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लग्नेश दशम भाव में

कर्म, करियर और प्रतिष्ठा: हर लग्न के लिए दशम में लग्नेश का अपना फल

करियर और सार्वजनिक भूमिकाकेंद्रउपचय

लग्नेश दशम भाव में हो तो समाज व्यक्ति को उसके काम के माध्यम से जानता है। जीवन कर्म, करियर और पद की ओर मुड़ता है, और व्यक्ति परिश्रम से अपना स्थान बनाता है। दशम केंद्र भी है और उपचय भाव भी, इसलिए फल समय और प्रयास के साथ बढ़ता है। राशि और बल फल की ऊँचाई तय करते हैं।

आपका लग्नेश किस भाव में है?

जन्म तिथि, समय और स्थान भरें। आपका लग्नेश इसी भाव में हो तो आपका खंड नीचे मिलेगा।

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करियर रिपोर्ट · कर्म बोध

लग्नेश दशम भाव में हो तो करियर जीवन की धुरी बन जाता है। करियर रिपोर्ट आपकी अपनी कुंडली का दशम भाव, दशमांश, अमात्यकारक और दशा साथ पढ़ती है।

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बारहों लग्नों के लिए लग्नेश दशम भाव में

हर लग्न के लिए लग्नेश कौन है, इस भाव में वह किस राशि में पड़ता है, और वहाँ उसका बल।

लग्नलग्नेशराशिबलदूसरा भाव
मेष लग्नमंगलमकरउच्चअष्टम भाव
वृषभ लग्नशुक्रकुम्भमित्र राशिषष्ठ भाव
मिथुन लग्नबुधमीननीचचतुर्थ भाव
कर्क लग्नचंद्रमेषसम राशिकेवल लग्न
सिंह लग्नसूर्यवृषभशत्रु राशिकेवल लग्न
कन्या लग्नबुधमिथुनस्वराशिदशम भाव(यहीं)
तुला लग्नशुक्रकर्कशत्रु राशिअष्टम भाव
वृश्चिक लग्नमंगलसिंहमित्र राशिषष्ठ भाव
धनु लग्नगुरुकन्याशत्रु राशिचतुर्थ भाव
मकर लग्नशनितुलाउच्चद्वितीय भाव
कुम्भ लग्नशनिवृश्चिकशत्रु राशिद्वादश भाव
मीन लग्नगुरुधनुस्वराशिदशम भाव(यहीं)

लग्नेश दशम भाव में: इसका अर्थ

दशम भाव कुंडली का शिखर है, वह बिंदु जो जन्म के समय आकाश में सबसे ऊपर था। यह कर्म का भाव है: आजीविका, पद, अधिकार, सरकार से संबंध, और वह प्रतिष्ठा जो व्यक्ति अपने कामों से कमाता है। जब लग्नेश, यानी स्वयं का स्वामी, यहाँ पहुँचता है, तो व्यक्ति का आत्म-बोध उसके काम से गुँथ जाता है। ऐसे लोग खाली बैठना कम पसंद करते हैं; उनके लिए काम ही उनकी पहचान है। दशम से हर लग्नेश अपनी सप्तम दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखता है, इसलिए घर, माता और मन की शांति भी इस योग का हिस्सा बनते हैं: करियर और घर के बीच संतुलन यहाँ एक स्थायी प्रश्न रहता है।

दशम सबसे बली केंद्र माना जाता है, और साथ ही उपचय भाव भी है, यानी ऐसा भाव जिसके फल समय और प्रयास के साथ बढ़ते जाते हैं। इसलिए यहाँ लग्नेश का पूरा फल अक्सर एक झटके में नहीं, बल्कि अनुभव के साथ खुलता है; दुर्बल लग्नेश भी परिश्रम से धीरे-धीरे अपनी जगह बना लेता है। सूर्य और मंगल को दशम भाव में दिग्बल मिलता है, इसलिए सिंह, मेष और वृश्चिक लग्न के लिए यहाँ एक अतिरिक्त सहारा है। करियर की बारीक तस्वीर के लिए दशमेश, दशमांश कुंडली और चल रही दशा को साथ देखें; केवल लग्नेश की स्थिति से पेशे का नाम तय नहीं होता, केवल उसकी दिशा का संकेत मिलता है।

