लग्नेश प्रथम भाव में हो, तो कुंडली का स्वामी अपने ही घर में बैठा होता है। प्रथम भाव केंद्र भी है और त्रिकोण भी, इसलिए यह स्थिति देह, स्वभाव और आत्मविश्वास को सीधा बल देती है। व्यक्ति अपने निर्णय स्वयं लेता है और जीवन की दिशा अपने प्रयास से तय करता है।
आपका लग्नेश किस भाव में है?
जन्म तिथि, समय और स्थान भरें। आपका लग्नेश इसी भाव में हो तो आपका खंड नीचे मिलेगा।
मुफ़्त · खगोलीय गणना · लाहिरी अयनांश
लग्नेश प्रथम भाव में है, पर फल पूरी कुंडली से तय होता है।
सम्पूर्ण जन्म कुंडली रिपोर्ट आपकी कुंडली से बारहों भावेश, विंशोत्तरी दशा, योग और दोष एक साथ पढ़ती है।
बारहों लग्नों के लिए लग्नेश प्रथम भाव में
हर लग्न के लिए लग्नेश कौन है, इस भाव में वह किस राशि में पड़ता है, और वहाँ उसका बल।
| लग्न | लग्नेश | राशि | बल | दूसरा भाव |
|---|---|---|---|---|
| मेष लग्न | मंगल | मेष | स्वराशि | अष्टम भाव |
| वृषभ लग्न | शुक्र | वृषभ | स्वराशि | षष्ठ भाव |
| मिथुन लग्न | बुध | मिथुन | स्वराशि | चतुर्थ भाव |
| कर्क लग्न | चंद्र | कर्क | स्वराशि | केवल लग्न |
| सिंह लग्न | सूर्य | सिंह | स्वराशि | केवल लग्न |
| कन्या लग्न | बुध | कन्या | उच्च | दशम भाव |
| तुला लग्न | शुक्र | तुला | स्वराशि | अष्टम भाव |
| वृश्चिक लग्न | मंगल | वृश्चिक | स्वराशि | षष्ठ भाव |
| धनु लग्न | गुरु | धनु | स्वराशि | चतुर्थ भाव |
| मकर लग्न | शनि | मकर | स्वराशि | द्वितीय भाव |
| कुम्भ लग्न | शनि | कुम्भ | स्वराशि | द्वादश भाव |
| मीन लग्न | गुरु | मीन | स्वराशि | दशम भाव |
लग्नेश प्रथम भाव में: इसका अर्थ
प्रथम भाव, जिसे लग्न या तनु भाव भी कहते हैं, कुंडली का आरंभ-बिंदु है। यह शरीर की बनावट, स्वास्थ्य की मूल शक्ति, स्वभाव, रूप-रंग और संसार के सामने व्यक्ति की पहली छवि दिखाता है। लग्नेश इसी भाव का स्वामी है, यानी वह ग्रह जो पूरी कुंडली में स्वयं का प्रतिनिधि है। जब वह किसी दूसरे भाव में जाता है, तो व्यक्ति का ध्यान उस भाव के विषयों की ओर खिंचता है। प्रथम भाव में ऐसा कोई खिंचाव नहीं होता: लग्नेश अपनी ही ज़मीन पर रहता है, और जीवन की ऊर्जा व्यक्ति के अपने व्यक्तित्व, देह और निर्णयों में केंद्रित रहती है।
प्रथम भाव अकेला ऐसा भाव है जो केंद्र और त्रिकोण दोनों गिना जाता है। केंद्र कर्म और स्थिरता का, त्रिकोण भाग्य और पूर्व पुण्य का स्थान है, इसलिए यहाँ बैठा लग्नेश दोनों का लाभ देता है। एक और बात इस भाव को अलग बनाती है: लग्नेश जब प्रथम भाव में हो, तो वह हर लग्न के लिए अपनी ही राशि में होता है, और कन्या लग्न में बुध इससे भी आगे, उच्च का होता है। इसलिए बारहों लग्नों में अंतर गरिमा से कम और इस बात से अधिक आता है कि ग्रह कौन है, वह दूसरा कौन-सा भाव सँभालता है और यहाँ से किन भावों को देखता है।
मेष लग्न: मंगल मेष राशि में
स्वराशिइस लग्न के लिए शुभ
