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लग्नेश चतुर्थ भाव में

जब लग्न का स्वामी घर और मन के भाव में बैठा हो

घर, माता और शांतिकेंद्र

लग्नेश चतुर्थ भाव में हो, तो व्यक्ति का जीवन घर, माता, अपनी ज़मीन और मन की शांति के इर्द-गिर्द घूमता है। चतुर्थ भाव केंद्र है, इसलिए यह स्थिति जीवन को टिकाव देती है। यहाँ से लग्नेश की दृष्टि सीधे दशम भाव पर पड़ती है, सो घर की जड़ें और बाहर का काम एक-दूसरे को सहारा देते हैं।

आपका लग्नेश किस भाव में है?

जन्म तिथि, समय और स्थान भरें। आपका लग्नेश इसी भाव में हो तो आपका खंड नीचे मिलेगा।

जन्म तिथि
जन्म समय

मुफ़्त · खगोलीय गणना · लाहिरी अयनांश

लग्नेश चतुर्थ भाव में है, पर फल पूरी कुंडली से तय होता है।

सम्पूर्ण जन्म कुंडली रिपोर्ट आपकी कुंडली से बारहों भावेश, विंशोत्तरी दशा, योग और दोष एक साथ पढ़ती है।

सम्पूर्ण जन्म कुंडली रिपोर्ट

बारहों लग्नों के लिए लग्नेश चतुर्थ भाव में

हर लग्न के लिए लग्नेश कौन है, इस भाव में वह किस राशि में पड़ता है, और वहाँ उसका बल।

लग्नलग्नेशराशिबलदूसरा भाव
मेष लग्नमंगलकर्कनीचअष्टम भाव
वृषभ लग्नशुक्रसिंहशत्रु राशिषष्ठ भाव
मिथुन लग्नबुधकन्याउच्चचतुर्थ भाव(यहीं)
कर्क लग्नचंद्रतुलासम राशिकेवल लग्न
सिंह लग्नसूर्यवृश्चिकमित्र राशिकेवल लग्न
कन्या लग्नबुधधनुसम राशिदशम भाव
तुला लग्नशुक्रमकरमित्र राशिअष्टम भाव
वृश्चिक लग्नमंगलकुम्भसम राशिषष्ठ भाव
धनु लग्नगुरुमीनस्वराशिचतुर्थ भाव(यहीं)
मकर लग्नशनिमेषनीचद्वितीय भाव
कुम्भ लग्नशनिवृषभमित्र राशिद्वादश भाव
मीन लग्नगुरुमिथुनशत्रु राशिदशम भाव

लग्नेश चतुर्थ भाव में: इसका अर्थ

चतुर्थ भाव को सुख भाव कहा जाता है। यह घर, माता, भूमि-भवन, वाहन, आरंभिक शिक्षा और सबसे बढ़कर मन की शांति का भाव है; व्यक्ति कहाँ से आया है और भीतर कितना सुरक्षित महसूस करता है, यह इसी से देखा जाता है। लग्नेश स्वयं का प्रतिनिधि है, इसलिए उसका यहाँ बैठना बताता है कि व्यक्ति की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा अपना घर बनाने, परिवार को सँभालने और अपनी जड़ें मज़बूत करने में लगता है। ऐसे लोगों के लिए अपना घर प्रायः जीवन का बड़ा लक्ष्य होता है, और बाहर कितनी भी भाग-दौड़ हो, लौटकर उन्हें अपनी जगह की शांति चाहिए।

चतुर्थ भाव केंद्र है, यानी कुंडली के चार स्तंभों में से एक, और केंद्र में बैठा लग्नेश स्थिरता और सुरक्षा देता है। यह भाव उत्तर दिशा, यानी आधी रात के बिंदु का प्रतीक है, और इसका एक रोचक परिणाम है: दिग्बल के नियम से चंद्रमा और शुक्र यहाँ सबसे बली होते हैं, जबकि सूर्य और मंगल यहाँ अपना दिशा-बल खो देते हैं। साथ ही, चतुर्थ से सप्तम स्थान हर लग्न में दशम भाव होता है, इसलिए यहाँ बैठा लग्नेश अपनी सप्तम दृष्टि से कर्म-क्षेत्र को देखता है। घर और करियर का यह आमना-सामना इस स्थिति की केंद्रीय कहानी है, और बारहों लग्नों में इसका रंग ग्रह की गरिमा से बदलता है।

