लग्नेश सप्तम भाव में हो तो जीवन का केंद्र स्वयं से हटकर साथी, साझेदार और समाज की ओर चला जाता है। विवाह, व्यापारिक साझेदारी और लोगों से व्यवहार जीवन की धुरी बनते हैं। सप्तम से लग्नेश सीधे लग्न को देखता है, इसलिए दूसरों से जुड़कर ही व्यक्ति स्वयं को पहचानता है। फल लग्नेश की राशि और बल पर टिका है।
आपका लग्नेश किस भाव में है?
जन्म तिथि, समय और स्थान भरें। आपका लग्नेश इसी भाव में हो तो आपका खंड नीचे मिलेगा।
मुफ़्त · खगोलीय गणना · लाहिरी अयनांश
कुंडली मिलान
लग्नेश सप्तम भाव में हो तो विवाह जीवन का केंद्र बनता है। इसे जीवनसाथी की कुंडली के साथ पढ़ें।
अष्टकूट गुण मिलान और मांगलिक जाँच, मुफ़्त।
बारहों लग्नों के लिए लग्नेश सप्तम भाव में
हर लग्न के लिए लग्नेश कौन है, इस भाव में वह किस राशि में पड़ता है, और वहाँ उसका बल।
| लग्न | लग्नेश | राशि | बल | दूसरा भाव |
|---|---|---|---|---|
| मेष लग्न | मंगल | तुला | सम राशि | अष्टम भाव |
| वृषभ लग्न | शुक्र | वृश्चिक | सम राशि | षष्ठ भाव |
| मिथुन लग्न | बुध | धनु | सम राशि | चतुर्थ भाव |
| कर्क लग्न | चंद्र | मकर | सम राशि | केवल लग्न |
| सिंह लग्न | सूर्य | कुम्भ | शत्रु राशि | केवल लग्न |
| कन्या लग्न | बुध | मीन | नीच | दशम भाव |
| तुला लग्न | शुक्र | मेष | सम राशि | अष्टम भाव |
| वृश्चिक लग्न | मंगल | वृषभ | सम राशि | षष्ठ भाव |
| धनु लग्न | गुरु | मिथुन | शत्रु राशि | चतुर्थ भाव |
| मकर लग्न | शनि | कर्क | शत्रु राशि | द्वितीय भाव |
| कुम्भ लग्न | शनि | सिंह | शत्रु राशि | द्वादश भाव |
| मीन लग्न | गुरु | कन्या | शत्रु राशि | दशम भाव |
लग्नेश सप्तम भाव में: इसका अर्थ
सप्तम भाव कुंडली में लग्न के ठीक सामने पड़ता है। लग्न ‘मैं’ है, तो सप्तम ‘दूसरा’: जीवनसाथी, व्यापार का साझेदार, अनुबंध का दूसरा पक्ष, और वह जनता जिससे व्यक्ति का रोज़ का लेन-देन होता है। जब लग्नेश, यानी शरीर, स्वभाव और जीवन की दिशा का स्वामी, इस भाव में जा बैठता है, तो व्यक्ति की ऊर्जा का बड़ा भाग संबंधों में लगता है। ऐसे लोग अकेले चलने के बजाय किसी के साथ मिलकर काम करना पसंद करते हैं, और उनके निर्णयों पर साथी की राय का असर साफ़ दिखता है। सप्तम में बैठा हर ग्रह अपनी सप्तम दृष्टि से लग्न को देखता है, इसलिए यहाँ लग्नेश अपने ही भाव पर नज़र रखे रहता है; यह आत्मबल को सहारा देने वाली बात है।
सप्तम भाव केंद्र है, यानी कुंडली के चार स्तंभों में से एक। केंद्र में बैठा लग्नेश सक्रिय और दृश्य रहता है; उसका फल जीवन में खुलकर सामने आता है, छिपा नहीं रहता। साथ ही सप्तम मारक भाव भी है। इसका अर्थ भय नहीं है: मारक भाव केवल उन अवधियों को चिह्नित करता है जब स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान देना उचित हो, विशेषकर जब लग्नेश दुर्बल हो और उसकी दशा चल रही हो। सप्तम कामनाओं का भाव भी है, इसलिए यहाँ लग्नेश व्यक्ति को सांसारिक जीवन, व्यापार और सामाजिक मेलजोल में रमाता है। विवाह का समय और स्वरूप जानने के लिए सप्तम भाव, उसके स्वामी, शुक्र या गुरु और नवांश को एक साथ पढ़ना होता है; अकेला लग्नेश पूरी कहानी नहीं कहता।
