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लग्नेश द्वितीय भाव में

धन, परिवार और वाणी से जुड़ा स्वयं: मेष से मीन तक हर लग्न का अलग फल

धन, परिवार और वाणी

लग्नेश द्वितीय भाव में हो तो व्यक्ति का स्वभाव और दिशा धन, परिवार, वाणी और भोजन से गहराई से जुड़ जाते हैं। वह कमाई को टिकाऊ बचत में बदलना चाहता है, परिवार की ज़िम्मेदारी गंभीरता से लेता है और शब्दों का वज़न समझता है। फल इस पर निर्भर है कि लग्नेश किस राशि में है और कितना बली है।

आपका लग्नेश किस भाव में है?

जन्म तिथि, समय और स्थान भरें। आपका लग्नेश इसी भाव में हो तो आपका खंड नीचे मिलेगा।

जन्म तिथि
जन्म समय

मुफ़्त · खगोलीय गणना · लाहिरी अयनांश

संपूर्ण धन-अध्ययन

धन बोधDhan Bodh

लग्नेश द्वितीय भाव, यानी धन के भाव, में हो तो व्यक्ति और धन का सीधा संबंध बनता है। धन बोध आपकी अपनी कुंडली से धन के पाँचों स्वामियों और आय के छहों मार्गों को तौलता है।

धन के पाँच स्वामी · आय के छह मार्ग · होरा (D-2) · दशमांश (D-10) · चतुर्थांश (D-4) · साढ़े साती · विंशोत्तरी काल

एक बार का भुगतान · हिन्दी या अंग्रेज़ी · तुरंत डाउनलोड, और एक प्रति आपकी ईमेल पर।

कुंडली में धन एक प्रतिरूप है, आश्वासन नहीं। जहाँ कुंडली मौन है, रिपोर्ट यह कह देती है।

बारहों लग्नों के लिए लग्नेश द्वितीय भाव में

हर लग्न के लिए लग्नेश कौन है, इस भाव में वह किस राशि में पड़ता है, और वहाँ उसका बल।

लग्नलग्नेशराशिबलदूसरा भाव
मेष लग्नमंगलवृषभसम राशिअष्टम भाव
वृषभ लग्नशुक्रमिथुनमित्र राशिषष्ठ भाव
मिथुन लग्नबुधकर्कशत्रु राशिचतुर्थ भाव
कर्क लग्नचंद्रसिंहमित्र राशिकेवल लग्न
सिंह लग्नसूर्यकन्यासम राशिकेवल लग्न
कन्या लग्नबुधतुलामित्र राशिदशम भाव
तुला लग्नशुक्रवृश्चिकसम राशिअष्टम भाव
वृश्चिक लग्नमंगलधनुमित्र राशिषष्ठ भाव
धनु लग्नगुरुमकरनीचचतुर्थ भाव
मकर लग्नशनिकुम्भस्वराशिद्वितीय भाव(यहीं)
कुम्भ लग्नशनिमीनसम राशिद्वादश भाव
मीन लग्नगुरुमेषमित्र राशिदशम भाव

लग्नेश द्वितीय भाव में: इसका अर्थ

द्वितीय भाव कुंडली का धन भाव है, पर यहाँ धन का अर्थ कमाई नहीं, संचय है: वह पैसा, वस्तुएँ और मूल्य जो आप अपने पास टिकाकर रख पाते हैं। यही भाव कुटुंब का है, यानी उस परिवार का जिसमें आप पले, और उसकी परंपराओं का। वाणी, भोजन की आदतें, मुख और आरंभिक शिक्षा भी इसी भाव से देखे जाते हैं; बचपन में घर से जो भाषा और संस्कार मिले, वे यहीं दिखते हैं। साथ ही द्वितीय भाव मारक स्थान भी है। इसमें डरने जैसा कुछ नहीं; परंपरा इतना ही कहती है कि इस भाव से जुड़ी दशाएँ स्वास्थ्य के प्रति अधिक सजगता माँगती हैं।

