ग्रह किस भाव में है, यह दर्ज जन्म-समय के अनुसार पढ़ा गया है।
चंद्र रात लगभग 10:01 बजे तक उत्तर भाद्रपदा में रहा, यानी उनके जन्म के तेरह घंटे से भी अधिक बाद तक। इस नक्षत्र का स्वामी शनि है। उनकी कुंडली में शनि अपनी ही राशि मकर में बैठा है।
सूर्य यहाँ उच्च का है, यानी अपनी सबसे बलवान राशि में, मेष के लगभग 28 अंश पर। शुक्र भी इसी राशि में है। डाली ने अपनी सार्वजनिक छवि को ही कला का हिस्सा बना लिया, ऊपर तनी मूँछों से लेकर सोचे-समझे सार्वजनिक प्रदर्शनों तक।
गुरु पूरे दिन मीन में रहा, जो उसकी अपनी राशि है और जहाँ वह सहज रहता है। चंद्र भी इसी राशि में है, इसलिए यहाँ गजकेसरी योग बनता है। इस योग के लिए गुरु का चंद्र से गिनने पर केंद्र, यानी चार मुख्य भावों में से किसी एक में, होना ज़रूरी है। केतु भी मीन में ही है।
शनि मकर के अंतिम हिस्से में, लगभग 28 अंश पर है। यह उनके चंद्र नक्षत्र का स्वामी है, इसलिए उनका जीवन शनि की लंबी दशा से शुरू हुआ। यह दशा लगभग 1914 तक चली। उनके स्वप्न-दृश्य धैर्य से, लगभग तस्वीर जैसी बारीकी के साथ चित्रित हैं।
साल्वाडोर डाली की कुंडली में सूर्य अपनी सबसे बलवान राशि मेष में है। गुरु और शनि, दोनों अपनी-अपनी राशि में हैं, जहाँ वे सहज रहते हैं। मीन राशि में गुरु के साथ चंद्र और केतु भी हैं।
उनका चंद्र उत्तर भाद्रपदा में है, जो उन 27 नक्षत्रों में से एक है जिनसे होकर चंद्र गुज़रता है। इसका स्वामी शनि है। यहाँ असली प्रश्न लग्न, यानी उदित राशि, का है। दर्ज समय सुबह 8:45 बजे के ठीक एक मिनट बाद कर्क उदित होने लगा था।
उन्होंने मैड्रिड की कला अकादमी में शिक्षा पाई और पेरिस में अतियथार्थवादियों से जुड़े। 1931 में उन्होंने 'द पर्सिस्टेंस ऑफ़ मेमोरी' चित्रित की। 1939 में अतियथार्थवादी समूह ने उन्हें निष्कासित कर दिया। 1982 में गाला के निधन के बाद वे पूबोल महल चले गए, जहाँ गाला दफ़न हैं। 1983 में उन्होंने वहीं अपने अंतिम चित्र बनाए। 1984 में वहाँ लगी आग में वे बुरी तरह झुलसे। 1989 में फ़िगेरेस में उनका निधन हुआ।
यह उसी सार्वजनिक जीवन-वृत्त के साथ कुंडली का पाठ है, यह दावा नहीं कि उनका जीवन कुंडली के कारण ऐसा बना।
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| ग्रह | राशि | अंश | नक्षत्र | भाव | |
|---|---|---|---|---|---|
| लग्न | मिथुन | 29.72° | पुनर्वसु, पाद 3 | 1 | |
| सूर्य | मेष | 27.69° | कृत्तिका, पाद 1 | 11 | उच्च |
| चंद्र | मीन | 9.95° | उत्तरा भाद्रपद, पाद 2 | 10 | |
| मंगल | वृषभ | 2.66° | कृत्तिका, पाद 2 | 12 | अस्त |
| बुध | वृषभ | 0.96° | कृत्तिका, पाद 2 | 12 | वक्रीअस्त |
| गुरु | मीन | 24.35° | रेवती, पाद 3 | 10 | |
| शुक्र | मेष | 12.07° | अश्विनी, पाद 4 | 11 | |
| शनि | मकर | 28.14° | धनिष्ठा, पाद 2 | 8 | |
