाई में सहयोग इस भाव के सर्वाधिक अनुकूल बैठता है। आचरण वाला पक्ष भी उतना ही आवश्यक है: जिसे आप सिखा रहे हैं, उसे असहमत होने दें और बहस को पद के बल पर समाप्त न करें।

ये उपाय केवल शैक्षिक उद्देश्य से दिए गए हैं। माणिक्य सूर्य का पारंपरिक रत्न है, पर रत्न प्रबल प्रभाव डालते हैं और परंपरा में भी इनके प्रति सावधानी बरती जाती है — पूर्ण कुंडली विश्लेषण के बिना इसे कभी धारण न करें। हर उपाय को श्रद्धा से किया गया सहायक अभ्यास मानें, निश्चित फल देने वाला साधन नहीं।

सूर्य के सभी उपाय सूर्य मुख्य पृष्ठ पर

गोचर का सूर्य बनाम जन्मकालीन सूर्य

यह पृष्ठ जन्मकालीन सूर्य की बात करता है — जन्म के क्षण वह जहाँ स्थित था, वही स्थिति जीवन भर अपरिवर्तित रहती है। गोचर का सूर्य इससे भिन्न है: वह प्रत्येक निरयण राशि में लगभग एक मास रहता है, हर प्रवेश संक्रांति कहलाता है, और वर्ष में एक बार यही अवधि आपके पंचम भाव को मिलती है — अध्ययन, संतान तथा रचनात्मक कार्य का एक छोटा दौर। जन्म की यह स्थिति अपना पूरा फल प्रायः सूर्य की महादशा में दिखाती है, जो 6 वर्ष की होती है; और यदि आपका चंद्रमा कृत्तिका, उत्तरा फाल्गुनी या उत्तराषाढ़ा में हो तो जीवन का आरंभ सूर्य की दशा से होता है — उन वर्षों का शेष भाग ही मिलता है, पूरे 6 वर्ष कभी नहीं। अपना दशा-क्रम संबंधित पृष्ठ पर देखें।

सूर्य की संक्रांति तिथियाँ देखें

सामान्य प्रश्न

इस स्थिति पर सर्वाधिक पूछे जाने वाले प्रश्न — संतान, पढ़ाई, दृष्टि, सट्टा और योग — तथा उनके सीधे उत्तर।

Q: क्या पंचम भाव का सूर्य संतान-सुख से वंचित करता है?

नहीं। यह शास्त्रीय पाठ निषेध नहीं, सावधानी है: संकेत छोटे परिवार का, देर से आरंभ का, अथवा ऐसी एक संतान का है जिस पर माता-पिता की अपेक्षा का बड़ा भार रहता है। यह चेतावनी लागू भी होगी या नहीं, यह पंचमेश, संतान-कारक गुरु, तथा चंद्रमा से पंचम भाव और सप्तांश कुंडली पर निर्भर करता है — इनका सहयोग प्रायः इसे हटा देता है, और समय का निर्णय ग्रह-स्थिति से नहीं, दशा से होता है। गर्भधारण पहले चिकित्सा का विषय है — कुंडली देखने से पूर्व किसी योग्य विशेषज्ञ से परामर्श करें।

Q: पंचम भाव का सूर्य शिक्षा और परीक्षाओं में कैसा फल देता है?

प्रायः अनुकूल, विशेषतः उन विषयों में जहाँ अनुशासन और आत्मविश्वास काम आते हैं — प्रशासन, विधि, राजनीति, चिकित्सा, गणित या मंच-कला। बुद्धि तेज तथा व्यवस्थित रहती है और सबके सामने परखा जाना उसे भाता है। सिंह या मेष में बैठा सूर्य, अथवा अस्त-सीमा से बाहर के बुध का साथ सर्वोत्तम परिणाम देता है। तुला में नीच होने पर या शनि की राशियों में सफलता देर से और दोहराव के बाद मिलती है; तब जिस शिक्षक को आप सराहते हों, उसका मार्गदर्शन अकेले पढ़ने से कहीं अधिक सहायक सिद्ध होता है।

Q: पंचम भाव में बैठा सूर्य किस भाव को देखता है?

एकादश भाव को, और केवल उसी को। विशेष पूर्ण दृष्टियाँ मंगल, गुरु, शनि तथा यहाँ मान्य परंपरा के अनुसार राहु-केतु को प्राप्त हैं, सूर्य को नहीं; अतः पंचम में बैठकर वह अपने से सप्तम, अर्थात् लाभ, आय, बड़े भाई-बहन और संपर्क-समूह के एकादश भाव पर दृष्टि डालता है। व्यवहार में इसका अर्थ यह है कि जो आप रचते या सिखाते हैं, वही आपकी आय और प्रतिष्ठा का आधार बनता है — और ऐसा अवसर प्रायः किसी समूह, संरक्षक अथवा पुराने शिष्य के माध्यम से आता है, औपचारिक आवेदन से नहीं।

Q: क्या पंचम भाव का सूर्य सट्टे या शेयर बाज़ार में भाग्य देता है?

इसे इस रूप में नहीं पढ़ा जाता। शास्त्र यहाँ प्रोत्साहन नहीं, चेतावनी देते हैं — पंचम दाँव का भाव है, और दाँव आय नहीं होता। यह स्थिति अध्यापन, रचनात्मक कार्य तथा धीरे-धीरे अर्जित अधिकार से प्रतिष्ठा बनाती है; अचानक धन के मामले में वह भरोसेमंद नहीं। ऐसे सौदों की सीमा पहले से तय रखें और उन्हें मन-बहलाव मानें, आय का साधन नहीं। यह पृष्ठ वित्तीय परामर्श नहीं देता, और कुंडली किसी योग्य सलाहकार का विकल्प नहीं।

Q: क्या पंचम भाव का सूर्य बुधादित्य योग बनाता है, या पंच महापुरुष योग?

बुधादित्य योग तब बनता है जब बुध इसी भाव में सूर्य के साथ हो; यहाँ उसे तीक्ष्ण विश्लेषण, लेखन और अध्यापन की सफलता के लिए पढ़ा जाता है, तथा पूर्ण फल के लिए अनेक ज्योतिषी बुध को अस्त की शास्त्रीय सीमा से बाहर देखना चाहते हैं। पंच महापुरुष योग यहाँ संभव नहीं — वह केवल मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि से होता है, और वह भी केंद्र (प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, दशम) से; पंचम त्रिकोण है। ‘कारको भाव नाशाय’ वाला परवर्ती सूत्र — जो बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में कहीं नहीं मिलता — भी यहाँ किसी बात पर लागू नहीं होता, क्योंकि संतान का कारक गुरु है, सूर्य नहीं।

सूचना: शास्त्रीय ज्योतिष (बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, फलदीपिका) पर आधारित। भाव-स्थिति का विश्लेषण प्रवृत्तियाँ बताता है, गारंटी नहीं देता। व्यक्तिगत परामर्श हेतु योग्य ज्योतिषी से संपर्क करें।