लग्नेश का पंचम भाव में होना बताता है कि व्यक्ति का स्वभाव, शरीर और जीवन की दिशा बुद्धि, सृजन, संतान और पूर्व जन्म के पुण्य से जुड़े हैं। पंचम भाव त्रिकोण है, इसलिए यह स्थिति सामान्यतः शुभ मानी जाती है; पर फल की गुणवत्ता लग्नेश की राशि, उसके बल और चल रही दशा पर निर्भर करती है।
आपका लग्नेश किस भाव में है?
जन्म तिथि, समय और स्थान भरें। आपका लग्नेश इसी भाव में हो तो आपका खंड नीचे मिलेगा।
मुफ़्त · खगोलीय गणना · लाहिरी अयनांश
लग्नेश पंचम भाव में है, पर फल पूरी कुंडली से तय होता है।
सम्पूर्ण जन्म कुंडली रिपोर्ट आपकी कुंडली से बारहों भावेश, विंशोत्तरी दशा, योग और दोष एक साथ पढ़ती है।
बारहों लग्नों के लिए लग्नेश पंचम भाव में
हर लग्न के लिए लग्नेश कौन है, इस भाव में वह किस राशि में पड़ता है, और वहाँ उसका बल।
| लग्न | लग्नेश | राशि | बल | दूसरा भाव |
|---|---|---|---|---|
| मेष लग्न | मंगल | सिंह | मित्र राशि | अष्टम भाव |
| वृषभ लग्न | शुक्र | कन्या | नीच | षष्ठ भाव |
| मिथुन लग्न | बुध | तुला | मित्र राशि | चतुर्थ भाव |
| कर्क लग्न | चंद्र | वृश्चिक | नीच | केवल लग्न |
| सिंह लग्न | सूर्य | धनु | मित्र राशि | केवल लग्न |
| कन्या लग्न | बुध | मकर | सम राशि | दशम भाव |
| तुला लग्न | शुक्र | कुम्भ | मित्र राशि | अष्टम भाव |
| वृश्चिक लग्न | मंगल | मीन | मित्र राशि | षष्ठ भाव |
| धनु लग्न | गुरु | मेष | मित्र राशि | चतुर्थ भाव |
| मकर लग्न | शनि | वृषभ | मित्र राशि | द्वितीय भाव |
| कुम्भ लग्न | शनि | मिथुन | मित्र राशि | द्वादश भाव |
| मीन लग्न | गुरु | कर्क | उच्च | दशम भाव |
लग्नेश पंचम भाव में: इसका अर्थ
पंचम भाव को सुत भाव भी कहा जाता है, पर इसका दायरा संतान से कहीं बड़ा है। यह बुद्धि और विवेक का भाव है, पढ़ाई और मंत्र-साधना का, कल्पना और रचना का, प्रेम और मन के आनंद का। पारंपरिक ग्रंथ इसे पूर्व पुण्य का स्थान भी कहते हैं: पिछले कर्मों का जो शुभ फल इस जन्म में सहज रूप से मिलता है, उसका संकेत यहीं से पढ़ा जाता है। जब लग्नेश, यानी स्वयं व्यक्ति का प्रतिनिधि ग्रह, इस भाव में बैठता है, तो स्वभाव और जीवन की दिशा इन्हीं विषयों की ओर मुड़ती है। व्यक्ति सोच-विचार से चलता है और अपनी पहचान अपने विचारों, अपनी रचनाओं या अपनी संतान के माध्यम से बनाता है।
लग्न स्वयं भी त्रिकोण है, और पंचम दूसरा त्रिकोण। इसलिए लग्नेश के पंचम में जाने से कुंडली के दो श्रेष्ठ भाव आपस में जुड़ जाते हैं; त्रिकोणों को लक्ष्मी-स्थान भी कहा जाता है। ऐसा व्यक्ति प्रायः अपने प्रयास का फल अपनी बुद्धि से पाता है, बाहरी सहारे से कम। पर त्रिकोण में होना अकेले पर्याप्त नहीं है। लग्नेश यहाँ नीच राशि में हो, तो विषय वही रहते हैं, पर उन तक पहुँचने में अधिक श्रम लगता है। उच्च या मित्र राशि में हो, तो वही विषय सहजता से फलते हैं। लग्नेश का दूसरा स्वामित्व भी देखें, क्योंकि वह जिस भाव का स्वामी है, उसके विषय भी पंचम में चले आते हैं।
मेष लग्न: मंगल सिंह राशि में
मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ
मेष लग्न के लिए मंगल लग्नेश है, और पंचम भाव में वह सिंह राशि में बैठता है, जो उसके मित्र सूर्य की राशि है। मित्र राशि में ग्रह सहज रहता है; मंगल की ऊर्जा यहाँ बिखरती नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और रचनात्मक साहस में बदलती है। मंगल इस लग्न के लिए अष्टम भाव (वृश्चिक) का भी स्वामी है। इससे पंचम के विषयों में गहराई और खोज की प्रवृत्ति जुड़ती है: गूढ़ विद्या, शोध, या किसी विषय की जड़ तक जाने की इच्छा। यहाँ से मंगल अपनी चतुर्थ दृष्टि से अष्टम भाव को देखता है, जो उसकी अपनी राशि है, सप्तम दृष्टि से एकादश को और अष्टम दृष्टि से द्वादश भाव को। एकादश पर दृष्टि बताती है कि बुद्धि और पहल से लाभ के रास्ते खुलते हैं। संतान के प्रति व्यक्ति उत्साही और रक्षक भाव रखता है; खेल, प्रतियोगी परीक्षाएँ और नेतृत्व सिखाने वाली पढ़ाई उसे भाती है। संतुलन के लिए देखें कि मंगल पर शनि या राहु का प्रभाव तो नहीं, क्योंकि तब यही उत्साह अधीरता बन सकता है; मंगल की दशा में ये विषय सबसे स्पष्ट दिखते हैं।
वृषभ लग्न: शुक्र कन्या राशि में
नीचइस लग्न के लिए शुभ
वृषभ लग्न में यह स्थिति विशेष विचार माँगती है। लग्नेश शुक्र पंचम भाव में कन्या राशि में आता है, जहाँ वह नीच होता है। नीच का अर्थ यह नहीं कि फल नहीं मिलेगा; अर्थ यह है कि शुक्र के स्वाभाविक गुण, यानी सहज आनंद, कला-बोध और सौंदर्य की समझ, यहाँ अत्यधिक परख और आलोचना में उलझ जाते हैं। व्यक्ति रचनात्मक होता है, पर अपनी ही रचना में कमियाँ ढूँढ़ता रहता है। शुक्र इस लग्न के लिए षष्ठ भाव (तुला) का भी स्वामी है, इसलिए पंचम के विषयों में सेवा, स्वास्थ्य, विश्लेषण और प्रतियोगिता का रंग आता है; चिकित्सा, लेखा या संपादन जैसी पढ़ाई अनुकूल रहती है। प्रेम और संतान के मामलों में अपेक्षाएँ ऊँची रहती हैं, जिनसे धैर्य की परीक्षा हो सकती है। शुक्र सप्तम दृष्टि से एकादश भाव में मीन को देखता है, जो उसकी उच्च राशि है; इसलिए मित्रों और लाभ के क्षेत्र में शुक्र का अच्छा पक्ष खुलता है। बुध या गुरु लग्न या चंद्रमा से केंद्र में हों, तो नीचभंग होता है और शुक्र की दशा अपेक्षा से बेहतर फल दे सकती है।
मिथुन लग्न: बुध तुला राशि में
मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ
मिथुन लग्न का स्वामी बुध पंचम भाव में तुला राशि में होता है, जो उसके मित्र शुक्र की राशि है। बुद्धि के ग्रह का बुद्धि के भाव में बैठना अर्थपूर्ण है, और मित्र राशि उसे संतुलन और शिष्टता देती है। ऐसा व्यक्ति तर्क को सुंदर ढंग से रखना जानता है; लेखन, भाषा, डिज़ाइन, संगीत की समझ या वाद-विवाद में उसका मन लगता है। बुध इस लग्न के लिए चतुर्थ भाव (कन्या) का भी स्वामी है, यानी एक केंद्र का। केंद्र और त्रिकोण का यह संबंध घर, माता और भीतरी सुख को पढ़ाई और रचना से जोड़ता है: घर का वातावरण अक्सर शिक्षा के अनुकूल रहता है, और मन की शांति अपने काम में ही मिलती है। बुध की सप्तम दृष्टि एकादश भाव पर पड़ती है, जहाँ मेष राशि है; मित्रों का दायरा बड़ा होता है और लाभ बातचीत, लेखन या व्यापारिक सूझ से आता है। संतान के साथ संबंध मित्रवत रहता है। बुध अस्त हो, तो यह चतुराई हमेशा स्पष्ट निर्णय में नहीं बदल पाती; बुध की दशा इन संकेतों को सबसे अधिक सक्रिय करती है।
