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पापमोचनी एकादशी

वर्ष की अंतिम एकादशी—वह व्रत जो पापों को धो देता है

Papamochani Ekadashi — Ekadashi vrat for Lord Vishnu
PanchangBodh Editorial
6 min read
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पापमोचनी एकादशी वह व्रत है जो पाप का बंधन खोल देता है। ‘पाप’ अर्थात् दोष, अशुभ कर्म, गलत आचरण का भार; और ‘मोचनी’ अर्थात् जो मुक्त करे, जो बोझ को उतार दे। यह चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि है, जो भगवान विष्णु को समर्पित है, और इसके साथ एक पुराना तथा चौंका देने वाला वचन जुड़ा है—कि गंभीर से गंभीर पाप भी, जिन्हें मनुष्य भय के साथ ढोता है, एक दिन के सच्चे उपवास और पूजन से धुल सकते हैं।

यह विदा होते वर्ष की अंतिम एकादशी भी है। होली के बाद और नववर्ष का आरंभ करने वाली चैत्र नवरात्रि से पहले पड़ती हुई, पापमोचनी मानो देहरी पर खड़ी है—वर्ष की संधि पार करने से पूर्व उन बोझों को उतार देने का अंतिम अवसर, जिन्हें कोई साथ नहीं ले जाना चाहता। जिस कथा से यह दिन स्मरण किया जाता है—जो श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई—वह एक अप्सरा की है, जो इसी व्रत को रखकर अपने शाप से मुक्त हुई; और यह व्रत भी, हर एकादशी की भाँति, अगली सुबह द्वादशी को पारण के साथ पूर्ण होता है।

वर्ष की अंतिम एकादशी—संक्षेप में

🗓️

2027 में तिथि

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2027

🌙

चंद्र मास

चैत्र · कृष्ण पक्ष

🕉️

आराध्य

भगवान विष्णु

🪔

क्या दर्शाती है

वर्ष की अंतिम एकादशी; विष्णु व्रत

🕊️

नाम का अर्थ

पापों को हरने वाली

तिथि और तिथि-काल

आपके शहर के लिए व्रत का दिन और तिथि-समय

इस वर्ष पापमोचनी एकादशी शुक्रवार, 2 अप्रैल 2027 को रखी जाती है; एकादशी तिथि का आरंभ 02 अप्रैल 2027, 12:46 AM पर और समापन 03 अप्रैल 2027, 02:53 AM पर होता है।

तिथि आरंभ

02 अप्रैल 2027, 12:46 AM

तिथि समाप्त

03 अप्रैल 2027, 02:53 AM

ℹ️

स्मार्त और वैष्णव तिथि भिन्न हैं

इस वर्ष स्मार्त परंपरा में व्रत शुक्रवार, 02 अप्रैल 2027 को और वैष्णव (गौण) परंपरा में शनिवार, 03 अप्रैल 2027 को रखा जाता है। अपनी परंपरा के अनुसार दिन चुनें।
वर्षव्रत का दिन
2026रविवार, 15 मार्च 2026
2027शुक्रवार, 2 अप्रैल 2027

समय नई दिल्ली के लिए; अन्य शहरों के लिए एकादशी कैलेंडर में अपना शहर चुनें।

वह एकादशी जो पापों को धो देती है

‘पापमोचनी’ का अर्थ, और वह बोझ जिसे यह उतारती है

पापमोचनी ऐसा नाम है जिसके अर्थ में ही उसका पूरा प्रयोजन निहित है। ‘पाप’ अर्थात् दोष, अपकर्म, अनुचित आचरण का भार; और ‘मोचनी’ अर्थात् जो मुक्त करे, जो गाँठ को खोल दे। दोनों मिलकर बनते हैं—पापों को हरने वाली। वर्ष की समस्त एकादशियों में यही वह तिथि है, जिसकी ओर मनुष्य तब मुड़ता है जब वह अपने किसी किए से मुक्त होना चाहता है।

परंपरा इस वचन को हल्का नहीं करती। मान्यता है कि पापमोचनी व्रत गंभीर से गंभीर पाप को भी धो सकता है—वह पाप, जिसके लिए साधारण प्रायश्चित दिखाई नहीं देता, यहाँ तक कि ब्रह्महत्या जैसे महापाप को भी। यह पाप को हल्के में लेने की छूट नहीं, बल्कि खुला रहने वाला एक द्वार है—कि कोई कितना ही भटक गया हो, सच्चा उपवास और विष्णु का पूजन उसे लौटा सकते हैं।

