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करवा चौथ 2026

करवा चौथ व्रत कथा

चंद्रोदय से पहले पढ़ी जाने वाली कथा — रानी वीरावती और पीपल के पीछे के झूठे चाँद की, और करवा की, जिसकी भक्ति ने यमराज को पति की रक्षा के लिए विवश कर दिया।

A woman holding a decorated puja thali and a chalni to the moon on the evening of Karwa Chauth
PanchangBodh Editorial
7 min read
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करवा चौथ पर पहला तारा दिखने से बहुत पहले, हर व्रती स्त्री एक कथा सुनने की प्रतीक्षा करती है — और वह कथा एक झूठे चाँद से आरंभ होती है। रानी वीरावती सात भाइयों की इकलौती, अत्यंत लाड़ली बहन थी। उसने अपना पहला निर्जल व्रत रखा था, और सायं तक भूख-प्यास से इतनी निढाल हो गई कि भाइयों से उसका कष्ट देखा न गया। उन्होंने एक दूर के पीपल के पीछे दीपक जला दिया, जिसकी आभा पत्तों के बीच से उगते चाँद-सी दिखी। बहन ने उसे सच्चा चाँद मानकर अर्घ्य दिया और व्रत खोल लिया — और उसी क्षण उसका सुख शोक में बदल गया।

यह पृष्ठ वही कथा है — कहानी स्वयं, न कि तिथि या विधि। यह सायं पूजा में सुनाई जाती है, जब थाली सज जाती है और चंद्रमा के दर्शन से ठीक पहले, क्योंकि माना जाता है कि कथा सुनने पर ही व्रत सफल होता है। दो स्त्रियाँ इसकी धुरी हैं: वीरावती, जिसने झूठे चाँद से व्रत टूटने के बाद अपनी भक्ति से पति को पुनः पा लिया, और करवा, जिसका सतीत्व इतना प्रबल था कि यमराज ने स्वयं उसके पति को दीर्घायु दी। 29 अक्टूबर 2026 की सायं, चलनी उठाकर चाँद को देखने से पहले, इन्हें पढ़ें या सुनें।

करवा चौथ व्रत कथा — एक दृष्टि में

🕯️

कब पढ़ें

सायं पूजा, चंद्रोदय से पहले

🗓️

करवा चौथ 2026

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

📖

दो कथाएँ

रानी वीरावती व करवा

🌙

व्रत का पारण

चंद्रोदय पर, अर्घ्य के बाद

🙏

किसके लिए

पति की दीर्घायु (सुहाग)

🏺

नाम किस पर

पतिव्रता करवा के नाम पर

कथा कब पढ़ी जाती है

सायं पूजा में, चंद्रोदय से पहले

कब पढ़ें या सुनें

सायं पूजा, चंद्रोदय से पहले

थाली सजने के बाद — ताकि व्रत सफल हो

करवा चौथ 2026

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

पति की दीर्घायु का सुहाग व्रत

करवा चौथ की कथा किसी भी सुविधाजनक समय पर नहीं पढ़ी जाती। यह सायं पूजा का अंग है — पूजा की थाली सज जाने के बाद और चंद्र-दर्शन से पहले सुनाई या पढ़ी जाती है, ताकि जब स्त्री अंततः चलनी उठाकर पहले चाँद को और फिर पति के मुख को देखे, तब कथा का वचन घर में ताज़ा हो। 2026 में यह सायं गुरुवार, 29 अक्टूबर को है। आगे उसी संध्या पर सुनाई जाने वाली दो कथाएँ हैं।

