लग्नेश नवम भाव में हो तो व्यक्ति का अपना स्वभाव और प्रयास भाग्य से जुड़ जाते हैं। नवम धर्म, पिता, गुरु, उच्च शिक्षा और लंबी यात्राओं का भाव है, और इसे सबसे बली त्रिकोण माना जाता है। इसलिए यह स्थिति सामान्यतः शुभ है; कितनी शुभ, यह लग्नेश की राशि, उसके बल और चल रही दशा से तय होता है।
आपका लग्नेश किस भाव में है?
जन्म तिथि, समय और स्थान भरें। आपका लग्नेश इसी भाव में हो तो आपका खंड नीचे मिलेगा।
मुफ़्त · खगोलीय गणना · लाहिरी अयनांश
लग्नेश नवम भाव में है, पर फल पूरी कुंडली से तय होता है।
सम्पूर्ण जन्म कुंडली रिपोर्ट आपकी कुंडली से बारहों भावेश, विंशोत्तरी दशा, योग और दोष एक साथ पढ़ती है।
बारहों लग्नों के लिए लग्नेश नवम भाव में
हर लग्न के लिए लग्नेश कौन है, इस भाव में वह किस राशि में पड़ता है, और वहाँ उसका बल।
| लग्न | लग्नेश | राशि | बल | दूसरा भाव |
|---|---|---|---|---|
| मेष लग्न | मंगल | धनु | मित्र राशि | अष्टम भाव |
| वृषभ लग्न | शुक्र | मकर | मित्र राशि | षष्ठ भाव |
| मिथुन लग्न | बुध | कुम्भ | सम राशि | चतुर्थ भाव |
| कर्क लग्न | चंद्र | मीन | सम राशि | केवल लग्न |
| सिंह लग्न | सूर्य | मेष | उच्च | केवल लग्न |
| कन्या लग्न | बुध | वृषभ | मित्र राशि | दशम भाव |
| तुला लग्न | शुक्र | मिथुन | मित्र राशि | अष्टम भाव |
| वृश्चिक लग्न | मंगल | कर्क | नीच | षष्ठ भाव |
| धनु लग्न | गुरु | सिंह | मित्र राशि | चतुर्थ भाव |
| मकर लग्न | शनि | कन्या | मित्र राशि | द्वितीय भाव |
| कुम्भ लग्न | शनि | तुला | उच्च | द्वादश भाव |
| मीन लग्न | गुरु | वृश्चिक | मित्र राशि | दशम भाव |
लग्नेश नवम भाव में: इसका अर्थ
नवम भाव को भाग्य भाव और धर्म भाव कहा जाता है। यहाँ से पिता, गुरु, आध्यात्मिक मार्गदर्शक, उच्च शिक्षा, तीर्थ, लंबी यात्राएँ और जीवन के नैतिक आधार पढ़े जाते हैं। पंचम भाव जहाँ पूर्व पुण्य को दिखाता है, वहीं नवम बताता है कि वह पुण्य इस जीवन में भाग्य बनकर कैसे सामने आता है। जब लग्नेश, यानी स्वयं व्यक्ति का प्रतिनिधि ग्रह, यहाँ बैठता है, तो स्वभाव और जीवन की दिशा धर्म और भाग्य की ओर झुकती है। ऐसे लोग प्रायः किसी आदर्श, परंपरा या शिक्षक से गहराई से प्रभावित होते हैं, और जीवन में कई बार सही समय पर सही व्यक्ति या अवसर उनके सामने आता है।
लग्न और नवम, दोनों त्रिकोण हैं, और नवम इनमें सबसे बली गिना जाता है। लग्नेश के नवम में जाने से कुंडली के दो श्रेष्ठ भाव जुड़ते हैं: स्वयं का भाव और भाग्य का भाव। सीधे शब्दों में, व्यक्ति का अपना प्रयास भाग्य को जगाता है; उसके लिए भाग्य बाहर से आने वाली चीज़ कम, अपने कर्म और आचरण से बनने वाली चीज़ अधिक है। फिर भी राशि का फ़र्क बड़ा है। उच्च लग्नेश इस भाव में असाधारण सहारा देता है, नीच लग्नेश भाग्य तक पहुँचने के लिए अधिक परिश्रम माँगता है। स्थिर लग्नों (वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ) के लिए नवम बाधक स्थान भी माना जाता है, इसलिए वहाँ अवसर बड़े होते हुए भी राह में अड़चनें आ सकती हैं।
