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लग्नेश षष्ठ भाव में

सेवा, संघर्ष और स्वास्थ्य के भाव में लग्न का स्वामी

सेवा, स्वास्थ्य और बाधाएँदुःस्थानउपचय

जब लग्नेश षष्ठ भाव में हो, तो जीवन का बड़ा भाग काम, सेवा और चुनौतियों से जूझने में बीतता है। व्यक्ति प्रतिद्वंद्वियों और कठिनाइयों के सामने हार नहीं मानता, पर स्वास्थ्य, दिनचर्या और ऋण पर नियमित ध्यान देना पड़ता है। षष्ठ दुःस्थान भी है और उपचय भी, इसलिए संघर्ष समय के साथ क्षमता में बदलता है।

आपका लग्नेश किस भाव में है?

जन्म तिथि, समय और स्थान भरें। आपका लग्नेश इसी भाव में हो तो आपका खंड नीचे मिलेगा।

जन्म तिथि
जन्म समय

मुफ़्त · खगोलीय गणना · लाहिरी अयनांश

लग्नेश षष्ठ भाव में है, पर फल पूरी कुंडली से तय होता है।

सम्पूर्ण जन्म कुंडली रिपोर्ट आपकी कुंडली से बारहों भावेश, विंशोत्तरी दशा, योग और दोष एक साथ पढ़ती है।

सम्पूर्ण जन्म कुंडली रिपोर्ट

बारहों लग्नों के लिए लग्नेश षष्ठ भाव में

हर लग्न के लिए लग्नेश कौन है, इस भाव में वह किस राशि में पड़ता है, और वहाँ उसका बल।

लग्नलग्नेशराशिबलदूसरा भाव
मेष लग्नमंगलकन्याशत्रु राशिअष्टम भाव
वृषभ लग्नशुक्रतुलास्वराशिषष्ठ भाव(यहीं)
मिथुन लग्नबुधवृश्चिकसम राशिचतुर्थ भाव
कर्क लग्नचंद्रधनुसम राशिकेवल लग्न
सिंह लग्नसूर्यमकरशत्रु राशिकेवल लग्न
कन्या लग्नबुधकुम्भसम राशिदशम भाव
तुला लग्नशुक्रमीनउच्चअष्टम भाव
वृश्चिक लग्नमंगलमेषस्वराशिषष्ठ भाव(यहीं)
धनु लग्नगुरुवृषभशत्रु राशिचतुर्थ भाव
मकर लग्नशनिमिथुनमित्र राशिद्वितीय भाव
कुम्भ लग्नशनिकर्कशत्रु राशिद्वादश भाव
मीन लग्नगुरुसिंहमित्र राशिदशम भाव

लग्नेश षष्ठ भाव में: इसका अर्थ

षष्ठ भाव को रिपु भाव भी कहते हैं। यह शत्रु और प्रतिस्पर्धा, रोग और उसका उपचार, ऋण, विवाद और मुकदमे, नौकरी, सेवा, रोज़ का काम और दिनचर्या का भाव है। इसकी गिनती दुःस्थानों (षष्ठ, अष्टम और द्वादश) में होती है, क्योंकि यहाँ जीवन की रगड़ और कठिनाइयाँ दिखती हैं। पर यही भाव उपचय भी है, यानी इसके विषयों से निपटने की क्षमता समय और अभ्यास के साथ बढ़ती है। जो व्यक्ति रोज़ थोड़ा-थोड़ा सुधार करता है, अनुशासन रखता है और समस्या से भागता नहीं, उसके लिए षष्ठ भाव प्रतिस्पर्धा में बढ़त का स्रोत बन जाता है।

लग्नेश जब इस भाव में जाता है, तो व्यक्ति का शरीर और उसकी पहचान, दोनों इस भाव के विषयों से जुड़ जाते हैं। इसलिए परंपरा इसे मिश्रित फल वाली स्थिति मानती है। एक ओर यह जुझारूपन देता है: व्यक्ति प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकलता है, रोग से उबरता है और कठिन काम को अपनाता है। दूसरी ओर लग्नेश का दुःस्थान में होना शरीर की ऊर्जा पर दबाव डाल सकता है, इसलिए स्वास्थ्य और ऋण के प्रति सजगता उचित है। यहाँ से हर लग्नेश की सप्तम दृष्टि द्वादश भाव पर पड़ती है, जो खर्च, नींद, विश्राम और दूर के स्थानों का भाव है। अंतिम फल लग्नेश की राशि, उसके बल और दशा से तय होता है।

