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वरलक्ष्मी व्रत 2026 — तिथि, पूजा विधि व कथा

शुक्रवार, 28 अगस्त 2026 (उत्तर / द्रिक नई दिल्ली), और दक्षिण भारत की परंपरा में शुक्रवार, 21 अगस्त। देवी महालक्ष्मी की कृपा के लिए सुबह का व्रत।

A decorated Varalakshmi kalash with a coconut, mango leaves, flowers and a lamp, set for the vratam puja
PanchangBodh Editorial
7 min read
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वरलक्ष्मी व्रत श्रावण के शुक्रवार का व्रत है, जिसमें महिलाएँ देवी महालक्ष्मी को वरलक्ष्मी — 'वर देने वाली लक्ष्मी' — के रूप में पूजकर अपने परिवार के कल्याण और समृद्धि की कामना करती हैं। देवी के साक्षात् स्वरूप के रूप में एक सजा हुआ कलश स्थापित किया जाता है, और यह दिन लक्ष्मी भक्तों के लिए वर्ष के सबसे प्रिय दिनों में से एक है।

2026 में उत्तर भारत और द्रिक (नई दिल्ली) की गणना इस व्रत को शुक्रवार, 28 अगस्त को रखती है, जबकि दक्षिण भारत की परंपरा इसे एक सप्ताह पहले, शुक्रवार, 21 अगस्त को मनाती है। पूजा सुबह, दोपहर से पहले करना श्रेष्ठ है। नीचे दोनों तिथियाँ, कलश पूजा विधि, व्रत कथा और उसका महत्व दिया गया है।

वरलक्ष्मी व्रत 2026 — एक दृष्टि में

🗓️

तिथि (उत्तर / द्रिक)

शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

🌸

तिथि (दक्षिण भारत)

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

🕉️

श्रेष्ठ समय

सुबह की पूजा, दोपहर से पहले

🪔

देवी

देवी महालक्ष्मी

👰

मुख्यतः

विवाहित महिलाएँ

📅

अवसर

श्रावण पूर्णिमा से पहले शुक्रवार

वरलक्ष्मी व्रत 2026 की तिथियाँ

उत्तर / द्रिक और दक्षिण भारत, दोनों परंपराएँ

उत्तर / द्रिक (नई दिल्ली)

शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

दक्षिण भारत

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

2026 में दो प्रचलित तिथियाँ हैं, क्योंकि उत्तर और दक्षिण श्रावण मास की गणना अलग-अलग करते हैं। उत्तर भारत और द्रिक (नई दिल्ली) पंचांग के अनुसार वरलक्ष्मी व्रत शुक्रवार, 28 अगस्त 2026 को पड़ता है। दक्षिण भारत की परंपरा — तेलुगु, तमिल और कन्नड़ — में यह श्रावण पूर्णिमा से पहले वाला शुक्रवार है, जो इस वर्ष शुक्रवार, 21 अगस्त 2026 है। व्रत और पूजा एक समान हैं; अपने परिवार में प्रचलित तिथि का अनुसरण करें।

ℹ️

पूजा का समय

पूजा परंपरागत रूप से सुबह, दोपहर से पहले, सिंह लग्न की शुभ अवधि में की जाती है। लग्न के सटीक मिनट शहर-शहर बदलते हैं, इसलिए 'सुबह, दोपहर से पहले' को सामान्य मार्गदर्शन मानें और अपने स्थान के लिए सटीक मुहूर्त की पुष्टि करें। जहाँ सुबह संभव न हो, वहाँ संध्या पूजा भी स्वीकार्य है।

वरलक्ष्मी कलश पूजा विधि

कलश की स्थापना और पूजन

1

पूजा स्थान स्वच्छ करें और रंगोली बनाएँ। सुबह की पूजा से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

2

कलश स्थापित करें — धातु के पात्र में चावल या जल भरें, ऊपर आम के पत्ते और नारियल रखें, और नए वस्त्र से लपेटें। इसी कलश को वरलक्ष्मी के रूप में पूजा जाता है।

3

कलश को हल्दी, कुमकुम, पुष्प और आभूषणों से सजाएँ। दीप जलाकर देवी का आवाहन करें।

4

पवित्र पीला सूत्र (तोरम) बाँधें, अष्टोत्तर और वरलक्ष्मी व्रत कथा का पाठ करें, और आरती व नैवेद्य से समापन करें।

वरलक्ष्मी व्रत कथा

कुंडिनपुर की चारुमती की कथा

वरलक्ष्मी व्रत कथा कुंडिनपुर की एक भक्त और सुशील स्त्री चारुमती की है, जिसे देवी लक्ष्मी ने स्वप्न में दर्शन देकर यह व्रत रखने को कहा। चारुमती ने अपने नगर की स्त्रियों को एकत्र कर श्रद्धापूर्वक कलश की पूजा की। पूजा पूर्ण होते ही उन्हें स्वर्ण आभूषण, धन और हर सुख की प्राप्ति हुई — यह देवी का वचन है कि वरलक्ष्मी की सच्ची पूजा का प्रतिफल भरपूर मिलता है। व्रत के अंग के रूप में यह कथा पढ़ी जाती है।

