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लग्नेश द्वादश भाव में

व्यय, विदेश और मुक्ति का भाव: हर लग्न के लिए अलग फल

हानि, विसर्जन और मोक्षदुःस्थान

जब लग्नेश द्वादश भाव में हो, तो व्यक्ति की ऊर्जा का बड़ा भाग अपने से बाहर बहता है: दूसरों पर ख़र्च, जन्मस्थान से दूर का जीवन, एकांत और भीतर की साधना। यह दुःस्थान है, इसलिए पहचान और संचय धीमे बन सकते हैं; पर बली लग्नेश यहाँ विदेश से जुड़ाव, उदार स्वभाव और गहरा आध्यात्मिक जीवन देता है।

आपका लग्नेश किस भाव में है?

जन्म तिथि, समय और स्थान भरें। आपका लग्नेश इसी भाव में हो तो आपका खंड नीचे मिलेगा।

जन्म तिथि
जन्म समय

मुफ़्त · खगोलीय गणना · लाहिरी अयनांश

लग्नेश द्वादश भाव में है, पर फल पूरी कुंडली से तय होता है।

सम्पूर्ण जन्म कुंडली रिपोर्ट आपकी कुंडली से बारहों भावेश, विंशोत्तरी दशा, योग और दोष एक साथ पढ़ती है।

सम्पूर्ण जन्म कुंडली रिपोर्ट

बारहों लग्नों के लिए लग्नेश द्वादश भाव में

हर लग्न के लिए लग्नेश कौन है, इस भाव में वह किस राशि में पड़ता है, और वहाँ उसका बल।

लग्नलग्नेशराशिबलदूसरा भाव
मेष लग्नमंगलमीनमित्र राशिअष्टम भाव
वृषभ लग्नशुक्रमेषसम राशिषष्ठ भाव
मिथुन लग्नबुधवृषभमित्र राशिचतुर्थ भाव
कर्क लग्नचंद्रमिथुनमित्र राशिकेवल लग्न
सिंह लग्नसूर्यकर्कमित्र राशिकेवल लग्न
कन्या लग्नबुधसिंहमित्र राशिदशम भाव
तुला लग्नशुक्रकन्यानीचअष्टम भाव
वृश्चिक लग्नमंगलतुलासम राशिषष्ठ भाव
धनु लग्नगुरुवृश्चिकमित्र राशिचतुर्थ भाव
मकर लग्नशनिधनुसम राशिद्वितीय भाव
कुम्भ लग्नशनिमकरस्वराशिद्वादश भाव(यहीं)
मीन लग्नगुरुकुम्भसम राशिदशम भाव

लग्नेश द्वादश भाव में: इसका अर्थ

द्वादश भाव कुंडली का अंतिम भाव है, और इसका स्वभाव छोड़ने और विसर्जित करने का है। यह व्यय, हानि, विदेश और परदेस में निवास, शय्या-सुख और नींद, अस्पताल या आश्रम जैसे एकांत स्थान, दान और अंततः मोक्ष का भाव है। लग्नेश, जो स्वयं व्यक्ति का प्रतिनिधि है, जब यहाँ आता है, तो जीवन का केंद्र अपने घर-आँगन से हटकर कहीं दूर या कहीं भीतर चला जाता है। ऐसे लोग प्रायः अपने जन्मस्थान से अलग किसी शहर या देश में जड़ें जमाते हैं, या भीड़ के बीच रहकर भी भीतर से एकांतप्रिय रहते हैं।

षष्ठ और अष्टम की तरह द्वादश भी दुःस्थान है। शास्त्रों में यहाँ लग्नेश को कठिन आसन पर माना गया है: व्यक्ति का बल अपने से अधिक दूसरों के काम आता है, ख़र्च आय से तेज़ चल सकता है, और सार्वजनिक पहचान देर से मिलती है। पर इस भाव के उपहार भी उतने ही वास्तविक हैं: विदेश में अवसर, दूसरी संस्कृतियों को अपनाने की सहजता, सेवा और दान का स्वभाव, ध्यान और साधना की ओर झुकाव, और ऐसी शांति जो वस्तुओं पर निर्भर नहीं करती। लग्नेश की राशि, उसका बल, उस पर पड़ने वाली दृष्टियाँ और चल रही दशा तय करती हैं कि कौन-सा पक्ष आगे आएगा।