मेष लग्न: मंगल कन्या राशि में

शत्रु राशिइस लग्न के लिए शुभ

मेष लग्न वालों का मंगल षष्ठ भाव में हो, तो वह कन्या राशि में होता है, जो बुध की राशि है और मंगल के लिए शत्रु राशि। यहाँ मंगल का जोश बारीक हिसाब, नियम और सुधार की आदत में ढलता है; व्यक्ति काम में सख़्त और गलती न सहने वाला होता है। चिकित्सा, शल्य-क्रिया, मशीनों की मरम्मत, गुणवत्ता-जाँच या कानूनी काम में यह गुण बहुत काम आता है। मंगल इस लग्न के लिए अष्टम भाव (वृश्चिक) का भी स्वामी है। अष्टमेश का षष्ठ में जाना सरल योग की श्रेणी में आता है, जिसे संकट से उबरने की क्षमता से जोड़ा जाता है; पर मंगल यहाँ लग्नेश भी है, इसलिए यह क्षमता व्यक्ति की अपनी ऊर्जा खपाकर ही मिलती है। यहाँ से मंगल की तीन दृष्टियाँ हैं: चतुर्थ दृष्टि नवम भाव (धनु) पर, सप्तम दृष्टि द्वादश भाव (मीन) पर, और अष्टम दृष्टि सीधे लग्न पर, जहाँ उसकी अपनी राशि मेष है। लग्न पर लग्नेश की दृष्टि शरीर और आत्मबल को सहारा देती है। फिर भी यह स्थिति काम के अत्यधिक दबाव, जल्दबाज़ी और थकान के प्रति सजग रहने को कहती है। मंगल की दशा में संघर्ष और जीत, दोनों सामने आते हैं।

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वृषभ लग्न: शुक्र तुला राशि में

स्वराशिइस लग्न के लिए शुभ

वृषभ लग्न के लिए शुक्र लग्न के साथ षष्ठ भाव (तुला) का भी स्वामी है, और यहाँ वह अपनी उसी दूसरी राशि तुला में बैठता है, यानी स्वराशि में। स्वराशि का ग्रह अपने घर के मालिक जैसा होता है: वह भाव को व्यवस्थित और सुरक्षित रखता है। षष्ठेश का षष्ठ में होना परंपरा में शत्रुओं पर नियंत्रण का संकेत माना जाता है। इसलिए नौकरी, सहकर्मी, प्रतिस्पर्धा और दिनचर्या व्यक्ति की पकड़ में रहते हैं, और विवाद हों भी तो प्रायः बातचीत और समझौते से सुलझते हैं, क्योंकि तुला न्याय और संतुलन की राशि है। फ़ैशन, सौंदर्य-सेवा, डिज़ाइन, होटल, कानून, मध्यस्थता या स्वास्थ्य-सेवा जैसे क्षेत्र अनुकूल रहते हैं। सप्तम दृष्टि से शुक्र द्वादश भाव (मेष) को देखता है, जिससे आराम, यात्राओं और सुख-सुविधाओं पर खर्च बढ़ने की प्रवृत्ति रहती है। लग्नेश दुःस्थान में है, इसलिए काम का बोझ बढ़ने पर शरीर को विश्राम और संतुलित खान-पान की ज़रूरत बनी रहती है, और सुख का बड़ा भाग काम से जुड़ जाता है। शुक्र की दशा में नौकरी और सेवा से उन्नति के अवसर प्रमुख रहते हैं।

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मिथुन लग्न: बुध वृश्चिक राशि में