मेष लग्न: मंगल तुला राशि में
सम राशिइस लग्न के लिए शुभ
मेष लग्न में मंगल सप्तम भाव में तुला राशि में आता है। तुला शुक्र की राशि है और मंगल के लिए सम, न मित्र की न शत्रु की; इसलिए यहाँ राशि उसका फल न बढ़ाती है, न घटाती है, बल्कि मंगल का अपना बल और उसके साथ बैठे ग्रह फल तय करते हैं। मंगल इस लग्न के लिए अष्टम का भी स्वामी है, इसलिए साझेदारी में अचानक मोड़, साझा धन या ससुराल से जुड़े विषय भी इसी स्थिति से जुड़ जाते हैं। सप्तम से मंगल तीन भावों को देखता है: दशम को, जिसमें उसकी उच्च राशि मकर है; लग्न को, जो उसकी अपनी राशि है; और द्वितीय को। ऐसा व्यक्ति साथी के प्रति उत्साही और रक्षक होता है, पर बहस में जल्दी गरम भी हो सकता है। मंगल का सप्तम में होना मांगलिक दोष की गिनती में आता है। इसे अकेले न पढ़ें, साथी की कुंडली के साथ मिलाकर देखें, क्योंकि कई स्थितियों में इसका प्रभाव संतुलित हो जाता है। मंगल की दशा में विवाह और साझेदारी के निर्णय तेज़ी से आगे बढ़ते हैं; धैर्य उनकी गुणवत्ता तय करता है।
वृषभ लग्न: शुक्र वृश्चिक राशि में
सम राशिइस लग्न के लिए शुभ
वृषभ लग्न के लिए शुक्र लग्नेश है, और सप्तम भाव में वह वृश्चिक राशि में बैठता है। वृश्चिक मंगल की राशि है, जहाँ शुक्र सम रहता है: न उसे विशेष सहारा मिलता है, न विरोध। शुक्र स्वयं विवाह का नैसर्गिक कारक है, इसलिए यहाँ कारक और भाव एक हो जाते हैं। पारंपरिक मत है कि कारक अपने ही भाव में हो तो उस भाव के फल सहजता से नहीं मिलते, उन पर अतिरिक्त ध्यान देना पड़ता है; यहाँ यह रिश्ते से ऊँची अपेक्षाओं, गहरे आकर्षण और तीव्रता के रूप में दिखता है। शुक्र षष्ठ का भी स्वामी है, अतः साथी के साथ काम, सेवा या दिनचर्या साझा होती है, और कभी-कभी छोटे विवाद भी रिश्ते में आ जाते हैं। सप्तम से शुक्र अपनी ही राशि वृषभ, यानी लग्न, को देखता है; यह दृष्टि व्यक्ति के आकर्षण और आत्मविश्वास को बढ़ाती है। ऐसा जातक साथी के प्रति समर्पित होता है और रिश्ते में सुविधा से अधिक गहराई चाहता है। शुक्र की दशा में संबंध प्रमुख रहते हैं; वृश्चिक के स्वामी मंगल की स्थिति बताती है कि यह तीव्रता सुख देगी या खिंचाव।
मिथुन लग्न: बुध धनु राशि में
सम राशिइस लग्न के लिए शुभ
