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लग्नेश एकादश भाव में

लाभ, आय और मित्र-मंडली की ओर बढ़ता स्वयं, बारहों लग्नों के लिए अलग-अलग

लाभ और संपर्कउपचय

लग्नेश एकादश भाव में हो तो व्यक्ति की ऊर्जा लाभ, आय, बड़े भाई-बहनों, मित्रों और संपर्कों की ओर बहती है। लक्ष्य तय करके उनकी ओर लगातार बढ़ना उसका स्वभाव बनता है, और लोगों से जुड़कर अवसर मिलते हैं। एकादश उपचय भाव है, इसलिए फल समय के साथ बढ़ता है; कितना, यह लग्नेश की राशि और बल बताते हैं।

आपका लग्नेश किस भाव में है?

जन्म तिथि, समय और स्थान भरें। आपका लग्नेश इसी भाव में हो तो आपका खंड नीचे मिलेगा।

जन्म तिथि
जन्म समय

मुफ़्त · खगोलीय गणना · लाहिरी अयनांश

संपूर्ण धन-अध्ययन

धन बोधDhan Bodh

लग्नेश एकादश भाव, यानी लाभ के भाव, में हो तो व्यक्ति और धन का सीधा संबंध बनता है। धन बोध आपकी अपनी कुंडली से धन के पाँचों स्वामियों और आय के छहों मार्गों को तौलता है।

धन के पाँच स्वामी · आय के छह मार्ग · होरा (D-2) · दशमांश (D-10) · चतुर्थांश (D-4) · साढ़े साती · विंशोत्तरी काल

एक बार का भुगतान · हिन्दी या अंग्रेज़ी · तुरंत डाउनलोड, और एक प्रति आपकी ईमेल पर।

कुंडली में धन एक प्रतिरूप है, आश्वासन नहीं। जहाँ कुंडली मौन है, रिपोर्ट यह कह देती है।

बारहों लग्नों के लिए लग्नेश एकादश भाव में

हर लग्न के लिए लग्नेश कौन है, इस भाव में वह किस राशि में पड़ता है, और वहाँ उसका बल।

लग्नलग्नेशराशिबलदूसरा भाव
मेष लग्नमंगलकुम्भसम राशिअष्टम भाव
वृषभ लग्नशुक्रमीनउच्चषष्ठ भाव
मिथुन लग्नबुधमेषसम राशिचतुर्थ भाव
कर्क लग्नचंद्रवृषभउच्चकेवल लग्न
सिंह लग्नसूर्यमिथुनसम राशिकेवल लग्न
कन्या लग्नबुधकर्कशत्रु राशिदशम भाव
तुला लग्नशुक्रसिंहशत्रु राशिअष्टम भाव
वृश्चिक लग्नमंगलकन्याशत्रु राशिषष्ठ भाव
धनु लग्नगुरुतुलाशत्रु राशिचतुर्थ भाव
मकर लग्नशनिवृश्चिकशत्रु राशिद्वितीय भाव
कुम्भ लग्नशनिधनुसम राशिद्वादश भाव
मीन लग्नगुरुमकरनीचदशम भाव

लग्नेश एकादश भाव में: इसका अर्थ

एकादश भाव लाभ का भाव है: नियमित आय, मेहनत का प्रतिफल, और वे इच्छाएँ जो समय के साथ पूरी होती हैं। यही भाव बड़े भाई-बहनों, मित्रों, सामाजिक दायरे, संस्थाओं और उन लोगों का है जिनके सहारे अवसर आप तक पहुँचते हैं। द्वितीय भाव जहाँ धन को सहेजने की बात करता है, वहीं एकादश धन के आने की राह दिखाता है। यह उपचय भाव भी है, यानी उन चार भावों (तृतीय, षष्ठ, दशम और एकादश) में से एक, जिनके फल समय और प्रयास के साथ बढ़ते जाते हैं। यहाँ पाप ग्रह भी अक्सर अच्छा फल देते हैं, क्योंकि इस भाव में संघर्ष बढ़त में बदलता है।