| राहु | कन्या | 2.37° | उत्तरा फाल्गुनी, पाद 2 | 4 | वक्री |
| केतु | मीन | 2.37° | पूर्वा भाद्रपद, पाद 4 | 10 | वक्री |
ये योग दर्ज जन्म-समय पर पढ़े गए हैं। "पूरे दिन" वाले योग किसी भी समय बनते हैं।
| महादशा | आरंभ | समाप्ति |
|---|---|---|
| शनि | 11 मई 1904 | 8 दिसंबर 1913 |
| बुध | 8 दिसंबर 1913 | 8 दिसंबर 1930 |
| केतु | 8 दिसंबर 1930 | 8 दिसंबर 1937 |
| शुक्र | 8 दिसंबर 1937 | 8 दिसंबर 1957 |
| सूर्य | 8 दिसंबर 1957 | 8 दिसंबर 1963 |
| चंद्र | 8 दिसंबर 1963 | 8 दिसंबर 1973 |
| मंगल | 8 दिसंबर 1973 | 8 दिसंबर 1980 |
| राहु | 8 दिसंबर 1980 | 8 दिसंबर 1998 |
| गुरु | 8 दिसंबर 1998 | 8 दिसंबर 2014 |
महादशा एक लंबी ग्रह-अवधि है, जो कई वर्ष चलती है। अंतर्दशा उसी के भीतर की छोटी अवधि है।
| तारीख़ | घटना | महादशा | अंतर्दशा |
|---|---|---|---|
| 6 फ़रवरी 1921 | माँ फ़ेलिपा दोमेनेक का कैंसर से निधन | बुध | — |
| 14 नवंबर 1925 | बार्सिलोना की गैलरी दालमाउ में उनकी पहली एकल प्रदर्शनी शुरू | बुध | — |
| 6 जून 1929 | लुइस बुनुएल के साथ बनी उनकी फ़िल्म 'उन शियाँ आंदालू' का पेरिस में पहला प्रदर्शन | बुध | शनि |
| 28 दिसंबर 1929 | पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया | बुध | शनि |
| 30 जनवरी 1934 | पेरिस में गाला से सिविल (क़ानूनी) विवाह | केतु | राहु |
| 20 जून 1940 | बोर्दो में उन्हें और गाला को फ़्रांस छोड़ने के लिए आपात वीज़ा मिला | शुक्र | शुक्र |
| 8 अगस्त 1958 | सांत मार्ती वेल में गाला से चर्च में विवाह | सूर्य | — |
| 28 सितंबर 1974 | फ़िगेरेस में डाली थिएटर-संग्रहालय खुला | मंगल | राहु |
| 10 जून 1982 | 87 वर्ष की आयु में गाला का निधन | राहु | राहु |
| 24 जुलाई 1982 | राजा ख़ुआन कार्लोस ने उन्हें 'मार्केस दे डाली दे पूबोल' की उपाधि दी | राहु | राहु |
| 23 जनवरी 1989 | 84 वर्ष की आयु में फ़िगेरेस में हृदय गति रुकने से निधन | राहु | — |
यहाँ चार अंतर्दशाएँ खाली छोड़ी गई हैं, क्योंकि जन्म-समय 15 मिनट आगे-पीछे होने पर वे बदल जातीं।
बुध की लंबी दशा, लगभग 1914 से लगभग 1931 तक, उनकी पहली एकल प्रदर्शनी और 'उन शियाँ आंदालू' के पहले प्रदर्शन को समेटती है। इसी दशा में माँ का निधन भी आता है और वह दिन भी, जब पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया।
इस कुंडली में बुध वृषभ राशि में मंगल के ठीक पास है। बुध वक्री है, यानी उल्टी चाल से पीछे की ओर चलता दिखता है। वह अस्त भी है, यानी सूर्य के इतने पास कि उसकी चमक में बुध का बल घट जाता है।
राहु की लंबी दशा, जो लगभग 1981 में शुरू हुई, गाला के निधन और मार्केस की उपाधि को समेटती है। 1984 में पूबोल की वह आग, जिसमें वे बुरी तरह झुलसे, और जनवरी 1989 में उनका अपना निधन भी इसी दशा में आते हैं। राहु कन्या राशि में है।