मिथुन लग्न का स्वामी बुध सप्तम भाव में धनु राशि में पहुँचता है। धनु गुरु की राशि है और बुध के लिए सम, इसलिए यहाँ उसका स्वभाव बना रहता है, पर उसकी तेज़ बुद्धि को गुरु की राशि का गंभीर, सिद्धांतप्रिय रंग मिल जाता है। बुध चतुर्थ का भी स्वामी है, यानी दो केंद्रों का स्वामी तीसरे केंद्र में बैठा है। घर, माता और संपत्ति के विषय इस तरह विवाह से जुड़ जाते हैं: साथी के आने से घर का वातावरण बदलता है, या संपत्ति का कोई काम साझेदारी में होता है। सप्तम से बुध लग्न को देखता है, इसलिए व्यक्ति बातचीत में सधा हुआ और लोगों से व्यवहार में कुशल रहता है। व्यापार, परामर्श, लेखन या शिक्षण में साझेदारी ऐसे व्यक्ति के लिए विशेष रूप से अनुकूल है, और जीवनसाथी अक्सर पढ़ा-लिखा या विचारशील होता है। एक बात ध्यान में रखें: दिशा-बल के हिसाब से बुध प्रथम भाव में सबसे बली और सप्तम में सबसे दुर्बल माना जाता है। इसलिए गुरु का बल और बुध की दशा ही बताते हैं कि यह योग कितना खुलकर फल देगा।
कर्क लग्न: चंद्र मकर राशि में
सम राशिइस लग्न के लिए शुभ
कर्क लग्न का चंद्रमा जब सप्तम भाव में मकर राशि में हो, तो मन का केंद्र साथी बन जाता है। चंद्रमा केवल कर्क का स्वामी है, इसलिए यहाँ किसी दूसरे भाव का विषय नहीं जुड़ता; जो कुछ फल है, वह सीधे स्वयं, मन और संबंध के बीच का है। चंद्रमा मकर के स्वामी शनि को न मित्र मानता है, न शत्रु। शनि की राशि भावनाओं को संयम और ज़िम्मेदारी देती है: ऐसा व्यक्ति रिश्ते में भरोसा, स्थिरता और निभाने वाला साथी खोजता है, क्षणिक उत्साह नहीं। सप्तम से चंद्रमा अपनी ही राशि, यानी लग्न, को देखता है, इसलिए दूसरों की प्रतिक्रिया का असर व्यक्ति के मन और स्वास्थ्य दोनों पर साफ़ पड़ता है। जनता से जुड़े काम, सेवा क्षेत्र या ऐसा व्यवसाय जिसमें लोगों से रोज़ मिलना हो, अच्छे परिणाम दे सकते हैं। चंद्रमा का बल उसके पक्ष, यानी शुक्ल या कृष्ण पक्ष, से भी तय होता है: बढ़ता चंद्र इस योग को अधिक सहज बनाता है। साथ ही शनि की स्थिति देखें, क्योंकि मकर का स्वामी होने से वही तय करता है कि यह गंभीरता सहारा बनेगी या दूरी।
सिंह लग्न: सूर्य कुम्भ राशि में
शत्रु राशिइस लग्न के लिए शुभ
सिंह लग्न के लिए सप्तम भाव कुम्भ है, और लग्नेश सूर्य यहाँ अपने शत्रु शनि की राशि में बैठता है। ऐसे में सूर्य को अपना काम करते हुए बार-बार परिस्थितियों से समझौता करना पड़ता है। सिंह के अलावा सूर्य किसी भाव का स्वामी नहीं, सो यहाँ पूरा प्रश्न आत्म-सम्मान और साझेदारी के संतुलन का बन जाता है। सिंह लग्न का व्यक्ति स्वभाव से नेतृत्व चाहता है, जबकि कुम्भ का सप्तम ऐसा साथी देता है जिसके विचार और नियम उसके अपने हों और जिसे स्वतंत्रता प्रिय हो। इसलिए रिश्ते में अहं की टकराहट की संभावना रहती है, विशेषकर जब दोनों अपनी बात पर अड़ जाएँ। सप्तम से सूर्य अपनी ही राशि, यानी लग्न, को देखता है, जिससे व्यक्ति की उपस्थिति और प्रतिष्ठा बनी रहती है। सरकारी अनुबंध, सार्वजनिक भूमिका या किसी संस्था के साथ साझेदारी यहाँ अच्छी चलती है। शनि की स्थिति इस योग की कुंजी है; बली और शुभ दृष्टि वाला शनि इस खिंचाव को परिपक्व सहयोग में बदल सकता है।