लग्नेश जब एकादश में आता है, तो स्वयं का भाव और लाभ का भाव सीधे जुड़ जाते हैं: आप स्वभाव से ही ऐसे रास्ते खोजते हैं जिनसे आय बढ़े, और लोगों के साथ काम करके आगे बढ़ते हैं। यह किसी निश्चित समृद्धि का वादा नहीं; यह बताता है कि आपका प्रयास किस दिशा में फल देता है। पंचम भाव एकादश से सप्तम स्थान पर है, इसलिए यहाँ बैठा हर लग्नेश पंचम को देखता है; बुद्धि, संतान, शिक्षा और रचनात्मकता भी इसी कारण फल का हिस्सा बनती हैं। चर लग्नों (मेष, कर्क, तुला, मकर) के लिए एकादश बाधक स्थान भी है, इसलिए वहाँ लाभ के साथ कुछ अड़चनें भी पढ़ी जाती हैं।

मेष लग्न: मंगल कुम्भ राशि में

सम राशिइस लग्न के लिए शुभ

मेष लग्न का मंगल एकादश भाव में कुम्भ राशि में होता है। कुम्भ शनि की राशि है और मंगल के लिए सम, और इस राशि में मंगल का जोश अकेले दौड़ने के बजाय समूह और व्यवस्था के साथ चलना सीखता है। एकादश उपचय भाव है, और मंगल जैसा ऊर्जावान ग्रह यहाँ प्रयास को लाभ में बदल सकता है: तकनीकी काम, इंजीनियरिंग, संगठन या समूह के नेतृत्व से आय बन सकती है। बड़े भाई-बहनों से संबंध सक्रिय रहते हैं, कभी सहयोग, कभी होड़। मंगल अष्टम भाव का भी स्वामी है, इसलिए अचानक लाभ, बीमा, साझा निवेश या शोध से जुड़ी आय की संभावना रहती है। यहाँ से वह द्वितीय (वृषभ), पंचम (सिंह) और षष्ठ (कन्या) को देखता है; द्वितीय पर दृष्टि कमाई को संचय से जोड़ती है, षष्ठ पर दृष्टि प्रतियोगिता में बढ़त देती है। मेष चर लग्न है और इसके लिए एकादश बाधक स्थान भी है, इसलिए लक्ष्य की राह में बीच-बीच में रुकावटें आ सकती हैं। कुम्भ का स्वामी शनि इस लग्न का दशमेश और एकादशेश है; उसकी स्थिति इस लाभ की स्थिरता तय करती है।

मेष लग्न के बारे में →

वृषभ लग्न: शुक्र मीन राशि में

उच्चइस लग्न के लिए शुभ

वृषभ लग्न के लिए एकादश भाव में बैठा लग्नेश विशेष रूप से बली है: शुक्र यहाँ मीन राशि में है, जो उसकी उच्च राशि है। उच्च का अर्थ है कि ग्रह अपने सबसे अच्छे रूप में होता है, और शुक्र की कोमलता, कला-बोध और संबंध बनाने की क्षमता पूरे निखार पर रहती है। लाभ के भाव में उच्च लग्नेश को परंपरा अच्छे संपर्कों, उदार मित्रों और इच्छाओं की पूर्ति से जोड़ती है। कला, संगीत, सौंदर्य, आतिथ्य, फ़ैशन या ऐसे काम से आय बन सकती है जिसमें रुचि और लोगों से मेल-जोल, दोनों हों। शुक्र षष्ठ भाव (तुला) का भी स्वामी है, इसलिए लाभ में सेवा और रोज़ की मेहनत का हिस्सा रहता है, और कभी कोई मित्र प्रतिस्पर्धी भी बन सकता है। यहाँ से शुक्र पंचम भाव कन्या को देखता है, जो उसकी नीच राशि है; प्रेम-संबंध, संतान या सट्टे जैसे जोखिम भरे निवेश में अपेक्षाएँ व्यावहारिक रखें। मीन का स्वामी गुरु इस लग्न का अष्टमेश और एकादशेश है; उसकी स्थिति लाभ के अचानक उतार-चढ़ाव बताती है। शुक्र अस्त हो तो उच्च का फल कुछ कम खुलता है।

