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मंगला गौरी व्रत 2026 — तिथियाँ, विधि व कथा

सावन के मंगलवार, जो विवाहित महिलाएँ अपने पति के लिए रखती हैं — 2026 की चारों तिथियाँ, पूजा विधि व सामग्री, और व्रत कथा।

A married woman offering flowers and a lamp to Goddess Gauri on a Sawan Tuesday, with sixteen items of shringar laid out
PanchangBodh Editorial
8 min read
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मंगला गौरी व्रत सावन के मंगलवार का व्रत है, जो माँ गौरी — पार्वती के सौम्य स्वरूप — को समर्पित है। विवाहित महिलाएँ, और विशेषकर नवविवाहिताएँ, अपने पति की दीर्घायु और कल्याण तथा घर की सुख-शांति के लिए यह व्रत रखती हैं।

2026 में यह व्रत उत्तर भारत के पूर्णिमांत श्रावण के चारों मंगलवार को पड़ता है — 4, 11, 18 और 25 अगस्त। नीचे तिथियाँ, पूरी पूजा विधि व सामग्री, पारंपरिक व्रत कथा, और यह व्रत इतना प्रिय क्यों है, सब दिया गया है।

मंगला गौरी व्रत 2026 — एक दृष्टि में

🌺

व्रत

मंगला गौरी व्रत

📆

कुल दिन

सावन के 4 मंगलवार

🗓️

पहला व्रत

मंगलवार, 4 अगस्त 2026

🗓️

अंतिम व्रत

मंगलवार, 25 अगस्त 2026

🙏

आराध्य

माँ गौरी (पार्वती)

💑

कौन रखता है

विवाहित महिलाएँ

मंगला गौरी व्रत 2026 की तिथियाँ

व्रत रखने के सावन के चार मंगलवार

1

मंगलवार, 4 अगस्त

सावन का पहला मंगलवार

2

मंगलवार, 11 अगस्त

3

मंगलवार, 18 अगस्त

4

मंगलवार, 25 अगस्त

भौम प्रदोष भी

मंगला गौरी पूजा विधि

मंगलवार की पूजा किस प्रकार होती है

व्रत रखने वाली महिला सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करती है, स्वच्छ या पर्व के वस्त्र पहनती है, और व्रत का संकल्प लेती है। लकड़ी की चौकी पर वह माँ गौरी की मूर्ति या चित्र स्थापित करती है और सोलह श्रृंगार की वस्तुएँ — चूड़ी, सिंदूर, बिंदी, मेहँदी आदि — सोलह फूल, माला, लड्डू और सुपारी के साथ अर्पित करती है। देवी के समक्ष गेहूँ के आटे का सोलह बत्ती वाला दीपक जलाया जाता है। इसके बाद वह मंगला गौरी व्रत कथा पढ़ती या सुनती है, आरती करती है और पति तथा परिवार के कल्याण की प्रार्थना करती है। व्रत दिन भर रखा जाता है और सायंकालीन पूजा के बाद खोला जाता है; श्रृंगार और भेंट किसी ब्राह्मणी अथवा बड़ी सुहागिन को दे दी जाती है।

पूजा सामग्री — क्या तैयार रखें

सोलह-सोलह के रूप में जुटाई गई भेंट

  • 1माँ गौरी की मिट्टी या धातु की मूर्ति अथवा चित्र
  • 2सोलह श्रृंगार की वस्तुएँ (चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, काजल, मेहँदी, कंघी आदि)
  • 3सोलह-सोलह फूल, माला, लड्डू, सुपारी, लौंग और इलायची
  • 4गेहूँ के आटे का सोलह बत्ती वाला दीपक
  • 5रोली, अक्षत, मौली, अगरबत्ती और धूप
  • 6फल, धतूरा, बिल्वपत्र और अर्घ्य के लिए शुद्ध जल

मंगला गौरी व्रत कथा

व्रत के पीछे की कथा

सबसे प्रचलित कथा एक धनी परंतु निःसंतान व्यापारी की है, जिसे माँ गौरी की लंबी आराधना के बाद पुत्र तो मिला, पर वह पुत्र अल्पायु था। परिवार की महिलाओं द्वारा श्रद्धापूर्वक रखे गए मंगला गौरी व्रत के पुण्य और देवी की कृपा से उस बालक की रक्षा हुई और उसे दीर्घायु तथा शुभ विवाह का आशीर्वाद मिला। व्रत के हर मंगलवार को यह कथा पढ़ी जाती है, इस स्मरण के साथ कि गौरी के प्रति सच्ची भक्ति परिवार की रक्षा करती है और सुहागिन के पति की आयु बढ़ाती है।