मेष लग्न: मंगल कर्क राशि में

नीचइस लग्न के लिए शुभ

इस भाव की सबसे चर्चित कठिन स्थितियों में से एक है मेष लग्न के मंगल का चतुर्थ भाव में जाना। यहाँ कर्क राशि है, और कर्क में मंगल नीच का होता है, यानी अपनी सबसे कमज़ोर राशि में; ऊपर से चतुर्थ भाव में उसका दिग्बल भी शून्य है। आग जैसा ग्रह जल की राशि में आकर अपना साहस भीतर की बेचैनी में बदल देता है: घर में अधीरता, माता के साथ भावुक खिंचाव, और संपत्ति के मामलों में मेहनत के बाद ही सफलता। मंगल अष्टम भाव (वृश्चिक) का भी स्वामी है, इसलिए निवास में अचानक बदलाव या पुराने मकान से जुड़ी उलझनें संभव हैं। यहाँ से मंगल सप्तम (तुला), दशम (मकर) और एकादश (कुम्भ) भाव को देखता है। दशम में मकर उसकी उच्च राशि है, सो घर में अटकी ऊर्जा काम में अपना सबसे अच्छा रास्ता पाती है। चतुर्थ का मंगल मांगलिक दोष में गिना जाता है; जीवनसाथी की कुंडली साथ में देखें। चंद्रमा या शनि लग्न से केंद्र में हों, तो नीचभंग, यानी नीचता का निवारण, माना जाता है, और गुरु की दृष्टि भी बहुत सहारा देती है।

मेष लग्न के बारे में →मंगल चतुर्थ भाव में: सामान्य फल →

वृषभ लग्न: शुक्र सिंह राशि में

शत्रु राशिइस लग्न के लिए शुभ

वृषभ लग्न का शुक्र चतुर्थ भाव में पहुँचे, तो वह सूर्य की राशि सिंह में होता है, जो शुक्र के लिए शत्रु राशि मानी जाती है। शत्रु राशि में ग्रह अपना काम तो करता है, पर पूरी सहजता से नहीं। इसकी भरपाई एक दूसरी बात से होती है: चतुर्थ भाव में शुक्र को दिग्बल मिलता है, यानी दिशा का पूरा बल। फल है सुंदर, सजे-सँवरे और कुछ भव्य घर की चाह, वाहन और आराम के साधनों में रुचि, और घर को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर देखने की आदत। शुक्र षष्ठ भाव (तुला) का भी स्वामी है, इसलिए घर से काम, घरेलू कामकाज का भार, या परिवार में छोटे-मोटे मतभेद दिख सकते हैं; माता के स्वास्थ्य पर ध्यान रखने का संकेत भी यहीं से आता है। यहाँ से शुक्र दशम भाव (कुम्भ) को देखता है, जो इस लग्न के योगकारक शनि की राशि है; कला, डिज़ाइन, वित्त या सौंदर्य से जुड़ा काम इससे अच्छा सहारा पाता है। सूर्य के साथ बैठा शुक्र अस्त भी हो सकता है; शुक्र की दशा में घर-संपत्ति के प्रश्न आगे आते हैं।