पंचांग में इसका स्थान इस भाव को और गहरा कर देता है। पापमोचनी विदा होते हिंदू वर्ष की अंतिम एकादशी है, जो चैत्र कृष्ण पक्ष में होली और नववर्ष आरंभ करने वाली चैत्र नवरात्रि के बीच पड़ती है। पुराने बोझ उतारकर नए वर्ष में निर्भार प्रवेश करने के लिए यह उपयुक्त बेला है।

मेधावी, अप्सरा और शाप का निवारण

वह कथा जो श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई

यह कथा भविष्योत्तर पुराण की है, जिसे श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाया। चैत्ररथ वन में मेधावी नामक एक युवा तपस्वी गहन साधना में लीन था—मन एकाग्र, तप कठोर। ऐसा तप स्वर्ग तक को विचलित कर देता है, और इसीलिए उसकी साधना तोड़ने के लिए अप्सरा मंजुघोषा भेजी गई। उसके गान और सामीप्य के आगे वह युवा तपस्वी, अपने समस्त संयम के बावजूद, मोहित हो गया।

इसके बाद के वर्ष उससे छिन गए। मंजुघोषा के आकर्षण में बँधा मेधावी अपनी तपस्या भुला बैठा और दीर्घ काल तक उसके संग रहा, अपने तप की अग्नि से विमुख। जब अंततः उसे अपनी सुध आई और उसने देखा कि कितना कुछ हाथ से निकल चुका है, तो शोक क्रोध में बदल गया, और उसने मंजुघोषा को पिशाचिनी हो जाने का शाप दे दिया।

वह स्तब्ध होकर उसके चरणों में गिर पड़ी और लौटने का मार्ग माँगने लगी। उसका क्रोध करुणा में शांत हुआ, और उसने उसे पापमोचनी एकादशी का व्रत बताया—वही व्रत, जो पापों को हर लेता है। मंजुघोषा ने उसे पूरे मन से रखा, और उसके पुण्य से शाप ढीला पड़कर मिट गया; वह उस पिशाचिनी-रूप और उस पाप से भी मुक्त हुई, जिसने वह रूप दिया था। मेधावी भी अपनी छोड़ी हुई तपस्या में लौट आया, फिर से प्रतिष्ठित। दो जीवन, एक व्रत—यही इस दिन की कथा है।

उपवास और विष्णु का पूजन

यह दिन कैसे बिताया जाता है

व्यवहार में यह व्रत शांत और अंतर्मुखी है। दिन स्नान और संकल्प से आरंभ होता है—व्रत के पालन का दृढ़ निश्चय—और फिर विष्णु के पूजन की ओर मुड़ता है: चरणों में तुलसीदल, प्रज्वलित दीप, एकादशी कथा का पाठ या श्रवण, और दिन भर जिह्वा पर उनका नाम। अन्न का त्याग किया जाता है, और अनेक लोग पूर्ण उपवास रखते हैं, स्वास्थ्य के अनुसार केवल जल अथवा फल ग्रहण करते हुए।

चूँकि इस दिन का समूचा प्रयोजन ही दोषों का त्याग है, बाह्य विधि का जितना महत्व है, उतना ही अंतर्मन का भी। यह अपने प्रति सच्चे होने का दिन है—पुराने दोषों से मुँह मोड़ने का, न कि केवल विधि दोहरा देने का। जहाँ संभव हो, गृहस्थ संध्या को स्मरण में बिताते हैं और परंपरा के अनुसार, पारण से पूर्व रात्रि विष्णु के नाम-स्मरण में जागते हैं।

💡

व्रत सामर्थ्य के अनुसार रखें

एकादशी का उपवास कई रूपों में रखा जाता है—निर्जल, जल पर, अथवा फल पर। वही चुनें जो आपका स्वास्थ्य सहन कर सके, और देह पर कभी बल न डालें। यह लेख समझ के लिए है, किसी अनिवार्य विधान अथवा किसी चिकित्सक या पुरोहित के मार्गदर्शन का विकल्प नहीं।

प्रातःकाल व्रत की पूर्णता

वह द्वादशी-काल जो व्रत को पूर्ण करता है

व्रत तब तक पूर्ण नहीं होता जब तक उसे विधिपूर्वक न खोला जाए। पारण अगली सुबह द्वादशी को किया जाता है—सूर्योदय के बाद, द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले, और हरि वासर, अर्थात् तिथि के प्रथम चरण में कभी नहीं। व्रत धीरे से खोला जाता है, प्रायः किसी सहज आहार से, और मान्यता है कि दिन का पुण्य इसी काल में पारण करने पर टिका रहता है, न कि बहुत जल्दी या बहुत देर करने पर।