जब लग्नेश, यानी स्वयं का प्रतिनिधि ग्रह, इस भाव में आता है, तो शास्त्रीय ग्रंथ स्वयं और धन के बीच एक सीधा संबंध पढ़ते हैं, जिसे धन-संबंध कहा जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि धन अपने-आप आएगा; अर्थ यह है कि आपकी ऊर्जा और ध्यान स्वाभाविक रूप से संचय, परिवार की ज़िम्मेदारी और बोलचाल की ओर जाते हैं। लग्नेश बली हो तो यही ध्यान स्थिर बचत और पारिवारिक सम्मान में बदलता है; कमज़ोर हो तो खर्च, पारिवारिक दबाव या कड़वी बात परीक्षा लेती है। अष्टम भाव द्वितीय से सप्तम स्थान पर है, इसलिए हर लग्नेश यहाँ से अष्टम को देखता है।

मेष लग्न: मंगल वृषभ राशि में

सम राशिइस लग्न के लिए शुभ

मेष लग्न में मंगल द्वितीय भाव में वृषभ राशि में बैठता है। वृषभ शुक्र की राशि है और मंगल के लिए सम: यहाँ उसे न विशेष सहारा मिलता है, न विरोध, इसलिए वह लगभग अपने असली रूप में दिखता है, सीधा, तेज़ और कर्मठ। धन कमाने और जोड़ने में उत्साह रहता है, पर बोली में धार भी आ जाती है, और यही धार कभी-कभी घर में टकराव का कारण बनती है। मंगल अष्टम भाव का भी स्वामी है, और यहाँ से वह अष्टम भाव वृश्चिक को, यानी अपनी ही दूसरी राशि को देखता है; इससे बीमा, पैतृक धन, साझा संसाधन और शोध जैसे विषय धन-संबंध में जुड़ जाते हैं। पंचम और नवम पर भी उसकी दृष्टि है, जिससे पढ़ाई, संतान और भाग्य के मामलों में भी उसका जोश दिखता है। कई गणनाओं में द्वितीय भाव का मंगल मांगलिक दोष में गिना जाता है; विवाह के प्रश्न पर इसे जीवनसाथी की कुंडली के साथ ही पढ़ें। वृषभ के स्वामी शुक्र की स्थिति, शुभ दृष्टि और चल रही दशा तय करती हैं कि यह जोश कितना सधा रहेगा।

मेष लग्न के बारे में →मंगल द्वितीय भाव में: सामान्य फल →

वृषभ लग्न: शुक्र मिथुन राशि में

मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ

वृषभ लग्न वालों के लिए शुक्र द्वितीय भाव में मिथुन राशि में आता है। मिथुन बुध की राशि है और बुध शुक्र का मित्र है, इसलिए मित्र राशि में शुक्र यहाँ सहज और प्रसन्न रहता है। इसका सबसे स्पष्ट असर वाणी पर दिखता है: बात में मिठास, हाज़िरजवाबी और शब्दों का सलीका। लेखन, बिक्री, मीडिया, डिज़ाइन या किसी भी ऐसे काम से धन जुड़ सकता है जहाँ बात कहने का ढंग मायने रखता है। परिवार में आप मेल-मिलाप कराने वाले बन सकते हैं, और भोजन में स्वाद व विविधता की रुचि रहती है। शुक्र षष्ठ भाव (तुला) का भी स्वामी है, इसलिए कमाई में नौकरी, सेवा और रोज़ की मेहनत का हाथ रहता है; ऋण और उधार के मामलों में सोच-समझकर चलें। यहाँ से शुक्र अष्टम भाव धनु को देखता है, जो साझा धन और जीवनसाथी के परिवार से जुड़े विषयों को छूता है। मिथुन का स्वामी बुध इस लग्न के लिए द्वितीय और पंचम का स्वामी है, इसलिए बुध की अपनी स्थिति इस धन-संबंध को पक्का या ढीला करती है।