मेष लग्न: मंगल मीन राशि में

मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ

मेष लग्न के लिए लग्नेश मंगल द्वादश भाव में मीन राशि में बैठता है। मीन गुरु की राशि है और मंगल के लिए मित्र राशि, इसलिए दुःस्थान में होकर भी मंगल को यहाँ सहारा मिलता है; उसकी आक्रामकता करुणा और सेवा की ओर मुड़ सकती है। मंगल इस लग्न के लिए अष्टम (वृश्चिक) का भी स्वामी है, और अष्टमेश का द्वादश में होना सरल योग का रूप लेता है, जिसे अचानक आए संकटों से उबारने वाला माना जाता है; पर मंगल लग्नेश भी है, इसलिए संकट से निकलने की यह राह आसान नहीं, धैर्य से तय होती है। ऐसे लोग अस्पताल, घर से दूर की तैनाती, विदेश में तकनीकी काम या आश्रम-जैसी किसी संस्था में अपनी ऊर्जा लगाते दिखते हैं। यहाँ से मंगल तृतीय, षष्ठ और सप्तम भाव को देखता है: साहस और भाई-बहनों के विषय, प्रतियोगिता में जुझारूपन, और जीवनसाथी से संबंधों पर उसकी सीधी छाप। द्वादश का मंगल मांगलिक दोष में गिना जाता है, इसलिए विवाह के प्रश्न पर इसे जीवनसाथी की कुंडली के साथ ही पढ़ें। गुरु बली हो, तो यह स्थिति साहस और त्याग का सुंदर मेल बनती है।

मेष लग्न के बारे में →मंगल द्वादश भाव में: सामान्य फल →

वृषभ लग्न: शुक्र मेष राशि में

सम राशिइस लग्न के लिए शुभ

वृषभ लग्न का शुक्र द्वादश भाव में मेष राशि में पहुँचता है। मेष मंगल की राशि है और शुक्र के लिए सम, इसलिए शुक्र यहाँ न विशेष बल पाता है, न दबता है; पर मेष की अधीरता उसकी कोमल रुचियों में उतावलापन ला सकती है। द्वादश शय्या-सुख और भोग का भी भाव है, और शुक्र इन विषयों का नैसर्गिक कारक है, इसलिए कई ग्रंथ द्वादश में शुक्र को सहज मानते हैं। शुक्र इस लग्न के लिए षष्ठ (तुला) का भी स्वामी है; षष्ठेश का द्वादश में जाना हर्ष योग का रूप लेता है, जिसे रोग और विरोध के विषयों को कमज़ोर करने वाला माना जाता है, यद्यपि लग्नेश के दुःस्थान में होने से शरीर की ऊर्जा का ध्यान रखना भी ज़रूरी रहता है। यहाँ से शुक्र षष्ठ भाव को देखता है, जो उसकी अपनी राशि तुला है: नौकरी, सेवा और दिनचर्या पर उसका सधा हुआ प्रभाव रहता है। व्यक्ति आराम, यात्रा, कला या विदेशी वस्तुओं पर खुलकर ख़र्च कर सकता है। मंगल और शुक्र का आपसी संबंध, और शुक्र की दशा, ख़र्च और सुख के इस संतुलन को तय करते हैं।

वृषभ लग्न के बारे में →शुक्र द्वादश भाव में: सामान्य फल →

मिथुन लग्न: बुध वृषभ राशि में

मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ

मिथुन लग्न के लिए बुध द्वादश भाव में वृषभ राशि में बैठता है। वृषभ शुक्र की राशि है और बुध का मित्र घर, इसलिए यहाँ बुध की बुद्धि व्यावहारिक रहती है और उसमें सौंदर्य-बोध भी जुड़ता है। बुध इस लग्न के लिए चतुर्थ (कन्या) का भी स्वामी है, और चतुर्थेश का द्वादश में होना जन्मभूमि से दूर बसने का एक पारंपरिक संकेत माना जाता है: घर, माता या संपत्ति के विषय किसी दूसरे शहर या देश से जुड़ सकते हैं। व्यक्ति अनुवाद, विदेशी भाषाएँ, आयात-निर्यात, लेखन या दूर बैठकर किया जाने वाला काम सहजता से करता है। यहाँ से बुध षष्ठ भाव (वृश्चिक) को देखता है, जिससे काम की जगह पर विश्लेषण की क्षमता तो बढ़ती है, पर छोटी-छोटी चिंताएँ भी बनी रह सकती हैं। ज्योतिषीय संकेतों में यहाँ नींद और मन की बेचैनी पर ध्यान रखने की बात आती है। शुक्र की स्थिति और बुध की दशा बताती हैं कि दूरी अवसर बनेगी या केवल अलगाव।