मेष लग्न: मंगल धनु राशि में
मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ
मेष लग्न का स्वामी मंगल नवम भाव में धनु राशि में बैठता है। धनु गुरु की राशि है, और गुरु मंगल का मित्र है; यहाँ मंगल का साहस धर्म और सिद्धांत की सेवा में लगता है। व्यक्ति अपनी आस्था पर डटा रहता है और उस पर बहस से भी पीछे नहीं हटता। मंगल इस लग्न के लिए अष्टम भाव (वृश्चिक) का भी स्वामी है। अष्टम और नवम का यह जुड़ाव गूढ़ ज्ञान, ज्योतिष या शोध में रुचि देता है, और भाग्य में कभी-कभी अचानक मोड़ भी लाता है। पिता से संबंध ऊर्जावान, पर कभी-कभी टकराव भरा हो सकता है। मंगल चतुर्थ दृष्टि से द्वादश भाव को, सप्तम दृष्टि से तृतीय को और अष्टम दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखता है। तृतीय पर दृष्टि पराक्रम और यात्राओं को बल देती है, द्वादश पर विदेश से जुड़ाव दिखाती है; चतुर्थ में कर्क है, जो मंगल की नीच राशि है, इसलिए घर के वातावरण में कभी तनाव आ सकता है। गुरु बली हो, तो यह मंगल धर्म और भाग्य, दोनों में अच्छा फल देता है; मंगल की दशा में लंबी यात्रा या उच्च शिक्षा के अवसर बनते हैं।
वृषभ लग्न: शुक्र मकर राशि में
मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ
वृषभ लग्न में शुक्र नवम भाव में मकर राशि में होता है, जो उसके मित्र शनि की राशि है। वृषभ लग्न के लिए शनि नवम और दशम का स्वामी होकर योगकारक है, इसलिए लग्नेश यहाँ भाग्य और कर्म, दोनों के स्वामी की राशि में बैठता है। मकर में शुक्र की रुचियाँ परिपक्व और व्यावहारिक होती हैं: व्यक्ति परंपरा का सम्मान करता है, शास्त्रीय संगीत, पुरानी कला या स्थापत्य में गहराई देखता है, और धर्म को आचरण के रूप में जीता है। शुक्र इस लग्न के लिए षष्ठ भाव (तुला) का भी स्वामी है; इसलिए भाग्य बिना श्रम के नहीं, मेहनत, सेवा और प्रतियोगिता से होकर आता है। उच्च शिक्षा में कानून, चिकित्सा या प्रबंधन अनुकूल रहते हैं। शुक्र की सप्तम दृष्टि तृतीय भाव पर है, जहाँ कर्क राशि है; लेखन, संवाद, छोटे भाई-बहन और अपना पराक्रम भाग्य को सहारा देते हैं। स्थिर लग्न होने से नवम यहाँ बाधक स्थान भी है, इसलिए अवसर देर से या कुछ अड़चनों के बाद आ सकते हैं। शनि की स्थिति साथ में पढ़ें; शुक्र की दशा पिता, गुरु और यात्रा के विषय सक्रिय करती है।
मिथुन लग्न: बुध कुम्भ राशि में
सम राशिइस लग्न के लिए शुभ
मिथुन लग्न का स्वामी बुध नवम भाव में कुम्भ राशि में आता है। कुम्भ शनि की राशि है, और बुध के लिए यह सम राशि है। कुम्भ की बौद्धिक, मानवतावादी और भविष्य की ओर देखने वाली प्रकृति बुध की जिज्ञासा को बड़े प्रश्नों की ओर ले जाती है। व्यक्ति धर्म को तर्क से समझना चाहता है; दर्शन, समाजशास्त्र, विज्ञान या तकनीक की उच्च शिक्षा उसे आकर्षित करती है, और वह बिना परखे कोई बात नहीं मानता। बुध इस लग्न के लिए चतुर्थ भाव (कन्या) का भी स्वामी है, यानी एक केंद्र का; नवम में बैठा यह केंद्रेश घर, माता और भीतरी सुख को भाग्य से जोड़ता है, और भाग्योदय में माता का सहारा भूमिका निभा सकता है। बुध की सप्तम दृष्टि तृतीय भाव पर है, जहाँ सिंह राशि है; लेखन, प्रकाशन और संवाद से पहचान बनती है। मिथुन लग्न के लिए नवमेश शनि अष्टम का भी स्वामी है, इसलिए शनि की स्थिति इस बुध के फल को बहुत प्रभावित करती है।