वृषभ लग्न के बारे में →

मिथुन लग्न: बुध कन्या राशि में

उच्चइस लग्न के लिए शुभ

चतुर्थ भाव की सबसे सुंदर स्थितियों में मिथुन लग्न का यह योग गिना जाता है। चतुर्थ भाव में कन्या राशि है, जहाँ बुध उच्च का होता है, और कन्या बुध की अपनी दूसरी राशि भी है; यानी लग्नेश अपने ही दूसरे भाव में, उच्च होकर बैठा है। उच्च बुध केंद्र में है, इसलिए यहाँ भद्र योग भी बनता है। फल है पढ़ाई पर गहरी पकड़, व्यवस्थित और शांत घर, और संपत्ति या वाहन जैसे सुख, जो अपनी बुद्धि के बल पर मिलते हैं। घर में किताबें, हिसाब-किताब और योजनाएँ रहती हैं; माता प्रायः समझदार और व्यावहारिक होती हैं, और उनसे बौद्धिक जुड़ाव बना रहता है। मन को शांति व्यवस्था से मिलती है। यहाँ से बुध दशम भाव (मीन) को देखता है, जो उसकी नीच राशि है और जिसका स्वामी गुरु है; इसलिए करियर की दिशा परखने के लिए गुरु की स्थिति साथ में देखें। अस्त बुध इस योग का बल घटाता है, और राहु की युति मन को बेचैन कर सकती है; बुध की महादशा में शिक्षा और घर, दोनों के अच्छे अवसर आते हैं।

कर्क लग्न: चंद्र तुला राशि में

सम राशिइस लग्न के लिए शुभ

कर्क लग्न में चंद्रमा का चतुर्थ भाव में बैठना एक अनोखा मेल है: चंद्रमा लग्नेश भी है और चतुर्थ भाव का नैसर्गिक कारक भी, यानी मन और माता का स्वाभाविक प्रतिनिधि। ऊपर से चतुर्थ भाव में चंद्रमा को दिग्बल मिलता है। राशि तुला है, जो चंद्रमा के लिए सम है, न मित्र, न शत्रु; इसलिए मुख्य शक्ति राशि से नहीं, भाव और दिशा से आती है। फल है माता से गहरा भावनात्मक जुड़ाव, सुंदर और शांत घर की चाह, और ऐसा मन जो घर के वातावरण से सीधे प्रभावित होता है: घर में सामंजस्य हो तो व्यक्ति खिल उठता है, कलह हो तो भीतर से थक जाता है। चंद्रमा केवल लग्न का स्वामी है, इसलिए यह पूरा फल व्यक्ति के अपने मन और स्वास्थ्य पर ही टिकता है। यहाँ से चंद्रमा दशम भाव (मेष) को देखता है, जिससे काम में पहल करने की इच्छा जागती है, पर मनोदशा का असर कार्य पर भी दिखता है। पूर्णिमा के पास का बली चंद्रमा इस स्थिति को बहुत अच्छा बनाता है; क्षीण चंद्रमा या शनि-राहु का प्रभाव मन पर बोझ डाल सकता है।

कर्क लग्न के बारे में →चंद्र चतुर्थ भाव में: सामान्य फल →

सिंह लग्न: सूर्य वृश्चिक राशि में

मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ

कुंडली का सबसे निचला बिंदु, जिसे आधी रात का स्थान माना जाता है, सिंह लग्न के सूर्य के लिए सहज जगह नहीं है। चतुर्थ भाव में सूर्य का दिग्बल शून्य होता है, इसलिए जो तेज दशम भाव में बाहर चमकता, वह यहाँ भीतर की ओर मुड़ जाता है। राशि वृश्चिक है, जिसका स्वामी मंगल सूर्य का मित्र है; मित्र राशि का सहयोग दिशा की कमी को काफ़ी हद तक सँभाल लेता है। फल है घर पर अधिकार रखने की चाह, पैतृक भूमि या संपत्ति से जुड़ाव, और एक गहरा, निजी भीतरी जीवन। सूर्य के पास किसी दूसरे भाव का स्वामित्व नहीं है, इसलिए यह सब सीधे व्यक्ति की अपनी पहचान से जुड़ता है: घर उसके आत्मसम्मान का हिस्सा बन जाता है। पिता का प्रभाव भी घर में साफ़ दिखता है। यहाँ से सूर्य दशम भाव (वृषभ) को देखता है, जो शुक्र की राशि है; करियर में धीमी, पर टिकाऊ प्रगति और मान्यता की इच्छा रहती है। शनि या राहु की युति घर में तनाव ला सकती है; सूर्य की दशा में अपना घर या भूमि बनाने के प्रयास आगे बढ़ते हैं।