वृषभ लग्न के बारे में →शुक्र द्वितीय भाव में: सामान्य फल →

मिथुन लग्न: बुध कर्क राशि में

शत्रु राशिइस लग्न के लिए शुभ

मिथुन लग्न का स्वामी बुध जब द्वितीय भाव में कर्क राशि में पहुँचता है, तो वह चंद्रमा की राशि में होता है, जिसे बुध शत्रु मानता है। शत्रु राशि का अर्थ यहाँ असहजता है: बुध की तर्क-बुद्धि पर भावनाओं की परत चढ़ जाती है। पैसे के निर्णय कभी हिसाब से, कभी मन के बहाव से होते हैं, और बोली मनोदशा के साथ बदल सकती है। फिर भी इसका एक सुंदर पक्ष है: परिवार से गहरा लगाव, घर की भाषा और कहानियों की अच्छी स्मृति, और लोगों की भावना समझकर बात करने की क्षमता। बुध चतुर्थ भाव (कन्या) का भी स्वामी है, यानी एक केंद्र का स्वामी धन भाव में है; घर, माता, वाहन और भूमि के विषय परिवार के धन से गुँथे रहते हैं, और पैतृक घर या पारिवारिक कारोबार का महत्व बढ़ सकता है। यहाँ से बुध अष्टम भाव मकर को देखता है। कर्क का स्वामी चंद्रमा बली हो, या बुध पर शुभ दृष्टि हो, तो यह असहजता काफ़ी कम हो जाती है; बुध की अपनी दशा में यह फल सबसे स्पष्ट दिखता है।

बुध द्वितीय भाव में: सामान्य फल →

कर्क लग्न: चंद्र सिंह राशि में

मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ

कर्क लग्न के लिए चंद्रमा ही लग्नेश है, और वह केवल इसी एक राशि का स्वामी है; इसलिए उसकी स्थिति सीधे आपके मन और स्वयं की बात करती है, किसी दूसरे भाव की नहीं। द्वितीय भाव में चंद्रमा सिंह राशि में होता है, जो उसके मित्र सूर्य की राशि है। मित्र राशि में चंद्रमा को अपनापन मिलता है: परिवार के नाम और प्रतिष्ठा से भावनात्मक जुड़ाव, बोली में गरिमा, और मेहमानों को खिलाने-पिलाने में सच्चा आनंद। आय और बचत में उतार-चढ़ाव चंद्रमा के स्वभाव में है, क्योंकि वह सबसे तेज़ चलने वाला ग्रह है; कई बार धन की स्थिति मन के साथ बदलती है। यहाँ से चंद्रमा अष्टम भाव कुम्भ को देखता है, जो छिपे साधनों और अचानक बदलावों का स्थान है। चंद्रमा के लिए पक्ष का बल बहुत मायने रखता है: शुक्ल पक्ष का बढ़ता हुआ चंद्रमा यह योग अधिक खुलकर देता है, जबकि अमावस्या के निकट का चंद्रमा संयम माँगता है। सिंह का स्वामी सूर्य कहाँ बैठा है, इससे भी पता चलता है कि यह धन-संबंध कितना टिकाऊ रहेगा।

कर्क लग्न के बारे में →

सिंह लग्न: सूर्य कन्या राशि में

सम राशिइस लग्न के लिए शुभ

सिंह लग्न का स्वामी सूर्य द्वितीय भाव में कन्या राशि में बैठता है। कन्या बुध की राशि है और सूर्य के लिए सम है, इसलिए यहाँ सूर्य का अधिकार-भाव बारीकी और व्यवस्था के रास्ते प्रकट होता है। सूर्य केवल सिंह का स्वामी है, अतः यह स्थिति किसी दूसरे भाव को नहीं, सीधे आपको धन और परिवार से जोड़ती है। आप हिसाब-किताब में सावधान, खर्च में चुनिंदा और बात में अधिकार-भरे हो सकते हैं। परिवार के नाम की रक्षा आपके लिए आत्मसम्मान का प्रश्न बनती है। सूर्य स्वभाव से क्रूर ग्रह है, इसलिए बोली में आदेश का स्वर आ सकता है, जिसे घर के लोग कठोरता समझ सकते हैं। यहाँ से सूर्य अष्टम भाव मीन को देखता है। एक विशेष बात: कन्या का स्वामी बुध इस लग्न के लिए द्वितीय और एकादश, दोनों धन भावों का स्वामी है। इसलिए बुध की स्थिति इस धन-संबंध की असली कसौटी है; बुध बली हो तो संचय और आय, दोनों में साथ मिलता है।