मेष लग्न: मंगल मकर राशि में

उच्चइस लग्न के लिए शुभ

मेष लग्न के लिए यह कुंडली के सबसे प्रबल योगों में गिना जाता है। मंगल दशम भाव में मकर राशि में पहुँचता है, जो उसकी उच्च राशि है, और दशम भाव में उसे दिग्बल भी मिलता है। उच्च का मंगल केंद्र में हो तो पंच महापुरुष योगों में से रुचक योग बनता है: साहस, अनुशासन, नेतृत्व और कठिन काम को पूरा करके ही छोड़ने की ज़िद। ऐसे व्यक्ति सेना, पुलिस, इंजीनियरिंग, खेल, शल्य-चिकित्सा या प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में तेज़ी से आगे बढ़ सकते हैं। मंगल अष्टम का भी स्वामी है, इसलिए करियर में अचानक मोड़, शोध, जाँच या संकट सँभालने वाली भूमिकाएँ भी इसी योग का हिस्सा बनती हैं। दशम से मंगल लग्न, चतुर्थ और पंचम को देखता है। लग्न पर दृष्टि शरीर और आत्मबल को मज़बूत रखती है; चतुर्थ में कर्क है, मंगल की नीच राशि, इसलिए काम की धुन में घर का सुख पीछे छूट सकता है। उच्च होने पर भी परिणाम मंगल के अंश, साथ बैठे ग्रहों और उसकी दशा पर टिका रहता है।

मेष लग्न के बारे में →

वृषभ लग्न: शुक्र कुम्भ राशि में

मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ

वृषभ लग्न में शुक्र दशम भाव में कुम्भ राशि में बैठता है, जो उसके मित्र शनि की राशि है। मित्र राशि में ग्रह सहज रहता है, और यहाँ एक अतिरिक्त लाभ भी है: शनि वृषभ लग्न के लिए योगकारक है, क्योंकि वह नवम और दशम दोनों का स्वामी है। इस तरह लग्नेश योगकारक की राशि में बैठकर भाग्य और कर्म दोनों से जुड़ जाता है। करियर में कला, संगीत, डिज़ाइन, वित्त, सौंदर्य, मीडिया या तकनीक से जुड़े रचनात्मक काम अनुकूल रहते हैं; कुम्भ का प्रभाव नए विचारों और बड़े संगठनों की ओर भी ले जाता है। शुक्र षष्ठ का भी स्वामी है, इसलिए नौकरी, सेवा और प्रतिस्पर्धा करियर में बड़ी भूमिका निभाती हैं। व्यक्ति अक्सर सहकर्मियों के बीच लोकप्रिय रहता है, पर ध्यान रखें कि काम का दबाव स्वास्थ्य पर भारी न पड़े। दशम से शुक्र चतुर्थ भाव को देखता है, जिससे काम की कमाई घर, वाहन और सुख-सुविधा में दिखती है। शनि बली हो तो यह योग और निखरता है; शुक्र की दशा में रचनात्मक काम को सबसे अधिक पहचान मिलती है।

वृषभ लग्न के बारे में →शुक्र दशम भाव में: सामान्य फल →

मिथुन लग्न: बुध मीन राशि में

नीचइस लग्न के लिए शुभ

मिथुन लग्न के लिए दशम भाव मीन है, और यहाँ लग्नेश बुध नीच का हो जाता है। नीच बुध का अर्थ यह नहीं कि बुद्धि कम है; अर्थ यह है कि बुध की तर्क और हिसाब वाली धार मीन की भावुक, कल्पनाशील राशि में धुँधली पड़ जाती है। कार्यक्षेत्र में व्यक्ति अंतर्ज्ञान से अच्छे निर्णय ले सकता है, पर लिखित ब्योरे, अनुबंध और आँकड़ों में चूक की संभावना रहती है; इन्हें दोबारा जाँचने की आदत यहाँ बहुत काम आती है। बुध चतुर्थ का भी स्वामी है, इसलिए घर से काम, संपत्ति, शिक्षा या वाहनों से जुड़ा व्यवसाय करियर में जगह बना सकता है। दशम से बुध चतुर्थ भाव कन्या को देखता है, जो उसकी अपनी और उच्च राशि है; यह दृष्टि घर और मन की स्थिरता को सहारा देती है। मीन का स्वामी गुरु इस लग्न का दशमेश भी है। गुरु यदि लग्न या चंद्रमा से केंद्र में बली बैठा हो, तो नीचभंग का नियम लागू होता है, और करियर की आरंभिक उलझनें आगे चलकर सधी हुई सफलता में बदल सकती हैं। दशमांश कुंडली भी अवश्य देखें।