सिंह लग्न के बारे में →

कन्या लग्न: बुध धनु राशि में

सम राशिइस लग्न के लिए शुभ

घर और काम का गठजोड़ ही कन्या लग्न की इस स्थिति का सार है। बुध यहाँ गुरु की राशि धनु में है, जो उसके लिए सम है; सो असली बात राशि की नहीं, भावों के जोड़ की है। बुध इस लग्न के लिए दशम भाव (मिथुन) का भी स्वामी है, और चतुर्थ से उसकी दृष्टि सीधे दशम पर, यानी अपनी ही दूसरी राशि पर पड़ती है। लग्नेश और कर्मेश एक ही ग्रह है, जो घर के भाव में बैठकर कर्म के भाव को देख रहा है; इसलिए घर और काम एक-दूसरे में गुँथ जाते हैं: घर से काम, पारिवारिक व्यवसाय, या शिक्षा, संपत्ति और कागज़ी व्यवस्था से जुड़ा पेशा। धनु राशि ज्ञान और दर्शन की ओर ले जाती है, सो घर में पढ़ने-पढ़ाने का वातावरण रहता है, और माता से विचारों पर खुली बातचीत होती है। गुरु इस राशि का स्वामी है, इसलिए उसकी स्थिति यहाँ बहुत मायने रखती है; अस्त या पीड़ित बुध घर और काम के बीच खिंचाव ला सकता है, जबकि बुध की दशा दोनों को साथ आगे बढ़ाती है।

तुला लग्न: शुक्र मकर राशि में

मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ

सुख-सुविधा के हिसाब से तुला लग्न के लिए यह बहुत अनुकूल स्थिति मानी जाती है। शुक्र यहाँ मकर राशि में है, जिसका स्वामी शनि शुक्र का मित्र है; मित्र राशि के साथ-साथ चतुर्थ भाव का दिग्बल भी शुक्र को मिलता है। एक और बात इसे विशेष बनाती है: मकर इस लग्न के योगकारक शनि की राशि है, सो लग्नेश योगकारक के घर में सुरक्षित बैठा है। फल है टिकाऊ, आरामदायक घर, वाहन का सुख, और सजावट में पारंपरिक, संयत रुचि, जहाँ दिखावे से अधिक गुणवत्ता का मोल है। शुक्र अष्टम भाव (वृषभ) का भी स्वामी है, इसलिए विरासत में मिली संपत्ति, ससुराल पक्ष से जुड़ा घर, या निवास में अचानक बदलाव संभव है। यहाँ से शुक्र दशम भाव (कर्क) को देखता है, जिससे जनता, आतिथ्य या सौंदर्य से जुड़े पेशे सहारा पाते हैं। माता से स्नेहपूर्ण संबंध और घर में कला का वातावरण इस स्थिति के सामान्य लक्षण हैं। शुक्र अस्त हो या मंगल-राहु से पीड़ित हो, तो घर के सुख के साथ खर्च और असंतोष भी जुड़ सकते हैं; शुक्र या शनि की दशा में घर-संपत्ति से जुड़े सुख प्रायः ठोस रूप लेते हैं।

वृश्चिक लग्न: मंगल कुम्भ राशि में

सम राशिइस लग्न के लिए सम

कुम्भ राशि में बैठा वृश्चिक लग्न का मंगल घर को कार्यशाला जैसा बना देता है। कुम्भ शनि की राशि है और मंगल के लिए सम मानी जाती है; सम राशि में ग्रह न दबता है, न उभरता है। पर चतुर्थ भाव में मंगल का दिग्बल शून्य है, इसलिए उसकी ऊर्जा बाहर की लड़ाई के बजाय घर के प्रबंध में लगती है। घर अनुशासित, कुछ अपारंपरिक और काम-काज से भरा रहता है। मंगल षष्ठ भाव (मेष) का भी स्वामी है, और इसी कारण इस लग्न के लिए उसकी भूमिका सम मानी गई है। चतुर्थ में बैठे षष्ठेश का एक व्यावहारिक अर्थ है भूमि या मकान से जुड़े विवाद, जिनसे बचने के लिए कागज़ात साफ़ रखें। यहाँ से मंगल सप्तम (वृषभ), दशम (सिंह) और एकादश (कन्या) भाव को देखता है: दांपत्य में ऊर्जा, करियर में अधिकार और नेतृत्व की चाह, और सेवा या विश्लेषण से लाभ। मांगलिक दोष के विचार में चतुर्थ का मंगल भी आता है; विवाह से पहले दोनों कुंडलियों का मिलान कराएँ। शनि की युति घर में कठोरता ला सकती है, जबकि गुरु की दृष्टि इस स्थिति को संतुलित करती है।