कर्क लग्न: चंद्र मीन राशि में
सम राशिइस लग्न के लिए शुभ
कर्क लग्न का चंद्रमा नवम भाव में मीन राशि में होता है। चंद्रमा का कोई शत्रु ग्रह नहीं, और मीन के स्वामी गुरु को वह सम मानता है; इसलिए यह सम राशि है। फिर भी जल राशि का स्वामी जल राशि में सहज रहता है, और मीन की करुणा, कल्पना और भक्ति चंद्रमा के स्वभाव से मेल खाती हैं। चंद्रमा केवल लग्न का स्वामी है, इसलिए यहाँ कोई दूसरा भाव नहीं जुड़ता; जो है, वह मन और शरीर का धर्म की ओर झुकाव है। ऐसा व्यक्ति भावपूर्ण आस्था रखता है, तीर्थ और पवित्र नदियों की ओर खिंचता है, और गुरुजनों का गहरा आदर करता है। समुद्र-पार यात्रा या विदेश में पढ़ाई के संकेत भी मिलते हैं। पिता से भावनात्मक संबंध गहरा होता है। सामने के तृतीय भाव (कन्या) पर चंद्रमा की दृष्टि लेखन, संवाद और छोटी यात्राओं में मन लगाती है। चंद्रमा तेज़ी से बदलता है, इसलिए उसका पक्ष-बल यहाँ अहम है; शुक्ल पक्ष का बली चंद्र भाग्य को अधिक स्थिर सहारा देता है, और तीर्थ या विदेश-यात्रा के अवसर प्रायः चंद्रमा की दशा में ही आते हैं।
सिंह लग्न: सूर्य मेष राशि में
उच्चइस लग्न के लिए शुभ
सिंह लग्न के लिए यह स्थिति शास्त्रीय दृष्टि से विशेष है: लग्नेश सूर्य नवम भाव में मेष राशि में बैठता है, जहाँ वह उच्च का होता है। उच्च सूर्य आत्मबल, नेतृत्व और प्रतिष्ठा को पूरी शक्ति से देता है, और नवम में यह शक्ति धर्म, पिता और भाग्य की ओर बहती है। ऐसे व्यक्ति के पिता प्रायः प्रभावशाली या सम्मानित होते हैं, या व्यक्ति स्वयं अपने परिवार में धर्म और मर्यादा का प्रतिनिधि बनता है। सूर्य केवल लग्न का स्वामी है, इसलिए कोई दूसरा भाव बीच में नहीं आता; भाग्य सीधे व्यक्ति के अपने चरित्र और साहस से जुड़ता है। प्रशासन, शासन, कानून, धार्मिक संस्थाओं या उच्च शिक्षा में नेतृत्व स्वाभाविक है। सूर्य की सप्तम दृष्टि तृतीय भाव पर पड़ती है, जहाँ तुला राशि है; पराक्रम, पहल और सार्वजनिक वाणी को बल मिलता है। स्थिर लग्न होने से नवम यहाँ बाधक स्थान भी है, और नवमेश मंगल बाधकेश; इसलिए मंगल की स्थिति भी देखें। सूर्य की दशा इस स्थिति का सबसे उजला समय होती है।
कन्या लग्न: बुध वृषभ राशि में
मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ
कन्या लग्न का स्वामी बुध नवम भाव में वृषभ राशि में बैठता है, जो उसके मित्र शुक्र की राशि है। कन्या लग्न के लिए शुक्र द्वितीय और नवम का स्वामी है, यानी धन और भाग्य, दोनों का; लग्नेश का इसी शुक्र की राशि में होना भाग्य और धन के बीच सुखद संबंध बनाता है। वृषभ की स्थिरता बुध की चंचलता को ठहराव देती है: व्यक्ति सोच-समझकर विश्वास करता है, और एक बार मान ले तो उस पर टिका रहता है। बुध इस लग्न के लिए दशम भाव (मिथुन) का भी स्वामी है, और यही इस स्थिति