कन्या लग्न: बुध मीन राशि में
नीचइस लग्न के लिए शुभ
कन्या लग्न के लिए यह स्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय है: बुध सप्तम भाव में मीन राशि में आता है, जो उसकी नीच राशि है। नीच राशि में ग्रह का स्वाभाविक गुण दब जाता है। कन्या का बुध हिसाब, विश्लेषण और बारीकी से चलता है, पर मीन में वही बुध तर्क से अधिक भावना और अंतर्ज्ञान पर भरोसा करने लगता है। संबंधों में इसका अर्थ है कि व्यक्ति साथी पर बहुत निर्भर हो सकता है, या समझौते की शर्तें ठीक से परखे बिना हाँ कह सकता है। बुध दशम का भी स्वामी है, इसलिए करियर और साझेदारी गहराई से जुड़ते हैं; कई बार काम का रास्ता साथी या किसी साझा उद्यम से खुलता है। सप्तम से बुध लग्न को देखता है, जो उसकी अपनी और उच्च राशि दोनों है, और यह दृष्टि आत्म-छवि को सहारा देती है। मीन का स्वामी गुरु यदि लग्न या चंद्रमा से केंद्र में बली हो, तो पारंपरिक नियम के अनुसार नीचभंग होता है और दुर्बलता काफ़ी हद तक सँभल जाती है। नवांश में बुध की स्थिति भी अवश्य देखें।
तुला लग्न: शुक्र मेष राशि में
सम राशिइस लग्न के लिए शुभ
तुला लग्न में शुक्र अपनी ही राशि के ठीक सामने, मेष में, सप्तम भाव में बैठता है। मेष मंगल की राशि है और शुक्र के लिए सम; यहाँ शुक्र की कोमलता को मंगल की राशि का साहस और जल्दबाज़ी मिलती है। परिणाम यह कि आकर्षण तुरंत जागता है, और व्यक्ति रिश्ते में पहल करने से हिचकता नहीं। तुला लग्न स्वभाव से संतुलन और सामंजस्य चाहता है; सप्तम में लग्नेश होने से उसका पूरा जीवन-दर्शन ही ‘हम’ पर टिक जाता है। शुक्र अष्टम का भी स्वामी है, इसलिए विवाह के बाद साझा संपत्ति, ससुराल से जुड़े विषय या जीवन में कोई गहरा बदलाव इसी योग से जुड़ते हैं। सप्तम से शुक्र तुला, यानी लग्न, को देखता है, जिससे रूप, शिष्टता और लोगों को साथ लाने की क्षमता बढ़ती है। कला, डिज़ाइन, फ़ैशन या ग्राहकों से सीधे जुड़े काम में साझेदारी लाभ दे सकती है। मेष का स्वामी मंगल यदि पीड़ित हो, तो निर्णयों में उतावलापन बढ़ता है; शुक्र की दशा और मंगल का बल मिलकर फल तय करते हैं।
वृश्चिक लग्न: मंगल वृषभ राशि में
सम राशिइस लग्न के लिए सम
वृश्चिक लग्न का मंगल सप्तम भाव में वृषभ राशि में जाता है। मंगल शुक्र को सम मानता है, इसलिए इस राशि का उस पर कोई विशेष रंग नहीं चढ़ता। दोनों राशियाँ स्थिर हैं, इसलिए लग्न और सप्तम दोनों में हठ का पुट रहता है: व्यक्ति जिससे जुड़ता है, उसे पूरी निष्ठा से थामे रखता है, पर झुकना उसके लिए कठिन होता है। मंगल इस लग्न के लिए षष्ठ का भी स्वामी है, और इसी कारण कार्यात्मक रूप से उसे सम गिना जाता है, न पूर्ण शुभ, न अशुभ। षष्ठ का स्वामित्व साझेदारी में प्रतिस्पर्धा, विवाद या कानूनी मामलों की संभावना जोड़ता है, और