वृषभ लग्न के बारे में →

मिथुन लग्न: बुध मेष राशि में

सम राशिइस लग्न के लिए शुभ

मिथुन लग्न का स्वामी बुध एकादश भाव में मेष राशि में पहुँचता है। मेष मंगल की राशि है, जिसे बुध सम मानता है; इसलिए बुध यहाँ न दबता है, न विशेष बल पाता है, पर मेष की गति उसकी सोच में तेज़ी भर देती है। आप जल्दी सौदे पहचानते हैं, बातचीत से अवसर बनाते हैं, और कई तरह के लोगों से संपर्क रखते हैं। व्यापार, बिक्री, संचार, मीडिया या कई छोटे स्रोतों से आय आ सकती है। बुध चतुर्थ भाव (कन्या) का भी स्वामी है, यानी एक केंद्र का स्वामी लाभ में है; घर, वाहन, भूमि या माता के सहयोग से लाभ के योग बनते हैं, और घर से चलने वाला काम भी आय दे सकता है। यहाँ से बुध पंचम भाव तुला को देखता है, जिससे पढ़ाई, लेखन और रचनात्मक रुचियों को सहारा मिलता है। मेष का स्वामी मंगल इस लग्न के लिए षष्ठ और एकादश का स्वामी है, इसलिए लाभ की राह में प्रतियोगिता भी रहती है। जल्दबाज़ी के वादे और अधूरे सौदे इस स्थिति की मुख्य परीक्षा हैं; बुध की दशा में फल सबसे स्पष्ट होता है।

बुध एकादश भाव में: सामान्य फल →

कर्क लग्न: चंद्र वृषभ राशि में

उच्चइस लग्न के लिए शुभ

कर्क लग्न का चंद्रमा एकादश भाव में वृषभ राशि में उच्च का होता है, और यह शास्त्रीय दृष्टि से उल्लेखनीय स्थिति है। चंद्रमा केवल कर्क का स्वामी है, इसलिए यह योग किसी और भाव का नहीं, सीधे आपके मन और स्वयं का है। उच्च चंद्रमा मन को स्थिर, संतुष्ट और लोगों के प्रति खुला रखता है; आप सहज ही अपनापन जगाते हैं, और यही गुण मित्रों और संपर्कों का दायरा बड़ा करता है। जनता से जुड़े काम, खाद्य, आतिथ्य, देखभाल या सौंदर्य से आय बन सकती है। वृषभ का स्वामी शुक्र इस लग्न के लिए चतुर्थ और एकादश का स्वामी है, इसलिए घर, वाहन और सुख-सुविधाएँ भी लाभ से जुड़ती हैं। यहाँ से चंद्रमा पंचम भाव वृश्चिक को देखता है, जो उसकी नीच राशि है; संतान और प्रेम के विषयों में भावनाएँ गहरी, कभी-कभी उथल-पुथल भरी रहती हैं। कर्क चर लग्न है, और इसके लिए एकादश बाधक स्थान भी गिना जाता है, इसलिए कुछ इच्छाएँ देर से पूरी होती हैं। शुक्ल पक्ष का बली चंद्रमा इस योग को पूरा खुलने देता है।

कर्क लग्न के बारे में →

सिंह लग्न: सूर्य मिथुन राशि में

सम राशिइस लग्न के लिए शुभ

सिंह लग्न के लिए सूर्य एकादश भाव में मिथुन राशि में आता है। मिथुन बुध की राशि है, जो सूर्य के लिए सम है; इसलिए सूर्य का तेज यहाँ न घटता है, न बढ़ता है, बल्कि बुद्धि और संवाद के रास्ते काम करता है। सूर्य स्वभाव से क्रूर ग्रह है, और उपचय भाव में क्रूर ग्रह अच्छे माने जाते हैं: संघर्ष से पीछे न हटने की आदत यहाँ बढ़त देती है। प्रभावशाली लोगों, सरकारी संस्थाओं, प्रशासन या किसी समूह के नेतृत्व से लाभ आ सकता है, और मित्र-मंडली में आप अगुआ रहते हैं। सूर्य केवल सिंह का स्वामी है, अतः यह योग पूरी तरह स्वयं का है। सूर्य जिस मिथुन में बैठा है, उसका स्वामी बुध धन भाव कन्या का भी स्वामी है; इसलिए आय बचत में बदले, यह बहुत कुछ बुध की मज़बूती पर टिका है। यहाँ से सूर्य पंचम भाव धनु को देखता है, जिससे संतान, शिक्षा और प्रतिष्ठा दिलाने वाली रचनात्मकता को बल मिलता है। मित्रों के बीच अहं का टकराव ही इस योग की मुख्य परीक्षा है।