महत्व — महालक्ष्मी की कृपा

यह व्रत क्यों रखा जाता है

वरलक्ष्मी की पूजा को अष्टलक्ष्मी — लक्ष्मी के आठ रूपों — की पूजा के समान माना जाता है, जो धन, साहस, संतान, अन्न, विद्या, विजय और समृद्धि की अधिष्ठात्री हैं। विवाहित महिलाएँ यह व्रत मुख्यतः अपने पति की दीर्घायु और कल्याण तथा गृहस्थी की सुख-शांति और समृद्धि के लिए रखती हैं। सबसे पवित्र मास श्रावण में पड़ने के कारण इस व्रत को भक्ति की ऋतु का अतिरिक्त पुण्य भी प्राप्त होता है।

लाइव पंचांग

अपने शहर का सुबह का मुहूर्त पुष्टि करें

लग्न का समय शहर के अनुसार बदलता है। पूजा से पहले अपने स्थान के दिन के शुभ मुहूर्त और सूर्योदय के लिए हमारे लाइव साधनों का उपयोग करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वरलक्ष्मी व्रत 2026 की तिथि, पूजा और कथा

वरलक्ष्मी व्रत 2026 में कब है?+
उत्तर भारत में और नई दिल्ली के द्रिक पंचांग के अनुसार वरलक्ष्मी व्रत 2026 शुक्रवार, 28 अगस्त को है। दक्षिण भारत (तेलुगु, तमिल और कन्नड़) की परंपरा में यह एक सप्ताह पहले, शुक्रवार, 21 अगस्त 2026 को रखा जाता है — श्रावण मास के शुक्ल पक्ष का अंतिम शुक्रवार।
2026 में वरलक्ष्मी की दो अलग तिथियाँ क्यों हैं?+
वरलक्ष्मी व्रत श्रावण पूर्णिमा से पहले वाले शुक्रवार को रखा जाता है, पर उत्तर और दक्षिण श्रावण मास की गणना अलग-अलग करते हैं। दक्षिण भारत की परंपरा इसे 21 अगस्त को रखती है, जबकि द्रिक / उत्तर की गणना इसे 28 अगस्त 2026 को रखती है। अपने समुदाय की प्रचलित तिथि का अनुसरण करें।
वरलक्ष्मी पूजा का श्रेष्ठ समय क्या है?+
पूजा परंपरागत रूप से सुबह, दोपहर से पहले की जाती है, जब सिंह लग्न की शुभ अवधि आती है। लग्न के सटीक मिनट शहर-शहर बदलते हैं, इसलिए अपने स्थान के लिए सुबह के मुहूर्त की पुष्टि करना श्रेष्ठ है। जहाँ सुबह संभव न हो, वहाँ संध्या पूजा की भी अनुमति है।
वरलक्ष्मी व्रत कौन रखता है?+
यह व्रत मुख्यतः विवाहित महिलाएँ रखती हैं, जो देवी महालक्ष्मी से परिवार के कल्याण, वैवाहिक सुख, आरोग्य और समृद्धि की प्रार्थना करती हैं। कहा जाता है कि वरलक्ष्मी की पूजा अष्टलक्ष्मी — लक्ष्मी के आठ रूपों — की पूजा के समान है।
वरलक्ष्मी कलश क्या है?+
कलश एक धातु का पात्र है, जिसमें चावल या जल भरकर ऊपर आम के पत्ते और नारियल रखे जाते हैं और नए वस्त्र से लपेटा जाता है, फिर हल्दी, कुमकुम, पुष्प और आभूषणों से सजाया जाता है। पूरे व्रत में इसी कलश को देवी वरलक्ष्मी के साक्षात् स्वरूप के रूप में पूजा जाता है।
वरलक्ष्मी व्रत कथा क्या सिखाती है?+
कथा कुंडिनपुर की एक भक्त स्त्री चारुमती की है, जिसे देवी ने स्वप्न में दर्शन देकर यह व्रत रखने को कहा। कलश की पूजा करते ही चारुमती और उसके नगर की अन्य स्त्रियाँ धन, स्वर्ण और हर सुख से समृद्ध हो गईं — यह इस विश्वास का प्रतीक है कि वरलक्ष्मी के प्रति सच्ची भक्ति का प्रतिफल भरपूर मिलता है।
स्रोत और अस्वीकरण: तिथियाँ पारंपरिक पंचांग के अनुसार हैं — उत्तर / द्रिक (नई दिल्ली) गणना से शुक्रवार 28 अगस्त 2026 और दक्षिण भारत की परंपरा में शुक्रवार 21 अगस्त 2026। सुबह की सिंह लग्न अवधि शहर के अनुसार बदलती है — पूजा से पहले अपने स्थानीय मुहूर्त की पुष्टि करें। स्थानीय परंपराएँ भिन्न हो सकती हैं; अपने परिवार और क्षेत्र की रीति का अनुसरण करें।