रानी वीरावती की कथा

सात भाई, झूठा चाँद, और टूटा व्रत

वीरावती सात भाइयों की इकलौती बहन थी, और वे उसे सीमा से परे प्रेम करते थे। अपने पहले करवा चौथ पर उसने प्रातः से निर्जल व्रत रखा — न अन्न, न जल की एक बूँद — और हर सुहागिन की तरह चाँद की बाट जोहती रही। पर वह अभी कम उम्र की थी और दिन लंबा; सांझ ढलते-ढलते वह इतनी पीली और निढाल पड़ गई कि भाइयों से सहा न गया। अपनी प्यारी बहन को चंद्रोदय तक तड़पते देखना उन्हें असह्य लगा, तो वे चुपके से गए और एक दूर के पीपल के पीछे दीपक जला आए, जिसकी आभा पत्तों में से एक फीके चाँद-सी उठी। ‘देख बहन, चाँद निकल आया,’ उन्होंने कहा। जिन भाइयों ने उसे कभी धोखा न दिया था, उन पर विश्वास कर वीरावती ने उस झूठी ज्योति को अर्घ्य दिया, मन ही मन पति का स्मरण किया, और व्रत खोल लिया। जिस घड़ी उसने अन्न ग्रहण किया, उसी घड़ी समाचार आया कि उसके पति का देहांत हो गया। उसका शोक अवर्णनीय था; और तभी उसे ज्ञात हुआ कि वह चाँद चाँद था ही नहीं, केवल एक दीपक था जिसे भाइयों के स्नेह ने समय से पहले जला दिया। पर वीरावती ने हार नहीं मानी। उसने संकल्प लिया कि वह पूरे मन और अटूट श्रद्धा से व्रत फिर रखेगी — और उसी अखंड आस्था के बल पर उसका पति अंततः पुनर्जीवित हो उठा। यही कारण है कि सच्चा चाँद देखे बिना व्रत कभी नहीं तोड़ा जाता।

करवा और यमराज की कथा

वह भक्ति जिसने व्रत को नाम दिया

दूसरी कथा व्रत को उसका नाम ही देती है। करवा ऐसी पतिव्रता थी कि उसका सतीत्व — पातिव्रत्य का बल — देवताओं तक को विचलित कर देता था, ऐसा कहा जाता है। एक दिन उसका पति नदी में स्नान करने उतरा, और एक मगर ने उसका पाँव पकड़ लिया और छोड़ा नहीं। उसने करवा को पुकारा, और वह दौड़ी चली आई। कहते हैं, अपनी भक्ति के बल से उसने मगर को एक कच्चे धागे से बाँध दिया और थामे रखा, फिर सीधे यमराज के पास जाकर माँग की कि उस जीव को उनके लोक भेजा जाए और उसके पति को दीर्घायु दी जाए। जब यमराज हिचके, तो करवा ने चेताया कि सच्ची पतिव्रता की भक्ति का बल उन्हीं पर पलट सकता है — और जो किसी से नहीं डरता, वह यमराज इससे डर गया। उसने मगर को यमलोक भेजा और करवा के पति को दीर्घ आयु का वरदान दिया। उसी के नाम पर व्रत करवा चौथ कहलाया, और पूजा में स्त्री जो मिट्टी का पात्र भरती है वह आज भी ‘करवा’ है। दोनों कथाएँ मिलकर व्रत का पूरा अर्थ धारण करती हैं: कि प्रेम और श्रद्धा से रखा व्रत वहाँ तक पहुँचता है जहाँ मृत्यु प्रतीक्षा करती है, और कथा सुनने पर ही व्रत फल देता है। इसीलिए हर वर्ष चाँद से पहले ये वचन फिर दोहराए जाते हैं।

लाइव पंचांग

अपने शहर के लिए करवा चौथ पूजा का समय जानें

कथा सायं पूजा में पढ़ें, फिर चाँद की प्रतीक्षा करें। 29 अक्टूबर को अपने ही शहर के चंद्रोदय और दिन के शुभ मुहूर्तों के लिए लाइव पंचांग और चौघड़िया खोलें।