कर्क लग्न: चंद्र वृश्चिक राशि में
नीचइस लग्न के लिए शुभ
कर्क लग्न का स्वामी चंद्रमा केवल लग्न का स्वामी है; उसके पास कोई दूसरा भाव नहीं। इसलिए पंचम भाव में उसकी स्थिति पूरी तरह मन और शरीर की कहानी है। यहाँ चंद्रमा वृश्चिक राशि में आता है, जहाँ वह नीच होता है। चंद्रमा मन का कारक है, और वृश्चिक गहरी, गोपनीय और तीव्र राशि है; नीच चंद्र भावनाओं को सतह पर कम आने देता है, पर भीतर उन्हें बहुत गहराई से जीता है। ऐसा व्यक्ति प्रेम और संतान के विषय में अत्यंत संवेदनशील होता है। यही गहराई उसे मनोविज्ञान, शोध, गूढ़ शास्त्र या कठिन विषयों की पढ़ाई में असाधारण बना सकती है। चंद्रमा की सप्तम दृष्टि एकादश भाव पर है, जहाँ वृषभ राशि है, यानी चंद्रमा की अपनी उच्च राशि; मित्रों से भावनात्मक सहारा और स्थिर लाभ के संकेत यहीं से आते हैं। मंगल या शुक्र लग्न या चंद्रमा से केंद्र में हों, तो नीचभंग होता है। पक्ष-बल भी देखें; शुक्ल पक्ष का बढ़ता चंद्रमा इस स्थिति को काफ़ी सहारा देता है, और चंद्र की दशा में ये विषय सबसे मुखर होते हैं।
सिंह लग्न: सूर्य धनु राशि में
मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ
सिंह लग्न में सूर्य पंचम भाव में धनु राशि में बैठता है। धनु गुरु की राशि है, और गुरु सूर्य का मित्र है; यहाँ सूर्य का तेज धर्म, आदर्श और ज्ञान की ओर मुड़ता है। चंद्रमा की तरह सूर्य भी केवल लग्न का स्वामी है, इसलिए यह स्थिति किसी दूसरे भाव के विषय नहीं जोड़ती; पंचम को जो कुछ मिलता है, वह सीधे व्यक्ति के अपने चरित्र से आता है। ऐसा व्यक्ति अपने सिद्धांतों पर गर्व करता है और दूसरों को सिखाने या राह दिखाने में सुख पाता है। अध्यापन, प्रशासन, दर्शन, कानून या धर्म-शास्त्र की पढ़ाई उसे आकर्षित करती है। संतान के प्रति वह गर्व और अपेक्षा दोनों रखता है, और चाहता है कि वे उसके आदर्शों को आगे ले जाएँ। सामने के एकादश भाव (मिथुन) पर पड़ती सूर्य की दृष्टि प्रतिष्ठित लोगों से मित्रता और बुद्धि के सहारे लाभ की ओर इशारा करती है। संतुलन के लिए देखें कि गुरु, जो इस पंचम भाव का स्वामी है, कहाँ और कितना बली है; सूर्य की दशा में आत्मविश्वास बढ़ता है, पर अहं को संयत रखना पड़ता है।
कन्या लग्न: बुध मकर राशि में
सम राशिइस लग्न के लिए शुभ