कई बार व्यक्ति प्रतिद्वंद्वी के साथ ही सौदा करता है। सप्तम से मंगल दशम, लग्न और द्वितीय भाव को देखता है; लग्न उसकी अपनी राशि है, इसलिए शारीरिक ऊर्जा और साहस बना रहता है। सप्तम का मंगल मांगलिक दोष की गिनती में आता है, पर इसका आकलन वर और वधू दोनों की कुंडली देखकर ही करें। शुक्र का बल और मंगल की दशा बताते हैं कि यह तीव्रता रिश्ते को मज़बूत करेगी या उसमें खिंचाव लाएगी।
धनु लग्न: गुरु मिथुन राशि में
शत्रु राशिइस लग्न के लिए शुभ
धनु लग्न के स्वामी गुरु के लिए सप्तम भाव मिथुन है, यानी बुध की राशि, जिसे गुरु शत्रु मानता है। शत्रु राशि में गुरु का ज्ञान और विवेक बना रहता है, पर उसका प्रयोग बिखरने लगता है: सिद्धांत की जगह तर्क-वितर्क, और गहराई की जगह जानकारी का फैलाव। फिर भी गुरु नैसर्गिक शुभ ग्रह है, इसलिए सप्तम में उसकी उपस्थिति रिश्तों में नैतिकता और सद्भाव की इच्छा देती है। गुरु चतुर्थ का भी स्वामी है; घर, माता और मन की शांति इस तरह जीवनसाथी से गहराई से जुड़ जाते हैं। सप्तम से गुरु की तीन दृष्टियाँ हैं: पंचम दृष्टि एकादश पर, जिससे साझेदारी से लाभ के योग बनते हैं; सप्तम दृष्टि अपनी ही राशि, लग्न, पर; और नवम दृष्टि तृतीय पर, जो संवाद और साहस को बल देती है। जीवनसाथी अक्सर बातूनी, जिज्ञासु और व्यावहारिक बुद्धि वाला होता है। मिथुन का स्वामी बुध बली हो, तो यह शत्रुता नरम पड़ती है; गुरु की दशा में विवाह और घर के प्रश्न सामने आते हैं।
मकर लग्न: शनि कर्क राशि में
शत्रु राशिइस लग्न के लिए शुभ
मकर लग्न का शनि जब सप्तम भाव में कर्क राशि में हो, तो दो बातें साथ चलती हैं। एक ओर कर्क चंद्रमा की राशि है, जिसे शनि शत्रु मानता है; भावनाओं की इस राशि में शनि का रूखा अनुशासन असहज रहता है, और व्यक्ति स्नेह को शब्दों से अधिक कर्तव्य से जताता है। दूसरी ओर, सप्तम भाव में शनि को दिग्बल मिलता है, यानी दिशा के हिसाब से यही उसका सबसे बली स्थान है। इसलिए शत्रु राशि के बावजूद यहाँ शनि टिकाऊ, निभने वाले रिश्ते देता है। शनि द्वितीय का भी स्वामी है: परिवार, संचित धन और वाणी विवाह से जुड़ते हैं, और साथी से आर्थिक स्थिरता मिल सकती है। द्वितीय और सप्तम दोनों मारक भाव हैं, इसलिए शनि की दशा में स्वास्थ्य पर नियमित ध्यान देना समझदारी है। सप्तम से शनि नवम, लग्न और चतुर्थ को देखता है; अपनी राशि पर दृष्टि धैर्य और सहनशक्ति बढ़ाती है। विवाह का निर्णय अक्सर लंबे सोच-विचार के बाद होता है; चंद्रमा की स्थिति इस गंभीरता में गर्माहट जोड़ भी सकती है और घटा भी सकती है।
कुम्भ लग्न: शनि सिंह राशि में
शत्रु राशिइस लग्न के लिए शुभ