मंगल चतुर्थ भाव में: सामान्य फल →

धनु लग्न: गुरु मीन राशि में

स्वराशिइस लग्न के लिए शुभ

धनु लग्न के लिए गुरु का चतुर्थ भाव में होना घर के लिहाज़ से बहुत शुभ संयोग है। यहाँ मीन राशि है, जो गुरु की अपनी दूसरी राशि है; सो लग्नेश उस दूसरे भाव में बैठा है जिसका स्वामी वह स्वयं है। केंद्र में ऐसा गुरु हंस योग बनाता है। फल है शांत, सात्त्विक वातावरण, धर्म या विद्या से प्रेम रखने वाली माता, और भूमि, भवन तथा वाहन का सुख। मन संतोषी रहता है, शिक्षा अच्छी होती है, और पढ़ाने या मार्गदर्शन की रुचि जागती है। यहाँ से गुरु अष्टम (कर्क), दशम (कन्या) और द्वादश (वृश्चिक) भाव को देखता है। अष्टम में कर्क गुरु की उच्च राशि है, इसलिए शोध, गूढ़ विषयों और ससुराल पक्ष से जुड़े मामलों को यह दृष्टि सहारा देती है; दशम पर दृष्टि अध्यापन, परामर्श या धर्म-क्षेत्र के काम को बल देती है; द्वादश पर दृष्टि परोपकार, साधना और दूर देशों से जुड़ाव की ओर ले जाती है। गुरु राहु या शनि से पीड़ित हो, तो घर का सुख देर से या कम मिलता है; गुरु की दशा में घर, शिक्षा और मन के संतोष से जुड़े फल सबसे खुलकर मिलते हैं।

गुरु चतुर्थ भाव में: सामान्य फल →

मकर लग्न: शनि मेष राशि में

नीचइस लग्न के लिए शुभ

मकर लग्न के शनि का चतुर्थ भाव में जाना कठिन, पर सँभाली जा सकने वाली स्थिति है। चतुर्थ भाव में मेष राशि है, और मेष में शनि नीच का होता है; धैर्य का ग्रह आवेग की राशि में असहज रहता है। घर में ज़िम्मेदारियों का बोझ, माता के जीवन में संघर्ष या उनसे कुछ भावनात्मक दूरी, और भूमि-भवन का सुख देर से, मेहनत के बाद मिलना इसके सामान्य लक्षण हैं। शनि द्वितीय भाव (कुम्भ) का भी स्वामी है, इसलिए परिवार और धन के प्रश्न घर से गहराई से जुड़ते हैं; कुटुंब का भार प्रायः इसी व्यक्ति पर आता है। इस स्थिति की ताक़त इसकी दृष्टियों में है: षष्ठ (मिथुन), दशम (तुला) और प्रथम (मकर) भाव पर। लग्न पर वह अपनी ही राशि को देखता है, जिससे शरीर और सहनशक्ति को सुरक्षा मिलती है; दशम में तुला उसकी उच्च राशि है, सो कर्म-क्षेत्र में लगन का अच्छा फल मिलता है; षष्ठ पर दृष्टि प्रतिस्पर्धा से निपटने की शक्ति देती है। लग्न से केंद्र में मंगल या शुक्र बैठा हो, तो नीचता का निवारण होता है; ऐसे में शनि की दशा संघर्ष के बाद ठोस उपलब्धि देती है।