मेष लग्न का अग्नि-स्वभाव तब पूरी तरह खुलकर सामने आता है, जब उसका स्वामी मंगल स्वयं लग्न में बैठा हो। मंगल यहाँ स्वराशि में है और अपना फल बिना हिचक देता है: फुर्तीला, सुदृढ़ शरीर, सीधी बात कहने की आदत और चुनौती दिखते ही आगे बढ़ने की तत्परता। केंद्र में स्वराशि का मंगल रुचक योग बनाता है, जो साहस और नेतृत्व का पंच महापुरुष योग है। मंगल अष्टम भाव (वृश्चिक) का भी स्वामी है; लग्न में आकर वह अचानक आने वाले बदलावों को झेलने की क्षमता और गहरी खोज की रुचि देता है। यहाँ से उसकी दृष्टि चतुर्थ, सप्तम और अष्टम भाव पर है। अष्टम में वह अपनी ही राशि को देखता है, जिससे उस भाव को सहारा मिलता है; चतुर्थ और सप्तम पर उसकी दृष्टि घर और दांपत्य में अधीरता ला सकती है। प्रथम भाव का मंगल मांगलिक दोष में गिना जाता है, इसलिए विवाह के लिए जीवनसाथी की कुंडली साथ में देखें; कई परंपराएँ स्वराशि के मंगल को इस दोष से छूट भी देती हैं। गुरु की दृष्टि इस आवेग को विवेक देती है।
वृषभ लग्न: शुक्र वृषभ राशि में
स्वराशिइस लग्न के लिए शुभ
ठहरी हुई सुंदरता उस वृषभ लग्न वाले की पहली पहचान है, जिसका शुक्र लग्न में ही बैठा हो। शुक्र यहाँ स्वराशि में है, और वृषभ स्थिर राशि है; इसलिए आकर्षण के साथ धैर्य भी आता है। ऐसा व्यक्ति जल्दी फ़ैसला नहीं करता, पर एक बार जो थाम ले उसे आसानी से नहीं छोड़ता। अच्छा भोजन, संगीत और सजा हुआ घर उसे विलासिता नहीं, ज़रूरत लगते हैं। सुख, कला और वैभव का मालव्य योग भी यहीं बनता है, क्योंकि केंद्र में शुक्र अपनी राशि में है। शुक्र षष्ठ भाव (तुला) का भी स्वामी है, इसलिए दिनचर्या, नौकरी और सेवा के विषय भी स्वभाव में घुल जाते हैं: काम में सलीका रहता है, पर स्वाद और आराम की अधिकता स्वास्थ्य पर भारी पड़ सकती है। काल-पुरुष में वृषभ मुख और कंठ की राशि है, सो वाणी मीठी रहती है; ज्योतिषीय संकेत के रूप में कंठ का ध्यान रखें। लग्न से शुक्र सप्तम भाव (वृश्चिक) को देखता है, जिससे दांपत्य में गहरा आकर्षण रहता है। शुक्र अस्त हो या राहु-मंगल से पीड़ित हो, तो यह सहजता घटती है; शुक्र की दशा में फल सबसे खुलकर मिलता है।
मिथुन लग्न: बुध मिथुन राशि में
स्वराशिइस लग्न के लिए शुभ
सबसे पहले मन की गति दिखती है, जब मिथुन लग्न का स्वामी बुध लग्न में ही बैठा हो। बुध यहाँ स्वराशि में है, और प्रथम भाव में उसे दिग्बल भी मिलता है, यानी दिशा का पूरा बल। ऐसा व्यक्ति जिज्ञासु, बातचीत में चतुर और एक साथ कई काम सँभालने वाला होता है; अपनी उम्र से कम दिखना भी इस स्थिति का पारंपरिक लक्षण है। स्वराशि और केंद्र, इन दोनों के मेल से भद्र योग बनता है, जिसकी पहचान बुद्धि, वाणी और व्यापार-कौशल है। बुध चतुर्थ भाव (कन्या) का भी स्वामी है, इसलिए घर, माता, शिक्षा और संपत्ति का सुख व्यक्ति की अपनी समझ और मेहनत से जुड़ जाता है; पढ़ाई प्रायः अच्छी रहती है। लग्न से बुध की दृष्टि सप्तम भाव (धनु) पर है, जो गुरु की राशि है; जीवनसाथी विद्वान या सिद्धांतों वाला हो सकता है, और व्यापार में साझेदारी लाभ देती है। ध्यान रहे, बुध सूर्य के बहुत पास रहता है और जल्दी अस्त हो जाता है; अस्त या राहु से पीड़ित बुध बेचैनी और बिखरा ध्यान दे सकता है। बुध की दशा में यह स्थिति सबसे सक्रिय रहती है।