यही कारण है कि अगली सुबह का सूर्योदय एकादशी की तिथि जितना ही महत्वपूर्ण है, और यही काल नगर-नगर बदलता है। अपने यहाँ के ठीक पारण-समय के लिए उस दिन का पंचांग देखें।

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पारण-काल का ध्यान रखें

व्रत केवल पारण-काल में ही खोलें—सूर्योदय के बाद और हरि वासर बीत जाने पर। बहुत जल्दी या बहुत देर से पारण व्रत का फल घटाता है; ठीक समय के लिए अपने शहर का उस दिन का पंचांग देखें।
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तिथि, नक्षत्र, सूर्योदय और दिन के मुहूर्त—जहाँ आप हैं, वहीं के लिए गणना।

पापमोचनी एकादशी—आपके प्रश्नों के उत्तर

नाम का अर्थ, मेधावी की कथा और पारण

पापमोचनी का अर्थ क्या है?+
‘पापमोचनी’ दो शब्दों से बना है—‘पाप’ अर्थात् दोष या अशुभ कर्म, और ‘मोचनी’ अर्थात् जो मुक्त करे। इस प्रकार पापमोचनी का अर्थ हुआ—पापों को हरने वाली एकादशी। यही इस दिन का समूचा प्रयोजन है—कि सच्चे उपवास और विष्णु-पूजन से मनुष्य अपने किए के भार से मुक्त हो सके।
पापमोचनी एकादशी किन पापों को हरती है?+
परंपरा कहती है कि यह व्रत गंभीर से गंभीर पाप को भी धो सकता है—यहाँ तक कि ब्रह्महत्या जैसे महापाप को भी, जिनके लिए साधारण प्रायश्चित दिखाई नहीं देता। यह पाप करने की छूट नहीं, बल्कि लौटने का द्वार है; इसका आधार श्रद्धापूर्वक रखा गया उपवास, विष्णु का पूजन और दोष से सच्चा विमुख होना ही है।
पापमोचनी एकादशी कब है?+
यह चैत्र कृष्ण पक्ष में, मार्च के आसपास पड़ती है—होली के बाद और चैत्र नवरात्रि से पहले, विदा होते हिंदू वर्ष की अंतिम एकादशी के रूप में। आपके शहर के लिए सटीक तिथि और तिथि-समय ऊपर दिए गए कार्ड में हैं, जो पंचांग से लिए गए हैं।
पापमोचनी एकादशी की कथा क्या है?+
भविष्योत्तर पुराण की यह कथा श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई। चैत्ररथ वन में तपस्वी मेधावी की साधना भंग करने अप्सरा मंजुघोषा आई और उसने उसे मोहित कर लिया; वर्षों बाद जब मेधावी को सुध आई, तो उसने क्रोध में उसे पिशाचिनी होने का शाप दे दिया। बाद में शांत होकर उसने मंजुघोषा को यही व्रत बताया, जिसे रखकर वह शाप और अपने पाप दोनों से मुक्त हो गई।
पापमोचनी एकादशी कैसे मनाई जाती है?+
दिन स्नान और संकल्प से आरंभ होता है, और तुलसी, दीप तथा एकादशी कथा के साथ भगवान विष्णु का पूजन होता है। अन्न का त्याग कर अनेक लोग पूर्ण उपवास रखते हैं और स्वास्थ्य के अनुसार जल या फल लेते हैं। संध्या स्मरण में बीतती है, और अगली सुबह द्वादशी को पारण के साथ व्रत पूर्ण होता है।
व्रत का पारण कब करें?+
पारण अगली सुबह द्वादशी को, पारण-काल में किया जाता है—सूर्योदय के बाद, द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले, और हरि वासर में नहीं। बहुत जल्दी या बहुत देर से पारण व्रत का फल घटाता है; सटीक समय के लिए अपने शहर का उस दिन का पंचांग देखें।
स्रोत और अस्वीकरण: तिथि और समय आपके चुने हुए शहर के पंचांग से निकाले जाते हैं और प्रतिष्ठित स्रोतों से मिलाए जाते हैं। व्रत और अनुष्ठान की विधि परिवार, संप्रदाय और क्षेत्र के अनुसार भिन्न होती है; यह लेख समझ के लिए है, किसी चिकित्सकीय सलाह अथवा अपने बुज़ुर्गों या पुरोहित के मार्गदर्शन का विकल्प नहीं।