मिथुन लग्न के बारे में →

कर्क लग्न: चंद्र मिथुन राशि में

मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ

द्वादश भाव में कर्क लग्न का चंद्रमा, जिसके पास लग्न के सिवा कोई भाव नहीं, व्यक्ति के मन और भावनाओं को सीधे एकांत और दूरी की ओर ले जाता है। यहाँ चंद्रमा मिथुन राशि में है, जो बुध की राशि है और चंद्रमा के लिए मित्र राशि। मित्र राशि में चंद्रमा का मन जिज्ञासु, कल्पनाशील और कई रुचियों में एक साथ रमने वाला रहता है। द्वादश का चंद्रमा स्वप्न, ध्यान, संगीत और कल्पना की दुनिया से गहरा रिश्ता देता है; व्यक्ति को एकांत में ऊर्जा मिलती है और भीड़ जल्दी थका देती है। जल-यात्रा, विदेश में पढ़ाई या किसी सेवा-संस्था में काम के अवसर बनते हैं। यहाँ से चंद्रमा षष्ठ भाव (धनु) पर दृष्टि डालता है, इसलिए दूसरों की सेवा और सहायता में मन लगता है, पर काम का तनाव भी मन तक जल्दी पहुँचता है। इस स्थिति को स्थिर रखने में सबसे बड़ा हाथ गुरु या शुक्र की दृष्टि और चंद्रमा के बढ़ते बल का होता है।

कर्क लग्न के बारे में →चंद्र द्वादश भाव में: सामान्य फल →

सिंह लग्न: सूर्य कर्क राशि में

मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ

सिंह लग्न का स्वामी सूर्य द्वादश भाव में कर्क राशि में बैठता है। कर्क चंद्रमा की राशि है और सूर्य के लिए मित्र राशि, इसलिए सूर्य को यहाँ अपनापन मिलता है, यद्यपि द्वादश में उसका प्रकाश सार्वजनिक मंच से अधिक भीतर की ओर जाता है। दूसरा कोई भाव सूर्य के पास नहीं, इसलिए द्वादश की दूरी सीधे व्यक्ति के मान और ऊर्जा पर असर डालती है। ऐसे व्यक्ति का अधिकार अक्सर दूर की संस्थाओं, विदेशी कंपनियों, अस्पतालों या आध्यात्मिक संगठनों में दिखता है, जहाँ वह नेतृत्व करता है पर नाम कम चाहता है। पिता से स्थान या भावना की दूरी के योग भी पढ़े जाते हैं, जिन्हें नवम भाव के साथ ही परखें। यहाँ से सूर्य षष्ठ भाव (मकर) को देखता है, जो प्रतियोगिता और विरोधियों पर विजय की क्षमता देता है। ज्योतिषीय दृष्टि से आँखों और नींद का ध्यान रखना यहाँ उचित माना जाता है। चंद्रमा की स्थिति और सूर्य की दशा तय करती हैं कि यह छिपा तेज कब और कहाँ सामने आएगा।