सिंह लग्न के बारे में →

कन्या लग्न: बुध कर्क राशि में

शत्रु राशिइस लग्न के लिए शुभ

कन्या लग्न में बुध प्रथम और दशम भाव का स्वामी है, और एकादश में वह कर्क राशि में बैठता है, जो चंद्रमा की राशि है और बुध के लिए शत्रु राशि। शत्रु राशि में बुध का हिसाब कभी-कभी दोस्ती और लिहाज़ के आगे झुक जाता है: किसी परिचित का प्रस्ताव ठुकराना कठिन लगता है, और मित्रों का दायरा भी समय-समय पर बदलता रहता है। फिर भी स्थिति का मूल बल कम नहीं: यही बुध दशमेश भी है, इसलिए लाभ के भाव में बैठकर वह आपके काम को सीधे आय से जोड़ता है। सार्वजनिक सेवा, देखभाल, शिक्षा, खाद्य या जनता से जुड़ा व्यापार अच्छे साधन बन सकते हैं। कर्क का स्वामी चंद्रमा इस लग्न का एकादशेश है; बली चंद्रमा इन संपर्कों को टिकाऊ बनाता है। यहाँ से बुध पंचम भाव मकर को देखता है, जो पढ़ाई और योजनाओं में गंभीरता और अनुशासन लाता है। भावना के आधार पर किए गए आर्थिक वादों में सावधानी रखें; बुध की दशा में यह स्थिति सबसे स्पष्ट दिखती है।

बुध एकादश भाव में: सामान्य फल →

तुला लग्न: शुक्र सिंह राशि में

शत्रु राशिइस लग्न के लिए शुभ

तुला लग्न के लिए शुक्र एकादश भाव में सिंह राशि में होता है। सिंह सूर्य की राशि है, और सूर्य को शुक्र अपना शत्रु मानता है; शत्रु राशि में शुक्र की सहजता पर दबाव रहता है। संबंध बनाने की कला बनी रहती है, पर संपर्कों में पद और अहं का प्रश्न बार-बार उठता है। प्रभावशाली या सत्ता से जुड़े लोगों से लाभ आ सकता है, और कला, मनोरंजन या विलासिता का काम आय दे सकता है, पर ऐसे संपर्कों के साथ शर्तें भी रहती हैं। शुक्र अष्टम भाव (वृषभ) का भी स्वामी है; विरासत, जीवनसाथी के धन या साझा निवेश से आय की संभावना रहती है, और लग्नेश होने से उस पर अष्टमेश का दोष नहीं गिना जाता। यहाँ से शुक्र पंचम भाव कुम्भ को देखता है, जो रचनात्मक रुचियों और मित्रता से शुरू होने वाले प्रेम-संबंधों को सहारा देता है। तुला चर लग्न है, इसलिए एकादश इसका बाधक स्थान भी है; लाभ आता है, पर देर से और कुछ अड़चनों के बाद। सिंह का स्वामी सूर्य इस लग्न का एकादशेश है, और उसकी स्थिति बहुत कुछ तय करती है।

वृश्चिक लग्न: मंगल कन्या राशि में

शत्रु राशिइस लग्न के लिए सम

वृश्चिक लग्न का मंगल एकादश भाव में कन्या राशि में पहुँचता है। कन्या बुध की राशि है, और बुध मंगल का शत्रु है; शत्रु राशि में मंगल का जोश बारीक हिसाब और आलोचना के साथ खिंचाव में रहता है। फिर भी उपचय भाव मंगल जैसे ग्रह को रास आता है: विश्लेषण, तकनीक, चिकित्सा, शोध या कठिन प्रतियोगिता में की गई मेहनत लाभ बनती है। मंगल इस लग्न के लिए षष्ठ भाव (मेष) का भी स्वामी है, इसीलिए उसकी कार्यात्मक भूमिका तटस्थ गिनी जाती है; और यहाँ से वह ठीक उसी षष्ठ भाव को, यानी अपनी दूसरी राशि मेष को देखता है। इससे प्रतियोगियों पर बढ़त और सेवा-क्षेत्र में सफलता के योग मज़बूत होते हैं, पर कुछ मित्र प्रतिद्वंद्वी भी बन सकते हैं। उसकी दृष्टि द्वितीय (धनु) और पंचम (मीन) पर भी है: बोली में धार, और संतान या पढ़ाई के विषयों में सक्रियता। कन्या का स्वामी बुध इस लग्न का अष्टमेश और एकादशेश है, इसलिए लाभ में अचानक बदलाव भी आ सकते हैं। मंगल की दशा में धैर्य रखें, तो यह संघर्ष अधिक फल देता है।