सिंह लग्न के बारे में →

कन्या लग्न: बुध तुला राशि में

मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ

कन्या लग्न में बुध दो भावों का स्वामी है, प्रथम और दशम, और द्वितीय भाव में वह तुला राशि में आता है। तुला शुक्र की राशि है, जो बुध का मित्र है; मित्र राशि में बुध की बुद्धि को सलीका और संतुलन मिलता है। सबसे बड़ी बात यह है कि स्वयं का स्वामी ही कर्म का स्वामी भी है, और वह धन भाव में बैठा है। इसका सीधा अर्थ है कि आपका काम ही आपकी बचत का आधार बनता है: लेखा, वित्त, व्यापार, परामर्श, डिज़ाइन, भाषा या ऐसा कोई पेशा जहाँ सटीकता और शिष्टता दोनों चाहिए। वाणी विनम्र और तर्कपूर्ण रहती है, और परिवार में आपकी सलाह का मान होता है। यहाँ से बुध अष्टम भाव मेष को देखता है, जिससे साझा धन, बीमा या अचानक खर्च भी ध्यान माँगते हैं। तुला का स्वामी शुक्र इस लग्न के लिए द्वितीय और नवम का स्वामी है, इसलिए शुक्र अच्छी स्थिति में हो तो भाग्य भी इस धन-संबंध का साथ देता है। बुध अस्त हो या पाप ग्रहों से घिरा हो, तो यही योग धीमा पड़ता है।

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तुला लग्न: शुक्र वृश्चिक राशि में

सम राशिइस लग्न के लिए शुभ

तुला लग्न के लिए शुक्र द्वितीय भाव में वृश्चिक राशि में बैठता है। वृश्चिक मंगल की राशि है, और शुक्र के लिए यह सम है, यानी न मित्र की, न शत्रु की। फिर भी इस राशि का गहरा, तीव्र स्वभाव शुक्र की रुचियों में उतर आता है: पसंद-नापसंद पक्की, भोजन और सुख-साधनों में तीखा स्वाद, और धन के मामलों में गोपनीयता। शुक्र इस लग्न के लिए अष्टम भाव (वृषभ) का भी स्वामी है, और यहाँ से वह ठीक उसी भाव को, यानी अपनी दूसरी राशि को देखता है। इससे अष्टम के विषय, जैसे विरासत, ससुराल पक्ष का धन, साझा निवेश और अचानक लाभ-हानि, धन भाव से सीधे जुड़ जाते हैं। शास्त्रीय नियम के अनुसार लग्नेश पर अष्टमेश होने का दोष नहीं लगता, इसलिए शुक्र यहाँ शुभ ही गिना जाता है। ध्यान रहे कि वृश्चिक का स्वामी मंगल इस लग्न के लिए द्वितीय और सप्तम, दोनों मारक भावों का स्वामी है; मंगल की दशा में स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान दें। मंगल और शुक्र, दोनों की स्थिति मिलकर बताती है कि यह संचय कितना स्थिर रहेगा।