बुध दशम भाव में: सामान्य फल →

कर्क लग्न: चंद्र मेष राशि में

सम राशिइस लग्न के लिए शुभ

कर्क लग्न का चंद्रमा दशम भाव में मेष राशि में हो, तो मन का ठिकाना कार्यक्षेत्र बन जाता है। दूसरा कोई भाव चंद्रमा के अधीन नहीं है, इसलिए काम में जो दिखता है, वह व्यक्ति के अपने स्वभाव का विस्तार है। मेष में चंद्रमा सम रहता है, पर मेष का स्वामी मंगल कर्क लग्न का योगकारक है, जो पंचम और दशम का स्वामी है। इसलिए चंद्रमा का फल बहुत कुछ मंगल की स्थिति से बँधा है। मेष की अग्नि चंद्रमा को पहल और कुछ उतावलापन देती है: व्यक्ति नए काम जल्दी उठाता है, जनता के सामने सहज रहता है, और ऐसे पेशों में सफल होता है जहाँ लोगों की भावना समझनी हो, जैसे देखभाल-सेवा, आतिथ्य, खाद्य व्यवसाय, जनसंपर्क या राजनीति। चंद्रमा चंचल ग्रह है, अतः भूमिका या कार्यस्थल में बदलाव बार-बार आ सकते हैं। दशम से चंद्रमा चतुर्थ को देखता है, जो उसके दिग्बल का भाव है; इसलिए घर की शांति यहाँ करियर की ऊर्जा का स्रोत बनती है। शुक्ल पक्ष का चंद्र और बली मंगल इस योग को स्थिर करते हैं।

कर्क लग्न के बारे में →चंद्र दशम भाव में: सामान्य फल →

सिंह लग्न: सूर्य वृषभ राशि में

शत्रु राशिइस लग्न के लिए शुभ

सिंह लग्न में सूर्य दशम भाव में वृषभ राशि में पहुँचता है, और यह स्थिति दो विरोधी बातों का मेल है। वृषभ शुक्र की राशि है, जिसे सूर्य शत्रु मानता है, इसलिए यहाँ सूर्य का तेज कुछ रुक-रुककर प्रकट होता है। पर दशम भाव में सूर्य को दिग्बल मिलता है, और वह स्वयं इस भाव का नैसर्गिक कारक भी है, क्योंकि दशम अधिकार, शासन और प्रतिष्ठा का भाव है। इस तरह राशि की कमी को भाव का बल काफ़ी हद तक भर देता है। सूर्य केवल सिंह का स्वामी है, अतः करियर का पूरा प्रश्न आत्म-सम्मान और पद से जुड़ा है। सरकारी सेवा, प्रशासन, वित्त, बैंकिंग, या विलासिता और कला से जुड़े व्यवसाय का प्रबंधन यहाँ स्वाभाविक लगता है। वृषभ स्थिर राशि है, इसलिए व्यक्ति एक ही क्षेत्र में टिककर धीरे-धीरे ऊपर जाता है। शत्रु राशि का प्रभाव वरिष्ठों से मतभेद के रूप में दिख सकता है। दशम से सूर्य चतुर्थ भाव वृश्चिक को देखता है। वृषभ का स्वामी शुक्र, जो इस लग्न का दशमेश भी है, बली हो तो यह योग खुलकर फल देता है।