सिंह लग्न के बारे में →सूर्य द्वादश भाव में: सामान्य फल →

कन्या लग्न: बुध सिंह राशि में

मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ

कन्या लग्न में बुध शरीर (प्रथम) और कर्म (दशम, मिथुन) दोनों का स्वामी है, और द्वादश भाव में वह सिंह राशि में बैठता है। सिंह सूर्य की राशि है और बुध के लिए मित्र राशि, इसलिए बुध की बुद्धि यहाँ आत्मविश्वास के साथ काम करती है। दशमेश का द्वादश में होना करियर को विदेश, बहुराष्ट्रीय संस्थाओं, अस्पतालों, शोध-प्रयोगशालाओं या पर्दे के पीछे के काम से जोड़ता है; व्यक्ति ऐसी जगह अधिक फलता-फूलता है जहाँ उसका काम भले कम दिखे, पर उसका असर दूर तक जाए। कभी-कभी पेशे के लिए जन्मस्थान छोड़ना पड़ता है, या काम का बड़ा भाग यात्रा में बीतता है। यहाँ से बुध षष्ठ भाव (कुम्भ) पर दृष्टि डालता है, जिससे सेवा, स्वास्थ्य-क्षेत्र या किसी व्यवस्था को सुधारने वाले काम में दक्षता बढ़ती है। ख़र्च का हिसाब रखना ऐसे व्यक्ति के लिए स्वाभाविक भी है और ज़रूरी भी। सूर्य की स्थिति और बुध की दशा दिखाती हैं कि दूर का काम पहचान लाएगा या केवल व्यस्तता।

कन्या लग्न के बारे में →

तुला लग्न: शुक्र कन्या राशि में

नीचइस लग्न के लिए शुभ

तुला लग्न के लिए यह स्थिति सबसे अधिक सावधानी से पढ़ने योग्य है, क्योंकि लग्नेश शुक्र द्वादश भाव में कन्या राशि में नीच का होता है। नीच राशि में ग्रह अपना स्वाभाविक फल पूरी तरह नहीं दे पाता: शुक्र के विषय, यानी सुख, संबंध, सौंदर्य और आराम, यहाँ अधिक आलोचनात्मक और संकोची रूप ले सकते हैं, और व्यक्ति अपने प्रति कठोर हो सकता है। पर नीच भंग की स्थितियाँ इस चित्र को बहुत बदल देती हैं, जैसे कन्या का स्वामी बुध केंद्र में हो या शुक्र के साथ बली होकर बैठा हो; इन्हें अवश्य देखें। शुक्र इस लग्न के लिए अष्टम (वृषभ) का भी स्वामी है, और अष्टमेश का कमज़ोर होकर द्वादश में बैठना कई ग्रंथों में विपरीत राजयोग का संकेत माना जाता है; पर यही शुक्र लग्नेश भी है, इसलिए उसकी नीचता व्यक्ति के अपने बल को भी छूती है और यह योग आंशिक सहारा ही देता है। यहाँ से शुक्र षष्ठ भाव (मीन) को देखता है, जो उसकी उच्च राशि है; सेवा, चिकित्सा, सौंदर्य से जुड़े काम या परोपकार में उसकी कोमलता लौट आती है। विवाह के विषय सप्तम भाव और उसके स्वामी मंगल के साथ ही परखें।

तुला लग्न के बारे में →शुक्र द्वादश भाव में: सामान्य फल →

वृश्चिक लग्न: मंगल तुला राशि में

सम राशिइस लग्न के लिए सम

वृश्चिक लग्न का मंगल द्वादश भाव में तुला राशि में जाता है, जो शुक्र की राशि है और मंगल के लिए सम। सम राशि में मंगल का स्वभाव बना रहता है, पर तुला की संतुलन-प्रियता उसकी तीक्ष्णता को कुछ नरम करती है। इस लग्न के लिए मंगल षष्ठ (मेष) का भी स्वामी है, और लग्न तथा षष्ठ के मिले-जुले स्वामित्व से उसकी कार्यात्मक भूमिका सम मानी जाती है। षष्ठेश मंगल यहाँ हर्ष योग भी बनाता है, जिससे विरोध और ऋण धीरे-धीरे ढीले पड़ सकते हैं; पर लग्नेश भी वही है, इसलिए नींद और विश्राम की अनदेखी न करें। यहाँ से मंगल तृतीय, षष्ठ और सप्तम भाव को देखता है; षष्ठ पर उसकी दृष्टि अपनी ही राशि मेष पर पड़ती है, जो प्रतियोगिता और सेवा में दृढ़ता देती है। सप्तम पर दृष्टि दांपत्य में ऊर्जा और कभी-कभी टकराव लाती है, और मांगलिक दोष की गिनती में यह स्थिति भी आती है, जिसका निर्णय विवाह-मिलान में ही होता है। व्यक्ति विदेश में साझेदारी, क़ानूनी या सैन्य सेवा, अथवा अस्पताल से जुड़े काम में आगे बढ़ सकता है। शुक्र की स्थिति और मंगल की दशा इस ऊर्जा को दिशा देती हैं।