शुक्र द्वितीय भाव में: सामान्य फल →

वृश्चिक लग्न: मंगल धनु राशि में

मित्र राशिइस लग्न के लिए सम

वृश्चिक लग्न का स्वामी मंगल द्वितीय भाव में धनु राशि में पहुँचता है। धनु गुरु की राशि है, और गुरु मंगल का मित्र है, इसलिए यहाँ मंगल का साहस सिद्धांतों से बँध जाता है। बोली खरी और निर्भीक रहती है; आप वही कहते हैं जो सही मानते हैं, चाहे सुनने वालों को अच्छा लगे या नहीं। मंगल इस लग्न के लिए षष्ठ भाव (मेष) का भी स्वामी है, और इसी कारण उसकी कार्यात्मक भूमिका पूर्ण शुभ नहीं, तटस्थ मानी जाती है। षष्ठ का संबंध कमाई को प्रतियोगिता, सेवा, चिकित्सा, विधि या अनुशासित परिश्रम से जोड़ता है, और ऋण के मामलों में सावधानी माँगता है। यहाँ से मंगल पंचम (मीन), अष्टम (मिथुन) और नवम (कर्क) भाव को देखता है; संतान, शोध और भाग्य तक उसकी ऊर्जा पहुँचती है। मेष लग्न की तरह यहाँ भी कई गणनाएँ इस मंगल को मांगलिक दोष में रखती हैं; सही आकलन दोनों कुंडलियों के मिलान से ही होता है। धनु का स्वामी गुरु इस लग्न के लिए द्वितीय और पंचम का स्वामी है; गुरु बली हो तो यह धन-संबंध सम्मानजनक और स्थायी बनता है।

मंगल द्वितीय भाव में: सामान्य फल →

धनु लग्न: गुरु मकर राशि में

नीचइस लग्न के लिए शुभ

धनु लग्न के लिए यह स्थिति ध्यान से पढ़ने योग्य है: गुरु द्वितीय भाव में मकर राशि में होता है, जो उसकी नीच राशि है। नीच का अर्थ है कि ग्रह अपने स्वाभाविक गुण पूरे खुलकर नहीं दे पाता। गुरु की उदारता यहाँ सावधानी में, और कभी-कभी अत्यधिक मितव्ययिता में बदल सकती है, और परिवार के मूल्यों या रीतियों पर मतभेद उठ सकते हैं। धन धीरे जुड़ता है, पर मेहनत से जुड़ा धन टिकता भी है। गुरु चतुर्थ भाव (मीन) का भी स्वामी है, इसलिए घर, वाहन, माता और शिक्षा से जुड़े निर्णय परिवार के धन पर असर डालते हैं। यहाँ से गुरु षष्ठ (वृषभ), अष्टम (कर्क) और दशम (कन्या) भाव को देखता है; दशम पर उसकी दृष्टि कर्मक्षेत्र में धीरज और नैतिकता लाती है, और अष्टम भाव की राशि कर्क स्वयं गुरु की उच्च राशि है। नीच भंग यहाँ बहुत मायने रखता है: मकर का स्वामी शनि लग्न या चंद्रमा से केंद्र में हो, तो यह कमज़ोरी काफ़ी हद तक संभल जाती है। द्वितीय और तृतीय के स्वामी शनि की स्थिति भी साथ में देखें।

मकर लग्न: शनि कुम्भ राशि में

स्वराशिइस लग्न के लिए शुभ

मकर लग्न के लिए द्वितीय भाव में लग्नेश की स्थिति शास्त्रीय दृष्टि से उल्लेखनीय है। शनि यहाँ कुम्भ राशि में है, जो उसकी स्वराशि है, और कुम्भ ही इस लग्न का द्वितीय भाव है; यानी लग्नेश अपनी दूसरी राशि में है, धन भाव का स्वामी अपने ही घर में। कुम्भ शनि की मूलत्रिकोण राशि भी मानी जाती है। स्वयं और संचय का यह जुड़ाव बहुत सीधा है: धन को धीरे पर निरंतर जोड़ने की प्रवृत्ति रहती है, आप खर्च से पहले योजना बनाते हैं, और परिवार की ज़िम्मेदारी को कर्तव्य मानते हैं। बोली संयमित और गंभीर रहती है; कम शब्दों में बात कहने की आदत होती है। यहाँ से शनि चतुर्थ (मेष), अष्टम (सिंह) और एकादश (वृश्चिक) भाव को देखता है। एकादश पर दृष्टि आय और संचय को एक धागे में बाँधती है, जबकि चतुर्थ पर दृष्टि घर-परिवार में कुछ अनुशासन या दूरी ला सकती है। चूँकि शनि यहाँ द्वितीय का भी स्वामी है, उसकी दशा में स्वास्थ्य के प्रति सजग रहना उचित है। शनि वक्री या अस्त हो, तो यह फल देर से खुलता है।