सम राशिइस लग्न के लिए शुभ

तेज़ बुद्धि को लड़ाई का मैदान मिले, तो वह औज़ार बन जाती है। मिथुन लग्न में बुध षष्ठ भाव में वृश्चिक राशि में होता है, जो मंगल की राशि और बुध के लिए सम राशि है। व्यक्ति उलझे हिसाब, कानूनी पेच, तकनीकी दोष या किसी समस्या की जड़ ढूँढने जैसे कामों में गहराई से उतरता है। वृश्चिक का प्रभाव उसे गोपनीय और सतर्क बनाता है; वह विरोधी की चाल पहले भाँप लेता है। बुध इस लग्न के लिए चतुर्थ भाव (कन्या) का भी स्वामी है। चतुर्थेश का षष्ठ में होना बताता है कि घर, माता, वाहन या संपत्ति के मामलों में कभी काम का दबाव या विवाद आ सकता है, और घर की सुख-शांति दिनचर्या की भागदौड़ में दब सकती है। दूसरी ओर, घर से काम करना या पढ़ाई को सीधे नौकरी से जोड़ना यहाँ अच्छा चलता है। सप्तम दृष्टि से बुध द्वादश भाव (वृषभ) को देखता है, जिससे खर्च पर हिसाबी नज़र रहती है और विदेश से जुड़े काम की संभावना बनती है। ज़्यादा सोचने से मन थकता है, इसलिए विश्राम आवश्यक है। बुध की दशा में ये विषय सबसे सक्रिय होते हैं।

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कर्क लग्न: चंद्र धनु राशि में

सम राशिइस लग्न के लिए शुभ

षष्ठ भाव में कर्क लग्न का चंद्रमा मन को सीधे काम और सेवा के बीच ला खड़ा करता है; उसके पास कोई दूसरा भाव नहीं, इसलिए हर फल मन और शरीर पर ही उतरता है। यहाँ चंद्रमा धनु राशि में है, जो गुरु की राशि और चंद्रमा के लिए सम राशि है। धनु की आस्था और आशावाद मन को सहारा देते हैं: व्यक्ति कठिन काम में भी अर्थ खोजता है और सेवा को कर्तव्य मानकर अपनाता है। शिक्षण, परामर्श, चिकित्सा-सेवा, सामाजिक काम या धार्मिक संस्थाओं से जुड़ा काम उसे संतोष देता है। चंद्रमा मन का कारक है, और मन यहाँ काम और दूसरों की परेशानियों में बहुत उलझता है; इसलिए चिंता का असर दिनचर्या और स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। सप्तम दृष्टि से चंद्रमा द्वादश भाव (मिथुन) को देखता है, जिससे नींद में विचारों की हलचल और यात्रा या पढ़ाई पर खर्च दिखता है। जन्म के समय चंद्रमा पूर्णिमा के निकट हो तो मन इस संघर्ष को आसानी से झेल लेता है; अमावस्या के निकट हो तो छोटी बातें भी गहरे चुभ सकती हैं। चंद्रमा की दशा में मन की देखभाल पर विशेष ध्यान दें।

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सिंह लग्न: सूर्य मकर राशि में

शत्रु राशिइस लग्न के लिए शुभ

सिंह लग्न के लिए सूर्य का षष्ठ भाव में होना दो दिशाओं में काम करता है। सूर्य स्वभाव से पाप ग्रह गिना जाता है, और षष्ठ जैसे उपचय भाव में पाप ग्रह शत्रुओं और प्रतिस्पर्धा पर बढ़त देते हैं; व्यक्ति प्रतिद्वंद्वी के सामने झुकता नहीं। पर यहाँ सूर्य मकर राशि में है, जो शनि की राशि है और सूर्य के लिए शत्रु राशि; इसलिए उसका आत्मविश्वास कठोर अनुशासन, नियमों और वरिष्ठों की अपेक्षाओं से टकराता है। व्यक्ति प्रायः सरकारी सेवा, प्रशासन या अनुशासित संस्थाओं में लंबी मेहनत के बाद मान्यता पाता है। सूर्य केवल लग्न का स्वामी है, इसलिए सारा भार व्यक्ति के आत्मबल और ऊर्जा पर है, और काम में स्वयं को झोंक देने की आदत शरीर की ऊर्जा घटा सकती है। सप्तम दृष्टि से सूर्य द्वादश भाव (कर्क) को देखता है, जिससे विश्राम में बेचैनी और भावनात्मक कारणों से खर्च दिखता है। यह स्थिति अहंकार को सेवा में ढालने का अवसर भी देती है। सूर्य का बल, उस पर पड़ी दृष्टियाँ और सूर्य की दशा तय करती हैं कि यह संघर्ष थकाता है या निखारता है।

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कन्या लग्न: बुध कुम्भ राशि में