वृश्चिक लग्न के बारे में →मंगल द्वादश भाव में: सामान्य फल →

धनु लग्न: गुरु वृश्चिक राशि में

मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ

धनु लग्न के जातक का गुरु द्वादश भाव में वृश्चिक राशि में बैठता है। वृश्चिक मंगल की राशि है और गुरु के लिए मित्र राशि, इसलिए यहाँ गुरु का ज्ञान गहन, शोधपरक और गूढ़ विषयों की ओर झुका रहता है। द्वादश स्वयं मोक्ष का भाव है, और गुरु जैसे नैसर्गिक शुभ ग्रह का लग्नेश बनकर यहाँ होना आध्यात्मिक जीवन, तीर्थ, साधना और दान के लिए बहुत अनुकूल माना जाता है। गुरु इस लग्न के लिए चतुर्थ (मीन) का भी स्वामी है, इसलिए घर और संपत्ति के विषय भी दूरी से जुड़ते हैं: विदेश में घर, या जन्मस्थान से दूर बसना। यहाँ से गुरु चतुर्थ, षष्ठ और अष्टम भाव पर दृष्टि डालता है। चतुर्थ पर दृष्टि अपनी ही राशि मीन पर है, जो घर के सुख और मन की शांति की रक्षा करती है; षष्ठ पर दृष्टि सेवा और चिकित्सा के काम में रुचि देती है; अष्टम पर दृष्टि शोध और गूढ़ विद्या में गहराई बढ़ाती है। ख़र्च उदार रहते हैं, प्रायः शिक्षा या धर्म के लिए। मंगल की स्थिति और गुरु की दशा इस फल को स्पष्ट करती हैं।

धनु लग्न के बारे में →

मकर लग्न: शनि धनु राशि में

सम राशिइस लग्न के लिए शुभ

मकर लग्न के लिए शनि द्वादश भाव में धनु राशि में है। धनु गुरु की राशि है और शनि के लिए सम, इसलिए शनि यहाँ अपना संयम बनाए रखता है और गुरु की राशि उसे धर्म और नियम की ओर मोड़ती है। शनि इस लग्न के लिए द्वितीय (कुम्भ) का भी स्वामी है, और द्वितीयेश का द्वादश में होना संचित धन के ख़र्च, परिवार से दूर रहने, या कमाई का बड़ा भाग विदेश अथवा संस्थाओं से जुड़ा होने का संकेत देता है। ख़र्च पर नियंत्रण यहाँ सीखा हुआ गुण बनता है। यहाँ से शनि द्वितीय, षष्ठ और नवम भाव को देखता है। द्वितीय पर दृष्टि अपनी ही राशि कुम्भ पर है, जो धन की रक्षा करती है और वाणी को गंभीर बनाती है; षष्ठ पर दृष्टि लंबी, थकाने वाली पर अंततः जीतने वाली मेहनत देती है; नवम पर दृष्टि धर्म, गुरुजन और लंबी यात्राओं में अनुशासन लाती है। व्यक्ति आश्रम, अस्पताल, जेल-प्रशासन या विदेशी संस्थाओं में स्थिर काम कर सकता है। गुरु की स्थिति और शनि की दशा तय करती हैं कि इस संयम का फल कैसा होगा।