को सबसे अर्थपूर्ण बनाता है: स्वयं और कर्म, दोनों का स्वामी भाग्य के भाव में बैठा है। कर्म और भाग्य का यह मेल शिक्षा, प्रकाशन, बैंकिंग, परामर्श या किसी गुरु-परंपरा से जुड़े काम में उन्नति का संकेत है, और पिता या गुरु करियर की दिशा तय करने में भूमिका निभा सकते हैं। तृतीय भाव की वृश्चिक राशि पर उसकी दृष्टि लेखन और संवाद में गहराई लाती है। बुध की दशा में करियर और उच्च शिक्षा प्रायः साथ-साथ आगे बढ़ते हैं, बशर्ते बुध सूर्य के बहुत निकट न हो।
तुला लग्न: शुक्र मिथुन राशि में
मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ
तुला लग्न के लिए शुक्र नवम भाव में मिथुन राशि में होता है, जो उसके मित्र बुध की राशि है। वायु तत्त्व की यह राशि शुक्र को विचारशील, भाषा-प्रेमी और संवाद-प्रिय बनाती है। व्यक्ति का धर्म भी बातचीत से खुलता है: वह अलग-अलग परंपराओं को जानना चाहता है, ग्रंथों से अधिक लोगों से सीखता है, और कला, साहित्य या भाषाओं की उच्च शिक्षा उसे भाती है। यात्राएँ उसके लिए सीखने का साधन बनती हैं। शुक्र इस लग्न के लिए अष्टम भाव (वृषभ) का भी स्वामी है। अष्टमेश का नवम में होना भाग्य में उतार-चढ़ाव या अप्रत्याशित मोड़ ला सकता है, पर साथ ही गूढ़ विद्या, ज्योतिष और शोध में गहरी रुचि भी देता है; ससुराल या साझे संसाधनों से भी भाग्य को सहारा मिल सकता है। पिता के साथ संबंध मित्रवत, पर समय-समय पर बदलता रहता है। तृतीय भाव की धनु राशि को देखकर शुक्र लेखन, प्रस्तुति और यात्रा का उत्साह बढ़ाता है। तुला लग्न के लिए नवमेश बुध द्वादश का भी स्वामी है, इसलिए बुध की स्थिति विदेश और व्यय के विषय भी बताती है।
वृश्चिक लग्न: मंगल कर्क राशि में
नीचइस लग्न के लिए सम
इस पृष्ठ पर सबसे सावधानी से पढ़ने वाली स्थिति वृश्चिक लग्न की है। लग्नेश मंगल नवम भाव में कर्क राशि में आता है, जहाँ वह नीच होता है। जल राशि में मंगल की आग धीमी पड़ती है; साहस बना रहता है, पर वह सीधे प्रहार के बजाय भावनाओं के रास्ते से चलता है। व्यक्ति अपने विश्वासों को लेकर बहुत संवेदनशील हो सकता है, और पिता या गुरु के साथ संबंध में भावनात्मक उतार-चढ़ाव रहते हैं। मंगल इस लग्न के लिए षष्ठ भाव (मेष) का भी स्वामी है, और इसी कारण उसकी कार्यात्मक भूमिका यहाँ तटस्थ मानी जाती है; भाग्य संघर्ष और सेवा से होकर आता है। स्थिर लग्न होने से नवम बाधक स्थान भी है। उसकी दृष्टियों में सबसे अहम तृतीय भाव पर पड़ने वाली दृष्टि है, जहाँ मकर, यानी मंगल की उच्च राशि है; इसलिए अपने पराक्रम और परिश्रम से व्यक्ति वह पाता है जो भाग्य सहज नहीं देता। चंद्रमा लग्न से केंद्र में हो, या शनि लग्न अथवा चंद्रमा से केंद्र में हो, तो नीचभंग होता है, और मंगल की दशा अपेक्षा से बेहतर फल दे सकती है।
धनु लग्न: गुरु सिंह राशि में
मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ
धनु लग्न के लिए गुरु लग्नेश है, और नवम भाव में वह सिंह राशि में होता है, जो उसके मित्र सूर्य की राशि है। गुरु स्वयं भाग्य, धर्म और मार्गदर्शन का नैसर्गिक कारक है, इसलिए कारक का अपने ही भाव में होना यहाँ फल को गहराई देता है। सिंह में गुरु का ज्ञान गरिमा और अधिकार के साथ प्रकट होता है; व्यक्ति शिक्षक, मार्गदर्शक या किसी शिक्षा-संस्था के प्रमुख की भूमिका में सहज रहता है। गुरु इस लग्न के लिए चतुर्थ भाव (मीन) का भी स्वामी है; लग्नेश और केंद्रेश के रूप में नवम में बैठा गुरु घर, संपत्ति और मन की शांति को भाग्य से जोड़ता है। यहाँ से गुरु की पंचम दृष्टि लौटकर लग्न, यानी अपनी ही धनु राशि पर पड़ती है, जिससे अपने विवेक पर भरोसा बढ़ता है; नवम दृष्टि पंचम भाव की बुद्धि और संतान को पुष्ट करती है, और सप्तम दृष्टि तृतीय भाव के साहस को दिशा देती है। नवमेश सूर्य की स्थिति भी साथ में पढ़ें, क्योंकि गुरु उसी की राशि में है; गुरु की दशा उच्च शिक्षा, तीर्थ और मार्गदर्शन के अवसर लाती है।
मकर लग्न: शनि कन्या राशि में
मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ
मकर लग्न का स्वामी शनि नवम भाव में कन्या राशि में बैठता है, जो उसके मित्र बुध की राशि है। शनि का धर्म कर्तव्य का धर्म है, और कन्या की विश्लेषण-प्रिय, सेवाभावी प्रकृति उसे और व्यावहारिक बनाती है। ऐसा व्यक्ति कर्मकांड से अधिक नियम, अनुशासन और ईमानदार परिश्रम को धर्म मानता है। उसके लिए भाग्य कोई अचानक मिली सौगात नहीं, लंबी लगन का जोड़ है। शनि इस लग्न के लिए द्वितीय भाव (कुम्भ) का भी स्वामी है; इसलिए धन, परिवार और वाणी भाग्य से जुड़ते हैं, और परिवार की परंपरा या संचित धन उच्च शिक्षा में सहायक हो सकता है। लेखा, विधि, शोध, चिकित्सा या प्रशासन में उच्च अध्ययन अनुकूल है। शनि की तृतीय दृष्टि एकादश पर, सप्तम दृष्टि तृतीय पर और दशम दृष्टि षष्ठ भाव पर पड़ती है; लाभ स्थिर रहते हैं, प्रयास में धैर्य रहता है, और प्रतियोगिता में व्यक्ति टिके रहकर आगे निकलता है। पिता से संबंध सम्मान का, पर कुछ औपचारिक हो सकता है। मकर लग्न के लिए नवमेश बुध षष्ठ का भी स्वामी है, इसलिए उसकी स्थिति भी देखें; शनि की दशा में भाग्य परिश्रम के अनुपात में खुलता है।
कुम्भ लग्न: शनि तुला राशि में
उच्चइस लग्न के लिए शुभ
कुम्भ लग्न के लिए यह स्थिति असाधारण है: लग्नेश शनि नवम भाव में तुला राशि में आता है, जहाँ वह उच्च का होता है। तुला शुक्र की राशि है, और कुम्भ लग्न के लिए शुक्र चतुर्थ और नवम का स्वामी होकर योगकारक है। उच्च शनि न्याय, संतुलन और ईमानदारी के ग्रह के रूप में भाग्य के भाव में बैठता है; ऐसे व्यक्ति का धर्म न्याय और समाज के प्रति कर्तव्य से जुड़ता है। कानून, न्याय-व्यवस्था, समाज-सेवा, प्रशासन या दर्शन की उच्च शिक्षा उसे स्वाभाविक लगती है, और लोग उसे निष्पक्ष सलाहकार के रूप में देखते हैं। शनि इस लग्न के लिए द्वादश भाव (मकर) का भी स्वामी है; इसलिए भाग्य का संबंध विदेश, दूर स्थानों, एकांत साधना या आध्यात्मिक संस्थाओं से जुड़ सकता है। एकादश, तृतीय और षष्ठ, तीनों उपचय भाव शनि की दृष्टि में हैं, जो समय के साथ लाभ, पराक्रम और प्रतियोगिता में स्थिरता लाती है। स्थिर लग्न होने से नवम यहाँ बाधक स्थान भी है, इसलिए फल प्रायः देर से और धैर्य के बाद आते हैं; शनि की दशा इस स्थिति का मुख्य समय है।