कन्या लग्न का स्वामी बुध पंचम भाव में मकर राशि में आता है। मकर शनि की राशि है, और बुध के लिए यह सम राशि है: न मित्र का घर, न शत्रु का। ऐसी राशि में फल बहुत हद तक ग्रह के अपने बल और उस पर पड़ने वाले प्रभावों पर निर्भर करता है। शनि की राशि बुध की बुद्धि को व्यावहारिक, धीमी और ठोस बनाती है। व्यक्ति वही पढ़ता है जिसका उपयोग दिखे; इंजीनियरिंग, प्रबंधन, लेखा, शासन-व्यवस्था या कोई तकनीकी विषय उसे जँचता है। बुध इस लग्न के लिए दशम भाव (मिथुन) का भी स्वामी है, और यहीं यह स्थिति विशेष बनती है: लग्नेश और दशमेश एक ही ग्रह है, और वह त्रिकोण में बैठा है, जिससे करियर बुद्धि, परामर्श या शिक्षा से जुड़ता है। बुध की सप्तम दृष्टि एकादश भाव पर है, जहाँ कर्क राशि है; बड़े संपर्क-क्षेत्र से लाभ मिलता है। संतान के प्रति दायित्व-बोध गहरा रहता है। बुध अस्त न हो और शुभ ग्रहों की दृष्टि में हो, तो यह स्थिति काफ़ी उठती है; उसकी दशा में करियर के निर्णय प्रायः पढ़ाई से निकलते हैं।
तुला लग्न: शुक्र कुम्भ राशि में
मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ
तुला लग्न के लिए शुक्र लग्नेश है, और पंचम भाव में वह कुम्भ राशि में होता है। कुम्भ शनि की राशि है, और शनि शुक्र का मित्र है; इस लग्न के लिए शनि स्वयं योगकारक भी है, इसलिए शुक्र यहाँ कुंडली के सबसे सहायक ग्रह की राशि में बैठता है। कुम्भ में शुक्र की कला परंपरा से हटकर नए प्रयोगों की ओर जाती है; व्यक्ति का सौंदर्य-बोध आधुनिक, सामाजिक और कभी-कभी असामान्य होता है। प्रेम में वह मित्रता को महत्त्व देता है। शुक्र इस लग्न के लिए अष्टम भाव (वृषभ) का भी स्वामी है। इससे पंचम के विषयों में अचानक मोड़, गुप्त विद्याओं में रुचि, या ससुराल और साझी संपत्ति से जुड़े प्रसंग जुड़ सकते हैं; पढ़ाई में भी कभी कोई अप्रत्याशित दिशा-परिवर्तन होता है। एकादश की सिंह राशि को देखता शुक्र प्रभावशाली मित्रों और रचनात्मक काम से आय का संकेत देता है। संतुलन के लिए शनि की स्थिति साथ में पढ़ें, क्योंकि यह शुक्र उसी की राशि में है; शुक्र की दशा में सृजन और प्रेम, दोनों विषय मुखर होते हैं।
वृश्चिक लग्न: मंगल मीन राशि में
मित्र राशिइस लग्न के लिए सम
वृश्चिक लग्न का स्वामी मंगल पंचम भाव में मीन राशि में बैठता है। मीन गुरु की राशि है, और गुरु मंगल का मित्र है। जल राशि में मंगल अपनी आग भीतर रखता है; उसकी तीव्रता यहाँ आस्था, कल्पना और करुणा का रूप लेती है। व्यक्ति के भीतर एक योद्धा और एक साधक साथ-साथ रहते हैं। मंगल इस लग्न के लिए षष्ठ भाव (मेष) का भी स्वामी है, और इसी कारण इस लग्न के लिए उसकी कार्यात्मक भूमिका शुभ नहीं, तटस्थ गिनी जाती है: लग्न का स्वामित्व उसे सहायक बनाता है, षष्ठ का स्वामित्व उसमें संघर्ष जोड़ता है। इसलिए प्रतियोगी परीक्षाएँ, चिकित्सा, रक्षा-सेवा या कानून की पढ़ाई इस व्यक्ति को स्वाभाविक लगती है, और वह मेहनत से योग्यता सिद्ध करता है। अष्टम, एकादश और द्वादश, तीनों भाव मंगल की दृष्टि में हैं; इसी से शोध में गहराई, परिश्रम से लाभ और एकांत या दूर देश से जुड़ी साधना के संकेत मिलते हैं। संतान के लिए वह सुरक्षात्मक रहता है। गुरु बली हो, तो यह मंगल अधिक सधा हुआ फल देता है।
धनु लग्न: गुरु मेष राशि में
मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ
धनु लग्न के लिए गुरु लग्नेश है, और पंचम भाव में वह मेष राशि में आता है, जो उसके मित्र मंगल की राशि है। गुरु ज्ञान, संतान और धर्म का नैसर्गिक कारक है, और पंचम उन्हीं का भाव है; कारक का अपने ही विषयों के भाव में होना इन विषयों को जीवन के केंद्र में ले आता है, हालाँकि परंपरा ऐसे में संतान का प्रश्न पूरी कुंडली से ही पढ़ने को कहती है। मेष की अग्नि गुरु के ज्ञान को साहसी बनाती है: व्यक्ति नए विचारों का पक्षधर होता है और सीखी बात को तुरंत आज़माना चाहता है। गुरु इस लग्न के लिए चतुर्थ भाव (मीन) का भी स्वामी है, इसलिए घर, माता, वाहन और भीतरी संतोष पढ़ाई और पूर्व पुण्य से जुड़ते हैं। गुरु की तीनों दृष्टियाँ शुभ भावों पर हैं: पंचम दृष्टि नवम पर, सप्तम एकादश पर, और नवम दृष्टि लौटकर स्वयं लग्न पर, जहाँ उसकी अपनी धनु राशि है। गुरु वक्री हो या राहु-केतु से जुड़ा हो, तो फल की दिशा बदल सकती है; गुरु की दशा में ये संकेत खुलकर सामने आते हैं।
मकर लग्न: शनि वृषभ राशि में
मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ
मकर लग्न का स्वामी शनि पंचम भाव में वृषभ राशि में होता है, जो उसके मित्र शुक्र की राशि है। शुक्र इस लग्न का योगकारक है, क्योंकि वह पंचम और दशम का स्वामी है; इसलिए शनि की यह स्थिति बुद्धि को कर्म से जोड़ती है। शनि धीमा और गंभीर ग्रह है। पंचम में वह बुद्धि को धैर्यवान और गहरा बनाता है: व्यक्ति देर से सीख सकता है, पर उसका सीखा टिकता है। कला में वह शिल्प और अनुशासन को महत्त्व देता है। शनि इस लग्न के लिए द्वितीय भाव (कुम्भ) का भी स्वामी है, इसलिए धन, परिवार और वाणी पढ़ाई और बुद्धि से जुड़ते हैं; ज्ञान ही आय का साधन बन सकता है। शनि की तृतीय दृष्टि सप्तम पर, सप्तम दृष्टि एकादश पर और दशम दृष्टि द्वितीय भाव पर पड़ती है, जहाँ उसकी अपनी राशि कुम्भ है; यह धन को धीरे पर स्थिर ढंग से सहेजने की प्रवृत्ति दिखाता है। संतान के विषय में व्यक्ति ज़िम्मेदार और कुछ गंभीर रहता है। संतुलन के लिए शुक्र का बल साथ में देखें; शनि की दशा इन विषयों को समय लेकर, पर पक्के ढंग से खोलती है।
कुम्भ लग्न: शनि मिथुन राशि में
मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ
कुम्भ लग्न में शनि पंचम भाव में मिथुन राशि में आता है। मिथुन बुध की राशि है, और बुध शनि का मित्र है; वायु तत्त्व की यह राशि शनि को विचारशील, विश्लेषक और कुछ अनासक्त बनाती है। ऐसा व्यक्ति विज्ञान, गणित, तकनीक, भाषाओं या किसी ऐसे विषय की ओर जाता है जिसमें व्यवस्थित तर्क चाहिए। उसकी रचनात्मकता अनुशासन से उपजती है। शनि इस लग्न के लिए द्वादश भाव (मकर) का भी स्वामी है। द्वादश व्यय, विदेश, एकांत और मोक्ष का भाव है; इसलिए पढ़ाई का संबंध विदेश या दूर स्थानों से हो सकता है, और मन ध्यान, आध्यात्मिक अध्ययन या शोध-संस्थान जैसे शांत वातावरण में खिलता है। संतान के मामले में भी दूरी, विदेश या खर्च से जुड़े प्रसंग उभर सकते हैं। सप्तम (सिंह), एकादश (धनु) और द्वितीय (मीन) भाव शनि की दृष्टि में हैं; साझेदारी में गंभीरता, धीमे पर स्थिर लाभ और वाणी में संयम इसके संकेत हैं। बुध बली हो, तो इस शनि को अच्छा आधार मिलता है, और शनि की दशा में अध्ययन का फल ठोस रूप लेता है।