कुम्भ लग्न में शनि सप्तम भाव में सिंह राशि में बैठता है, जो सूर्य की राशि है और शनि के लिए शत्रु राशि। सूर्य और शनि का पारंपरिक वैर यहाँ रिश्ते के भीतर उतर आता है: साथी अक्सर स्वाभिमानी, प्रभावशाली या अधिकार-भाव वाला होता है, जबकि कुम्भ लग्न का व्यक्ति बराबरी और अपनी स्वतंत्रता चाहता है। इस खिंचाव को समझदारी से सँभालें, तो दोनों एक-दूसरे की कमी पूरी करते हैं। शनि द्वादश का भी स्वामी है, इसलिए विदेश, दूर स्थान, बड़े खर्च या एकांत की चाह भी विवाह और साझेदारी से जुड़ सकती है; साथी किसी दूसरे शहर या परिवेश से आ सकता है। सप्तम शनि के दिग्बल का भाव है, जो शत्रु राशि की कमी को कुछ हद तक भरता है। यहाँ से शनि तृतीय दृष्टि से नवम को देखता है, जहाँ उसकी उच्च राशि तुला है; सप्तम से अपनी राशि, यानी लग्न, को; और दशम से चतुर्थ को। सूर्य का बल इस योग में निर्णायक है; शनि की दशा संबंधों में धैर्य माँगती है और उन्हें परिपक्व भी बनाती है।
मीन लग्न: गुरु कन्या राशि में
शत्रु राशिइस लग्न के लिए शुभ
मीन लग्न में गुरु सप्तम भाव में कन्या राशि में आता है। कन्या बुध की राशि है, जिसे गुरु शत्रु मानता है, और यह गुरु की अपनी राशि मीन के ठीक सामने है। विस्तार और आस्था वाले गुरु को यहाँ कन्या की बारीकी और आलोचनात्मक दृष्टि के भीतर काम करना पड़ता है; इसलिए रिश्ते में व्यक्ति उदार रहता है, पर साथी उससे हिसाब और व्यावहारिकता की माँग करता है। गुरु दशम का भी स्वामी है, सो लग्न और कर्म, दोनों का स्वामी साझेदारी के भाव में आ बैठा है। यह विवाह और करियर को एक धागे में बाँधता है: साझेदारी में व्यापार, परामर्श, शिक्षण या ऐसा पेशा जिसमें ग्राहक से सीधा संबंध हो, यहाँ सहज रूप से उभरता है। सप्तम से गुरु एकादश, लग्न और तृतीय को देखता है। एकादश में मकर है, गुरु की नीच राशि, इसलिए लाभ की राह में संयम चाहिए; लग्न पर दृष्टि शरीर और आत्मविश्वास को सहारा देती है। बुध की स्थिति तय करती है कि साथी की सटीकता अच्छी सलाह लगेगी या टोका-टाकी, और गुरु की दशा इस प्रश्न को जीवन में सामने लाती है।
कब यह स्थिति साथ देती है
बारहों लग्नों में से किसी का भी लग्नेश सप्तम भाव में उच्च या स्वराशि का नहीं होता; इसलिए यहाँ बल राशि से कम और दूसरे कारकों से अधिक आता है। यह स्थिति सबसे अधिक तब फलती है जब लग्नेश पीड़ा-रहित हो, उस पर गुरु जैसे शुभ ग्रह की दृष्टि हो, और सप्तमेश भी अच्छी स्थिति में हो। तब व्यक्ति साझेदारी से आगे बढ़ता है, साथी से सहारा पाता है, और व्यापार में लोगों का भरोसा जीतता है। मकर और कुम्भ लग्न में शनि को यहाँ दिग्बल मिलता है, जो टिकाऊ बंधन देता है। लग्नेश की दशा या अंतर्दशा में, जब गोचर भी सप्तम भाव को सक्रिय करे, विवाह, अनुबंध और साझेदारी के निर्णय सहजता से आगे बढ़ते हैं।
कब यह स्थिति कसौटी बनती है