धनु लग्न: गुरु तुला राशि में

शत्रु राशिइस लग्न के लिए शुभ

धनु लग्न का गुरु एकादश भाव में तुला राशि में होता है। तुला शुक्र की राशि है, और गुरु शुक्र को शत्रु मानता है; इसलिए शत्रु राशि में गुरु के सिद्धांत और तुला का व्यवहार-कुशल, सुख-प्रिय स्वभाव आपस में खिंचते रहते हैं। लाभ अक्सर परामर्श, शिक्षण, विधि, साझेदारी या ऐसे काम से आता है जिसमें संतुलन और समझौता चाहिए, पर कभी-कभी लगता है कि लाभ के लिए अपने मूल्यों से थोड़ा हटना पड़ रहा है। गुरु चतुर्थ भाव (मीन) का भी स्वामी है, इसलिए संपत्ति, घर और शिक्षा भी लाभ से जुड़ते हैं। यहाँ से गुरु की तीन दृष्टियाँ पड़ती हैं: तृतीय (कुम्भ) पर, जिससे साहस और संवाद को सहारा मिलता है; पंचम (मेष) पर, जो संतान और बुद्धि को बल देती है; और सप्तम (मिथुन) पर, जो विवाह और साझेदारी को शुभ आधार देती है। तुला का स्वामी शुक्र इस लग्न का षष्ठेश और एकादशेश है, इसलिए मित्र और प्रतिस्पर्धी की रेखा कभी-कभी धुँधली हो जाती है। शुक्र की स्थिति और गुरु की दशा मिलकर बताती हैं कि यह खिंचाव कितना रहेगा।

मकर लग्न: शनि वृश्चिक राशि में

शत्रु राशिइस लग्न के लिए शुभ

मकर लग्न में शनि प्रथम और द्वितीय भाव का स्वामी है, और एकादश में वह वृश्चिक राशि में बैठता है। वृश्चिक मंगल की राशि है, जो शनि के लिए शत्रु राशि है; इसलिए लाभ आसानी से नहीं, कड़ी और कभी-कभी टकराव भरी मेहनत से आता है। फिर भी शास्त्रीय दृष्टि से यह स्थिति उल्लेखनीय है: द्वितीय भाव के स्वामी का एकादश में होना, यानी संचय और लाभ के भावों का जुड़ना, पारंपरिक धन योग का एक रूप है, और यहाँ वह ग्रह स्वयं लग्नेश भी है। शोध, खनन, बीमा, तकनीक या संकट में काम आने वाले क्षेत्रों से आय बन सकती है। यहाँ से शनि प्रथम (मकर), पंचम (वृषभ) और अष्टम (सिंह) को देखता है; लग्न में अपनी ही राशि को देखकर वह स्वास्थ्य और आत्मबल को सहारा देता है। मकर चर लग्न है, इसलिए एकादश इसका बाधक स्थान भी है; बड़ी इच्छाएँ धीरज माँगती हैं। वृश्चिक का स्वामी मंगल यहाँ चतुर्थ (घर और सुख) का भी स्वामी है, इसलिए लाभ की गति घर-परिवार की स्थिरता से भी जुड़ती है। द्वितीय का स्वामी होने से शनि की दशा में स्वास्थ्य के प्रति सजग रहें।