सम राशिइस लग्न के लिए शुभ

कन्या लग्न स्वयं सेवा और सुधार की राशि है, इसलिए लग्नेश बुध का षष्ठ भाव में आना इस स्वभाव को और गहरा करता है। यहाँ बुध कुम्भ राशि में बैठता है, जो शनि की राशि है और बुध के लिए सम राशि। व्यक्ति काम को व्यवस्थित करने, गलतियाँ पकड़ने और प्रणालियाँ सुधारने में माहिर होता है। बुध इस लग्न के लिए दशम भाव (मिथुन) का भी स्वामी है, और दशमेश का षष्ठ में होना बताता है कि करियर प्रायः नौकरी, सेवा-क्षेत्र या कड़ी प्रतिस्पर्धा वाले वातावरण में बनता है: स्वास्थ्य-सेवा, लेखा, विश्लेषण, सूचना-तकनीक, कानून, या प्रतियोगी परीक्षा से मिला पद। कुम्भ का प्रभाव बड़े संगठनों, सामाजिक संस्थाओं और तकनीकी नेटवर्क से जोड़ता है। कार्यस्थल पर होड़ तीखी रहती है, पर व्यक्ति अपनी कुशलता से आगे निकलता है। सप्तम दृष्टि से बुध द्वादश भाव (सिंह) को देखता है, जिससे विदेश या दूर के स्थान से जुड़े काम और प्रतिष्ठा पर खर्च का संकेत मिलता है। अधिक काम से मानसिक थकान का संकेत रहता है। बुध की दशा में नौकरी में बदलाव और उन्नति, दोनों संभव हैं।

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तुला लग्न: शुक्र मीन राशि में

उच्चइस लग्न के लिए शुभ

तुला लग्न के लिए यह एक विशेष स्थिति है: लग्नेश शुक्र षष्ठ भाव में मीन राशि में है, जहाँ वह उच्च का होता है। उच्च शुक्र दुःस्थान में भी अपनी कोमलता और गरिमा नहीं खोता। व्यक्ति विरोधियों से टकराने के बजाय अपने व्यवहार से उन्हें निरुत्तर कर देता है, और सेवा का काम कला की तरह करता है। चिकित्सा, देखभाल, संगीत, सौंदर्य-सेवा, आतिथ्य या परोपकारी संस्थाओं में काम अनुकूल रहता है। शुक्र इस लग्न के लिए अष्टम भाव (वृषभ) का भी स्वामी है, और अष्टमेश का षष्ठ में होना परंपरा में बाधाओं के आपस में कट जाने का संकेत माना जाता है; अचानक आई परेशानी भी अंततः किसी लाभ या सीख में बदलती है। सप्तम दृष्टि से शुक्र द्वादश भाव (कन्या) को देखता है, जिससे आराम और सुख-सुविधा पर खर्च बढ़ता है, पर कन्या की व्यावहारिकता उसे संयत रखने में मदद करती है। उच्च होने पर भी लग्नेश दुःस्थान में है, इसलिए शरीर को पर्याप्त विश्राम चाहिए, और दूसरों की मदद करते हुए अपना ध्यान छोड़ देना ठीक नहीं। शुक्र की दशा में सेवा से प्रतिष्ठा मिलने की संभावना प्रबल रहती है।

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वृश्चिक लग्न: मंगल मेष राशि में

स्वराशिइस लग्न के लिए सम

वृश्चिक लग्न के लिए मंगल की दूसरी राशि मेष षष्ठ भाव में पड़ती है, और यहाँ मंगल उसी में स्वराशि का होकर बैठा है। शास्त्रीय दृष्टि से यह बहुत प्रबल स्थिति है: षष्ठेश अपने ही भाव में हो तो वह उस भाव के कष्टों पर नियंत्रण रखता है, और मंगल जैसा योद्धा ग्रह षष्ठ भाव में स्वभाव से ही सहज है। व्यक्ति प्रतिस्पर्धा, मुकदमे, खेल या किसी भी लड़ाई में डटकर खड़ा रहता है और प्रायः जीतता है। पर इसी षष्ठेश-स्वामित्व से मंगल इस लग्न के लिए सम गिना जाता है, और दुःस्थान में बैठा लग्नेश शरीर पर भार भी डालता है। यहाँ से मंगल की अष्टम दृष्टि लग्न पर पड़ती है, जहाँ उसकी अपनी राशि वृश्चिक है; इससे सहनशक्ति और रोग से उबरने की क्षमता बढ़ती है। चतुर्थ दृष्टि नवम भाव (कर्क) पर पिता या गुरु से खरी बातचीत दिखाती है, और सप्तम दृष्टि द्वादश भाव (तुला) पर खर्च में आवेग। सेना, पुलिस, चिकित्सा, खेल-प्रशिक्षण या सुरक्षा का काम अनुकूल है। ज़्यादा जोश में चोट या थकान से बचें। मंगल की दशा में विरोधियों पर जीत के योग स्पष्ट होते हैं।