मीन लग्न: गुरु वृश्चिक राशि में
मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ
मीन लग्न का स्वामी गुरु नवम भाव में वृश्चिक राशि में बैठता है, जो उसके मित्र मंगल की राशि है। मीन लग्न के लिए मंगल द्वितीय और नवम का स्वामी है, इसलिए गुरु यहाँ भाग्य और धन के स्वामी की राशि में है। वृश्चिक की गहराई गुरु के ज्ञान को भीतर की ओर मोड़ती है: व्यक्ति धर्म के बाहरी रूप से संतुष्ट नहीं होता, वह उसके मर्म तक जाना चाहता है। योग, ज्योतिष, मनोविज्ञान या शोध की उच्च शिक्षा उसे खींचती है। गुरु इस लग्न के लिए दशम भाव (धनु) का भी स्वामी है; इस नाते नवम में बैठा गुरु कर्म और भाग्य का सीधा मेल बनाता है, और करियर में गुरु, पिता या किसी परंपरा का सहारा मिलता है। गुरु की पंचम दृष्टि लौटकर लग्न पर पड़ती है, जहाँ उसकी अपनी मीन राशि है; सप्तम दृष्टि तृतीय भाव (वृषभ) पर, और नवम दृष्टि पंचम भाव (कर्क) पर, जो गुरु की उच्च राशि है। इसलिए बुद्धि, संतान और मंत्र-अध्ययन के विषय विशेष रूप से पुष्ट होते हैं। गुरु वक्री या पीड़ित हो, तो यह मेल देर से फलता है।
कब यह स्थिति साथ देती है
यह स्थिति सबसे अधिक तब खिलती है जब लग्नेश बली हो: सिंह लग्न में उच्च सूर्य और कुम्भ लग्न में उच्च शनि इसके सबसे प्रबल उदाहरण हैं, और मेष, वृषभ, कन्या, तुला, धनु, मकर तथा मीन लग्न में मित्र राशि का लग्नेश भी अच्छा सहारा देता है। नवमेश का बली होना भी ज़रूरी है, क्योंकि लग्नेश उसी के घर में बैठा है। लग्नेश की दशा या अंतर्दशा में, और जब गोचर में गुरु नवम या लग्न पर दृष्टि डाले, तब उच्च शिक्षा, लंबी यात्रा, गुरु से भेंट और पिता का सहयोग जैसे विषय आगे बढ़ते हैं। जो लोग अध्यापन, कानून, धर्म, परामर्श या विदेश से जुड़े काम में हैं, उन्हें यह स्थिति विशेष सहारा देती है।
कब यह स्थिति कसौटी बनती है
तनाव तब दिखता है जब लग्नेश नीच हो, जैसे वृश्चिक लग्न में कर्क का मंगल, और नीचभंग न हो; या जब नवम भाव पर शनि, राहु या केतु का भारी प्रभाव हो। तब आस्था में उलझन, पिता या गुरु से दूरी, या उच्च शिक्षा में रुकावट जैसे अनुभव हो सकते हैं। स्थिर लग्नों (वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ) के लिए नवम बाधक स्थान भी है, इसलिए वहाँ बड़े अवसर भी अक्सर कुछ अड़चनों के बाद आते हैं। जहाँ लग्नेश षष्ठ, अष्टम या द्वादश का भी स्वामी है (मेष, वृषभ, तुला, वृश्चिक, कुम्भ), वहाँ भाग्य परिश्रम, उतार-चढ़ाव या दूरी से होकर आता है। यह एक प्रवृत्ति है, निर्णय नहीं; लग्नेश का बल और अनुकूल दशा इसे बहुत बदल देते हैं।
बारहों भावों में लग्नेश
जिन भावों का पृष्ठ अभी नहीं आया, उनका सार लग्नेश पृष्ठ पर है।
अपना लग्न जानें
जन्म तिथि, समय और स्थान से लग्न, लग्नेश, नवांश लग्न और चंद्र लग्न एक साथ।
लग्न कैलकुलेटरअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
लग्नेश नवम भाव में हो तो भाग्योदय कब होता है?