कुम्भ लग्न: शनि धनु राशि में

सम राशिइस लग्न के लिए शुभ

कुम्भ लग्न का शनि एकादश भाव में धनु राशि में आता है। धनु गुरु की राशि है और शनि के लिए सम है; इसलिए शनि यहाँ बिना विशेष बाधा के, अपने अनुशासन को गुरु के आदर्शों से जोड़कर काम करता है। संस्थाओं, समाज-सेवा, शिक्षा, धार्मिक संगठनों या बड़े नेटवर्क के माध्यम से धीमा पर भरोसेमंद लाभ आता है, और मित्र कम पर स्थायी होते हैं। शनि इस लग्न के लिए द्वादश भाव (मकर) का भी स्वामी है; विदेश, दूर स्थानों या विदेशी संपर्कों से आय के योग बनते हैं, पर बढ़ती आय के साथ व्यय भी बढ़ता है, इसलिए हिसाब सधा रखें। यहाँ से शनि प्रथम (कुम्भ), पंचम (मिथुन) और अष्टम (कन्या) को देखता है; अपनी ही राशि वाले लग्न पर उसकी दृष्टि शरीर और स्वभाव में दृढ़ता लाती है। धनु के स्वामी गुरु के हाथ में इस लग्न के लिए लाभ के साथ धन भाव (मीन) भी है; गुरु जितना सुदृढ़ हो, यह लाभ उतना टिकाऊ बनता है। बड़े भाई-बहनों से संबंध ज़िम्मेदारी भरे रहते हैं। शनि वक्री हो तो लाभ के रास्ते घुमावदार हो सकते हैं।

मीन लग्न: गुरु मकर राशि में

नीचइस लग्न के लिए शुभ

मीन लग्न में एकादश भाव में बैठा लग्नेश दोहरी तस्वीर देता है: गुरु यहाँ मकर राशि में है, जो उसकी नीच राशि है। नीच गुरु अपनी उदारता और दूरदृष्टि पूरी तरह नहीं दिखा पाता; लाभ के मामलों में वह अधिक व्यावहारिक, कभी-कभी संकोची हो जाता है, और मित्रों या संस्थाओं से जुड़ी अपेक्षाएँ पूरी होने में देर लगती है। उपचय भाव होने से समय के साथ यह स्थिति सुधरती है। गुरु दशम भाव (धनु) का भी स्वामी है, यानी एक ही ग्रह स्वयं और कर्म, दोनों का स्वामी होकर लाभ में है; काम लाभ का रास्ता बनता है, पर पहचान धीरे मिलती है। यहाँ से गुरु तृतीय (वृषभ), पंचम (कर्क) और सप्तम (कन्या) को देखता है; कर्क गुरु की उच्च राशि है, इसलिए संतान, शिक्षा और विवेक पर उसकी दृष्टि विशेष रूप से अच्छी मानी जाती है। मकर का स्वामी शनि इस लग्न का एकादशेश और द्वादशेश है; शनि लग्न या चंद्रमा से केंद्र में हो, तो नीच भंग माना जाता है और यह कमज़ोरी काफ़ी हद तक संभल जाती है। गुरु की दशा में धैर्य सबसे बड़ा सहारा है।

कब यह स्थिति साथ देती है

यह स्थिति सबसे अधिक तब खिलती है जब लग्नेश उच्च राशि में या अच्छे बल में हो, अस्त न हो, और एकादश भाव के स्वामी से उसका अच्छा संबंध हो। बारहों में वृषभ लग्न का उच्च शुक्र और कर्क लग्न का उच्च चंद्रमा इसके सबसे स्पष्ट उदाहरण हैं। उपचय भाव होने से फल समय और प्रयास के साथ बढ़ता है, अतः लगातार मेहनत करने वाले इससे अधिक पाते हैं। लग्नेश की दशा या अंतर्दशा में नए संपर्क बनते हैं, आय के स्रोत बढ़ते हैं और लंबे समय से रुकी इच्छाएँ आगे बढ़ती हैं। पंचम पर दृष्टि बली हो तो बुद्धि और रचनात्मकता भी लाभ का साधन बनती हैं।