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धनु लग्न: गुरु वृषभ राशि में

शत्रु राशिइस लग्न के लिए शुभ

शिक्षक का स्वभाव, सुख की राशि और संघर्ष का भाव: धनु लग्न के गुरु का षष्ठ भाव में वृषभ राशि में होना इन तीनों को साथ लाता है। वृषभ शुक्र की राशि है और गुरु के लिए शत्रु राशि; गुरु का ज्ञान यहाँ धन, भौतिक सुख और खान-पान के प्रश्नों से घिरा रहता है। फिर भी गुरु की सहज भलाई सेवा के काम में अच्छा फल देती है: अध्यापन, परामर्श, कानून, बैंकिंग, पोषण या स्वास्थ्य-सेवा। परंपरा के अनुसार षष्ठ का गुरु विरोधियों को नरम करता है, पर खान-पान में संयम माँगता है। गुरु इस लग्न के लिए चतुर्थ भाव (मीन) का भी स्वामी है, इसलिए घर, संपत्ति या वाहन से जुड़े विवाद या ऋण, और माता के स्वास्थ्य की चिंता कभी सामने आ सकती है। यहाँ से गुरु की पंचम दृष्टि दशम भाव (कन्या) पर पड़ती है, जो करियर में सेवा-भाव और विश्लेषण की शक्ति देती है; सप्तम दृष्टि द्वादश भाव (मेष) पर धर्म-कार्य या यात्रा पर खर्च दिखाती है; नवम दृष्टि द्वितीय भाव (मकर) पर वाणी में संयम और परिवार के धन में धीमी वृद्धि देती है। गुरु की दशा में काम का दायरा बढ़ता है।

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मकर लग्न: शनि मिथुन राशि में

मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ

मकर लग्न के लिए षष्ठ भाव में शनि परिश्रम की सबसे पक्की नींव डालता है। शत्रु, रोग और ऋण, षष्ठ के इन तीनों विषयों पर शनि धीमी पर पक्की पकड़ बनाता है, क्योंकि धीरज ही उसका हथियार है। यहाँ शनि मिथुन राशि में है, जो बुध की राशि और शनि के लिए मित्र राशि है; इसलिए उसका धैर्य बुद्धि और योजना से जुड़ता है। व्यक्ति लंबे, उबाऊ, पर ज़रूरी कामों को निपटाने में सबसे भरोसेमंद होता है: लेखा, आँकड़े, कानून, सरकारी सेवा या अभियांत्रिकी की बारीकियाँ। शनि इस लग्न के लिए द्वितीय भाव (कुम्भ) का भी स्वामी है, इसलिए कमाई प्रायः नौकरी और सेवा से आती है, और परिवार के धन का कुछ भाग ऋण चुकाने या स्वास्थ्य पर खर्च में भी जा सकता है। शनि की तृतीय दृष्टि अष्टम भाव (सिंह) पर शोध और गहरी जाँच में धैर्य देती है; सप्तम दृष्टि द्वादश भाव (धनु) पर खर्च में अनुशासन लाती है; दशम दृष्टि तृतीय भाव (मीन) पर प्रयास को निरंतरता और भाई-बहनों के प्रति ज़िम्मेदारी देती है। शनि की दशा में मेहनत का फल देर से, पर टिकाऊ रूप में मिलता है।

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कुम्भ लग्न: शनि कर्क राशि में