भाग्योदय की कोई निश्चित आयु इस स्थिति से नहीं निकलती; समय दशा और गोचर से पढ़ा जाता है। सबसे पहले लग्नेश और नवमेश की दशा-अंतर्दशा देखें, क्योंकि इन्हीं में स्वयं के प्रयास और भाग्य का मेल सक्रिय होता है। फिर देखें कि गोचर में गुरु कब नवम भाव, नवमेश या लग्न को देखता है। लग्नेश उच्च या मित्र राशि में हो, तो भाग्य अपेक्षाकृत सहजता से खुलता है; नीच हो या स्थिर लग्न का बाधक प्रभाव हो, तो वही भाग्य अधिक परिश्रम और धैर्य के बाद आता है।
किस लग्न के लिए लग्नेश नवम भाव में सबसे अच्छा है?
राशि-बल के हिसाब से सिंह और कुम्भ लग्न सबसे आगे हैं: सिंह लग्न में सूर्य मेष में और कुम्भ लग्न में शनि तुला में उच्च होता है। कन्या और मीन लग्न में लग्नेश दशम का भी स्वामी है, इसलिए वहाँ कर्म और भाग्य सीधे जुड़ते हैं। धनु लग्न में गुरु भाग्य का कारक होकर भाग्य भाव में है और लग्न को देखता है। सबसे सावधान पढ़ाई वृश्चिक लग्न माँगता है, जहाँ मंगल कर्क में नीच होता है। ध्यान रहे कि सिंह और कुम्भ स्थिर लग्न हैं, जिनके लिए नवम बाधक स्थान भी है; उच्च बल वहाँ फल देता है, पर कभी-कभी धैर्य के बाद।
लग्नेश नवम भाव में हो तो पिता से संबंध कैसा रहता है?
नवम भाव पिता का भाव है, इसलिए लग्नेश यहाँ हो तो व्यक्ति और पिता के बीच सीधा संबंध बनता है, और पिता का प्रभाव जीवन की दिशा पर गहरा रहता है। संबंध का स्वभाव लग्नेश की राशि से झलकता है: सिंह लग्न का उच्च सूर्य पिता को सम्मानित दिखाता है, वृश्चिक लग्न का नीच मंगल भावनात्मक उतार-चढ़ाव, और मित्र राशि का लग्नेश प्रायः सहयोग। पूरा चित्र देखने के लिए नवमेश और पिता के कारक सूर्य को साथ में पढ़ें; कुछ परंपराएँ दशम भाव को भी पिता से जोड़ती हैं।
क्या लग्नेश नवम भाव में विदेश यात्रा का योग बनाता है?
नवम लंबी यात्राओं का भाव है, इसलिए यह स्थिति दूर की यात्रा, तीर्थ या विदेश में पढ़ाई की ओर झुकाव देती है। पर विदेश में बसने या लंबे प्रवास का निर्णय केवल नवम से नहीं होता; उसके लिए द्वादश भाव, चतुर्थ भाव (घर से दूरी), राहु और चर राशियों की भूमिका भी देखी जाती है। जिन लग्नों में लग्नेश द्वादश का भी स्वामी है (कुम्भ) या नवम से द्वादश भाव पर दृष्टि डालता है (मेष और वृश्चिक), वहाँ यह संकेत अधिक स्पष्ट होता है। यात्रा का समय दशा बताती है।
लग्नेश नवम में और नवमेश लग्न में हो तो क्या होता है?
तब दोनों ग्रह एक-दूसरे की राशि में होते हैं, और इसे परिवर्तन योग कहते हैं। लग्न और नवम के स्वामियों का यह आदान-प्रदान कुंडली के सबसे शुभ संबंधों में गिना जाता है, क्योंकि इससे स्वयं और भाग्य के भाव आपस में बँध जाते हैं: व्यक्ति का प्रयास भाग्य को जगाता है, और भाग्य उसके प्रयास को दिशा देता है। फल की मात्रा दोनों ग्रहों के बल पर निर्भर करती है, और यह योग उन्हीं दोनों की दशाओं में सबसे अधिक दिखता है।