सिंह लग्न के बारे में →सूर्य दशम भाव में: सामान्य फल →

कन्या लग्न: बुध मिथुन राशि में

स्वराशिइस लग्न के लिए शुभ

कन्या लग्न के लिए बुध प्रथम और दशम दोनों भावों का स्वामी है, और यहाँ वह ठीक दशम भाव में, अपनी दूसरी राशि मिथुन में बैठता है। स्वयं का स्वामी और कर्म का स्वामी एक ही ग्रह हो और वह कर्म-भाव में अपने घर में हो, तो व्यक्ति और उसका काम लगभग एक हो जाते हैं। स्वराशि का बुध केंद्र में होने से भद्र योग भी बनता है, जो पंच महापुरुष योगों में से एक है: तेज़ बुद्धि, वाणी की कुशलता, व्यापारिक समझ और कई काम एक साथ सँभालने की क्षमता। लेखा, वाणिज्य, लेखन, पत्रकारिता, शिक्षण, सूचना-प्रौद्योगिकी या परामर्श जैसे क्षेत्र यहाँ स्वाभाविक रूप से खुलते हैं। मिथुन द्विस्वभाव राशि है, इसलिए एक से अधिक काम या दो समानांतर पेशे भी संभव हैं। दशम से बुध चतुर्थ भाव धनु को देखता है, जिससे शिक्षा और घर के सुख को सहारा मिलता है। फिर भी बुध का सूर्य के बहुत निकट होकर अस्त होना, या पाप ग्रहों का साथ, इस योग की धार कम कर सकता है; बुध की दशा में इसका पूरा फल सामने आता है।

बुध दशम भाव में: सामान्य फल →

तुला लग्न: शुक्र कर्क राशि में

शत्रु राशिइस लग्न के लिए शुभ

तुला लग्न का दशम भाव कर्क है, और लग्नेश शुक्र यहाँ चंद्रमा की राशि में शत्रु स्थिति में बैठता है। शुक्र और चंद्रमा दोनों कोमल ग्रह हैं, फिर भी पारंपरिक मैत्री-चक्र में शुक्र चंद्रमा को शत्रु मानता है; इसलिए यहाँ शुक्र की सुरुचि भावनाओं के उतार-चढ़ाव से प्रभावित रहती है। कार्यक्षेत्र में व्यक्ति सौम्य, मिलनसार और लोगों की ज़रूरत समझने वाला होता है। आतिथ्य, भोजन, गृह-सज्जा, संपत्ति, देखभाल-सेवा, कला या घरेलू उपयोग के उत्पाद यहाँ उपयुक्त क्षेत्र हैं। शुक्र अष्टम का भी स्वामी है, अतः करियर में अचानक बदलाव, विरासत में मिला काम, बीमा, कर या शोध से जुड़ी भूमिकाएँ भी आ सकती हैं; इस कारण कार्यजीवन सीधी रेखा में कम और मोड़ों के साथ अधिक चलता है। दशम से शुक्र चतुर्थ भाव मकर को देखता है, जो शनि की राशि है, और शनि तुला लग्न का योगकारक है; इसलिए शनि बली हो तो घर और करियर दोनों में स्थिरता आती है। कर्क का स्वामी चंद्रमा इस लग्न का दशमेश भी है; उसका बल इस योग को सबसे अधिक बदलता है।

शुक्र दशम भाव में: सामान्य फल →

वृश्चिक लग्न: मंगल सिंह राशि में

मित्र राशिइस लग्न के लिए सम

वृश्चिक लग्न में मंगल दशम भाव में सिंह राशि में जाता है, जो उसके मित्र सूर्य की राशि है। मित्र राशि के साथ यहाँ मंगल को दिग्बल भी मिलता है, इसलिए करियर में उसका साहस और संगठन-क्षमता खुलकर काम आते हैं। सिंह का स्वामी सूर्य इस लग्न का दशमेश है; लग्नेश दशमेश की राशि में हो, तो व्यक्ति अपने काम में अधिकार और प्रत्यक्ष ज़िम्मेदारी चाहता है। प्रशासन, सुरक्षा बल, पुलिस, शल्य-चिकित्सा, खेल, इंजीनियरिंग या सरकारी तंत्र जैसे क्षेत्र इस योग के लिए उपयुक्त हैं। मंगल षष्ठ का भी स्वामी है, और इसी वजह से इस लग्न के लिए उसे कार्यात्मक रूप से सम माना जाता है। षष्ठ का स्वामित्व प्रतियोगिता में जीत, सेवा-क्षेत्र, कानून या स्वास्थ्य से जुड़े पेशों की ओर ले जाता है, पर कार्यस्थल पर विरोधियों से सामना भी कराता है। दशम से मंगल लग्न, चतुर्थ और पंचम को देखता है; अपनी राशि पर दृष्टि शरीर और आत्मविश्वास बनाए रखती है, जबकि चतुर्थ पर दृष्टि घर में तीखे स्वर ला सकती है। सूर्य की स्थिति और मंगल की दशा इस योग की ऊँचाई तय करती हैं।