मकर लग्न के बारे में →शनि द्वादश भाव में: सामान्य फल →

कुम्भ लग्न: शनि मकर राशि में

स्वराशिइस लग्न के लिए शुभ

द्वादश भाव में लग्नेश की बारहों स्थितियों में कुम्भ लग्न का यह योग राशि-बल में सबसे ऊपर है। शनि कुम्भ लग्न के लिए प्रथम और द्वादश दोनों का स्वामी है, और यहाँ वह द्वादश में अपनी ही दूसरी राशि मकर में बैठा है। स्वराशि का ग्रह अपने घर का स्वामी बनकर रहता है, इसलिए दुःस्थान का दबाव यहाँ बहुत कम हो जाता है; द्वादशेश का द्वादश में होना विमल योग भी बनाता है, जिसे संयत ख़र्च और स्वतंत्र स्वभाव से जोड़ा जाता है; फिर भी दुःस्थान का लग्नेश जीवन को घर से दूर खींच सकता है, इसलिए इसे सहज वरदान न मानें। मकर चर राशि है, इसलिए विदेश-यात्रा या दूर बसने का खिंचाव भी यहाँ प्रबल रहता है। ऐसे लोग एकांत में लंबा, अनुशासित काम कर सकते हैं: शोध, लेखन, तकनीक, किसी संस्था का संचालन या साधना। यहाँ से शनि द्वितीय, षष्ठ और नवम भाव को देखता है: कुटुंब-धन में सावधानी, सेवा और प्रतियोगिता में धैर्य, और धर्म के प्रति गंभीर, व्यावहारिक दृष्टि। फिर भी शनि की दशा में फल धीरे खुलता है, और उस पर पड़ने वाली दृष्टियाँ उसकी गति तय करती हैं।

कुम्भ लग्न के बारे में →शनि द्वादश भाव में: सामान्य फल →

मीन लग्न: गुरु कुम्भ राशि में

सम राशिइस लग्न के लिए शुभ

मीन लग्न के लिए गुरु द्वादश भाव में कुम्भ राशि में बैठता है, जो शनि की राशि है और गुरु के लिए सम। सम राशि में गुरु का शुभ स्वभाव बना रहता है, और कुम्भ उसमें मानवतावादी, समाज के लिए सोचने वाला रंग जोड़ता है। गुरु इस लग्न के लिए दशम (धनु) का भी स्वामी है, इसलिए करियर का बड़ा भाग विदेश, धर्मार्थ संस्थाओं, अस्पतालों, शिक्षा या अंतरराष्ट्रीय संगठनों से जुड़ सकता है; व्यक्ति प्रायः किसी बड़े उद्देश्य के लिए काम करता है, अपने नाम के लिए कम। यहाँ से गुरु चतुर्थ, षष्ठ और अष्टम भाव पर दृष्टि डालता है: घर और माता के सुख पर संरक्षण, सेवा के काम में निष्ठा, और गूढ़ विषयों तथा शोध में गहरी रुचि। ध्यान, प्रार्थना और एकांत में मन आसानी से टिकता है, और देने की प्रवृत्ति सहज रहती है। दूसरी ओर, उदारता के कारण ख़र्च अनियोजित हो सकते हैं, इसलिए आर्थिक योजना सोच-समझकर बनाएँ। शनि की स्थिति और गुरु की दशा बताती हैं कि यह सेवा-भाव पद भी लाएगा या केवल संतोष।

मीन लग्न के बारे में →

कब यह स्थिति साथ देती है

यह स्थिति सबसे अच्छा फल तब देती है जब लग्नेश द्वादश में स्वराशि या मित्र राशि में हो: कुम्भ लग्न में शनि अपनी स्वराशि मकर में रहता है, और मेष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या और धनु लग्न में लग्नेश मित्र राशि में। ऐसे में व्यक्ति विदेश में जड़ें जमाता है, बहुराष्ट्रीय या सेवा-संस्थाओं में सम्मान पाता है, और ध्यान, साधना और दान के मार्ग पर सहजता से चलता है। मेष, वृषभ, तुला, वृश्चिक और कुम्भ लग्न में लग्नेश किसी दुःस्थान का भी स्वामी है, इसलिए विपरीत राजयोग की झलक भी मिलती है: हानि का भाव अंततः मुक्ति और स्वतंत्रता की ओर ले जा सकता है। पर यह योग मूलतः दुःस्थान के स्वामी के लिए है; जब वही ग्रह लग्नेश हो, तो इसे पूरा वरदान नहीं, कठिनाई के बीच मिलने वाला सहारा मानें।

कब यह स्थिति कसौटी बनती है

खिंचाव तब अधिक दिखता है जब लग्नेश द्वादश में कमज़ोर हो, जैसे तुला लग्न में नीच का शुक्र, या जब वह अस्त हो या पाप ग्रहों से घिरा हो। तब ख़र्च योजना से आगे निकल सकते हैं, व्यक्ति अपनी ज़रूरतें पीछे रखकर दूसरों के लिए थक सकता है, और कहीं पूरी तरह न जुड़ पाने का भाव बना रह सकता है। ऐसे में नींद और विश्राम से जुड़े ज्योतिषीय संकेत नियमित दिनचर्या की ओर इशारा करते हैं, किसी डर की ओर नहीं। नीच भंग, शुभ दृष्टि और अनुकूल दशा इस तस्वीर को बदल देते हैं, इसलिए किसी एक ग्रह-स्थिति से पूरी कुंडली का फ़ैसला न करें; चंद्र लग्न और नवांश भी साथ देखें।