शनि चतुर्थ भाव में: सामान्य फल →

कुम्भ लग्न: शनि वृषभ राशि में

मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ

अपने मित्र शुक्र की राशि वृषभ में बैठा कुम्भ लग्न का शनि घर और संपत्ति को बहुत व्यावहारिक नज़र से देखता है। साथ ही, शुक्र इस लग्न के लिए चतुर्थ और नवम भाव का स्वामी होकर योगकारक है, इसलिए यह स्थिति लग्नेश को भाग्य और सुख, दोनों के स्वामी से सीधे जोड़ देती है। व्यक्ति धीरे-धीरे, सोच-समझकर भूमि और भवन जोड़ता है, और जो बनाता है वह टिकता है। शनि द्वादश भाव (मकर) का भी स्वामी है, इसलिए जन्मस्थान से दूर बसना, विदेश में घर, या घर पर बड़ा खर्च इस स्थिति के संभावित रंग हैं; घर कभी-कभी एकांत और चिंतन का स्थान भी बन जाता है। यहाँ से शनि षष्ठ (कर्क), दशम (वृश्चिक) और प्रथम (कुम्भ) भाव को देखता है। लग्न पर अपनी ही राशि को देखकर वह आत्म-अनुशासन और सहनशक्ति देता है; दशम पर दृष्टि शोध, तकनीक या बड़ी संस्थाओं में टिकाऊ काम का संकेत है; षष्ठ पर दृष्टि दिनचर्या और सेवा को अनुशासित करती है। माता के साथ संबंध गंभीर, पर भरोसेमंद रहता है। मंगल या राहु की पीड़ा घर में ठंडापन ला सकती है; शनि की दशा संपत्ति के लिए अच्छा समय है।

शनि चतुर्थ भाव में: सामान्य फल →

मीन लग्न: गुरु मिथुन राशि में

शत्रु राशिइस लग्न के लिए शुभ

ज्ञान का ग्रह सूचनाओं की राशि में: मीन लग्न के गुरु की चतुर्थ भाव वाली स्थिति यही है। यहाँ मिथुन राशि है, जो बुध की राशि है और गुरु के लिए शत्रु राशि गिनी जाती है। पढ़ने की लगन रहती है, पर रुचियाँ गहराई के बजाय फैलाव की ओर बिखर सकती हैं। द्विस्वभाव राशि होने से एक से अधिक निवास या बार-बार घर बदलना संभव है। फिर भी इस स्थिति में एक बड़ी शक्ति छिपी है। धनु, जो इस लग्न का दशम भाव है, गुरु की ही राशि है, और चतुर्थ में बैठा गुरु ठीक उसी पर सप्तम दृष्टि डालता है। इससे करियर सुरक्षित रहता है, और अध्यापन, लेखन या परामर्श का काम घर से भी चल सकता है। गुरु अष्टम (तुला) और द्वादश (कुम्भ) भाव को भी देखता है: शोध और गूढ़ विषयों में रुचि, अध्यात्म की ओर झुकाव और खर्च में विवेक। माता प्रायः बुद्धिमान और बातचीत में कुशल होती हैं। बुध की स्थिति यहाँ निर्णायक है; बुध बली हो तो शत्रु राशि की कमी बहुत घट जाती है, और गुरु की दशा में घर और काम, दोनों आगे बढ़ते हैं।

गुरु चतुर्थ भाव में: सामान्य फल →

कब यह स्थिति साथ देती है

यह स्थिति सबसे अधिक तब फलती है जब लग्नेश चतुर्थ में बली हो: उच्च या स्वराशि का, जैसे मिथुन और धनु लग्न में, या दिग्बल पाकर, जैसे चंद्रमा और शुक्र। चतुर्थ भाव पर गुरु की दृष्टि और चतुर्थ के कारक ग्रहों की अच्छी स्थिति, यानी माता के लिए चंद्रमा, भूमि के लिए मंगल और वाहन के लिए शुक्र, इस योग को और पक्का करती हैं। दशम पर लग्नेश की दृष्टि का लाभ तब पूरा मिलता है, जब दशम भाव पर पाप प्रभाव न हो। समय की दृष्टि से लग्नेश की महादशा या अंतर्दशा में घर बनाना, भूमि लेना या परिवार के साथ स्थिर होना सबसे सहज रूप से होता है।