कर्क लग्न: चंद्र कर्क राशि में
स्वराशिइस लग्न के लिए शुभ
कर्क लग्न की कुंडली में चंद्रमा लग्न में ही हो, तो व्यक्ति की पहचान उसके मन से बनती है। चंद्रमा यहाँ स्वराशि में है और केवल लग्न का स्वामी है, इसलिए उसका पूरा फल स्वभाव, भावनाओं और शरीर पर ही केंद्रित रहता है। ऐसा व्यक्ति संवेदनशील, दूसरों की देखभाल करने वाला और परिवार से गहराई से बँधा होता है। चर लग्न होने से मन जल्दी बदलता है, और यह बदलाव चंद्रमा की कलाओं जैसा ही होता है: कभी उत्साह, कभी भीतर सिमटने की इच्छा। इसलिए यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न चंद्रमा का पक्ष-बल है, यानी जन्म के समय चंद्रमा कितना प्रकाशित था। पूर्णिमा के पास का बली चंद्रमा इस स्थिति को उदार और स्थिर बनाता है; अमावस्या के पास का क्षीण चंद्रमा उतना सहारा नहीं दे पाता। लग्न से चंद्रमा सप्तम भाव (मकर) को देखता है, जो शनि की राशि है; भावुक व्यक्ति को व्यावहारिक, गंभीर जीवनसाथी मिलना यहाँ आम है, और दोनों का संतुलन रिश्ते की ताक़त बनता है। शनि या राहु की युति चिंता बढ़ा सकती है, जबकि गुरु की दृष्टि मन को धीरज देती है।
सिंह लग्न: सूर्य सिंह राशि में
स्वराशिइस लग्न के लिए शुभ
सिंह लग्न का सूर्य जब लग्न में ही हो, तो कुंडली का केंद्र और उसका स्वामी एक ही जगह मिल जाते हैं। स्वराशि का सूर्य किसी दूसरे भाव का भार नहीं उठाता; उसकी पूरी शक्ति आत्मबल, प्रतिष्ठा और शारीरिक ऊर्जा में लगती है। ऐसा व्यक्ति स्वाभिमानी होता है और ज़िम्मेदारी लेने से नहीं हिचकता। सिद्धांतों पर टिके रहना उसकी ताक़त है; सलाह सुनने में कठिनाई और अपनी बात को ही अंतिम मानने की प्रवृत्ति इसी ताक़त का दूसरा पहलू है। सूर्य पिता और सत्ता का कारक है, सो पिता का प्रभाव और नेतृत्व की भूमिकाएँ जीवन में बड़ी जगह लेती हैं। सिंह को काल-पुरुष का हृदय माना गया है; बली सूर्य अच्छी जीवन-शक्ति देता है, और इसी संकेत से हृदय की सेहत पर नियमित ध्यान देना समझदारी है। लग्न से सूर्य सप्तम भाव (कुम्भ) को देखता है, जो उसके शत्रु शनि की राशि है; दांपत्य में अहं टकरा सकता है, और जीवनसाथी स्वतंत्र विचारों वाला हो सकता है। शनि या राहु की युति इस तेज को ढक सकती है; सूर्य की दशा में यह स्थिति अपना सबसे स्पष्ट रूप दिखाती है।
कन्या लग्न: बुध कन्या राशि में
उच्चइस लग्न के लिए शुभ
बारहों लग्नों में केवल कन्या लग्न ऐसा है, जहाँ लग्नेश प्रथम भाव में उच्च का होता है। कन्या बुध की उच्च राशि भी है और उसकी अपनी राशि भी, इसलिए बुध यहाँ पूरी शक्ति में है, और प्रथम भाव में उसे दिग्बल भी मिलता है। केंद्र में उच्च का बुध भद्र योग बनाता है। फल है सूक्ष्म बुद्धि, विश्लेषण की आदत, भाषा पर अधिकार और हर काम को ठीक ढंग से करने का आग्रह। बुध यहाँ दशम भाव (मिथुन) का भी स्वामी है, यानी लग्नेश और कर्मेश