करवा चौथ व्रत कथा — आपके प्रश्न

कब पढ़ें, दोनों कथाएँ, और व्रत का अर्थ

करवा चौथ व्रत कथा कब पढ़ी जाती है?+
कथा सायं (संध्या) पूजा में पढ़ी जाती है — पूजा की थाली सज जाने के बाद और चंद्र-दर्शन से पहले। माना जाता है कि कथा सुनने पर ही व्रत सफल होता है, इसलिए स्त्री या घर की बड़ी-बुज़ुर्ग उसे ऊँचे स्वर में पढ़ती या सुनाती हैं, और उसके बाद ही चाँद का स्वागत कर व्रत खोला जाता है। 2026 में यह सायं गुरुवार, 29 अक्टूबर को है।
रानी वीरावती की कथा क्या है?+
वीरावती सात स्नेही भाइयों की इकलौती बहन थी। अपने पहले करवा चौथ पर उसने निर्जल व्रत रखा, और सांझ तक वह इतनी निढाल हो गई कि भाइयों से न सहा गया, और उन्होंने एक दूर के पीपल के पीछे दीपक जलाकर उसकी आभा को चाँद-सा दिखा दिया। उसने उस झूठे चाँद पर व्रत खोल लिया, और उसी घड़ी उसके पति का देहांत हो गया। हार न मानकर उसने पूरे मन और अटूट श्रद्धा से व्रत फिर रखा और उसी आस्था से पति को पुनः जीवित पा लिया।
व्रत का नाम करवा चौथ क्यों पड़ा?+
यह करवा नामक उस पतिव्रता के नाम पर है जिसने अपने पति की रक्षा की। जब नदी में एक मगर ने उसके पति को पकड़ लिया, तो उसका सतीत्व इतना प्रबल था कि उसने उस जीव को बाँधकर स्वयं यमराज के पास जाकर मृत्यु के देवता को विवश कर दिया कि वे मगर को हर लें और पति को दीर्घायु दें। उसी के नाम से "करवा" शब्द आया, और पूजा में भरा जाने वाला मिट्टी का पात्र आज भी करवा कहलाता है।
कथा चाँद देखने से पहले क्यों पढ़ी जाती है?+
क्योंकि कथा ही व्रत को पूर्ण करती है — माना जाता है कि कथा सुनने के बाद ही व्रत फल देता है। इसमें वीरावती की सीख भी है: व्रत कभी झूठे या समय-पूर्व चाँद पर नहीं तोड़ा जाता, बल्कि सच्चे चंद्रोदय और अर्घ्य के बाद ही। इसलिए पहले कथा कही जाती है, और चलनी चाँद की ओर उसके बाद ही उठाई जाती है।
क्या वीरावती और करवा एक ही कथा हैं?+
नहीं — ये एक ही संध्या पर साथ सुनाई जाने वाली दो अलग कथाएँ हैं। वीरावती की कथा बताती है कि सच्चे चाँद से पहले व्रत क्यों नहीं तोड़ना चाहिए, जबकि करवा की कथा पतिव्रता की भक्ति का बल दिखाती है और व्रत को उसका नाम देती है। परिवार एक या दोनों कथाएँ कह सकते हैं, और छोटे विवरण क्षेत्र-दर-क्षेत्र बदलते हैं।
करवा चौथ 2026 में कब है?+
करवा चौथ 2026 गुरुवार, 29 अक्टूबर को है। व्रत प्रातः से रखा जाता है, सायं पूजा में व्रत कथा पढ़ी जाती है, और चंद्रोदय के बाद अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है। चंद्रोदय का समय शहर-दर-शहर भिन्न होता है, इसलिए पूजा से पहले अपना स्थानीय चंद्रोदय पंचांग में देख लें।
स्रोत और अस्वीकरण: करवा चौथ व्रत कथा कई क्षेत्रीय रूपों में जीवित है, और छोटे-छोटे विवरण — झूठा चाँद, धागा, यमराज से कहे वचन — परिवार-दर-परिवार भिन्न होते हैं; यहाँ दिए रूप सर्वाधिक प्रचलित उत्तर भारतीय परंपरा का अनुसरण करते हैं। करवा चौथ 2026 गुरुवार, 29 अक्टूबर को है; सायं पूजा से पहले अपने शहर का चंद्रोदय समय पंचांग में देख लें। व्रत रखने वाली गर्भवती, अस्वस्थ या वृद्ध स्त्रियों को कठोर निर्जल व्रत के स्थान पर चिकित्सक की सलाह माननी चाहिए।