धनु लग्न: गुरु कन्या राशि में

शत्रु राशिइस लग्न के लिए शुभ

धनु लग्न का गुरु दशम भाव में पहुँचे, तो वह कन्या में होता है, यानी बुध की राशि में, जिसे वह शत्रु मानता है। गुरु का स्वभाव बड़े सिद्धांत और व्यापक दृष्टि का है, जबकि कन्या ब्योरे, नियम और सटीकता की राशि है; इसलिए काम में व्यक्ति कभी-कभी बड़ी तस्वीर और बारीक काम के बीच खिंचा हुआ महसूस कर सकता है। गुरु चतुर्थ का भी स्वामी है, सो सुख-भाव का स्वामी कर्म-भाव में आ गया है: घर, शिक्षा, भूमि-भवन और मन की शांति करियर से सीधे जुड़ते हैं। अध्यापन, कानून, वित्तीय सलाह, प्रकाशन, स्वास्थ्य-सेवा या विश्लेषण वाले पेशे यहाँ अनुकूल माने जाते हैं। दशम से गुरु तीन भावों पर दृष्टि डालता है: पंचम दृष्टि द्वितीय भाव मकर पर, जो गुरु की नीच राशि है, इसलिए वाणी और धन-संचय में संयम चाहिए; सप्तम दृष्टि चतुर्थ में अपनी राशि मीन पर, जो घर और सुख को स्थिर करती है; और नवम दृष्टि षष्ठ पर, जो प्रतिस्पर्धा में टिके रहने का बल देती है। गुरु जिस राशि में बैठा है, उसका स्वामी बुध ही दशम भाव का स्वामी है; इसलिए अंतिम फल के लिए बुध का बल ज़रूर परखें।

गुरु दशम भाव में: सामान्य फल →

मकर लग्न: शनि तुला राशि में

उच्चइस लग्न के लिए शुभ

मकर लग्न का शनि दशम में तुला राशि पाता है, जो उसकी उच्च राशि है। केंद्र में उच्च होने से यहाँ शश योग बनता है, और साथ में मिलते हैं: धैर्य, न्यायबुद्धि, संगठन-शक्ति और लंबी दूरी तक टिके रहने की क्षमता। यहाँ पद अक्सर एक-एक सीढ़ी चढ़कर मिलता है, अचानक नहीं; दशम उपचय भाव है और शनि धीमा ग्रह, इसलिए परिश्रम का फल समय के साथ बढ़ता जाता है। कानून, न्यायपालिका, प्रशासन, इंजीनियरिंग, बड़े उद्योग, श्रम या लोक-निर्माण जैसे क्षेत्र इस योग के स्वाभाविक मैदान हैं। शनि द्वितीय का भी स्वामी है, इसलिए करियर से संचित धन और परिवार की आर्थिक स्थिति सीधे जुड़ती है। तुला का स्वामी शुक्र इस लग्न का योगकारक है; उसका बल इस योग को और ऊपर ले जाता है। दशम से शनि द्वादश, चतुर्थ और सप्तम को देखता है। चतुर्थ पर पड़ने वाली यह दृष्टि शनि की नीच राशि मेष पर है, सो घर के मामलों में रूखापन या समय की कमी आ सकती है; सप्तम पर दृष्टि साझेदारी में औपचारिकता लाती है। शनि की दशा में यह योग सबसे स्पष्ट रूप से फलता है।