एक ही ग्रह है, और वह लग्न में बैठा है: व्यक्ति की पहचान उसके काम से बनती है। लेखा, लेखन, संपादन, चिकित्सा और परामर्श उसके स्वाभाविक क्षेत्र हैं। लग्न से बुध सप्तम भाव (मीन) को देखता है, जो उसकी नीच राशि है; जीवनसाथी भावुक और कल्पनाशील हो सकता है, और अपनी बारीक परख को रिश्ते में आलोचना न बनने दें। अस्त बुध या मंगल-राहु की पीड़ा इस बुद्धि को अति-चिंता की ओर मोड़ सकती है; बुध की दशा में यह योग सबसे अधिक फल देता है।
तुला लग्न: शुक्र तुला राशि में
स्वराशिइस लग्न के लिए शुभ
तुला लग्न का शुक्र लग्न में हो, तो व्यक्तित्व में संतुलन और शिष्टता सबसे पहले दिखते हैं। शुक्र यहाँ स्वराशि में है, और केंद्र में ऐसा शुक्र मालव्य योग बनाता है, जो कला, सौंदर्य-बोध और सुख-साधनों से जुड़ा है। तुला चर राशि है, इसलिए यह शुक्र केवल आराम तक सीमित नहीं रहता: मेल-जोल, सामाजिक संबंध और लोगों को जोड़ने का काम इस व्यक्ति को स्वाभाविक लगता है। न्याय-प्रियता और बीच का रास्ता खोजने की आदत इसकी पहचान है। शुक्र अष्टम भाव (वृषभ) का भी स्वामी है, इसलिए सहज और सुघड़ व्यक्तित्व के नीचे एक गहरा, निजी पक्ष भी रहता है: गूढ़ विषयों में रुचि, ससुराल पक्ष या विरासत से जुड़े मामले, और जीवन में अचानक आने वाले मोड़। लग्न का स्वामी होने के कारण अष्टम का स्वामित्व यहाँ बड़ा दोष नहीं बनता। लग्न से शुक्र सप्तम भाव (मेष) को देखता है, जो मंगल की राशि है; ऊर्जावान, स्पष्टवादी जीवनसाथी की ओर आकर्षण रहता है। शुक्र अस्त हो या पाप ग्रहों से घिरा हो, तो संतुलन झिझक में बदल सकता है; शुक्र की दशा में इसका फल सबसे साफ़ दिखता है।
वृश्चिक लग्न: मंगल वृश्चिक राशि में
स्वराशिइस लग्न के लिए सम
वृश्चिक लग्न का स्वामी भी मंगल ही है, पर लग्न में बैठकर वह मेष से बिलकुल अलग रूप दिखाता है: ऊर्जा बाहर कम, भीतर अधिक। मंगल यहाँ स्वराशि में है, किंतु वृश्चिक जल तत्त्व की स्थिर राशि है, इसलिए खुला आवेग नहीं, बल्कि गहरा संकल्प और सहनशक्ति मिलती है। केंद्र में स्वराशि का मंगल यहाँ भी रुचक योग बनाता है। व्यक्ति देर से भरोसा करता है, पर निभाता अंत तक है। मंगल षष्ठ भाव (मेष) का भी स्वामी है, और इसी कारण इस लग्न के लिए उसकी भूमिका शुभ नहीं, सम मानी गई है: लग्नेश होना शुभ है, षष्ठ का स्वामी होना संघर्ष लाता है। व्यवहार में इसका अर्थ है विरोधियों से निपटने की अच्छी क्षमता, साथ ही स्वास्थ्य और विवादों के प्रति सजगता। यहाँ से मंगल चतुर्थ (कुम्भ), सप्तम (वृषभ) और अष्टम (मिथुन) भाव को देखता है: घर में अनुशासन, दांपत्य में प्रबल भावनाएँ, और शोध या गूढ़ विद्याओं में रुचि। कुंडली-मिलान में यह स्थिति मांगलिक दोष के अंतर्गत देखी जाती है, इसलिए निष्कर्ष दोनों कुंडलियों को साथ रखकर ही निकालें। गुरु की दृष्टि और मंगल की दशा तय करती हैं कि यह ऊर्जा किस ओर बहेगी।
धनु लग्न: गुरु धनु राशि में
स्वराशिइस लग्न के लिए शुभ