मीन लग्न: गुरु कर्क राशि में
उच्चइस लग्न के लिए शुभ
मीन लग्न के लिए यह बारहों में सबसे उल्लेखनीय स्थिति है। लग्नेश गुरु पंचम भाव में कर्क राशि में होता है, जहाँ वह उच्च का होता है। उच्च ग्रह अपने गुणों को पूरी शुद्धता से देता है, और गुरु के गुण, यानी ज्ञान, विवेक, उदारता और संतान-सुख, पंचम भाव के ही विषय हैं। परंपरा इसे पूर्व पुण्य का प्रबल संकेत मानती है। गुरु इस लग्न के लिए दशम भाव (धनु) का भी स्वामी है; लग्नेश और दशमेश एक ही ग्रह हो और वह उच्च होकर त्रिकोण में बैठे, तो कर्म-क्षेत्र भी ज्ञान, शिक्षा, परामर्श, धर्म या न्याय से जुड़ता है और प्रतिष्ठा बुद्धि से आती है। गुरु की पंचम दृष्टि नवम (वृश्चिक) पर, सप्तम दृष्टि एकादश (मकर) पर और नवम दृष्टि लौटकर लग्न पर पड़ती है, जहाँ उसकी अपनी मीन राशि है। लग्न पर लग्नेश की दृष्टि शरीर और मनोबल, दोनों को सहारा देती है, और एकादश पर दृष्टि मित्रों और आय को। उच्च गुरु भी पीड़ित हो सकता है; राहु या शनि का प्रभाव, या गुरु का अस्त होना, फल को कम करता है, और गुरु की दशा इसका सबसे स्पष्ट समय है।
कब यह स्थिति साथ देती है
यह स्थिति सबसे अधिक तब काम आती है जब लग्नेश राशि के हिसाब से बली हो (मीन लग्न में उच्च गुरु, या मेष, मिथुन, सिंह, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर और कुम्भ लग्न में मित्र राशि का लग्नेश), जब वह अस्त न हो और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो। पंचमेश का बली होना भी ज़रूरी है, क्योंकि लग्नेश उसी के घर में बैठा है। लग्नेश की दशा या अंतर्दशा में, और जब गोचर में गुरु पंचम या लग्न को देखे, तब पढ़ाई, रचना, प्रेम और संतान से जुड़े विषय आगे बढ़ते हैं। जो लोग अध्यापन, लेखन, परामर्श, कला या शोध से जीविका चलाते हैं, उन्हें यह स्थिति विशेष रूप से सहारा देती है।
कब यह स्थिति कसौटी बनती है
तनाव तब दिखता है जब लग्नेश नीच हो (वृषभ लग्न में कन्या का शुक्र, कर्क लग्न में वृश्चिक का चंद्रमा) और नीचभंग न हो, या जब शनि, राहु या केतु पंचम भाव को घेरें। तब बुद्धि वही रहती है, पर मन में बेचैनी, पढ़ाई में रुकावट या संतान से जुड़े विषयों में देरी अनुभव हो सकती है। जिन लग्नों में लग्नेश षष्ठ, अष्टम या द्वादश का भी स्वामी है (मेष, वृषभ, तुला, वृश्चिक, कुम्भ), वहाँ उस दूसरे भाव के विषय भी पंचम में आते हैं: संघर्ष, अचानक बदलाव या दूरी। यह कोई निश्चित फल नहीं, एक प्रवृत्ति है; लग्नेश का बल, शुभ दृष्टि और अनुकूल दशा इसे बहुत कुछ बदल देते हैं।
बारहों भावों में लग्नेश
जिन भावों का पृष्ठ अभी नहीं आया, उनका सार लग्नेश पृष्ठ पर है।
अपना लग्न जानें
जन्म तिथि, समय और स्थान से लग्न, लग्नेश, नवांश लग्न और चंद्र लग्न एक साथ।
लग्न कैलकुलेटरअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
लग्नेश पंचम भाव में हो तो संतान का क्या फल है?