खिंचाव तब दिखता है जब लग्नेश सप्तम में दुर्बल हो, जैसे कन्या लग्न का नीच बुध, या पाप ग्रहों से पीड़ित हो। तब व्यक्ति अपनी पहचान साथी में खोने लगता है, निर्णयों के लिए दूसरों पर अधिक निर्भर हो जाता है, या साझेदारी में अपने हित की अनदेखी कर बैठता है। शत्रु राशि का लग्नेश रिश्ते में अहं या अपेक्षाओं की टकराहट ला सकता है। मेष और वृश्चिक लग्न में मंगल का सप्तम में होना मांगलिक विचार का विषय है, जिसे साथी की कुंडली के साथ ही तौलें। सप्तम मारक भाव भी है, इसलिए दुर्बल लग्नेश की दशा में स्वास्थ्य की नियमित देखभाल उचित है। इनमें से कोई भी बात अकेले निर्णायक नहीं; दृष्टि, नवांश और दशा मिलकर पूरा चित्र बनाते हैं।
बारहों भावों में लग्नेश
जिन भावों का पृष्ठ अभी नहीं आया, उनका सार लग्नेश पृष्ठ पर है।
अपना लग्न जानें
जन्म तिथि, समय और स्थान से लग्न, लग्नेश, नवांश लग्न और चंद्र लग्न एक साथ।
लग्न कैलकुलेटरअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
लग्नेश सप्तम भाव में हो तो क्या होता है?
जीवन का केंद्र साथी, साझेदारी और लोगों से व्यवहार बन जाता है। व्यक्ति दूसरों के साथ मिलकर बेहतर काम करता है, और सप्तम से लग्नेश की दृष्टि लग्न पर पड़ने से आत्मबल बना रहता है। फल इस पर निर्भर है कि लग्नेश किस राशि में है: छह लग्नों में वह सम राशि में, पाँच में शत्रु राशि में, और कन्या लग्न में नीच का होता है।
क्या लग्नेश सप्तम में होने से विवाह जल्दी होता है?
यह स्थिति विवाह को जीवन का बड़ा विषय बनाती है, पर कोई निश्चित आयु नहीं बताती। विवाह का समय सप्तम भाव, सप्तमेश, शुक्र या गुरु, नवांश और चल रही दशा को साथ पढ़कर आँका जाता है। लग्नेश या सप्तमेश की दशा-अंतर्दशा में, जब गोचर भी सप्तम भाव को सक्रिय करे, विवाह के योग प्रबल होते हैं।
किस लग्न के लिए लग्नेश सप्तम भाव में सबसे अच्छा है?
सप्तम में किसी भी लग्न का लग्नेश उच्च या स्वराशि का नहीं होता। मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, तुला और वृश्चिक में लग्नेश सम राशि में रहता है, इसलिए फल उसके अपने बल से तय होता है। मकर और कुम्भ में शनि शत्रु राशि में है, पर सप्तम में उसे दिग्बल मिलता है। कन्या लग्न में बुध नीच का है, इसलिए वहाँ नीचभंग की जाँच ज़रूरी है।
क्या लग्नेश सप्तम में होने से मांगलिक दोष बनता है?
केवल तब, जब लग्नेश मंगल हो, यानी मेष और वृश्चिक लग्न में। सप्तम का मंगल मांगलिक दोष की गिनती में आता है, पर इसे अकेले नहीं पढ़ा जाता; साथी की कुंडली से मिलान करने पर कई बार इसका प्रभाव संतुलित हो जाता है। बाकी दस लग्नों में लग्नेश कोई और ग्रह है, इसलिए यह प्रश्न नहीं उठता।
सप्तम मारक भाव है, तो क्या लग्नेश का यहाँ होना अशुभ है?
नहीं। सप्तम केंद्र भी है, और केंद्र में लग्नेश सक्रिय और दृश्य रहता है। मारक होने का अर्थ इतना ही है कि दुर्बल लग्नेश की दशा में स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान देना उचित है। बली लग्नेश यहाँ साझेदारी, व्यापार और सामाजिक जीवन में अच्छे फल देता है।