जिस धनु लग्न वाले का गुरु लग्न में हो, उसमें आशा, उदारता और सिद्धांतों के प्रति निष्ठा साफ़ दिखती हैं। गुरु यहाँ स्वराशि में है और प्रथम भाव में उसे दिग्बल भी प्राप्त है; साथ ही केंद्र में स्वराशि होने से ज्ञान और सदाचार देने वाला हंस योग भी बनता है। ऐसा व्यक्ति स्वभाव से शिक्षक या सलाहकार होता है, और धर्म, दर्शन या कानून में उसकी सहज रुचि रहती है। गुरु चतुर्थ भाव (मीन) का भी स्वामी है, इसलिए घर, माता, वाहन और मन की शांति अच्छी रहती है। यहाँ से गुरु पंचम (मेष), सप्तम (मिथुन) और नवम (सिंह) भाव को देखता है। पंचम और नवम दोनों त्रिकोण हैं, सो संतान, बुद्धि, भाग्य और पिता के विषयों को इस दृष्टि का सीधा लाभ मिलता है; सप्तम पर दृष्टि जीवनसाथी के साथ परस्पर सम्मान देती है। गुरु राहु के साथ हो या वक्री होकर पीड़ित हो, तो आत्मविश्वास अति-विश्वास बन सकता है, और भोजन में संयम पर ध्यान देना पड़ता है। गुरु की दशा इस स्थिति का सबसे अच्छा समय है।
मकर लग्न: शनि मकर राशि में
स्वराशिइस लग्न के लिए शुभ
शनि अपने ही लग्न मकर में बैठा हो, तो व्यक्तित्व की नींव धैर्य और कर्तव्य पर रखी जाती है। स्वराशि का यह शनि केंद्र में है, सो शश योग बनता है; अनुशासन और अधिकार इस योग के मुख्य गुण हैं। ऐसा व्यक्ति गंभीर, व्यावहारिक और लंबी योजना बनाकर चलने वाला होता है; उसकी सफलता धीरे आती है, पर टिकाऊ होती है। दिग्बल के नियम से शनि प्रथम भाव में सबसे कमज़ोर और सप्तम में सबसे बली माना जाता है, इसलिए यहाँ राशि का बल तो पूरा है, दिशा का बल कम। शनि द्वितीय भाव (कुम्भ) का भी स्वामी है, सो धन, परिवार और वाणी पर भी उसकी छाप रहती है: संचय की आदत, नपी-तुली बात और परिवार के प्रति ज़िम्मेदारी। यहाँ से शनि तृतीय (मीन), सप्तम (कर्क) और दशम (तुला) भाव को देखता है। दशम में तुला उसकी उच्च राशि है, इसलिए कर्म-क्षेत्र पर यह दृष्टि विशेष रूप से सहायक है; सप्तम पर दृष्टि विवाह में परिपक्वता और कभी-कभी देरी लाती है। मंगल या राहु की युति कठोरता बढ़ा सकती है; शनि की दशा परिश्रम का पूरा प्रतिफल देती है।
कुम्भ लग्न: शनि कुम्भ राशि में
स्वराशिइस लग्न के लिए शुभ
अपने ढंग से सोचने वाला, शांत और कुछ अलग-थलग: कुम्भ लग्न में लग्न का शनि ऐसा ही व्यक्तित्व देता है। शनि यहाँ स्वराशि में है, और मकर की तरह यहाँ भी वह शश योग बनाता है; पर पद और व्यवस्था पर नहीं, बल्कि विचार, समाज और बड़े समूहों के हित पर इसका ज़ोर रहता है। ऐसा व्यक्ति भीड़ की राय से नहीं, तर्क से चलता है। शनि द्वादश भाव (मकर) का भी स्वामी है, इसलिए एकांत, अध्यात्म, विदेश और खर्च के विषय भी स्वभाव का हिस्सा बनते हैं: अकेले काम करना अच्छा लगता है, और दूर देशों से जुड़ाव संभव है। यहाँ से शनि तृतीय (मेष), सप्तम (सिंह) और दशम (वृश्चिक) भाव को देखता है। सप्तम में सूर्य की राशि है, जो शनि का शत्रु है, इसलिए दांपत्य में अपनापन सचेत होकर व्यक्त करना ज़रूरी हो जाता है; दशम पर दृष्टि शोध, तकनीक या संस्थागत काम में स्थिरता देती है। सूर्य की युति या राहु-मंगल की पीड़ा इस शांति को रूखेपन में बदल सकती है; शनि की दशा में व्यक्ति अपनी असली राह पाता है।