शनि दशम भाव में: सामान्य फल →

कुम्भ लग्न: शनि वृश्चिक राशि में

शत्रु राशिइस लग्न के लिए शुभ

कुम्भ लग्न का शनि दशम भाव में वृश्चिक राशि में पहुँचता है। वृश्चिक मंगल की राशि है और शनि के लिए शत्रु राशि; मंगल की तेज़ी और शनि की धीमी, नपी-तुली चाल यहाँ आपस में टकराती हैं। कार्यजीवन में यह कठिन, तकनीकी या दबाव वाले काम के रूप में दिखता है, जिसमें धैर्य और ज़िद दोनों लगते हैं: इंजीनियरिंग, खनन, ऊर्जा, शोध, जाँच-पड़ताल या संकट-प्रबंधन। करियर की दिशा तय करने में मंगल की स्थिति बड़ी भूमिका निभाती है, क्योंकि इस लग्न का दशमेश वही है। शनि द्वादश का भी स्वामी है: विदेश में काम, विदेशी कंपनियाँ, अस्पताल, शोध-संस्थान या पर्दे के पीछे की भूमिकाएँ यहाँ उभर सकती हैं। दशम में बैठा शनि तृतीय दृष्टि से द्वादश में अपनी राशि मकर को, सप्तम दृष्टि से चतुर्थ को और दशम दृष्टि से सप्तम में सिंह को देखता है; सिंह पर दृष्टि साझेदारों और वरिष्ठों से संबंधों में औपचारिक दूरी ला सकती है। शत्रु राशि होने पर भी शनि यहाँ मेहनत को व्यर्थ नहीं जाने देता; उसकी दशा में परिणाम देर से, पर ठोस आते हैं।

शनि दशम भाव में: सामान्य फल →

मीन लग्न: गुरु धनु राशि में

स्वराशिइस लग्न के लिए शुभ

मीन लग्न के लिए गुरु प्रथम के साथ दशम भाव का भी स्वामी है, और यहाँ वह दशम में अपनी ही राशि धनु में बैठता है। धनु गुरु की मूलत्रिकोण राशि भी है, इसलिए यहाँ वह पूरी सहजता और अधिकार के साथ काम करता है। अपनी राशि में केंद्र-स्थित गुरु से हंस योग बनता है। इस योग की पहचान ऐसी प्रतिष्ठा है जो ज्ञान और सदाचार से आती है, केवल पद से नहीं। अध्यापन, उच्च शिक्षा, कानून, न्याय, वित्तीय परामर्श, धार्मिक संस्थाएँ, प्रकाशन या मार्गदर्शन वाली कोई भी भूमिका ऐसे व्यक्ति को स्वाभाविक लगती है। दशम से गुरु द्वितीय, चतुर्थ और षष्ठ को देखता है: द्वितीय पर पंचम दृष्टि धन और परिवार को, चतुर्थ पर सप्तम दृष्टि घर और शिक्षा को, और षष्ठ पर नवम दृष्टि सेवा-भाव और प्रतिस्पर्धा में टिकाव को सहारा देती है। गुरु के उदार स्वभाव में ज़रूरत से अधिक ज़िम्मेदारियाँ ओढ़ लेने की प्रवृत्ति भी रहती है। गुरु का अस्त या पीड़ित होना फल घटाता है; उसकी दशा में यह योग पूरी तरह खिलता है।

गुरु दशम भाव में: सामान्य फल →

कब यह स्थिति साथ देती है

यह स्थिति सबसे अधिक तब फलती है जब लग्नेश दशम में बली हो। मेष लग्न में मंगल और मकर लग्न में शनि यहाँ उच्च के होते हैं, जबकि कन्या लग्न में बुध और मीन लग्न में गुरु स्वराशि में; चारों स्थितियों में पंच महापुरुष योग बनता है। वृषभ और वृश्चिक लग्न में लग्नेश मित्र राशि में रहता है, और सिंह लग्न में सूर्य शत्रु राशि के बावजूद दिग्बल पाता है। दशमेश का भी अच्छी स्थिति में होना, और दशम पर गुरु जैसे शुभ ग्रह की दृष्टि, फल को और पुष्ट करते हैं। लग्नेश या दशमेश की दशा में, जब गोचर भी दशम भाव को सक्रिय करे, पदोन्नति, नई ज़िम्मेदारी या अपना काम शुरू करने के अवसर आते हैं।