कब यह स्थिति कसौटी बनती है

लग्नेश नीच या शत्रु राशि में हो, अस्त हो, या पाप ग्रहों से पीड़ित हो, तो यही स्थिति परीक्षा लेती है। तब लाभ देर से आता है, मित्रों से अपेक्षाएँ अधूरी रहती हैं, और कभी आय की दौड़ में स्वास्थ्य या परिवार पीछे छूट जाते हैं। चर लग्नों के लिए एकादश बाधक स्थान भी है, इसलिए मेष, कर्क, तुला और मकर लग्न में लक्ष्य की राह में रुकावटें अधिक दिख सकती हैं। ये रुकावटें स्थायी नहीं होतीं; नीच भंग, शुभ दृष्टि, बली एकादशेश या अनुकूल दशा इन्हें बहुत हद तक हल्का कर देते हैं। केवल इस एक स्थिति से जीवन का निष्कर्ष न निकालें; पूरी कुंडली साथ देखें।

बारहों भावों में लग्नेश

अपना लग्न जानें

जन्म तिथि, समय और स्थान से लग्न, लग्नेश, नवांश लग्न और चंद्र लग्न एक साथ।

लग्न कैलकुलेटर

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लग्नेश एकादश भाव में हो तो क्या आय अच्छी होती है?

यह स्थिति आय और लाभ की ओर स्वाभाविक झुकाव देती है: आप अवसर पहचानते हैं और लोगों के साथ मिलकर आगे बढ़ते हैं। आय कितनी और कब बढ़ेगी, यह लग्नेश की राशि, उसके बल, एकादश भाव के स्वामी और चल रही दशा पर निर्भर है। उपचय भाव होने से फल समय के साथ बढ़ता है, पर इस योग से कोई निश्चित राशि या समृद्धि नहीं बताई जा सकती।

किस लग्न के लिए लग्नेश एकादश भाव में सबसे अच्छा है?

राशि-बल के हिसाब से वृषभ लग्न (शुक्र मीन में उच्च) और कर्क लग्न (चंद्रमा वृषभ में उच्च) सबसे आगे हैं। मेष, मिथुन, सिंह और कुम्भ लग्न में लग्नेश यहाँ सम राशि में होता है। कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु और मकर लग्न में वह शत्रु राशि में है, यद्यपि मकर लग्न में शनि द्वितीय का स्वामी होने से धन योग का रूप बनाता है। मीन लग्न में गुरु नीच का होता है; उसे नीच भंग और दृष्टियों के साथ पढ़ें।

लग्नेश एकादश भाव में हो तो बड़े भाई-बहनों से संबंध कैसे रहते हैं?

एकादश भाव बड़े भाई-बहनों का भी है, इसलिए लग्नेश यहाँ हो तो उनसे जुड़ाव जीवन में महत्वपूर्ण रहता है। लग्नेश बली हो तो उनसे सहयोग और साथ मिलता है; शत्रु राशि में या पीड़ित हो तो संबंध में होड़ या ज़िम्मेदारी का बोझ दिख सकता है। एकादश भाव के स्वामी की स्थिति भी साथ में देखें।

चर लग्न में लग्नेश एकादश भाव में हो तो बाधक स्थान का क्या असर होता है?

मेष, कर्क, तुला और मकर जैसे चर लग्नों के लिए एकादश भाव बाधक स्थान माना जाता है, यानी वह भाव जो कामों में अड़चन से जुड़ा है। इसका अर्थ यह नहीं कि लाभ नहीं होगा; अर्थ इतना है कि कुछ इच्छाएँ देर से या शर्तों के साथ पूरी होती हैं। लग्नेश बली हो, जैसे कर्क लग्न का उच्च चंद्रमा, तो यह अड़चन बहुत हल्की पड़ जाती है।

लग्नेश एकादश भाव में हो तो संतान और शिक्षा पर क्या असर होता है?

पंचम भाव एकादश से सप्तम स्थान पर है, इसलिए यहाँ बैठा लग्नेश हमेशा पंचम को देखता है। इससे संतान, शिक्षा, बुद्धि और रचनात्मक कामों में आपकी सीधी रुचि और भागीदारी रहती है। दृष्टि का स्वर लग्नेश पर निर्भर है: गुरु की दृष्टि सबसे शुभ मानी जाती है, जबकि मंगल या शनि की दृष्टि अनुशासन और कभी-कभी दबाव लाती है।

सूचना: यह पृष्ठ शास्त्रीय ज्योतिष सिद्धांतों पर आधारित शैक्षिक जानकारी देता है। व्यक्तिगत निर्णयों के लिए योग्य ज्योतिषी से परामर्श करें।