मीन लग्न: गुरु मीन राशि में
स्वराशिइस लग्न के लिए शुभ
करुणा, कल्पना और आस्था एक साथ मिलती हैं, जब मीन लग्न का स्वामी गुरु लग्न में ही बैठा हो। गुरु यहाँ स्वराशि में है, प्रथम भाव में उसे दिग्बल भी मिलता है, और केंद्र में स्वराशि का गुरु हंस योग बनाता है। धनु के गुरु की तुलना में यहाँ उपदेश कम, दूसरों का दुःख समझने का भाव अधिक है। दशम भाव (धनु) भी गुरु का ही है, सो कर्म का स्वामी स्वयं देह के भाव में बैठा है: व्यक्ति का काम उसकी आस्थाओं से अलग नहीं रहता। शिक्षा, परामर्श, चिकित्सा और आध्यात्मिक मार्गदर्शन इस मेल के अनुकूल हैं। यहाँ से गुरु पंचम (कर्क), सप्तम (कन्या) और नवम (वृश्चिक) भाव को देखता है। पंचम में कर्क गुरु की उच्च राशि है, इसलिए संतान, विद्या और रचनात्मकता पर यह दृष्टि बहुत शुभ मानी जाती है; नवम पर दृष्टि भाग्य और गुरुजनों का सहयोग देती है, और सप्तम की दृष्टि से व्यावहारिक, सहयोगी जीवनसाथी का संकेत मिलता है। गुरु पीड़ित हो, तो उदारता सीमा से आगे जा सकती है, और लोग इसका लाभ उठा सकते हैं; निष्कर्ष गुरु के बल और दशा को देखकर ही निकालें।
कब यह स्थिति साथ देती है
यह स्थिति सबसे अधिक तब खिलती है जब लग्नेश अस्त या पीड़ित न हो और उस पर गुरु, बली चंद्रमा या शुभ बुध की दृष्टि हो। कर्क और सिंह को छोड़कर बाक़ी दस लग्नों में यहाँ पंच महापुरुष योग बनता है, जो ग्रह के निर्दोष रहने पर व्यक्ति को अपने क्षेत्र में विशिष्ट बना सकता है। बुध और गुरु के लग्नों में दिग्बल इस बल को और बढ़ाता है। नवांश कुंडली में भी लग्नेश अच्छी स्थिति में हो, तो जन्म कुंडली का यह वादा पक्का माना जाता है। समय की दृष्टि से लग्नेश की महादशा या अंतर्दशा में स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और अपनी पहचान बनाने के प्रयास सबसे अच्छा फल देते हैं।
कब यह स्थिति कसौटी बनती है
लग्नेश अपनी राशि में होकर भी दबाव में आ सकता है। सूर्य के बहुत निकट होने से अस्त लग्नेश अपना पूरा फल नहीं दे पाता; यह बात बुध और शुक्र पर अधिक लागू होती है, जो प्रायः सूर्य के आस-पास रहते हैं। लग्न में शनि, राहु या केतु की युति, या लग्नेश पर पाप ग्रहों की दृष्टि, स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव और स्वभाव में कठोरता या बेचैनी ला सकती है। एक सूक्ष्म जोखिम भी है: सब कुछ अकेले करने का आग्रह, जो कभी-कभी दूसरों की मदद लेने से रोक देता है। ये संकेत स्थायी नहीं हैं; शुभ दृष्टि, नवांश में लग्नेश का बल और अनुकूल दशा इन्हें बहुत कुछ सँभाल लेते हैं।
बारहों भावों में लग्नेश
जिन भावों का पृष्ठ अभी नहीं आया, उनका सार लग्नेश पृष्ठ पर है।
अपना लग्न जानें
जन्म तिथि, समय और स्थान से लग्न, लग्नेश, नवांश लग्न और चंद्र लग्न एक साथ।
लग्न कैलकुलेटरअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
लग्नेश प्रथम भाव में हो तो क्या होता है?