कब यह स्थिति कसौटी बनती है

चतुर्थ भाव में लग्नेश नीच हो, जैसे मेष लग्न का मंगल और मकर लग्न का शनि, या शत्रु राशि में हो, जैसे वृषभ लग्न का शुक्र और मीन लग्न का गुरु, तो घर का सुख देर से या टुकड़ों में मिल सकता है। अस्त लग्नेश, या शनि, राहु और केतु की पीड़ा का भी यही असर होता है। ऐसे में मन की शांति के लिए अधिक प्रयास करना पड़ता है, माता के साथ संबंधों में धैर्य चाहिए, और संपत्ति के मामलों में सावधानी ज़रूरी है। ये संकेत स्थायी नहीं हैं: नीचभंग, शुभ दृष्टि और नवांश में लग्नेश का बल इनकी दिशा काफ़ी बदल देते हैं।

बारहों भावों में लग्नेश

अपना लग्न जानें

जन्म तिथि, समय और स्थान से लग्न, लग्नेश, नवांश लग्न और चंद्र लग्न एक साथ।

लग्न कैलकुलेटर

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लग्नेश चतुर्थ भाव में हो तो क्या होता है?

व्यक्ति की ऊर्जा घर, माता, भूमि और मन की शांति की ओर जाती है। चतुर्थ भाव केंद्र है, इसलिए यह स्थिति सामान्यतः स्थिरता देती है, और यहाँ से लग्नेश दशम भाव को देखता है, जिससे घर और काम का संतुलन जीवन का मुख्य विषय बनता है। फल ग्रह की राशि और बल पर निर्भर करता है।

क्या लग्नेश चतुर्थ भाव में शुभ है?

हाँ, केंद्र में होने से इसे सामान्यतः शुभ माना जाता है। पर बारह लग्नों में इसकी गुणवत्ता बहुत अलग है: मिथुन और धनु लग्न में लग्नेश यहाँ अपने ही दूसरे भाव में बली होता है, जबकि मेष और मकर लग्न में वह नीच का होता है। इसलिए अपनी कुंडली में ग्रह का बल और उस पर पड़ने वाली दृष्टियाँ देखकर ही निष्कर्ष निकालें।

किस लग्न के लिए लग्नेश चतुर्थ भाव में सबसे अच्छा है?

मिथुन लग्न, जहाँ बुध कन्या में उच्च होकर अपने ही चतुर्थ भाव में बैठता है और भद्र योग बनाता है; और धनु लग्न, जहाँ गुरु मीन में स्वराशि का होकर अपने चतुर्थ भाव में हंस योग बनाता है। इनके बाद तुला लग्न आता है, जहाँ शुक्र मित्र राशि में है और उसे दिग्बल भी मिलता है। मेष और मकर लग्न में लग्नेश यहाँ नीच का होता है, इसलिए वहाँ नीचभंग की जाँच ज़रूरी है।

लग्नेश चतुर्थ भाव में हो तो क्या अपना घर बनता है?

चतुर्थ भाव भूमि और भवन का भाव है, इसलिए यहाँ बली लग्नेश अपने घर की प्रबल इच्छा और उसके लिए प्रयास का संकेत देता है। घर कब बनेगा, इसकी कोई निश्चित आयु नहीं होती; समय जानने के लिए चतुर्थ भाव, उसका स्वामी, मंगल और शुक्र जैसे कारक ग्रह, और चल रही दशा साथ में देखे जाते हैं।

मेष या वृश्चिक लग्न में मंगल चतुर्थ भाव में हो तो क्या मांगलिक दोष है?

हाँ, चतुर्थ भाव का मंगल मांगलिक दोष में गिना जाता है। मेष लग्न में यह मंगल कर्क में नीच का भी होता है, जबकि वृश्चिक लग्न में कुम्भ में, यानी सम राशि में। दोनों स्थितियों में विवाह से पहले जीवनसाथी की कुंडली साथ में देखें; दोनों कुंडलियों में ऐसा ही मंगल हो, तो दोष संतुलित माना जाता है। यह केवल कुंडली-मिलान का एक बिंदु है, किसी अनहोनी का संकेत नहीं।

सूचना: यह पृष्ठ शास्त्रीय ज्योतिष सिद्धांतों पर आधारित शैक्षिक जानकारी देता है। व्यक्तिगत निर्णयों के लिए योग्य ज्योतिषी से परामर्श करें।