कुम्भ लग्न: शनि मीन राशि में

सम राशिइस लग्न के लिए शुभ

कुम्भ लग्न वालों का लग्नेश शनि द्वितीय भाव में मीन राशि में आता है। मीन गुरु की राशि है और शनि के लिए सम; इसलिए शनि यहाँ अपना कठोर रूप कुछ नरम करता है और उसमें गुरु के सिद्धांतों का रंग घुल जाता है। बोली नपी-तुली और नैतिक रहती है, और परिवार में आप नियमों और परंपरा की याद दिलाने वाले हो सकते हैं। शनि इस लग्न के लिए द्वादश भाव (मकर) का भी स्वामी है। द्वादश व्यय, विदेश और दूर स्थानों का भाव है, इसलिए धन आता भी है और खर्च की राहें भी खुली रहती हैं; बचत अनुशासन से ही टिकती है। विदेश से जुड़ा काम भी कमाई का साधन बन सकता है। चतुर्थ (वृषभ), अष्टम (कन्या) और एकादश (धनु) भाव उसकी दृष्टि में हैं; लाभ भाव पर पड़ती यह नज़र आय को धीमा पर लगातार बहने वाला स्रोत बनाती है। मीन का स्वामी गुरु इस लग्न में धन भाव के साथ लाभ भाव भी सँभालता है; वह सुदृढ़ हो तो शनि की यह स्थिति काफ़ी सुधरती है। शनि की दशा में खर्च का हिसाब रखना सबसे काम का कदम है।

मीन लग्न: गुरु मेष राशि में

मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ

मीन लग्न के लिए द्वितीय भाव में मेष राशि पड़ती है, और लग्नेश गुरु यहीं बैठता है। मित्र मंगल की इस अग्नि राशि में गुरु का ज्ञान ठहरा नहीं रहता, पहल करता है। गुरु स्वयं धन का नैसर्गिक कारक है, इसलिए धन भाव में उसका आना परंपरा में शुभ माना जाता है। वाणी में ज्ञान और विश्वास रहता है, जिससे शिक्षण, परामर्श, वित्त, धार्मिक कार्य या सार्वजनिक वक्तृता से कमाई का संबंध बन सकता है। गुरु इस लग्न के लिए दशम भाव (धनु) का भी स्वामी है, और यहाँ से वह उसी दशम भाव को देखता है; इसलिए काम और कमाई एक-दूसरे को बल देते हैं। षष्ठ (सिंह) और अष्टम (तुला) पर पड़ती दृष्टि प्रतियोगिता और साझा धन के मामले सुलझाने में मदद करती है। मेष का स्वामी मंगल इस लग्न के लिए द्वितीय और नवम का स्वामी है; मंगल बली हो तो भाग्य भी साथ देता है। बस मेष की उतावली से बचें: बड़े आर्थिक निर्णय जल्दबाज़ी में न लें।

कब यह स्थिति साथ देती है

यह स्थिति तब सबसे अधिक फल देती है जब लग्नेश स्वराशि या मित्र राशि में हो, अस्त न हो, और शुभ दृष्टि में हो। बारहों में मकर लग्न का शनि यहाँ स्वराशि में आता है, और पाँच लग्नों का लग्नेश मित्र राशि में। द्वितीय भाव के स्वामी से लग्नेश का अच्छा संबंध और बली एकादश भाव कमाई और संचय को एक-दूसरे का पूरक बनाते हैं। लग्नेश की दशा या अंतर्दशा में धन-संबंध सबसे स्पष्ट दिखता है: बचत की आदत बनती है, परिवार में भूमिका बढ़ती है, और वाणी से जुड़े काम आगे बढ़ते हैं। नवांश कुंडली में भी लग्नेश बली हो, तो यह संकेत पक्का माना जाता है।