बारहों भावों में लग्नेश

अपना लग्न जानें

जन्म तिथि, समय और स्थान से लग्न, लग्नेश, नवांश लग्न और चंद्र लग्न एक साथ।

लग्न कैलकुलेटर

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लग्नेश द्वादश भाव में हो तो क्या होता है?

व्यक्ति का जीवन किसी न किसी रूप में दूरी से जुड़ता है: जन्मस्थान से दूर बसना, विदेश से संबंध, सेवा-संस्थाओं में काम, या भीतर की साधना। ख़र्च और दान की प्रवृत्ति अधिक रहती है। द्वादश दुःस्थान है, इसलिए पहचान धीरे बनती है, पर लग्नेश की राशि-स्थिति अच्छी हो तो यही स्थिति स्वतंत्रता, शांति और विदेश में सफलता देती है।

लग्नेश द्वादश भाव में हो तो क्या विदेश योग बनता है?

यह विदेश से जुड़ाव का एक प्रबल संकेत है, पर अकेले निर्णायक नहीं। विदेश-योग पढ़ने के लिए द्वादश भाव और उसका स्वामी, नवम भाव (लंबी यात्राएँ), चतुर्थ भाव (जन्मभूमि से जुड़ाव) और उसका स्वामी, राहु की स्थिति, और लग्नेश चर राशि में है या स्थिर में, यह सब साथ देखें। फिर इन ग्रहों की दशा या अंतर्दशा देखें: योग प्रायः तभी फलता है जब संबंधित ग्रहों की दशा चल रही हो।

किस लग्न के लिए लग्नेश द्वादश भाव में सबसे अच्छा है?

राशि-बल के हिसाब से कुम्भ लग्न सबसे आगे है: वहाँ शनि द्वादश में अपनी स्वराशि मकर में बैठता है। इसके बाद वे छह लग्न आते हैं जिनमें लग्नेश मित्र राशि में है: मेष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या और धनु। धनु लग्न में गुरु का द्वादश में होना आध्यात्मिक जीवन के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। सबसे अधिक सहारे की ज़रूरत तुला लग्न को है, जहाँ शुक्र नीच का होता है।

क्या लग्नेश द्वादश में हो तो धन नहीं टिकता?

ख़र्च की प्रवृत्ति अधिक रहती है, पर इसका अर्थ यह नहीं कि धन टिकेगा ही नहीं। धन का विचार द्वितीय और एकादश भाव, उनके स्वामियों और गुरु की स्थिति से होता है। यहाँ ख़र्च प्रायः विदेश, शिक्षा, स्वास्थ्य-सेवा, यात्रा या दान जैसे सार्थक कामों पर होता है। मकर लग्न में शनि द्वितीय का भी स्वामी है, इसलिए वहाँ बचत पर ख़ास ध्यान देना उचित है; साथ ही द्वितीय भाव पर शनि की अपनी दृष्टि धन को सँभालती भी है।

लग्नेश द्वादश में हो तो क्या व्यक्ति आध्यात्मिक होता है?

द्वादश मोक्ष का भाव है, इसलिए यहाँ लग्नेश प्रायः ध्यान, एकांत, तीर्थ और सेवा की ओर झुकाव देता है। यह झुकाव कितना गहरा होगा, यह लग्नेश के स्वभाव पर निर्भर है: धनु और मीन लग्न का गुरु, और कुम्भ लग्न में स्वराशि का शनि, इसे यहाँ सबसे स्पष्ट रूप देते हैं, जबकि शुक्र या मंगल इसे कला, सेवा या कर्म के रास्ते से लाते हैं। नवम भाव और केतु की स्थिति भी साथ देखें।

सूचना: यह पृष्ठ शास्त्रीय ज्योतिष सिद्धांतों पर आधारित शैक्षिक जानकारी देता है। व्यक्तिगत निर्णयों के लिए योग्य ज्योतिषी से परामर्श करें।