शत्रु राशिइस लग्न के लिए शुभ

बाहर अनुशासन, भीतर भावनाएँ: कुम्भ लग्न के शनि का षष्ठ भाव में होना यही चित्र बनाता है। यहाँ शनि कर्क राशि में बैठता है, जो चंद्रमा की राशि और शनि के लिए शत्रु राशि है। कर्क भावनाओं की राशि है और शनि ठंडे, संयमी अनुशासन का ग्रह; इसलिए व्यक्ति काम का बोझ चुपचाप उठाता है, पर भीतर भावनात्मक थकान जमा कर सकता है। देखभाल, अस्पताल, खाद्य, आवास या समाज-कल्याण के काम में वह बेहद निष्ठावान रहता है। शनि इस लग्न के लिए द्वादश भाव (मकर) का भी स्वामी है, और द्वादशेश का षष्ठ में जाना विमल योग है, जिसे कष्ट काटने वाला माना जाता है; पर शनि लग्नेश भी है, इसलिए यह राहत धीरज की परीक्षा के बाद आती है; विदेश, दूर के स्थान या बड़ी संस्थाएँ काम का क्षेत्र बन सकती हैं। शनि की सप्तम दृष्टि द्वादश भाव में उसकी अपनी राशि मकर पर पड़ती है, जो खर्च पर नियंत्रण देती है। तृतीय दृष्टि अष्टम भाव (कन्या) पर शोध में धैर्य देती है, और दशम दृष्टि तृतीय भाव (मेष) पर प्रयास में अधीरता और धैर्य के बीच संतुलन माँगती है। शनि की दशा में नियमित दिनचर्या ही सबसे बड़ा सहारा बनती है।

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मीन लग्न: गुरु सिंह राशि में

मित्र राशिइस लग्न के लिए शुभ

करियर की दृष्टि से षष्ठ भाव में लग्नेश की सबसे अच्छी स्थितियों में से एक मीन लग्न की है। यहाँ गुरु लग्नेश और दशमेश दोनों है, और षष्ठ भाव में वह सिंह राशि में होता है, जो सूर्य की राशि और गुरु के लिए मित्र राशि है। मित्र की राशि में गुरु आत्मविश्वास से काम करता है: व्यक्ति सेवा के क्षेत्र में नेतृत्व की भूमिका लेता है, जैसे अस्पताल या विद्यालय का प्रबंधन, कानूनी सलाह या परामर्श। सबसे उल्लेखनीय बात इसकी पंचम दृष्टि है, जो दशम भाव में गुरु की अपनी राशि धनु पर पड़ती है; दशमेश अपने कर्म-भाव को देखे, तो करियर को स्थायी सहारा मिलता है। इसलिए यहाँ षष्ठ का संघर्ष प्रायः करियर की सीढ़ी बनता है: प्रतियोगी परीक्षाएँ, कठिन नौकरी या प्रतिद्वंद्वियों से मुकाबला व्यक्ति को ऊपर उठाते हैं। सप्तम दृष्टि द्वादश भाव (कुम्भ) पर समाज-सेवा और दूर के स्थानों पर खर्च दिखाती है, और नवम दृष्टि द्वितीय भाव (मेष) पर वाणी में स्पष्टता और परिवार का धन बढ़ाने की प्रवृत्ति देती है। फिर भी काम के बोझ में शरीर की अनदेखी न करें। गुरु की दशा में ये संकेत सबसे स्पष्ट दिखते हैं।

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कब यह स्थिति साथ देती है

यह स्थिति सबसे अच्छा फल तब देती है जब लग्नेश बली हो, जैसे तुला लग्न के लिए मीन में उच्च शुक्र, या वृषभ और वृश्चिक लग्न में अपनी ही दूसरी राशि में बैठा लग्नेश। तब व्यक्ति प्रतिस्पर्धा में टिकता है, कठिन परीक्षाएँ निकालता है, कार्यस्थल की राजनीति से निपट लेता है और रोग से जल्दी उबरता है। चिकित्सा, नर्सिंग, कानून, पुलिस, सेना, लेखा, सरकारी सेवा, खेल और समाज-सेवा जैसे क्षेत्र अनुकूल रहते हैं। जो व्यक्ति नियमित दिनचर्या रखता है, उसके लिए षष्ठ भाव का उपचय गुण पूरी तरह खुलता है, और लग्नेश की दशा में की गई मेहनत पद और प्रतिष्ठा में बदलती है।