कब यह स्थिति कसौटी बनती है

खिंचाव तब दिखता है जब लग्नेश दशम में दुर्बल या पीड़ित हो। मिथुन लग्न में बुध नीच का होता है, और सिंह, तुला, धनु तथा कुम्भ लग्न में लग्नेश शत्रु राशि में; ऐसे में करियर की राह सीधी कम और घुमावदार अधिक होती है, या वरिष्ठों से तालमेल में मेहनत लगती है। एक और बात सभी लग्नों पर लागू होती है: दशम से लग्नेश चतुर्थ को देखता है, इसलिए काम की धुन में घर और अपनों के लिए समय घट सकता है। जब पहचान पूरी तरह पद पर टिकी हो, तो करियर का कोई झटका आत्म-सम्मान पर भी भारी पड़ता है। दशम उपचय भाव है, इसलिए यहाँ की दुर्बलता भी समय और परिश्रम से सुधरती है; दशमांश और दशा पूरी तस्वीर देते हैं।

बारहों भावों में लग्नेश

अपना लग्न जानें

जन्म तिथि, समय और स्थान से लग्न, लग्नेश, नवांश लग्न और चंद्र लग्न एक साथ।

लग्न कैलकुलेटर

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लग्नेश दशम भाव में हो तो क्या होता है?

व्यक्ति की पहचान उसके कर्म और करियर से जुड़ जाती है। वह महत्वाकांक्षी और परिश्रमी होता है, और समाज में अपने काम से स्थान बनाता है। दशम केंद्र और उपचय भाव दोनों है, इसलिए फल समय के साथ बढ़ता है। लग्नेश की राशि बताती है कि यह राह कितनी सहज होगी।

किस लग्न के लिए लग्नेश दशम भाव में सबसे अच्छा है?

मेष और मकर लग्न के लिए, जहाँ मंगल और शनि दशम में उच्च के होते हैं और रुचक व शश योग बनाते हैं। कन्या और मीन लग्न में बुध और गुरु दशम में स्वराशि के होते हैं, जिससे भद्र और हंस योग बनते हैं। वृषभ और वृश्चिक में लग्नेश मित्र राशि में रहता है। मिथुन लग्न में बुध नीच का होता है, इसलिए वहाँ नीचभंग की जाँच करें।

लग्नेश दशम भाव में हो तो करियर में सफलता कब मिलती है?

इसकी कोई तय आयु नहीं है। समय दशम भाव, दशमेश और चल रही दशा से पढ़ा जाता है: लग्नेश या दशमेश की दशा-अंतर्दशा में, जब शनि या गुरु का गोचर भी दशम भाव को सक्रिय करे, करियर में बड़े कदम उठते हैं। दशम उपचय भाव है, इसलिए यहाँ सफलता प्रायः अनुभव के साथ बढ़ती है।

क्या लग्नेश दशम में होने से सरकारी नौकरी मिलती है?

केवल इस स्थिति से नहीं। यह व्यक्ति को कर्म और पद की ओर ले जाती है, पर सरकारी क्षेत्र का संकेत मुख्यतः सूर्य, दशमेश और दशमांश कुंडली से मिलता है। सिंह लग्न में सूर्य स्वयं लग्नेश होकर दशम में दिग्बल पाता है, इसलिए वहाँ यह झुकाव अधिक दिखता है।

लग्नेश दशम में हो तो घर-परिवार पर क्या असर होता है?

दशम से हर लग्नेश सप्तम दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखता है, जो घर, माता और मन की शांति का भाव है। बली लग्नेश काम की कमाई से घर को सुख देता है; व्यस्त या पीड़ित लग्नेश घर के लिए समय कम कर सकता है। चतुर्थ भाव की राशि और उसके स्वामी की स्थिति देखकर यह संतुलन साफ़ होता है।

सूचना: यह पृष्ठ शास्त्रीय ज्योतिष सिद्धांतों पर आधारित शैक्षिक जानकारी देता है। व्यक्तिगत निर्णयों के लिए योग्य ज्योतिषी से परामर्श करें।