यह स्थिति बताती है कि व्यक्ति का मन संतान से गहराई से जुड़ा रहता है, पर संतान का फल केवल लग्नेश से तय नहीं होता। इसके लिए पंचम भाव, पंचमेश, संतान के नैसर्गिक कारक गुरु, और इन तीनों पर पड़ने वाली दृष्टियाँ साथ में देखी जाती हैं; जीवनसाथी की कुंडली भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है। समय का संकेत दशा से मिलता है, विशेषकर लग्नेश, पंचमेश या गुरु की दशा-अंतर्दशा से। संतान की संख्या या कोई निश्चित समय इस एक स्थिति से नहीं बताया जा सकता।
लग्नेश पंचम भाव में हो तो पढ़ाई कैसी रहती है?
पंचम बुद्धि का भाव है, इसलिए लग्नेश यहाँ हो तो पढ़ाई में स्वाभाविक रुचि रहती है। किस विषय में मन लगेगा, यह लग्नेश की राशि बताती है: मिथुन लग्न में तुला का बुध भाषा और कला की ओर ले जाता है, मकर लग्न में वृषभ का शनि व्यावहारिक और तकनीकी विषयों की ओर, और कर्क लग्न में वृश्चिक का चंद्रमा शोध और गूढ़ विषयों की ओर। औपचारिक शिक्षा के लिए चतुर्थ भाव और बुध की स्थिति भी साथ में देखें। जिस दशा में लग्नेश या पंचमेश सक्रिय हो, उसमें पढ़ाई के निर्णायक अवसर आते हैं।
किस लग्न के लिए लग्नेश पंचम भाव में सबसे अच्छा है?
राशि के बल के हिसाब से मीन लग्न सबसे आगे है: वहाँ गुरु कर्क में उच्च होता है, दशम का भी स्वामी है, और लौटकर लग्न को देखता है। धनु लग्न भी प्रबल है, क्योंकि गुरु मित्र राशि मेष में बैठकर अपने लग्न को देखता है और चतुर्थ, यानी एक केंद्र का भी स्वामी है। कन्या लग्न में बुध लग्नेश और दशमेश, दोनों होकर त्रिकोण में है, यद्यपि सम राशि में। वृषभ और कर्क लग्न में लग्नेश नीच होता है, इसलिए वहाँ नीचभंग की शर्तें ध्यान से देखनी पड़ती हैं। अंतिम फल हर कुंडली में ग्रह के पूरे बल पर निर्भर करता है।
क्या लग्नेश पंचम भाव में राजयोग बनाता है?
अपने आप में यह राजयोग नहीं, पर एक शुभ योग की नींव ज़रूर है। शास्त्रीय राजयोग केंद्र और त्रिकोण के स्वामियों के संबंध से बनता है। लग्न केंद्र और त्रिकोण, दोनों है, इसलिए लग्नेश का पंचम में होना पहले से एक शुभ संबंध है। जिन लग्नों में लग्नेश किसी दूसरे केंद्र का भी स्वामी है, जैसे मिथुन और धनु (चतुर्थ) या कन्या और मीन (दशम), वहाँ यह संबंध और स्पष्ट हो जाता है। अगर पंचमेश बदले में लग्न में बैठा हो, तो दोनों भावों के बीच परिवर्तन योग बनता है, जो इसे और मज़बूत करता है।
लग्नेश पंचम भाव में नीच हो तो क्या फल बिगड़ जाता है?
बारह लग्नों में ऐसे दो हैं: वृषभ लग्न में शुक्र कन्या में और कर्क लग्न में चंद्रमा वृश्चिक में नीच होता है। नीच होने का अर्थ है कि ग्रह अपने गुण सहजता से नहीं दे पाता, यह नहीं कि पंचम के विषय नष्ट हो जाते हैं। सबसे पहले नीचभंग देखें: नीच राशि का स्वामी या ग्रह की उच्च राशि का स्वामी लग्न या चंद्रमा से केंद्र में हो, तो नीचता काफ़ी हद तक कट जाती है। फिर ग्रह पर शुभ दृष्टि और चल रही दशा देखें। कई कुंडलियों में नीचभंग वाला ग्रह अपनी दशा में अच्छे फल देता है।