कुंडली का स्वामी अपने ही भाव में होता है, इसलिए व्यक्ति का ध्यान अपने शरीर, स्वभाव और निर्णयों पर केंद्रित रहता है। प्रथम भाव केंद्र और त्रिकोण दोनों है, अतः यह स्थिति सामान्यतः बलवान मानी जाती है। फल का स्वर इस पर निर्भर करता है कि लग्नेश कौन-सा ग्रह है, वह दूसरा कौन-सा भाव सँभालता है और उस पर किन ग्रहों की दृष्टि है।
क्या लग्नेश प्रथम भाव में शुभ है?
हाँ, सामान्य नियम से यह लग्नेश की सबसे सहज स्थितियों में से एक है, क्योंकि यहाँ वह हर लग्न में अपनी राशि में होता है। फिर भी अस्त होना, पाप ग्रहों की युति या दृष्टि, और नवांश में कमज़ोरी इस शुभता को घटा सकते हैं। इसलिए केवल भाव देखकर नहीं, ग्रह का पूरा बल देखकर निष्कर्ष निकालें।
किस लग्न के लिए लग्नेश प्रथम भाव में सबसे अच्छा है?
गरिमा के हिसाब से कन्या लग्न, क्योंकि वहाँ बुध लग्न में उच्च का होता है, उसे दिग्बल मिलता है और वह भद्र योग बनाता है। मिथुन, धनु और मीन लग्न भी विशेष हैं, क्योंकि बुध और गुरु को प्रथम भाव में दिग्बल मिलता है। बाक़ी सभी लग्नों में लग्नेश स्वराशि में होता है, और कर्क तथा सिंह को छोड़कर हर लग्न में यह पंच महापुरुष योग भी बनाता है।
क्या लग्नेश लग्न में हो तो पंच महापुरुष योग बनता है?
मंगल, बुध, गुरु, शुक्र या शनि जब अपनी या उच्च राशि में केंद्र में हों, तब पंच महापुरुष योग बनता है। प्रथम भाव में लग्नेश अपनी राशि में होता है, इसलिए मेष और वृश्चिक में रुचक, वृषभ और तुला में मालव्य, मिथुन और कन्या में भद्र, धनु और मीन में हंस, तथा मकर और कुम्भ में शश योग बनता है। सूर्य और चंद्रमा इस योग में नहीं गिने जाते, इसलिए सिंह और कर्क लग्न में यह नहीं बनता। ग्रह अस्त या पीड़ित हो, तो योग का फल घटता है।
मेष या वृश्चिक लग्न में मंगल लग्न में हो तो क्या मांगलिक दोष है?
प्रथम भाव का मंगल मांगलिक दोष में गिना जाता है, इसलिए विवाह के समय दोनों कुंडलियाँ साथ में देखें। कई परंपराएँ स्वराशि के मंगल को इस दोष से छूट देती हैं, और जीवनसाथी की कुंडली में भी ऐसा ही मंगल हो, तो दोष संतुलित माना जाता है। यह किसी अनहोनी का संकेत नहीं, केवल कुंडली-मिलान का एक बिंदु है।