कब यह स्थिति कसौटी बनती है

यह स्थिति तब खिंचाव देती है जब लग्नेश शत्रु राशि में हो या पाप ग्रहों से पीड़ित हो, जैसे मेष, सिंह, धनु और कुम्भ लग्न में शत्रु राशि का लग्नेश। तब काम का बोझ, सहकर्मियों से खींचतान, ऋण लेने की प्रवृत्ति या बिगड़ी दिनचर्या से थकान के संकेत रहते हैं। स्वास्थ्य से जुड़ी बातें यहाँ केवल ज्योतिषीय संकेत हैं, निदान नहीं; शरीर से जुड़ी किसी भी चिंता में डॉक्टर की सलाह ही आधार है। इस स्थिति से डरने की आवश्यकता नहीं: षष्ठ उपचय भाव है, और अनुशासन, समय पर विश्राम और सोचा-समझा खर्च इसके कठिन पहलुओं को काफ़ी हल्का कर देते हैं। चल रही दशा बताती है कि ये विषय कब प्रमुख होंगे।

बारहों भावों में लग्नेश

अपना लग्न जानें

जन्म तिथि, समय और स्थान से लग्न, लग्नेश, नवांश लग्न और चंद्र लग्न एक साथ।

लग्न कैलकुलेटर

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लग्नेश षष्ठ भाव में हो तो क्या होता है?

व्यक्ति का जीवन काम, सेवा और प्रतिस्पर्धा के इर्द-गिर्द चलता है। वह कठिनाइयों और विरोधियों से जूझकर आगे बढ़ता है और प्रायः नौकरी या सेवा-क्षेत्र में अपनी जगह बनाता है। साथ ही स्वास्थ्य, दिनचर्या और ऋण पर ध्यान रखना पड़ता है। लग्नेश की सप्तम दृष्टि द्वादश भाव पर होने से खर्च और विश्राम भी इस स्थिति का हिस्सा हैं।

क्या लग्नेश षष्ठ भाव में अशुभ है?

इसे सीधे अशुभ कहना ठीक नहीं; यह मिश्रित स्थिति है। षष्ठ दुःस्थान है, इसलिए लग्नेश यहाँ शरीर और ऊर्जा पर दबाव डाल सकता है, पर यह उपचय भी है, इसलिए समय के साथ लड़ने की क्षमता बढ़ती है। लग्नेश बली हो, जैसे तुला लग्न का उच्च शुक्र या वृषभ और वृश्चिक लग्न का स्वराशि लग्नेश, तो यह स्थिति विरोधियों पर जीत देती है।

लग्नेश षष्ठ भाव में हो तो स्वास्थ्य कैसा रहता है?

ज्योतिष में यह स्थिति स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने का संकेत है, किसी रोग का निदान नहीं। लग्नेश बली हो तो रोग से उबरने की क्षमता अच्छी रहती है; मेष और वृश्चिक लग्न में मंगल की दृष्टि लग्न पर होने से सहनशक्ति बढ़ती है। शत्रु राशि का या पीड़ित लग्नेश थकान और दिनचर्या बिगड़ने का संकेत देता है। स्वास्थ्य की किसी भी चिंता में डॉक्टर से सलाह लें।

किस लग्न के लिए लग्नेश षष्ठ भाव में सबसे अच्छा है?

तुला लग्न के लिए, जहाँ शुक्र मीन में उच्च होता है, और वृषभ तथा वृश्चिक लग्न के लिए, जहाँ लग्नेश अपनी ही दूसरी राशि में स्वराशि का होता है। मकर लग्न में शनि मित्र राशि मिथुन में और मीन लग्न में गुरु मित्र राशि सिंह में भी अच्छा फल देते हैं; मीन लग्न में गुरु दशम भाव में अपनी राशि को देखकर करियर को सहारा देता है।

लग्नेश षष्ठ भाव में हो तो नौकरी अच्छी रहती है या व्यापार?

षष्ठ भाव नौकरी और सेवा का भाव है, इसलिए यह स्थिति प्रायः नौकरी, सेवा-क्षेत्र या प्रतियोगिता से मिले पद की ओर झुकाव देती है। कन्या और मीन लग्न में लग्नेश दशम भाव का भी स्वामी है, इसलिए वहाँ यह झुकाव और स्पष्ट होता है। अंतिम निर्णय के लिए दशम और सप्तम भाव, उनके स्वामी और चल रही दशा को साथ देखें।

सूचना: यह पृष्ठ शास्त्रीय ज्योतिष सिद्धांतों पर आधारित शैक्षिक जानकारी देता है। व्यक्तिगत निर्णयों के लिए योग्य ज्योतिषी से परामर्श करें।