कब यह स्थिति कसौटी बनती है

लग्नेश नीच या शत्रु राशि में हो, अस्त हो, या शनि, मंगल, राहु जैसे ग्रहों की दृष्टि या युति से दबा हो, तो यही स्थिति परीक्षा लेती है। तब धन कम टिकता है, परिवार की अपेक्षाएँ बोझ लगती हैं, और कड़ी बात संबंधों में दूरी ला सकती है। चूँकि द्वितीय भाव मारक भी है, लग्नेश की दशा के कुछ हिस्से स्वास्थ्य के प्रति अधिक सजगता माँगते हैं। यह कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं, केवल सावधानी का संकेत है। कमज़ोर लग्नेश भी नीच भंग, शुभ दृष्टि या अनुकूल दशा से काफ़ी सुधरता है; इसलिए कोई भी निष्कर्ष पूरी कुंडली साथ देखकर ही निकालें।

बारहों भावों में लग्नेश

अपना लग्न जानें

जन्म तिथि, समय और स्थान से लग्न, लग्नेश, नवांश लग्न और चंद्र लग्न एक साथ।

लग्न कैलकुलेटर

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लग्नेश द्वितीय भाव में हो तो धन का क्या फल है?

यह स्वयं और संचय के बीच सीधा संबंध बनाता है: आपकी प्रवृत्ति कमाई को बचाने और परिवार के लिए जोड़ने की होती है। धन कितना टिकेगा, यह लग्नेश की राशि, उसके बल, द्वितीय भाव के स्वामी और चल रही दशा पर निर्भर है। यह योग धन की कोई निश्चित मात्रा नहीं बताता, केवल प्रवृत्ति और दिशा बताता है।

किस लग्न के लिए लग्नेश द्वितीय भाव में सबसे अच्छा है?

राशि-बल के हिसाब से मकर लग्न सबसे आगे है: शनि द्वितीय भाव में कुम्भ में स्वराशि का होता है और साथ ही धन भाव का स्वामी भी है। वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक और मीन लग्न में लग्नेश यहाँ मित्र राशि में आता है; कन्या और मीन में वह दशम का भी स्वामी है, जिससे काम और कमाई जुड़ते हैं। मिथुन लग्न में बुध शत्रु राशि में और धनु लग्न में गुरु नीच राशि में होता है; इन्हें शुभ दृष्टि और नीच भंग के साथ पढ़ें।

मेष या वृश्चिक लग्न में मंगल द्वितीय भाव में हो तो क्या मांगलिक दोष बनता है?

कई गणनाओं में द्वितीय भाव का मंगल मांगलिक दोष में गिना जाता है, जबकि कुछ परंपराएँ केवल प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव को गिनती हैं। इस दोष के कई अपवाद भी माने जाते हैं। इसलिए केवल मंगल की स्थिति देखकर कोई निर्णय न लें; विवाह के प्रश्न पर निष्कर्ष दोनों कुंडलियों को साथ देखकर ही निकालें।

द्वितीय भाव मारक है, तो क्या लग्नेश का यहाँ होना अशुभ है?

नहीं। मारक भाव का अर्थ केवल इतना है कि उससे जुड़ी दशाओं में स्वास्थ्य के प्रति अधिक सजग रहना उचित है। लग्नेश स्वयं का रक्षक ग्रह है, और द्वितीय भाव में वह धन, परिवार और वाणी को बल देता है। अकेले इस स्थिति से कोई डरावना निष्कर्ष नहीं निकाला जाता; पूरी कुंडली और दशाओं का क्रम साथ देखा जाता है।

लग्नेश द्वितीय भाव में हो तो वाणी कैसी होती है?

वाणी व्यक्तित्व का प्रमुख हिस्सा बन जाती है, पर उसका स्वर लग्नेश पर निर्भर है। शुक्र या बुध हो तो बात में मिठास और तर्क, मंगल या सूर्य हो तो खरापन और अधिकार, शनि हो तो संयम, गुरु हो तो ज्ञान और सलाह, और चंद्रमा हो तो भावना झलकती है। राशि और दृष्टियाँ इस स्वर को और बदलती हैं।

सूचना: यह पृष्ठ शास्त्रीय ज्योतिष सिद्धांतों पर आधारित शैक्षिक जानकारी देता है। व्यक्तिगत निर्णयों के लिए योग्य ज्योतिषी से परामर्श करें।