व्रत का महत्व

विवाहित महिलाएँ इसे इतना प्रिय क्यों मानती हैं

सावन शिव का मास है और गौरी उनकी अर्धांगिनी हैं; सोमवार की शिव पूजा के साथ मंगलवार को गौरी की आराधना दिव्य दंपति की भक्ति को पूर्ण करती है। विवाहित महिला के लिए यह व्रत अपने पति और परिवार के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति है — उसकी दीर्घायु, संतान और अखंड, संतोषपूर्ण दांपत्य जीवन की प्रार्थना। सोलह श्रृंगार का स्मरण कराती सोलह-सोलह भेंट इस व्रत को सौभाग्य का उत्सव बना देती हैं।

💡

सोलह श्रृंगार

भेंट सोलह-सोलह की संख्या में चढ़ाई जाती है, जो सुहागिन के सोलह श्रृंगार का स्मरण कराती है और व्रत को सौभाग्य का उत्सव बना देती है।
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ये तिथियाँ नई दिल्ली के लिए हैं। अपने शहर के सटीक सूर्योदय, तिथि और दिन के शुभ मुहूर्त के लिए हमारे लाइव साधनों का उपयोग करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मंगला गौरी व्रत 2026 की तिथियाँ और विधि

मंगला गौरी व्रत 2026 में कब है?+
2026 में मंगला गौरी व्रत सावन के चारों मंगलवार को रखा जाता है — 4, 11, 18 और 25 अगस्त। ये वही मंगलवार हैं जो उत्तर भारत के पूर्णिमांत श्रावण मास के भीतर पड़ते हैं।
सावन 2026 में कितने मंगला गौरी व्रत हैं?+
सावन 2026 में चार मंगला गौरी व्रत हैं, मास के हर मंगलवार को एक — 4, 11, 18 और 25 अगस्त। जो महिला व्रत आरंभ करती है, वह प्रायः उस सावन के सभी मंगलवार व्रत रखती है।
मंगला गौरी व्रत कौन रखता है?+
यह व्रत मुख्यतः विवाहित महिलाएँ रखती हैं, और विशेषकर नवविवाहिताएँ विवाह के आरंभिक वर्षों में अपने पति की दीर्घायु और कल्याण तथा सुखी-सुखद दांपत्य जीवन के लिए यह व्रत करती हैं। यह माँ गौरी को समर्पित है, जो पार्वती का ही स्वरूप हैं।
मंगला गौरी व्रत की पूजा विधि क्या है?+
प्रातः स्नान के बाद महिला संकल्प लेती है, लकड़ी की चौकी पर गौरी की मूर्ति या चित्र स्थापित करती है और सोलह श्रृंगार की वस्तुएँ फूल, लड्डू, सुपारी तथा सोलह बत्ती वाले दीपक के साथ अर्पित करती है। इसके बाद मंगला गौरी व्रत कथा पढ़ती या सुनती है, आरती करती है और सायंकालीन पूजा के बाद व्रत खोलती है।
इस व्रत में सोलह की संख्या का क्या महत्व है?+
भेंट सोलह की संख्या में चढ़ाई जाती है — सोलह फूल, माला, लड्डू, सुपारी और सोलह बत्ती वाला दीपक — जो सोलह श्रृंगार का स्मरण कराते हैं। यह व्रत परंपरागत रूप से एक निश्चित वर्षों तक रखा जाता है और उद्यापन के साथ पूरा किया जाता है, इसलिए सोलह की संख्या बार-बार आती है।
क्या कुँवारी कन्याएँ मंगला गौरी व्रत रख सकती हैं?+
परंपरा से यह व्रत विवाहित महिलाओं के लिए है, पर कुँवारी कन्याएँ भी इसे रखकर योग्य वर और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए गौरी से प्रार्थना कर सकती हैं। सच्ची भक्ति पर कोई रोक नहीं है।
स्रोत और अस्वीकरण: तिथियाँ नई दिल्ली के लिए स्विस एफेमेरिस से गणना कर पारंपरिक पंचांग से मिलाई गई हैं। मंगला गौरी व्रत उत्तर भारत के पूर्णिमांत सावन के अनुसार है; अमांत पंचांग वाले क्षेत्र इसे अपने सावन के मंगलवार को रखते हैं। स्थानीय परंपराएँ किसी तिथि को एक दिन आगे-पीछे कर सकती हैं — व्रत से पहले अपने शहर का समय अवश्य पुष्टि कर लें।